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Tuesday, March 23, 2010

तुम्हे कैसे याद करुँ भगत सिंह


-अशोक कुमार पाण्डेय

जिन खेतों में तुमने बोई थी बंदूकें
उनमे उगी हैं नीली पड़ चुकी लाशें

जिन कारखानों में उगता था
तुम्हारी उम्मीद का लाल सूरज
वहां दिन को रोशनी रात के अंधेरों से मिलती है

ज़िन्दगी से ऐसी थी तुम्हारी मोहब्बत
कि कांपी तक नही जबान
सू ऐ दार पर इंक़लाब जिंदाबाद कहते
अभी एक सदी भी नही गुज़री और
ज़िन्दगी हो गयी है इतनी बेमानी
कि पूरी एक पीढी जी रही है ज़हर के सहारे

तुमने देखना चाहा था जिन हाथों में सुर्ख परचम
कुछ करने की नपुंसक सी तुष्टि में
रोज़ भरे जा रहे हैं अख़बारों के पन्ने
तुम जिन्हें दे गए थे एक मुडे हुए पन्ने वाले किताब
सजाकर रख दी है उन्होंने
घर की सबसे खुफिया आलमारी मैं

तुम्हारी तस्वीर ज़रूर निकल आयी है
इस साल जुलूसों में रंग-बिरंगे झंडों के साथ
सब बैचेन हैं तुम्हारी सवाल करती आंखों पर
अपने अपने चश्मे सजाने को तुम्हारी घूरती आँखें
डरती हैं उन्हें और तुम्हारी बातें
गुज़रे ज़माने की लगती हैं

अवतार बनने की होड़ में
तुम्हारी तकरीरों में मनचाहे रंग
रंग-बिरंगे त्यौहारों के इस देश में
तुम्हारा जन्म भी एक उत्सव है

मै किस भीड़ में हो जाऊँ शामिल
तुम्हे कैसे याद करुँ भगत सिंह
जबकि जानता हूँ की तुम्हे याद करना
अपनी आत्मा को केंचुलों से निकल लाना है

कौन सा ख्वाब दूँ मै अपनी बेटी की आंखों में
कौन सी मिट्टी लाकर रख दूँ
उसके सिरहाने
जलियांवाला बाग़ फैलते-फैलते ...
हिन्दुस्तान बन गया है


Wednesday, November 4, 2009

संरचनावाद के योद्धा लेवी स्ट्रॉस नहीं रहे



संरचनावादी मानवशास्त्री क्लाउद लेवी स्ट्रॉस नहीं रहे। सौ साल के थे। इस दार्शनिक और मानवशास्त्री ने दर्शन की पूरी समझ पर गहरा असर डाला है। पचास-साठ के दशक में जब युरोप के मशहूर दार्शनिक सात्र कमजोर हो रहे थे तब लेवी स्ट्रॉस के विचार,दर्शन से लेकर साहित्य और समाजिक विज्ञानों को प्रभावित करने लगे थे। लेवी स्ट्रॉस को सबसे बेहतर श्रद्धांजली यही होगी कि उनके विचारों को पाठकों तक पहुंचाई जाय। लेवी स्ट्रास के विचार जटिल लग सकते हैं लेकिन अगर तर्क प्रक्रिया को समझने की सामान्य सी कोशिश की जाय तो ये बहुत आसान भी है। लेवी स्ट्रॉस के बहाने हम अनुभववादी दर्शन के संकट और उसके बाद के उत्तर आधुनिक दर्शन तक की लंबी वैचारिक यात्रा को समझने की कोशिश करेंगे। लेवी स्ट्रॉस की श्रद्धांजली इसके लिए प्रस्थान बिंदु होगी।

पार्ट -1
फ्रांस के लेवी स्ट्रॉस मशहूर भाषाशास्त्री सॉस्योर से प्रभावित थे। ऐसे में सबसे पहले हमें सास्योर के विचार यानी संरचनावाद को जानना जरूरी होगा। सास्योर ने संरचनावाद की नींव भाषा के विश्लेषण के जरिए रखी।
सास्युर मानते हैं कि शब्दों के अर्थ बाहरी दुनिया की चीजों यानी वस्तुओं के संदर्भ से निर्धारित नहीं होते। फिर कैसे होते हैं? सास्युर कहते हैं कि ये संकेतों के जरिए निर्धारित होते हैं। इसे साफ करने के लिए सास्युर संकेतों को भी दो हिस्सो में तोड़ देते हैं एक हिस्सा जो पन्ने पर लिखा जाता है जिसे वे सिग्नीफायर यानी संकेतक कहते हैं। जबकि दूसरे हिस्से को वे संकेतित यानी सिग्नीफाइड मान लेते हैं। सिग्नीफायर वाला हिस्सा पन्ने पर रहता है जबकि सिग्नीफाइड हमारे मस्तिष्क में तस्वीर बनाता है। ये कुछ इस तरह है जैसे आपने पन्ने पर ‘जाल’ लिखा। ये संकेतक यानी सिग्नीफायर है और ‘जाल’ की जो तस्वीर हमारे मस्तिष्क में बनी वो सिग्नीफाइड है। सास्युर मानते हैं कि यह सिर्फ इस रूप में अर्थवान है कि यह माल,डाल,खाल,नाल जैसे संकेतकों से थोड़ा अलग दिखता है। अब यहां वे पन्ने पर लिखे शब्द को मस्तिष्क में उभरी तस्वीर से अलग करते हैं। सास्युर का कहना है सिग्नीफायर और सिग्नीफाइड कोई संबंध नहीं है। हो सकता है जाल की जगह कोई और सिग्नीफायर होता तो भी सिग्नीफाइड अपना वही अर्थ रखता। सास्युर साफतौर पर कहते हैं कि भाषा की व्यवस्था में केवल भिन्नताओं का अस्तित्व है। किसी भाषाई रूप में अर्थ देने के लिए उन्हे खास क्रम में पिरो दिया जाता है। भिन्नताओं की इस बुनावट में कोई खास संकेत अपनी जगह पर चिपक जाता है। फिर जाकर वह पुरे वाक्य की संरचना में अपना कोई अर्थ देता है। लेकिन सास्युर ने भाषा के इस अध्ययन के लिए एक शर्त बना ली थी। वो शर्त ये थी कि इसकी संरचना स्थिर रहे है। भाषा के ऐतिहासिक विकास की अवधारणा से दूर रहते हैं। सास्युर बोलचाल वाली भाषा को जगह नहीं देते हैं। वे केवल उसी भाषा को वैज्ञानिक नजरिए से विश्लेषण के योग्य मानते थे जिसमें संकेत नजर आएं।
संरचनावाद का मूल सिद्धांत को विस्तारित किया गया। इस सिद्धांत को भाषाशास्त्र से बाहर के समाज विज्ञानो में लागू किया गया। क्लाउद लेवी स्ट्रॉस पहले दार्शनिक और मानवशास्त्री थे जिन्होने संरचनावाद का इस्तेमाल संस्कृतियों के अध्ययन में किया। वे संस्कृतियों की संरचना में मिथकों के अध्ययन में संरचनावाद लागू करते हुए कहते हैं कि हर मिथक भी छोटे मिथकीय हिस्सों से निर्मित है। इन हिस्सों को उन्होने Mytheme नाम दिया। भाषा की तरह ये भी अपने जगह की वजह से अर्थ देते हैं। लेवी स्ट्रॉस मानते थे कि मिथकों की संरचनाएं मनुष्य के मानसिक संरचना से मेल खाती है। लेकिन वे इस बात के कायल थे कि मनुष्य के दिमाग में मिथक बनने से पहले मिथकों की संरचना मौजूद रहती है। मिथकों के अनुरूप गढ़ी गई संरचना उस कर्ता की चेतना का निर्माण करती है जो इस गफलत में रहता है कि अपनी चेतना और अपनी इच्छा शक्ति का स्रोत वह खुद ही है। मनुष्य मिथक नहीं गढ़ता बल्कि मिथक मनुष्यों को गढ़ते हैं।
लेवी स्ट्रॉस के इस समझ को जमकर आलोचना भी हुई। एक स्थिर संरचना में बाइनरी अपोजिशन की जरूरत पड़ती ही है इस लिहाज से लेवी स्ट्रॉस भी मिथकों के विश्लेषण में दुख-सुख,जीवन-मृत्यु जैसी अवधारणा के साथ मिथकों का विश्लेषण किया है।(जारी... )
-दीपू राय

