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Saturday, January 12, 2008

जरूरी है परमाणु समझौते को रद्द करना


-नॉंम चौमस्की
प्रजातियों का जीवन दांव पर लगा है। इस स्वीकारोक्ति के साथ आगे बढ़ने का एक बेहतर तरीका है सार्वभौमिक परमाणु निरस्त्रीकरण की जरूरत की ओर कदम बढ़ाया जाय।

नाभिकीय शस्त्र रखने और बनाने वाले राज्य अपराधिक राज्य हैं। हालांकि वो परमाणु हथियारं को नष्ट करने वाली परमाणु अप्रसार संधि के धारा 6 को भी मानते हैं। इस कानून पर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का भी ठप्पा है। यह न्यायालय परमाणु हथियारों को पूरी तरह नाश करने के लिए अच्छी नियत के साथ बातचीत चलाने की अपील करता है। लेकिन किसी भी परमाणु हथियार संपन्न राज्य ने इसे नहीं माना है। संयुक्त राज्य अमेरिका इसे नकारने वालों का मुखिया है। खासकर बुश प्रशासन जो ये मानता है कि यह धारा 6 का विषय ही नहीं है।

27 जुलाई को वांशिंगटन ने भारत के साथ एक समझौता किया। यह समझौता एनपीटी मुख्य हिस्से को ही खा गया। इसका दोनों ही देशों में पुरजोर विरोध हुआ है। इज़रायल और पाकिस्तान की तरह (लेकिन इरान से अलग) भारत भी एनपीटी का हस्ताक्षरकर्ता देश नहीं हैं। संधि को धत्ता बताते हुए इसने नाभिकीय हथियारों को विकसित कर लिया है। हाल के समझौते से बुश प्रशासन इस अलग किस्म (कानून से बाहर) के व्यवहार को प्रभावी रूप से समर्थन और सुविधा प्रदान करता है। यह समझौता संयुक्त राज्य के कानून का भी उल्लघंन करता है और परमाणु हथियारों की आपूर्ति करने वाले ग्रुप को अनदेखा करता है। ऐसे 45 देश हैं जिन्होने परमाणु हथियार प्रसार के खतरे को कम करने के लिए कड़े नियमों को स्थापित किया है।
आर्म्स कट्रोल एसोसिएशन के कार्यकारी निदेशक डेरिल किम्बॉल कहते हैं कि "यह समझौता भारत की ओर से भविष्य में किए जाने वाले नाभिकीय परिक्षण को नहीं रोकता है। यह समझौता आश्चर्यजनक रुप से भारत के परमाणु परीक्षण करने पर वाशिंगटन, नई दिल्ली को दूसरे देशों से ईधन हासिल करने के लिए प्रतिबद्ध करता है। " यह भारत को "बम बनाने के लिए सीमित घरेलु सप्लाई को भी मुक्त करने" की छूट देता है। ये सभी कदम अंतर्राष्ट्रीय अप्रसार संधियों का सीधा-सीधा उल्लघंन करते हैं।
भारत-अमेरिका परमाणु समझौता दूसरों को भी इस तरह के नियमों को तोडने के लिए संभावित रुप से उकसाता है। ऐसी चर्चा है कि पाकिस्तान नाभिकीय हथियारों के लिए एक प्लुटोनियम उत्पादक रिऐक्टर बनाने जा रहा है। ऐसा लगता है कि हथियारों के रुपों की एक ज्यादा उन्नत अवस्था की शुरुआत हो रही है। क्षेत्रीय नाभिकीय महाशक्ति इजराइल भारत की तरह विशेषाधिकार के लिए कांग्रेस के साथ गुटबाजी करता आ रहा है। उसने नियमों से छूट पाने के निवेदन के साथ परमाणु आपूर्ति समूह से भी संपर्क साधा है। अब फ्रासं रुस और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने भारत के साथ परमाणु समझौता करने की तरफ कदम बढ़ा चुके हैं। चीन का पाकिस्तान के साथ है और यह चौंकाने वाली बात है कि किसी समय के सार्वभौमिक महाशक्ति नें दरवाजे खोल दिये हैं।