Tuesday, March 24, 2009

मैं नास्तिक क्यों हूँ: भगत सिंह


यह लेख भगत सिंह ने जेल में रहते हुए लिखा था जो भगत सिंह के लेखन के सबसे चर्चित हिस्सों में रहा है. इस लेख में उन्होंने ईश्वर के प्रति अपनी धारणा और तर्कों को सामने रखा है।

प्रत्येक मनुष्य को, जो विकास के लिए खड़ा है, रूढ़िगत विश्वासों के हर पहलू की आलोचना तथा उन पर अविश्वास करना होगा और उनको चुनौती देनी होगी.
प्रत्येक प्रचलित मत की हर बात को हर कोने से तर्क की कसौटी पर कसना होगा. यदि काफ़ी तर्क के बाद भी वह किसी सिद्धांत या दर्शन के प्रति प्रेरित होता है, तो उसके विश्वास का स्वागत है.

उसका तर्क असत्य, भ्रमित या छलावा और कभी-कभी मिथ्या हो सकता है. लेकिन उसको सुधारा जा सकता है क्योंकि विवेक उसके जीवन का दिशा-सूचक है.

लेकिन निरा विश्वास और अंधविश्वास ख़तरनाक है. यह मस्तिष्क को मूढ़ और मनुष्य को प्रतिक्रियावादी बना देता है. जो मनुष्य यथार्थवादी होने का दावा करता है उसे समस्त प्राचीन विश्वासों को चुनौती देनी होगी.

यदि वे तर्क का प्रहार न सह सके तो टुकड़े-टुकड़े होकर गिर पड़ेंगे. तब उस व्यक्ति का पहला काम होगा, तमाम पुराने विश्वासों को धराशायी करके नए दर्शन की स्थापना के लिए जगह साफ करना.

यह तो नकारात्मक पक्ष हुआ. इसके बाद सही कार्य शुरू होगा, जिसमें पुनर्निर्माण के लिए पुराने विश्वासों की कुछ बातों का प्रयोग किया जा सकता है.

जहाँ तक मेरा संबंध है, मैं शुरू से ही मानता हूँ कि इस दिशा में मैं अभी कोई विशेष अध्ययन नहीं कर पाया हूँ.

एशियाई दर्शन को पढ़ने की मेरी बड़ी लालसा थी पर ऐसा करने का मुझे कोई संयोग या अवसर नहीं मिला.

लेकिन जहाँ तक इस विवाद के नकारात्मक पक्ष की बात है, मैं प्राचीन विश्वासों के ठोसपन पर प्रश्न उठाने के संबंध में आश्वस्त हूँ.

मुझे पूरा विश्वास है कि एक चेतन, परम-आत्मा का, जो कि प्रकृति की गति का दिग्दर्शन एवं संचालन करती है, कोई अस्तित्व नहीं है.

हम प्रकृति में विश्वास करते हैं और समस्त प्रगति का ध्येय मनुष्य द्वारा, अपनी सेवा के लिए, प्रकृति पर विजय पाना है. इसको दिशा देने के लिए पीछे कोई चेतन शक्ति नहीं है. यही हमारा दर्शन है.

जहाँ तक नकारात्मक पहलू की बात है, हम आस्तिकों से कुछ प्रश्न करना चाहते हैं-(i) यदि, जैसा कि आपका विश्वास है, एक सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक एवं सर्वज्ञानी ईश्वर है जिसने कि पृथ्वी या विश्व की रचना की, तो कृपा करके मुझे यह बताएं कि उसने यह रचना क्यों की?

कष्टों और आफतों से भरी इस दुनिया में असंख्य दुखों के शाश्वत और अनंत गठबंधनों से ग्रसित एक भी प्राणी पूरी तरह सुखी नहीं.

कृपया, यह न कहें कि यही उसका नियम है. यदि वह किसी नियम में बँधा है तो वह सर्वशक्तिमान नहीं. फिर तो वह भी हमारी ही तरह गुलाम है.

कृपा करके यह भी न कहें कि यह उसका शग़ल है.

नीरो ने सिर्फ एक रोम जलाकर राख किया था. उसने चंद लोगों की हत्या की थी. उसने तो बहुत थोड़ा दुख पैदा किया, अपने शौक और मनोरंजन के लिए.

और उसका इतिहास में क्या स्थान है? उसे इतिहासकार किस नाम से बुलाते हैं?

सभी विषैले विशेषण उस पर बरसाए जाते हैं. जालिम, निर्दयी, शैतान-जैसे शब्दों से नीरो की भर्त्सना में पृष्ठ-के पृष्ठ रंगे पड़े हैं.

एक चंगेज़ खाँ ने अपने आनंद के लिए कुछ हजार ज़ानें ले लीं और आज हम उसके नाम से घृणा करते हैं.

तब फिर तुम उस सर्वशक्तिमान अनंत नीरो को जो हर दिन, हर घंटे और हर मिनट असंख्य दुख देता रहा है और अभी भी दे रहा है, किस तरह न्यायोचित ठहराते हो?

फिर तुम उसके उन दुष्कर्मों की हिमायत कैसे करोगे, जो हर पल चंगेज़ के दुष्कर्मों को भी मात दिए जा रहे हैं?

मैं पूछता हूँ कि उसने यह दुनिया बनाई ही क्यों थी-ऐसी दुनिया जो सचमुच का नर्क है, अनंत और गहन वेदना का घर है?

सर्वशक्तिमान ने मनुष्य का सृजन क्यों किया जबकि उसके पास मनुष्य का सृजन न करने की ताक़त थी?

इन सब बातों का तुम्हारे पास क्या जवाब है? तुम यह कहोगे कि यह सब अगले जन्म में, इन निर्दोष कष्ट सहने वालों को पुरस्कार और ग़लती करने वालों को दंड देने के लिए हो रहा है.

ठीक है, ठीक है. तुम कब तक उस व्यक्ति को उचित ठहराते रहोगे जो हमारे शरीर को जख्मी करने का साहस इसलिए करता है कि बाद में इस पर बहुत कोमल तथा आरामदायक मलहम लगाएगा?

ग्लैडिएटर संस्था के व्यवस्थापकों तथा सहायकों का यह काम कहाँ तक उचित था कि एक भूखे-खूँख्वार शेर के सामने मनुष्य को फेंक दो कि यदि वह उस जंगली जानवर से बचकर अपनी जान बचा लेता है तो उसकी खूब देख-भाल की जाएगी?

इसलिए मैं पूछता हूँ, ‘‘उस परम चेतन और सर्वोच्च सत्ता ने इस विश्व और उसमें मनुष्यों का सृजन क्यों किया? आनंद लुटने के लिए? तब उसमें और नीरो में क्या फर्क है?’’

मुसलमानों और ईसाइयों. हिंदू-दर्शन के पास अभी और भी तर्क हो सकते हैं. मैं पूछता हूँ कि तुम्हारे पास ऊपर पूछे गए प्रश्नों का क्या उत्तर है?

तुम तो पूर्व जन्म में विश्वास नहीं करते. तुम तो हिन्दुओं की तरह यह तर्क पेश नहीं कर सकते कि प्रत्यक्षतः निर्दोष व्यक्तियों के कष्ट उनके पूर्व जन्मों के कुकर्मों का फल है.

मैं तुमसे पूछता हूँ कि उस सर्वशक्तिशाली ने विश्व की उत्पत्ति के लिए छः दिन मेहनत क्यों की और यह क्यों कहा था कि सब ठीक है.

उसे आज ही बुलाओ, उसे पिछला इतिहास दिखाओ. उसे मौजूदा परिस्थितियों का अध्ययन करने दो.

फिर हम देखेंगे कि क्या वह आज भी यह कहने का साहस करता है- सब ठीक है.

कारावास की काल-कोठरियों से लेकर, झोपड़ियों और बस्तियों में भूख से तड़पते लाखों-लाख इंसानों के समुदाय से लेकर, उन शोषित मजदूरों से लेकर जो पूँजीवादी पिशाच द्वारा खून चूसने की क्रिया को धैर्यपूर्वक या कहना चाहिए, निरुत्साहित होकर देख रहे हैं.

और उस मानव-शक्ति की बर्बादी देख रहे हैं जिसे देखकर कोई भी व्यक्ति, जिसे तनिक भी सहज ज्ञान है, भय से सिहर उठेगा; और अधिक उत्पादन को जरूरतमंद लोगों में बाँटने के बजाय समुद्र में फेंक देने को बेहतर समझने से लेकर राजाओं के उन महलों तक-जिनकी नींव मानव की हड्डियों पर पड़ी है...उसको यह सब देखने दो और फिर कहे-‘‘सबकुछ ठीक है.’’ क्यों और किसलिए? यही मेरा प्रश्न है. तुम चुप हो? ठीक है, तो मैं अपनी बात आगे बढ़ाता हूँ.

और तुम हिंदुओ, तुम कहते हो कि आज जो लोग कष्ट भोग रहे हैं, ये पूर्वजन्म के पापी हैं. ठीक है.

तुम कहते हो आज के उत्पीड़क पिछले जन्मों में साधु पुरुष थे, अतः वे सत्ता का आनंद लूट रहे हैं.

मुझे यह मानना पड़ता है कि आपके पूर्वज बहुत चालाक व्यक्ति थे.

उन्होंने ऐसे सिद्धांत गढ़े जिनमें तर्क और अविश्वास के सभी प्रयासों को विफल करने की काफी ताकत है.

लेकिन हमें यह विश्लेषण करना है कि ये बातें कहाँ तक टिकती हैं.

न्यायशास्त्र के सर्वाधिक प्रसिद्ध विद्वानों के अनुसार, दंड को अपराधी पर पड़नेवाले असर के आधार पर, केवल तीन-चार कारणों से उचित ठहराया जा सकता है. वे हैं प्रतिकार, भय तथा सुधार.

आज सभी प्रगतिशील विचारकों द्वारा प्रतिकार के सिद्धांत की निंदा की जाती है. भयभीत करने के सिद्धांत का भी अंत वही है.

केवल सुधार करने का सिद्धांत ही आवश्यक है और मानवता की प्रगति का अटूट अंग है. इसका उद्देश्य अपराधी को एक अत्यंत योग्य तथा शांतिप्रिय नागरिक के रूप में समाज को लौटाना है.

लेकिन यदि हम यह बात मान भी लें कि कुछ मनुष्यों ने (पूर्व जन्म में) पाप किए हैं तो ईश्वर द्वारा उन्हें दिए गए दंड की प्रकृति क्या है?

तुम कहते हो कि वह उन्हें गाय, बिल्ली, पेड़, जड़ी-बूटी या जानवर बनाकर पैदा करता है. तुम ऐसे 84 लाख दंडों को गिनाते हो.

मैं पूछता हूँ कि मनुष्य पर सुधारक के रूप में इनका क्या असर है? तुम ऐसे कितने व्यक्तियों से मिले हो जो यह कहते हैं कि वे किसी पाप के कारण पूर्वजन्म में गदहा के रूप में पैदा हुए थे? एक भी नहीं?

अपने पुराणों से उदाहरण मत दो. मेरे पास तुम्हारी पौराणिक कथाओं के लिए कोई स्थान नहीं है. और फिर, क्या तुम्हें पता है कि दुनिया में सबसे बड़ा पाप गरीब होना है? गरीबी एक अभिशाप है, वह एक दंड है.

मैं पूछता हूँ कि अपराध-विज्ञान, न्यायशास्त्र या विधिशास्त्र के एक ऐसे विद्वान की आप कहाँ तक प्रशंसा करेंगे जो किसी ऐसी दंड-प्रक्रिया की व्यवस्था करे जो कि अनिवार्यतः मनुष्य को और अधिक अपराध करने को बाध्य करे?

क्या तुम्हारे ईश्वर ने यह नहीं सोचा था? या उसको भी ये सारी बातें-मानवता द्वारा अकथनीय कष्टों के झेलने की कीमत पर-अनुभव से सीखनी थीं? तुम क्या सोचते हो.

किसी गरीब तथा अनपढ़ परिवार, जैसे एक चमार या मेहतर के यहाँ पैदा होने पर इन्सान का भाग्य क्या होगा? चूँकि वह गरीब हैं, इसलिए पढ़ाई नहीं कर सकता.

वह अपने उन साथियों से तिरस्कृत और त्यक्त रहता है जो ऊँची जाति में पैदा होने की वजह से अपने को उससे ऊँचा समझते हैं.

उसका अज्ञान, उसकी गरीबी तथा उससे किया गया व्यवहार उसके हृदय को समाज के प्रति निष्ठुर बना देते हैं.

मान लो यदि वह कोई पाप करता है तो उसका फल कौन भोगेगा? ईश्वर, वह स्वयं या समाज के मनीषी?

और उन लोगों के दंड के बारे में तुम क्या कहोगे जिन्हें दंभी और घमंडी ब्राह्मणों ने जान-बूझकर अज्ञानी बनाए रखा तथा जिन्हें तुम्हारी ज्ञान की पवित्र पुस्तकों-वेदों के कुछ वाक्य सुन लेने के कारण कान में पिघले सीसे की धारा को सहने की सज़ा भुगतनी पड़ती थी?

यदि वे कोई अपराध करते हैं तो उसके लिए कौन ज़िम्मेदार होगा और उसका प्रहार कौन सहेगा?

मेरे प्रिय दोस्तो. ये सारे सिद्धांत विशेषाधिकार युक्त लोगों के आविष्कार हैं. ये अपनी हथियाई हुई शक्ति, पूँजी तथा उच्चता को इन सिद्धान्तों के आधार पर सही ठहराते हैं.

जी हाँ, शायद वह अपटन सिंक्लेयर ही था, जिसने किसी जगह लिखा था कि मनुष्य को बस (आत्मा की) अमरता में विश्वास दिला दो और उसके बाद उसका सारा धन-संपत्ति लूट लो.

वह बगैर बड़बड़ाए इस कार्य में तुम्हारी सहायता करेगा. धर्म के उपदेशकों तथा सत्ता के स्वामियों के गठबंधन से ही जेल, फाँसीघर, कोड़े और ये सिद्धांत उपजते हैं.

मैं पूछता हूँ कि तुम्हारा सर्वशक्तिशाली ईश्वर हर व्यक्ति को उस समय क्यों नहीं रोकता है जब वह कोई पाप या अपराध कर रहा होता है?

ये तो वह बहुत आसानी से कर सकता है. उसने क्यों नहीं लड़ाकू राजाओं को या उनके अंदर लड़ने के उन्माद को समाप्त किया और इस प्रकार विश्वयुद्ध द्वारा मानवता पर पड़ने वाली विपत्तियों से उसे क्यों नहीं बचाया?

उसने अंग्रेज़ों के मस्तिष्क में भारत को मुक्त कर देने हेतु भावना क्यों नहीं पैदा की?