भारत-अमेरिका समझौता सैन्य और वाणिज्यिक दोनों उद्देश्यों को एक कर देता है। परमाणु हथियारों के विशेषज्ञ गैरी मिल्होलीन ने सेक्रेटरी ऑफ स्टेट कोन्डोलिजा राइस के द्वारा कांग्रेस को दी गयी सफाई को उल्लेखित करते हैं कि समझौता "निजी क्षेत्र को दृढतापूर्वक ध्यान में रख कर बनाया" गया था, खासकर हवाईजहाज और रिऐक्टर्स बनाने वाली कंपनियों के। मिल्होलिन जोर देते हुए कहते हैं कि उसमें सैन्य ऐयरक्राफ्ट शामिल है। इसके अलावा वो आगे कहते हैं कि परमाणु युद्ध के खिलाफ खड़ी रुकावटों को कम आंकने से समझौता न केवल क्षेत्रीय तनाव बढाता है बल्कि "उस दिन की तरफ भी शीघ्रता से बढ़ता है जब एक परमाणु विस्फोट एक अमेरिकी शहर को नष्ट कर देगा"। वाशिगंटन का संदेश हैं कि "संयुक्त राज्य के लिए पैसे की तुलना में आपात नियंत्रण कम महत्वपूर्ण हैं"—अर्थात्, संयुक्त राज्य के व्यापरिक मण्डल के लिए लाभ जरूरी है—चाहे संभावित खतरे कुछ भी हों। किम्बॉल कहते हैं कि संयुक्त राज्य भारत को "एनपीटी पर करार करने वाले देशों के मुकाबले परमाणु व्यापार की ज्यादा सुविधाजनक शर्तें" प्रदान कर रहा है। दुनिया में बहुत कम लोग होंगे जो जो इस कुटिलता को देखने में असफल हैं। वाशिंगटन उन सहयोगियों और ग्राहकों को पुरस्कृत करता है जिन्होने एनपीटी नियमों को पूरी तरह अनदेखा किया है। जबकि इरान के विरुद्ध युद्ध की धमकी दे रहा है जो चरम उकसाव के बाद भी एनपीटी के उल्लघंन के लिए नहीं जाना जाता। अमेरिका ने इरान के दो पड़ोसियों पर कब्जा किया है।1979 में अमेरिकी नियंत्रण से मुक्त होने के बाद से वह खुले तौर पर इरानी राज्य को उखाड फैकने का प्रयास करता रहा है।
पिछले कुछ सालों से भारत और पाकिस्तान ने अपने बीच तनावों को कम करने की दिशा में प्रगति की है। लोगों के बीच संपर्क बढ़ा है और सरकारें दोनों राज्यों को अलग करने वाले कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार-विमर्श कर रहीं है। लेकिन उम्मीद जगाने वाली यह प्रगति भारत-अमेरिकी परमाणु समझौते से उलट भी सकती है। इस पूरे क्षेत्र में विश्वास पैदा करने वाले माध्यमों में से एक था इरान से लेकर पाकिस्तान से होकर भारत में प्राकृतिक गैस पाइपलाइन का निर्माण था। "शान्ति पाइपलाइन" क्षेत्र को एक सूत्र में बांध दी होती और आगे भी शान्तिपूर्ण एकीकरण की संभावनाओं का द्वार खोलती। पाइपलाइन के जरिए जो उम्मीद लग रही है वह भारत-अमेरिकी समझौते की बलि चढ सकती है। वाशिंगटन भारत को इरानी गैस के बदले में नाभिकीय शक्ति को प्रस्तावित करने की रणनीति को दुश्मन को अलग-थलग करने के एक उपाय की तरह देखता है।
भारत-अमेरिका परमाणु समझौता वाशिगंटन के ईरान को अलग-थलग करने की रणनीति का ही हिस्सा है। 2006 में अमेरिकी कांग्रेस ने हाईड एक्ट पारित किया । यह एक्ट विशेषरुप से मांग करता है कि अमेरिकी सरकार " इरान के सामूहिक विनाश वाले हथियारों को हासिल करने के प्रयास के लिए हतोत्साहित करने, अलग-थलग करने और अगर जरुरी हो तो प्रतिबन्ध लगाने और रुकावट डालने के प्रयासों में भारत की पूरी और सक्रीय भागीदारी सुनिश्चित करे" ।
यह गौर करने वाली बात है कि बड़ी संख्या में अमेरिकी और इरानी जनता इजरायल और इरान को शामिल करते हुए इस पूरे क्षेत्र को ही नाभिकीय हथियार मुक्त क्षेत्र में बदलने के पक्ष में है। 3 अप्रैल, 1991 के संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का प्रस्ताव 687 तो बहुत से लोगों को याद होगा । जो कि मांग करता है कि " मध्य पूर्व में सामूहिक विनाश वाले हथियारों और उनको संचालित करने वाली सभी मिशाइलों से मुक्त क्षेत्र की स्थापना की जाय।" अमेरिका ने इराक पर अपने आक्रमण की सफाई के दौरान नियमित रुप से इस अपील का सहारा लेता रहा है।
अनुवाद-नूतन मौर्या