वह क्यों नहीं पूँजीपतियों के हृदय में यह परोपकारी उत्साह भर देता कि वे उत्पादन के साधनों पर व्यक्तिगत संपत्ति का अपना अधिकार त्याग दें और इस प्रकार न केवल सम्पूर्ण श्रमिक समुदाय, वरन समस्त मानव-समाज को पूँजीवाद की बेड़ियों से मुक्त करें.

आप समाजवाद की व्यावहारिकता पर तर्क करना चाहते हैं. मैं इसे आपके सर्वशक्तिमान पर छोड़ देता हूँ कि वह इसे लागू करे.

जहाँ तक जनसामान्य की भलाई की बात है, लोग समाजवाद के गुणों को मानते हैं, पर वह इसके व्यावहारिक न होने का बहाना लेकर इसका विरोध करते हैं.

चलो, आपका परमात्मा आए और वह हर चीज़ को सही तरीके से कर दें.

अब घुमा-फिराकर तर्क करने का प्रयास न करें, वह बेकार की बातें हैं. मैं आपको यह बता दूँ कि अंग्रेज़ों की हुकूमत यहाँ इसलिए नहीं है कि ईश्वर चाहता है, बल्कि इसलिए कि उनके पास ताक़त है और हम में उनका विरोध करने की हिम्मत नहीं.

वे हमें अपने प्रभुत्व में ईश्वर की सहायता से नहीं रखे हुए हैं बल्कि बंदूकों, राइफलों, बम और गोलियों, पुलिस और सेना के सहारे रखे हुए हैं.

यह हमारी ही उदासीनता है कि वे समाज के विरुद्ध सबसे निंदनीय अपराध-एक राष्ट्र का दूसरे राष्ट्र द्वारा अत्याचारपूर्ण शोषण-सफलतापूर्वक कर रहे हैं.

कहाँ है ईश्वर? वह क्या कर रहा है? क्या वह मनुष्य जाति के इन कष्टों का मज़ा ले रहा है? वह नीरो है, चंगेज़ है, तो उसका नाश हो.

क्या तुम मुझसे पूछते हो कि मैं इस विश्व की उत्पत्ति और मानव की उत्पत्ति की व्याख्या कैसे करता हूँ? ठीक है, मैं तुम्हें बतलाता हूँ. चार्ल्स डारविन ने इस विषय पर कुछ प्रकाश डालने की कोशिश की है. उसको पढ़ो.

सोहन स्वामी की ‘सहज ज्ञान’ पढ़ो. तुम्हें इस सवाल का कुछ सीमा तक उत्तर मिल जाएगा. यह (विश्व-सृष्टि) एक प्राकृतिक घटना है. विभिन्न पदार्थों के, निहारिका के आकार में, आकस्मिक मिश्रण से पृथ्वी बनी.

कब? इतिहास देखो. इसी प्रकार की घटना का जंतु पैदा हुए और एक लंबे दौर के बाद मानव. डारविन की ‘जीव की उत्पत्ति’ पढ़ो.

और तदुपरांत सारा विकास मनुष्य द्वारा प्रकृति से लगातार संघर्ष और उस पर विजय पाने की चेष्टा से हुआ. यह इस घटना की संभवतः सबसे संक्षिप्त व्याख्या है.

तुम्हारा दूसरा तर्क यह हो सकता है कि क्यों एक बच्चा अंधा या लँगड़ा पैदा होता है, यदि यह उसके पूर्वजन्म में किए कार्यों का फल नहीं है तो?

जीवविज्ञान-वेत्ताओं ने इस समस्या का वैज्ञानिक समाधान निकाला है.

उनके अनुसार इसका सारा दायित्व माता-पिता के कंधों पर है जो अपने उन कार्यों के प्रति लापरवाह अथवा अनभिज्ञ रहते हैं जो बच्चे के जन्म के पूर्व ही उसे विकलांग बना देते हैं.

स्वभावतः तुम एक और प्रश्न पूछ सकते हो-यद्यपि यह निरा बचकाना है. वह सवाल यह कि यदि ईश्वर कहीं नहीं है तो लोग उसमें विश्वास क्यों करने लगे?

मेरा उत्तर संक्षिप्त तथा स्पष्ट होगा-जिस प्रकार लोग भूत-प्रेतों तथा दुष्ट-आत्माओं में विश्वास करने लगे, उसी प्रकार ईश्वर को मानने लगे.

अंतर केवल इतना है कि ईश्वर में विश्वास विश्वव्यापी है और उसका दर्शन अत्यंत विकसित.

कुछ उग्र परिवर्तनकारियों (रेडिकल्स) के विपरीत मैं इसकी उत्पत्ति का श्रेय उन शोषकों की प्रतिभा को नहीं देता जो परमात्मा के अस्तित्व का उपदेश देकर लोगों को अपने प्रभुत्व में रखना चाहते थे और उनसे अपनी विशिष्ट स्थिति का अधिकार एवं अनुमोदन चाहते थे.

यद्यपि मूल बिंदु पर मेरा उनसे विरोध नहीं है कि सभी धर्म, सम्प्रदाय, पंथ और ऐसी अन्य संस्थाएँ अन्त में निर्दयी और शोषक संस्थाओं, व्यक्तियों तथा वर्गों की समर्थक हो जाती हैं.

राजा के विरुद्ध विद्रोह हर धर्म में सदैव ही पाप रहा है.

ईश्वर की उत्पत्ति के बारे में मेरा अपना विचार यह है कि मनुष्य ने अपनी सीमाओं, दुर्बलताओं व कमियों को समझने के बाद, परीक्षा की घड़ियों का बहादुरी से सामना करने स्वयं को उत्साहित करने, सभी खतरों को मर्दानगी के साथ झेलने तथा संपन्नता एवं ऐश्वर्य में उसके विस्फोट को बाँधने के लिए-ईश्वर के काल्पनिक अस्तित्व की रचना की.

अपने व्यक्तिगत नियमों और अविभावकीय उदारता से पूर्ण ईश्वर की बढ़ा-चढ़ाकर कल्पना एवं चित्रण किया गया.

जब उसकी उग्रता तथा व्यक्तिगत नियमों की चर्चा होती है तो उसका उपयोग एक डरानेवाले के रूप में किया जाता है, ताकि मनुष्य समाज के लिए एक खतरा न बन जाए.

जब उसके अविभावकीय गुणों की व्याख्या होती है तो उसका उपयोग एक पिता, माता, भाई, बहन, दोस्त तथा सहायक की तरह किया जाता है.

इस प्रकार जब मनुष्य अपने सभी दोस्तों के विश्वासघात और उनके द्वारा त्याग देने से अत्यंत दुखी हो तो उसे इस विचार से सांत्वना मिल सकती है कि एक सच्चा दोस्त उसकी सहायता करने को है, उसे सहारा देगा, जो कि सर्वशक्तिमान है और कुछ भी कर सकता है.

वास्तव में आदिम काल में यह समाज के लिए उपयोगी था. विपदा में पड़े मनुष्य के लिए ईश्वर की कल्पना सहायक होती है.

समाज को इस ईश्वरीय विश्वास के विरूद्ध उसी तरह लड़ना होगा जैसे कि मूर्ति-पूजा तथा धर्म-संबंधी क्षुद्र विचारों के विरूद्ध लड़ना पड़ा था.

इसी प्रकार मनुष्य जब अपने पैरों पर खड़ा होने का प्रयास करने लगे और यथार्थवादी बन जाए तो उसे ईश्वरीय श्रद्धा को एक ओर फेंक देना चाहिए और उन सभी कष्टों, परेशानियों का पौरुष के साथ सामना करना चाहिए जिसमें परिस्थितियाँ उसे पलट सकती हैं.

मेरी स्थिति आज यही है. यह मेरा अहंकार नहीं है.

मेरे दोस्तों, यह मेरे सोचने का ही तरीका है जिसने मुझे नास्तिक बनाया है. मैं नहीं जानता कि ईश्वर में विश्वास और रोज़-बरोज़ की प्रार्थना-जिसे मैं मनुष्य का सबसे अधिक स्वार्थी और गिरा हुआ काम मानता हूँ-मेरे लिए सहायक सिद्घ होगी या मेरी स्थिति को और चौपट कर देगी.

मैंने उन नास्तिकों के बारे में पढ़ा है, जिन्होंने सभी विपदाओं का बहादुरी से सामना किया, अतः मैं भी एक मर्द की तरह फाँसी के फंदे की अंतिम घड़ी तक सिर ऊँचा किए खड़ा रहना चाहता हूँ.

देखना है कि मैं इस पर कितना खरा उतर पाता हूँ. मेरे एक दोस्त ने मुझे प्रार्थना करने को कहा.

जब मैंने उसे अपने नास्तिक होने की बात बतलाई तो उसने कहा, ‘देख लेना, अपने अंतिम दिनों में तुम ईश्वर को मानने लगोगे.’ मैंने कहा, ‘नहीं प्रिय महोदय, ऐसा नहीं होगा. ऐसा करना मेरे लिए अपमानजनक तथा पराजय की बात होगी.

स्वार्थ के लिए मैं प्रार्थना नहीं करूँगा.’ पाठकों और दोस्तो, क्या यह अहंकार है? अगर है, तो मैं इसे स्वीकार करता हूँ.

Monday, March 23, 2009

भगत सिंह का अंतिम पत्र


22 मार्च,1931
साथियो,
स्वाभाविक है कि जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए, मैं इसे छिपाना नहीं चाहता. लेकिन मैं एक शर्त पर जिंदा रह सकता हूँ, कि मैं क़ैद होकर या पाबंद होकर जीना नहीं चाहता.

मेरा नाम हिंदुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है और क्रांतिकारी दल के आदर्शों और कुर्बानियों ने मुझे बहुत ऊँचा उठा दिया है - इतना ऊँचा कि जीवित रहने की स्थिति में इससे ऊँचा मैं हर्गिज़ नहीं हो सकता.

आज मेरी कमज़ोरियाँ जनता के सामने नहीं हैं. अगर मैं फाँसी से बच गया तो वो ज़ाहिर हो जाएँगी और क्रांति का प्रतीक-चिन्ह मद्धिम पड़ जाएगा या संभवतः मिट ही जाए. लेकिन दिलेराना ढंग से हँसते-हँसते मेरे फाँसी चढ़ने की सूरत में हिंदुस्तानी माताएँ अपने बच्चों के भगत सिंह बनने की आरज़ू किया करेंगी और देश की आज़ादी के लिए कुर्बानी देनेवालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि क्रांति को रोकना साम्राज्यवाद या तमाम शैतानी शक्तियों के बूते की बात नहीं रहेगी.

हाँ, एक विचार आज भी मेरे मन में आता है कि देश और मानवता के लिए जो कुछ करने की हसरतें मेरे दिल में थी, उनका हजारवाँ भाग भी पूरा नहीं कर सका. अगर स्वतंत्र, ज़िंदा रह सकता तब शायद इन्हें पूरा करने का अवसर मिलता और मैं अपनी हसरतें पूरी कर सकता.

इसके सिवाय मेरे मन में कभी कोई लालच फाँसी से बचे रहने का नहीं आया. मुझसे अधिक सौभाग्यशाली कौन होगा? आजकल मुझे ख़ुद पर बहुत गर्व है. अब तो बड़ी बेताबी से अंतिम परीक्षा का इंतज़ार है. कामना है कि यह और नज़दीक हो जाए.

आपका साथी,
भगत सिंह

Thursday, August 14, 2008

अधिनायक


राष्ट्रगीत में भला कौन वह
भारत-भाग्य-विधाता है
फटा सुथन्ना पहने जिसका
गुन हरचरना गाता है।
मखमल टमटम बल्लम तुरही
पगड़ी छत्र चंवर के साथ
तोप छुड़ाकर ढोल बजाकर
जय-जय कौन कराता है।
पूरब-पश्चिम से आते हैं
नंगे-बूचे नरकंकाल
सिंहासन पर बैठा,उनके
तमगे कौन लगाता है।
कौन-कौन है वह जन-गण-मन
अधिनायक वह महाबली
डरा हुआ मन बेमन जिसका
बाजा रोज बजाता है।
-रघुवीर सहाय