Wednesday, January 2, 2008

दंभी लोगों की गूंज है फिल्म 300


-विनिता
३०० की ऎतिहासिक पृष्ठभूमि एक बात है लेकिन उसका फिल्मी रुपान्तरण सिर्फ तथ्यों को नही रखता। इरानी सेना को दैत्यों, जादूगरों और पशुवत लोगों से भरा दिखाकर यह फिल्म जो कह रही है उसको समझने में किसी भी न्यूनतम राजनैतिक समझदारी रखने वाले को दिक्कत नहीं होनी चाहिए। फिल्म में लियोनायडस के जरिये कही गई बात कि दुनिया में सभ्यता और स्वतंत्रता कि आखरी उम्मीद स्पार्टा है,में निश्चित तौर से आज के पश्चिमी महाबलियों कि भाषा की दंभी गूंज सुनी जा सकती है। इतिहास कि इस तरह कि तोड़-मरोड़ का हर तरह से प्रतिरोध होना चाहिए, निश्चित तौरपर सांस्कृतिक रुपों में भी, जिसका ईरानी संगीतकार यास एक अच्छा उदाहरण पेश करते हैं।

जो इतिहास है सो है...

इतिहास पर फिल्म बनाना वर्तमान को आइना दिखाना होता है। उसे सबक देना होता है। एक विषय के रूप में भी शायद इतिहास की जरूरत हमें इसीलिए होती है। फिल्म चाहे पचास बार बनाई जाय उसका मूल्यांकन उसके देखे जाने वाले समय के हिसाब से होगा। हिटलर के समय यहूदियों पर हुए अत्याचार के जरिए हम आज इजराइल की हरकत को वाजिब नहीं ठहरा सकते। लेकिन अमित जी मानते हैं कि ऐसा नहीं होता। वे 300 को ऐतिहासिक रूप से सही मानते हैं। इतिहास तो इतिहास है उसे बताने या दिखाने से संस्कृति कैसे नष्ट हो सकती है? अमित जी का यही सवाल है।

अमित जी लिखते हैं...
जनाब, यदि यहाँ देखेंगे तो यह आपको पता चलेगा कि इस कहानी पर फिल्म आज से 45 वर्ष पहले भी बनी है। यह कहानी ऐसी है कि उस समय के बाद से युद्ध विज्ञान और रणनीती के हर स्कूल में इसका अध्ययन किया गया है, आज भी होता है।

इस फिल्म में दिखाया गया है कि उस युद्ध में किस तरह स्पार्टा की 300 सैनिकों की एक छोटी सी सेना ने तत्कालीन पर्सिया (आधुनिक ईरान)को नेस्तनाबुत किया था

आपका पता नहीं पर मैंने यह फिल्म भी देखी है और 45 वर्ष पूर्व आई 300 Spartans भी देखी है और दोनों में से किसी फिल्म में यह नहीं दिखाया कि स्पार्टा के ३०० सैनिकों ने पर्शिया को नेस्तेनाबूद किया। दोनों में सिर्फ़ स्पार्टा के ३०० बहादुरों और थेस्पिआ के ७०० रणबांकुरों(यह 300 में नहीं वरन्‌ 300 Spartans में दिखाया है और इतिहास के अनुसार सत्यता के निकट है) की वीरता दिखाई है कि वे ज़र्कसीस की सागर जैसी सेना के सामने डटे रहे और लड़ते हुए प्राण त्यागे। और यह इतिहास में दर्ज है कि थरमाप्ली की भीषण लड़ाई के बाद प्लैटेया पर ज़र्कसीस की बाकी सेना का मुकाबला अन्य यूनानी राज्यों की सेनाओं से हुआ था और ज़र्कसीस की सेना की इतनी मारकाट हुई थी कि वह आखिरकार अपनी सेना छोड़ के वापस पर्शिया भाग गया था।

अब जो इतिहास है सो है, उससे किसी की संस्कृति कैसे नष्ट होती है यह मेरे को समझ नहीं आता। कल को कोई फिल्म बनाता है जिसमें दिखाता है कि डेढ़ सौ वर्ष भारत अंग्रेज़ों का गुलाम रहा और कैसे अंग्रेज़ों ने भारतीयों का शोषण किया तो क्या उससे भारत की संस्कृति नष्ट हो जाएगी? या कोई यह फिल्म बनाता है कि कैसे बाबर ने दिल्ली का तख्त हासिल किया और मुग़ल सल्तनत की नींव रखी तो उससे भारत की संस्कृति नष्ट हो जाएगी?