Sunday, March 16, 2008

तिब्बती विरोध के मायने

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तिब्बत में हिंसक प्रदर्शन के दौरान कई लोग मारे गए हैं। जिसकी घोर निंदा की जानी चाहिए। लेकिन यह जानना बहुत जरूरी है कि तिब्बत के इस विद्रोह का कोई राजनैतिक स्वरूप है या केवल यह एक धार्मिक विद्रोह है। क्योंकि जो समूह इस विद्रोह की वकालत कर रहा है उसका इतिहास राजनीतिक कम और धार्मिक ज्यादा है। इस बारे में कोई भी राय बनाने से पहले हमें चीन और तिब्बत के संबंधों को उनके अब तक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखना जरूरी है। लेकिन यह सवाल हमेशा और हर देश के संदर्भ में उठना चाहिए क्या हमें धार्मिक विद्रोह के राजनीतिक इस्तेमाल को अपना समर्थन देना चाहिए या नहीं। प्रसून का कहना है कि चूंकि यह विद्रोह धार्मिक चरित्र लिए हुए हैं इसलिए इसके पीछे महज बौद्ध साधुओं की राजनीतिक इच्छा है लिहाजा उसे समर्थन बिल्कुल नहीं मिलना चाहिए।
-प्रसून
20वीं सदी के शुरुआत में ही तिब्बत ने खुद को चीन से स्वतंत्र घोषित कर दिया था। लेकिन 1950 तक पूर्वी तिब्बत पर चीन ने आक्रमण के जरिए अपने अधिकार का दावा करता रहा है। एक साल बाद चीन और तिब्बती भिक्षुओं ने ‘सत्रह सूत्रीय सहमति’ पर हस्ताक्षर किया। जिसके बाद तिब्बत को बौद्ध धर्म मानने की स्वतंत्रता और स्वायत्ता की गारंटी मिली। चीन ने इस भिक्षुओँ से नागरिक औऱ सैन्य मुख्यालयों की ल्हासा में स्थापना की गारंटी ले ली। हालांकि तिब्बतियों के एक समूह ने इसका विरोध जारी रखा। जिसके परिणाम स्वरूप 1959 में एक विद्रोह होता है जिसमें कई लोग मारे जाते हैं दलाई लामा तिब्बत छोड़कर भारत में शरण लेते हैं। पिछले दिनों की घटनाएं उस विद्रोह की वर्षगांठ के मौके पर भड़क उठी। वैसे तो चीनी सरकार ने 1965 में ही तिब्बत को स्वशाषित क्षेत्र घोषित कर दिया था फिर भी तिब्बती बौद्ध भिक्षुओं का एक तबका यह आरोप लगाता रहा कि चीन ने अपने सात सूत्रीय सहमति को पूरा नहीं किया है। इस समूह ने वहां बार-बार विद्रोह को जन्म दिया। जिसमें सबसे भयानक विद्रोह 1988 में हुआ और हालत की गंभीरता को देखते हुए चीन सरकार ने तिब्बत की कमान कुच दिनों के लिए सैना के हवाले कर दी।
तिब्बत पर चीन के दावे का इतिहास को जानना जरूरी है। 1950 तक चेयरमैन माओ की सेना ने वास्तव में तिब्बत पर अधिकार नहीं किया था फिर भी चीन तिब्बत को 700 साल पुराने मंगोल शासन के समय से ही अपना हिस्सा मानता रहा। जो कि 18वीं और 19वीं शताब्दी में औपचारिक रूप से चीन संरक्षित राज्य का हिस्सा बन गया। तिब्बत की स्वायत्तता 1913 के एक पक्षीय स्वतंत्रता की घोषणा करने के बाद मिला।
चीन का तिब्बत पर शासन को लेकर पक्ष-विपक्ष में कई तर्क दिए जाते हैं। 1950 के चीनी सरकार के हस्तक्षेप के बाद वहां चीनी हान जनता को बडत़े पैमाने पर बसाने का काम किया गया। जिसके बाद 60 और 70 के दशक में चीन की सांस्कृतिक क्रांति तिब्बत में भी संपन्न हुई। भिक्षु वर्ग का आरोप है कि उस दौरान उनके धार्मिक मठों को तोड़ दिया गया। हालांकि 80के दशक में चीनी सरकार ने तिब्बत में “ओपेन डोर” सुधार कार्यक्रम लागू किया। जिसका उद्देश्य निवेश बढ़ाना था। तिब्बती भिक्षु इस कदम को भी चीनी सरकार की मजबूती से जोड़कर देखते रहे। पिछले दो सालों से चीन ने ल्हासा और चीनी शहर गोलमड के बीच रेल सेवा शुरू की है। जिसपर तिब्बत भिक्षुओं की कड़ी प्रतिक्रिया रही। और वे इसे भी चीनी सरकार की मजबूत पकड़ बनाने की नीति से जोड़कर देखते हैं। वे मानते हैं कि इससे हान जनता की संख्या तिब्बत में और बढ़ेगी।
इस पूरे मसले पर दलाई लामा की भूमिका दिलचस्प है। जिस साल चीन ने पूर्वी तिब्बत पर अधिकार किया उसी साल 15साल की उम्र में दलाई लामा राज्य के प्रमुख बनाए गए। एक साल के भीतर ही वे सत्रह सूत्रीय सहमति पर चीन सरकार के साथ बातचीत करने लगे। वे चार साल बाद तिब्बत में चीन के दखल को कम करने के लिए बीजिंग में चेयरमैन माओ के साथ दलाई लामा ने एक असफल बातचीत भी की। 1959 में इस बातचीत के बाद तिब्बत में एक बड़ा विद्रोह हुआ और दलाई लामा को भारत के धर्मशाला शहर में शरण लेनी पड़ी।
धर्मशाला से दलाई लामा ने लगातार तिब्बत की निर्वासित सरकार के जरिए शांति प्रयास चलाते रहे। इस काम के लिए उन्हे 1989 में नोबेल शांति पुरस्कार भी दिया गया। यद्दपि की दलाई लामा की बातचीत का सिलसिला 1993 में रुक गया था लेकिन इसे 2002 में दोबारा शुरू किया गया। इस बातचीत पर दलाई लामा कहते हैं कि उन्होने तिब्बत के वास्तविक स्वतंत्रता का विचार तो त्याग दिया है लेकिन सांस्कृतिक स्वायत्तता दिए जाने की उम्मीद है। तो क्या यह माना जाय कि पिछले दो दिनों से शुरू हुआ हिंसक विद्रोह केवल सांस्कृतिक स्वायत्तता की मांग है।
दलाई लामा के पूरे उद्धरण से क्या यह नहीं लगता है कि तिब्बत की स्वतंत्रता कुछ धार्मिक समूहों के द्वारा उठाई जा रही है। अगर इसका कोई राजनैतिक नेतृत्व सामने आता है तो हमें जरूर समर्थन करना चाहिए। क्योंकि हम फिलिस्तीनी मुक्त संगठन का तो समर्थन कर सकते हैं लेकिन तालिबान का नहीं।

Thursday, March 6, 2008

जातियों के वजूद के लिए स्त्री हत्या जरूरी !


अंबेडकर यह खोज करने का दावा करते हैं कि – जाति समस्या के अलावा ‘सती प्रथा’,विधवाओं पर प्रतिबंध और बालिका विवाह( बालक-विवाह नहीं) की समस्याएं ब्राह्मण वर्ग द्वारा सजातीय विवाह पद्धति लागू करने के कारण उपजीं। उनकी यह व्याख्या कि ये समस्याएं किस तरह जाति व्यवस्था से जुड़ी हैं, इस प्रकार है-
सजातीय विवाह से हमारा तात्पर्य उन विवाहों से है जो जाति के भीतर ही होते हैं। किसी जाति में स्त्रियों की संख्या पुरुषों की संख्या से मेल खानी चाहिए। हमें यह देखने को मिलता है कि पत्नियो के जीते जी पति मर जाते हैं और पतियों के जीते जी पत्नियां मर जाती हैं यदि कोई पत्नी मर जाए और उसका पति जीवित हो तो वह अतिरिक्त पुरुष होता है औऱ यदि पति मर जाय और पत्नी जीवित हो तो वह ‘अतिरिक्त स्त्री’ होती है। ये शब्दावलियां अंबेडकर ने गढ़ी हैं। यदि ऐसी अतिरिक्त स्त्रियां और अतिरिक्त पुरुष अब भी युवावस्था या अधेड़ उम्र में हों तो उन्हे फिर से विवाह करना होगा। ऐसे विवाह उसी जाति में करने होंगे, अन्यथा वे अपने पुनर्विवाह के लिए दूसरी जातियों में झांक संकते हैं। तब जाति-व्यवस्था भंग हो सकती है। ऐसा जोखिम उठाए बिना पुनर्विवाह की इस समस्या का क्या समाधान हो सकता है?
अंबेडकर को पुनर्विवाह की समस्या मुश्किल में डाल देती है। उन्होने इस बात की विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत की कि स्त्रियों की सती प्रथा जैसी सभी समस्याएँ, पुनर्विवाह की समस्या के कारण उत्पन्न हुई।
“….(जाति से) बाहर विवाह रोकने की यह घेरा बंदी अनिवार्यत: समस्या पैदा कर देती है जिनका समाधान बहुत आसान नहीं है...यदि सजातीय विवाह पद्धति को निरापद रखना है तो यह आवश्यक रुप से दांपत्य अधिकारों का प्रावधान करना होगा, अन्यथा समूह के सदस्या येन-केन प्रकारेण अपना काम बनाने के लिए घेरे से बाहर निकल जाएंगे। परंतु दांपत्य अधिकारों का आवश्यक रुप से प्रावधान करने के लिए यह परम आवश्यक है कि समूह के भीतर दो लिंगो के विवाह-योग्य उन घटकों की आंकिक समानता कायम रखी जाय जो खुद को जाति में बनाए रखना चाहते हैं। केवल ऐसी समानता कायम रखने से ही यह संभव होगा कि समूह की आवश्यक सजातीयता को अक्षुण्ण रखा जा सके, और बहुत बड़ी विषमता से यह अवश्य टूट जाएगी। तब, जाति की समस्या जाति के भीतर दोनों लिंगों के विवाह योग्य घटकों के बीच विषमता को दुरुस्त करने की समस्या में बदल जाती है......यदि ध्यान न दिया जाय तो अतिरिक्त पुरुष और अतिरिक्त स्त्री, दोनों, जाति के लिए संकट खड़ा कर देते हैं..”(खंड 1 पृ 10)
अंबेडकर की व्याख्या जारी रहती है...
“…यदि हम उस समाधान की जांच करें जो हिंदुओं ने अतिरिक्त पुरुष और अतिरिक्त स्त्री की समस्याओँ को हल करने के लिए ढूंढा है तो हमारा काम आसान हो जाएगा...हिंदू समाज की कार्यपद्धति भले ही जटिल हो परंतु एक मामूली द्रष्टा को भी तीन अनूठे स्त्रियोचित प्रचलन देखने को मिलते हैं जिनका नांम है 1) सती प्रथा 2) बलात वैधव्य 3) बालिका विवाह ।...जहां तक मुझे पता है आज भी इस परिपाटी के उद्भव की कोई वैज्ञानिक व्याख्या नहीं मिलती है ”।( खंड 1 पृ 13)
बहरहाल, उन परिघटनाओं की वैज्ञानिक व्याख्या जो अभी तक दूसरों ने नहीं दी और जिसका अंबेडकर ने आविष्कार किया, इस प्रकार है:
“इस प्रश्न के बारे में कि क्यों वे उत्पन्न हुए, मेरा मानना है कि जाति व्यवस्था की संरचना निर्मित करने के लिए वे आवश्यक थे।”
जाति व्यवस्था की संरचना निर्मित करने के लिए ऐसे प्रचलन क्यों जरूरी हैं?
पहले हम अंबेडकर के शब्दों में ही इन दोनों प्रथाओं का अवलोकन करें..
“...अतिरिक्त स्त्री (=विधवा) को यदि ठिकाने नहीं लगाया जाए तो वह समूह में बनी रहेगी: लेकिन उसके बने रहने से दोहरा खतरा है। वह जाति से बाहर विवाह कर सकती है और सजातीय विवाह पद्धति का उल्लंघन कर सकती है, या वह जाति के अंदर विवाह कर सकती है और स्पर्धा के द्वारा उन अवसरों को अतिक्रमित कर सकती है जो जाति में संभावी वधुओं के चलिए अवश्य सुरक्षित होना चाहिए। इसलिए किसी भी दशा में वह अभिशाप है, और यदि उसके मृत पति के साथ उसे जलाया न जा सकता हो तो उसका अवश्य कुछ होना चाहिए। दूसरा उपाय यह है कि उसके शेष जीवन के लिए उस पर वैधव्य थोप दिया जाए”।(खंड 1, पृ 11)।
अंबेडकर के मुताबिक सती प्रथा और वैधव्य इसी प्रकार अस्तित्व में आए।
कई स्थानों पर अंबेडकर का तर्क विच्छिन्न है। हम किन्ही भी दो तर्कों में सामंजस्य नहीं पाते है। उन्हे इस बात की बिल्कुल शंका ही नहीं हुई कि किसी भी सूरत में बालिका विवाह अतिरिक्त पुरुष के पुनर्विवाह की समस्या को हल नहीं कर सकता। अंबेडकर का कहना है कि कुछ अतिरिक्त पुरुष ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं जबकि दूसरे विरक्त हो जाते हैं और यह टिप्पणी करते हैं कि यदि वे किसी एक रास्ते का इमानदारी से पालन करें तो कोई समस्या नहीं होगी अन्यथा जाति मर्यादा की सुरक्षा के लिए खतरा रहेगा। एक तरफ तो वे पुरुषों के प्रभुत्व की व्याख्या करते हैं और दूसरी तरफ वह उन पुरुषों की विशेषता बताते हैं मानों उनके पास मर्यादा है और होनी चाहिए ! क्योंकि, ‘किसी जाति में नियंत्रक अनुपात एक पुरष और एक स्त्री का होना चाहिए’ (खंड 1 पृ 12) मानो यह मर्यादा का सिद्धांत, जो आज भी लागू नहीं हुआ है, अतीत में पहले ही लागू हो चुका हो!
चाहे अतीत में हो या वर्तमान में, जिनकी पत्नियां मर जाती हैं, क्या वे बालिग स्त्री से विवाह नहीं करते हैं? क्या इससे ऐसी स्थिति निर्मित हो रही है जिससे अविवाहित पुरुष पत्नियां पाने में विफल हो जाएं। क्या पत्नियों के जीवित रहते हुए दूसरा विवाह, तीसरा विवाह और विवाह के बाद विवाह नहीं किए जा रहे हैं? एक पुरुष और एक स्त्री का यह नियंत्रक उपाय किस जाति में और किस समय मौजूद था?

अंबेडकर लिखते हैं-
“मेरे विचार में, यह जातियों की व्यवस्था में किसी जाति की एक सामान्य प्रक्रिया है” (खंड 1 पृ 13)

इसका अर्थ यह हुआ कि अगर आप किसी जाति को सतत बनाए रखना चाहते हैं तो ये सभी प्रथाएं प्रकट होंगी।
ठीक है तो क्या ये प्रथाएं निचली जातियों में भी मिलती है? ब्राह्मण जाति की तरह, हमें हर जाति में अतिरिक्त स्त्रियां और अतिरिक्त पुरुष अवश्य मिलते हैं। सभी जातियों को जातियों के रूप में सतत बनाए रखने के लिए, आप यह अपेक्षा करेंगे कि सती, वैधव्य और बाल-विवाह की प्रथाएं सभी जातियों में मौजूद रहनी चाहिए। क्या वे मौजूद थीं?
(जारी...)

Tuesday, February 26, 2008

क्या सजातीय विवाह ही जाति का आधार है?




बाजार से सामाजिक न्याय की उम्मीद है। इस तर्क को प्रचारित करने वाले आज भी रोना रो रहे हैं कि महत्वपूर्ण पदों पर दलितों की भागीदारी न के बराबर है। दरअसल दलितों के हक की लड़ाई एक ओर प्रगतिशील विचारधार के बदौलत लड़ी जा रही है और जबकि दूसरी ओर स्वघोषित चैंपियन दलित ब्राह्मणवादी विचारधारा के जरिए। उसके दाएं बाएं टुकड़ों में तर्क बटोरने के तौर तरीके ही खुद उसके अस्थिर और अध्यात्मवादी चिंतन के बीच खड़ा करते हैं। अपने पूरे कलेवर में यह मानव विकास विरोधी विचारधारा अंत में सामंती मूल्यों के सामने न केवल घुटने ही टेकती बल्कि खुलकर बताती है कि यही से दलित मुक्ति का रास्ता जाता है। मौजूदा दलित सत्ताओं के अनुपातवादी संघर्ष के साथ यह छद्म लड़ाई उनके आधारभूत सिद्धांतकारो में भी मौजूद है। अनुपातवादी चिंतन की बहस में लटकने की जद्दोजहद में उनके विचारक सिलसिलेवार ढंग से खुद की कही बातों का खंडन करते मिलते हैं। वे उस छद्म लड़ाई पर बहस नहीं करते बल्कि अभी अनुपात सही नहीं हुआ...वे ऐसे चौंकते हैं जैसे किसी दैव चमत्कार के जरिए यह होने वाला था। ये ऐसी छद्म लड़ाई है जिसमें कोई शहीद नहीं होता। सबकुछ सुविधाजनक तरीके से चलता है। यही वह मजबूरी है जो इन्हे आज बाजारवाद के साथ खड़ा कर रही है। कल को कोई और आस्थामूलक विचारधारा पैदा होती है तो फिर उसमें समा जाएंगे। इसलिए जरूरत है कि इस समझ के मूल सिद्दांतकारों की जड़ में जाकर देखा जाय कि क्या ये शुरू से ही ऐसे छद्म युद्ध लड़ते रहे हैं। देखते हैं कि जातियों के पैदा होने के बारे में अंबेडकर के विचार मैकाले के तर्क दिवस मनाने वालों के मुताबिक कितने तार्किक हैं।