Sunday, December 30, 2007

फिल्म ३०० के खिलाफ


मध्य एशिया पर लगाई गई गिद्ध दृष्टि में अगला संभावित शिकार है ईरान। जिसकी नींव सांस्कृतिक स्तर पर रखी जा चुकी है। यकीन न हो तो हालीवुड़ की फिल्म '300' देख लें। अचानक हालीवुड को 480 ईसा पूर्व थर्मोपिलई के युद्ध की याद क्यो आई इसे आप बखूबी समझ सकते हैं। फ्रैंक मिलर के उपन्यास पर आधारित इस फिल्म में 480 ईसा पूर्व हुए थर्मोपिलई के युद्ध का वर्णन है। निर्माता वार्नर ब्रदर्स की इस फिल्म में दिखाया गया है कि उस युद्ध में किस तरह स्पार्टा की 300 सैनिकों की एक छोटी सी सेना ने तत्कालीन पर्सिया (आधुनिक ईरान)को नेस्तनाबुत किया था।
दुनिया भर में जनमत बनाने की कमान सभ्यता के ऐसे ही लुटेरों और दंभियों के जिम्मे है। लेकिन इस सांस्कृतिक हमले का विरोध शुरू हो चुका है। इस फिल्म के प्रतिरोध में ईरानी संगीतकार और लेखक यास ने एक बेहतरीन गीत लिखा है...



अग्रेजी अनुवाद
Listen. I want to tell you my intent
They want to erase my identity
The history of the land of the Aryans
Is screaming until we come to it
So now is the time for you to hear
Iran is my land the
The country which after 7000 years
Is still standing
And the hearts of Iranians – still like the sea
Hear this, my fellow Iranian, from YAS
I too for my land stand like a soldier
Hold Iran like a gem in your hand and say
My complaint will burst out like a shot
Let's stand together and sing our anthem
My sisters, my brothers, my fellow Iranians
Iran's civilization is in danger
All of us are soldiers beneath our flag
We won't let anyone spread lies about us
For us Iranians it is our calling
That we wear the symbol of 'Farvahar' around our necks
Our unity against an enemy is the cause of their distress
Iran's name for us is an honor
And our respect for her is like a thorn in eye for those
Who want to injure her

CHORUS:

- Like the thirst of a seed [wheat] for water
- Like the dampness of rain, the smell of earth
- Like you, pure eyes, like the feeling of its earth, for you
- My land. Singing for you is in my heart
- Singing of my land, is my feeling
- My love - the earth of this land – Iraaaan.

You want to say that we came from generations of Barbarians?
So take a look then to Takht Jamshid!
You're showing Iran's name in vein
So yours could be written big on a cover of a CD [DVD}?
I'm writing down your intentions in my book
I know why you wrote this film "300"
I know that your heart is made of stone and lead
Instead of using your art to make a culture of peace
In this sensitive air and bad atmosphere
You want to start fishing in murky waters [profiting]
But this I tell you in its original language
Iran will never be spoiled and surrendered
God has given you two eyes to see
Take a look and read the books written by
Saadi and Ibn-e-Sina, Ferdosi, Khayam or Molana Rumi
Always throughout history we were the start [on top]
But now YAS can't sit down quietly
Let Iran's name be marred by a few tricksters
I'll shred your intentions with the "razor of hope"
Who are YOU to speak of the history of Iran?

- CHORUS -

It was Cyrus The Great that started the peace
Freeing the Jewish from the grip of Babylon
Cyrus The Great wrote the first bill of human rights
That is why I carry my esteem and great pride
For my Iran. The history of my land
For the earth of this land which my body is from
Whatever part of the world you live my fellow Iranian
And till your blood flows through you
Don't allow yourself to be satisfied
That anyone can fool around with your heritage
The history of Iran is my identity
Iran – protecting your name is my good intent

Wednesday, December 26, 2007

शासक बनने की इच्छा


वहाँ एक पेड़ था

उस पर कुछ परिंदे रहते थे

पेड़ उनकी आदत बन चुका था

फिर एक दिन जब परिंदे आसमान नापकर लौटे

तो पेड़ वहाँ नहीं था

फिर एक दिन परिंदों को एक दरवाजा दिखा

परिंदे उस दरवाजे से आने-जाने लगे

फिर एक दिन परिंदों को एक मेज दिखी

परिंदे उस मेज पर बैठकर सुस्ताने लगे

फिर परिंदों को एक दिन एक कुर्सी दिखी

परिंदे कुर्सी पर बैठे

तो उन्हें तरह-तरह के दिवास्वप्न दिखने लगे

और एक दिन उनमें

शासक बनने की इच्छा जगने लगी !
-राजेश जोशी

Sunday, December 23, 2007

दांये हांथ की नैतिकता


-धुमिल

सहमति...
नहीं यह समकालीन शब्द नहीं है
इसे बालिगों के बीच चालू मत करो
जंगल से जिरह करने के बाद
उसके साथियों ने उसे समझाया कि भूख
का इलाज सिर्फ नींद के पास है!
मगर इस बात से वह सहमत नहीं था
विरोध के लिये सही शब्द पटोलते हुए
उसनें पाया कि वह अपनी जुबान
सहुवाइन की जांघ पर भूल आया है
फिर भी हकलाते हुए उसने कहा-
मुझे अपनी कविताओं के लिये
दूसरे प्रजातंत्र की तलाश है
सहसा तुम कहोगे और फिर एक दिन-
पेट के इसारे पर
प्रजातंत्र से बहर आकर
वाजिब गुस्से के साथ अपनें चेहरे से
कूदोगे
और अपने ही घूँसे पर
गिर पड़ोगे|
क्या मैनें गलत कहा? अखिरकार
इस खाली पेट के सिवा
तुम्हारे पास वह कौन सी सुरक्षित
जगह है,जहाँ खड़े होकर
तुम अपने दाहिने हाँथ की
शाजिस के खिलाफ लड़ोगे?
यह एक खुला हुआ सच है कि आदमी-
दांये हांथ की नैतिकता से
इस कदर मजबूर होता है
कि तमाम उम्र गुज़र जाती है मगर गाँड़
सिर्फ बांया हाथ धोता है
और अब तो हवा भी बुझ चुकी है
और सारे इश्तिहार उतार लिये गये है
जिनमें कल आदमी-
अकाल था! वक्त के
फालतू हिस्सों में
छोड़ी गयी फालतू कहांनियाँ
देश प्रेम के हिज्जे भूल चुकी है
और वह सड़क
समझौता बन गयी है
जिस पर खड़े होकर
कल तुमने संसद को
बाहर आने के लिये आवाज़ दी थी
नहीं,अब वहाँ कोई नहीं है
मतलब की इबारत से होकर
सब के सब व्यवस्था के पक्ष में
चले गये है|लेखपाल की
भाषा के लंबे सुनसान में
जहाँ पालों और बंजरों का फर्क
मिट चुका है चंद खेत
हथकड़ी पहनें खड़े है|

और विपक्ष में-
सिर्फ कविता है|
सिर्फ हज्जाम की खुली हुई किस्मत में एक उस्तूरा- चमक रहा है
सिर्फ भंगी का एक झाड़ू हिल रहा है
नागरिकता का हक हलाल करती हुई
गंदगी के खिलाफ

और तुम हो, विपक्ष में
बेकारी और नीद से परेशान!

और एक जंगल है-
मतदान के बाद खून में अंधेरा
पछीटता हुआ
(जंगल मुखबिर है)
उसकी आंखों में
चमकता हुआ भाईचारा
किसी भी रोज तुम्हारे चेहरे की हरियाली को बेमुरव्वत चाट सकता है

खबरदार!
उसनें तुम्हारे परिवार को
नफ़रत के उस मुकाम पर ला खड़ा किया है
कि कल तुम्हारा सबसे छोटा लड़का भी
तुम्हारे पड़ोसी का गला
अचानक
अपनीं स्लेट से काट सकता है|
क्या मैनें गलत कहा?
आखिरकार..... आखिरकार.....

Saturday, December 15, 2007

शैलेंद्र की याद में...


शैलेंद्र का जन्म 30 अगस्त 1923 को रावलपिंडी में हुआ था। पूरा नाम था शंकरदास केसरीलाल शेलेंद्र। रेलवे की सेवा शैलेंद्र को मुंबई ले आई। अपने कविता को हथियार बनाकर आजादी की लड़ाई में शरीक हुए। पब्लिक मीटिंग में "जलता है पंजाब" कविता सुना रहे थे। उसी भीड़ में राजकपूर भी मौजूद थे। यहीं से राजकपूर और शैलेंद्र साथ हो लिए।
वैसे तो शैलेंद्र ने ज्यादातर गीत शंकर-जयकिशन के साथ कंपोज किया लेकिन उतनी ही शिद्दत के साथ उन्होने सलिल चौधरी (मधुमति),एस एन त्रिपाठी (संगीत सम्राट तानसेन)और एस डी बर्मन (गाईड) के लिए गीत लिखा।

राजकपूर के साथ उन्होने कई यादगार फिल्मे की और एक ऐसी टीम बनी जो पूरी फिल्म इंडस्ट्री के लिए यादगार बन गई। राजकपूर ने शैलेंद्र की तीसरी कसम पर फिल्म बनाने की ख्वाहिश को भी अंजाम देने में मदद की।
गीतकार के रूप में शैलेंद्र को तीन बार फिल्म फेयर एवार्ड मिला। किसी तरह पैसे जुटाकर शैलेंद्र ने तीसरी कसम बनाई थी। लेकिन जब वो पर्दे पर नाकाम रही तो शैलेंद्र बूरी तरह टूट गए। इस फिल्म के लिए राजकपूर काफी आर्थिक सहयोग भी दिया था। कहते हैं फिल्म की नाकामी के बाद शैलेंद्र ने 14 दिसंबर 1966 को आत्म हत्या कर ली। इसी दिन राजकपूर का जन्म दिन भी है।


जले बहार के लिए जो जिंदगी....

Friday, December 14, 2007

सच न बोलना / नागार्जुन



मलाबार के खेतिहरों को अन्न चाहिए खाने को,
डंडपाणि को लठ्ठ चाहिए बिगड़ी बात बनाने को!
जंगल में जाकर देखा, नहीं एक भी बांस दिखा!
सभी कट गए सुना, देश को पुलिस रही सबक सिखा!



जन-गण-मन अधिनायक जय हो, प्रजा विचित्र तुम्हारी है
भूख-भूख चिल्लाने वाली अशुभ अमंगलकारी है!
बंद सेल, बेगूसराय में नौजवान दो भले मरे
जगह नहीं है जेलों में, यमराज तुम्हारी मदद करे।



ख्याल करो मत जनसाधारण की रोज़ी का, रोटी का,
फाड़-फाड़ कर गला, न कब से मना कर रहा अमरीका!
बापू की प्रतिमा के आगे शंख और घड़ियाल बजे!
भुखमरों के कंकालों पर रंग-बिरंगी साज़ सजे!



ज़मींदार है, साहुकार है, बनिया है, व्योपारी है,
अंदर-अंदर विकट कसाई, बाहर खद्दरधारी है!
सब घुस आए भरा पड़ा है, भारतमाता का मंदिर
एक बार जो फिसले अगुआ, फिसल रहे हैं फिर-फिर-फिर!



छुट्टा घूमें डाकू गुंडे, छुट्टा घूमें हत्यारे,
देखो, हंटर भांज रहे हैं जस के तस ज़ालिम सारे!
जो कोई इनके खिलाफ़ अंगुली उठाएगा बोलेगा,
काल कोठरी में ही जाकर फिर वह सत्तू घोलेगा!



माताओं पर, बहिनों पर, घोड़े दौड़ाए जाते हैं!
बच्चे, बूढ़े-बाप तक न छूटते, सताए जाते हैं!
मार-पीट है, लूट-पाट है, तहस-नहस बरबादी है,
ज़ोर-जुलम है, जेल-सेल है। वाह खूब आज़ादी है!



रोज़ी-रोटी, हक की बातें जो भी मुंह पर लाएगा,
कोई भी हो, निश्चय ही वह कम्युनिस्ट कहलाएगा!
नेहरू चाहे जिन्ना, उसको माफ़ करेंगे कभी नहीं,
जेलों में ही जगह मिलेगी, जाएगा वह जहां कहीं!



सपने में भी सच न बोलना, वर्ना पकड़े जाओगे,
भैया, लखनऊ-दिल्ली पहुंचो, मेवा-मिसरी पाओगे!
माल मिलेगा रेत सको यदि गला मजूर-किसानों का,
हम मर-भुक्खों से क्या होगा, चरण गहो श्रीमानों का!