जातियों के पैदा होने के बारे में मुख्यतौर पर दो राय बनती है। एक धारा कहती है कि कबीले के बचेखुचे लोग जातियों में बदल गए होंगे जबकि दूसरी धारा इसे श्रम विभाजन से जोड़ कर देखती है। खुद पेशों से ही जातियों का उदय हुआ हो। इस विचार को ही ज्यादातर लोग मानते हैं। लेकिन अंबेडकर इसे नहीं मानते। उनका सवाल है क्या सभी देशों में श्रम विभाजन नहीं हुआ फिर वर्ण व्यवस्था भारत में ही क्यों पैदा हुई। जवाब में तर्क दिया जाता है विशेष परिस्थितियों का जो जातियों के निर्माण तक ले जाती है। लेकिन विशेष परिस्थितियां क्या थी इस पर सवाल अनसुलझा छोड़ा गया। लेकिन झटके से अंबेडकर ने कहा कि वे उस विशेष परिस्थिति को समझ गए हैं। वे सजातीय विवाह को जाति व्यवस्था का मूल मानते हैं। देखिए क्या कहते हैं वे
“उद्भव का प्रश्न हमेशा खीझ पैदा करने वाला रहा है और जाति व्यवस्था के अध्ययन में इसपर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया है। कुछ ने अपनी आंखे मूंद और कुछ न कन्नी काट ली। कुछ लोग अभी इस उहापोह में हैं कि क्या जाति जैसी चीज का कोई उद्भव हो सकता है जहां तक मेरा सवाल है मैं किसी उहापोह में नहीं हूं क्योंकि मैं यह सिद्ध कर चुका हुं कि सजातीय विवाह ही जाति का एकमात्र लक्षण है और जाति व्यवस्था के उद्भव से मेरा आशय यही है कि सजातीय विवाह पद्धति की संरचना और तंत्र का उद्भव” (खंड 1, पृ. 14)
अंत में की गई टिप्पणियों में कोई आपसी तालमेल नहीं है । एक जगह सजातीय विवाह ही कारण (मूल) है और ‘जाति’ इसका ‘प्रभाव’ है। यदि हम इस बात को इस रूप में देखें तो दोनों (सजातीय विवाह पद्धति और जाति व्यवस्था) समान नहीं है। लेकिन दूसर वाक्य में अंबेडकर का कहना है कि चाहे आप जाति व्यवस्था के उद्भव की बात करें या सजातीय विवाह पद्धति की संरचना और तंत्र के उद्भव की बात करें, दोनों का अर्थ एक है। यदि हम इस नजरिए से देखें तो जाति व्यवस्था और सजातीय विवाह पद्धति दोनों एक हैं। इन परस्पर असंगत विचारों में से हमें लेखक का कौन सा विचार ग्रहण करना चाहिए ?
अगर उनका यह कहना है कि सजातीय विवाह पद्धति ही जाति व्यवस्था का आधार है तो यह जाति का आधार ढूंढ लेने का दावा नहीं हो सकता। तब सवाल यह उठता है कि ठीक है, फिर सजातीय विवाह पद्धति का आधार क्या है? जब तक हम यह न जान लें तब तक समस्या नहीं सुलझ सकती।
यहां पर तो ऐसे कहा गया, लेकिन किसी और जगह अंबेडकर की जाति व्यवस्था की व्याख्या ‘चार वर्णों’ से आरंभ होती है।
(जारी..)

Thursday, January 17, 2008

फिल्म को फिल्म की तरह देखें.. मतलब !

हमने सोचा कि फिल्म 300 पर कोई बहस आगे नहीं बढ़ेगी। लेकिन बहस धीरे-धीरे ही सही बहस आगे बढ़ी । हालांकि लिखने वालों ने नाम नही दिया। आप भी जानिए फिल्म पर दी जाने वाली प्रतिक्रियाओं के बारे में।
Anonymous said...
सदी की बेहतरीन और जिम्मेदार सुझावों में से एक सुझाव। मैं इन महाशय से कहना चाहुंगा कि अगर आपको मैं दो पैरों पर चलने वाले बंदर की तरह देखा जाय या फिर अभिव्यक्ति की बेहतरीन क्षमता और अपने आसपास घटित घटनाओं की कारणता जानने वाले सजग मानव के रूप में। इतिहास थोड़ा पढ़े और किताब पढ़े( किताब लेकर घुमें नहीं) केवल इंटरनेट पढ़ेंगे तो साधु और ओझा की तरह ज्ञान का हवन कर डालेंगे। कम्युनिस्ट कभी बाप के द्वारा की गई हत्या की सजा बेटे को देने की वकालत नहीं करता। इसमें आप यकीन करते होंगे। हम हत्यारों और दलालों की दुनिया से वाकिफ हैं और उसे जड़ से काटने में ज्यादा यकीन रखते हैं। माफ करिएगा हम बहुत सीधा जवाब देना जानते हैं। हम मानव और मानवनुमा दिखने वालों के बीच फर्क करते हैं।

Anonymous said...

अमेरिका में जो हो रहा है वह पाप है और ईरान चूंकि प्रतिरोध करता है वह पवित्र है, यह दृष्टि ठीक नहीं. फ़िल्म को फ़िल्म की तरह भी देख लीजिए. यह इतिहास बताएगा की ईरान की महान सरकार प्रगतिशील थी या अमेरिका की तानाशाही व्यवस्था सड़ी-गली थी. अलबत्ता यह याद रखना चाहिए की खुमैनी की क्रांति के बाद सबसे पहले ईरान में मार्क्सवादियों को खड़ा करके गोलिओं से उडाया गया था. उसके लिए कुछ हज़ार साल पीछे नहीं ३८ साल पीछे जाना है.

Wednesday, January 2, 2008

दंभी लोगों की गूंज है फिल्म 300


-विनिता
३०० की ऎतिहासिक पृष्ठभूमि एक बात है लेकिन उसका फिल्मी रुपान्तरण सिर्फ तथ्यों को नही रखता। इरानी सेना को दैत्यों, जादूगरों और पशुवत लोगों से भरा दिखाकर यह फिल्म जो कह रही है उसको समझने में किसी भी न्यूनतम राजनैतिक समझदारी रखने वाले को दिक्कत नहीं होनी चाहिए। फिल्म में लियोनायडस के जरिये कही गई बात कि दुनिया में सभ्यता और स्वतंत्रता कि आखरी उम्मीद स्पार्टा है,में निश्चित तौर से आज के पश्चिमी महाबलियों कि भाषा की दंभी गूंज सुनी जा सकती है। इतिहास कि इस तरह कि तोड़-मरोड़ का हर तरह से प्रतिरोध होना चाहिए, निश्चित तौरपर सांस्कृतिक रुपों में भी, जिसका ईरानी संगीतकार यास एक अच्छा उदाहरण पेश करते हैं।

जो इतिहास है सो है...

इतिहास पर फिल्म बनाना वर्तमान को आइना दिखाना होता है। उसे सबक देना होता है। एक विषय के रूप में भी शायद इतिहास की जरूरत हमें इसीलिए होती है। फिल्म चाहे पचास बार बनाई जाय उसका मूल्यांकन उसके देखे जाने वाले समय के हिसाब से होगा। हिटलर के समय यहूदियों पर हुए अत्याचार के जरिए हम आज इजराइल की हरकत को वाजिब नहीं ठहरा सकते। लेकिन अमित जी मानते हैं कि ऐसा नहीं होता। वे 300 को ऐतिहासिक रूप से सही मानते हैं। इतिहास तो इतिहास है उसे बताने या दिखाने से संस्कृति कैसे नष्ट हो सकती है? अमित जी का यही सवाल है।

अमित जी लिखते हैं...
जनाब, यदि यहाँ देखेंगे तो यह आपको पता चलेगा कि इस कहानी पर फिल्म आज से 45 वर्ष पहले भी बनी है। यह कहानी ऐसी है कि उस समय के बाद से युद्ध विज्ञान और रणनीती के हर स्कूल में इसका अध्ययन किया गया है, आज भी होता है।

इस फिल्म में दिखाया गया है कि उस युद्ध में किस तरह स्पार्टा की 300 सैनिकों की एक छोटी सी सेना ने तत्कालीन पर्सिया (आधुनिक ईरान)को नेस्तनाबुत किया था

आपका पता नहीं पर मैंने यह फिल्म भी देखी है और 45 वर्ष पूर्व आई 300 Spartans भी देखी है और दोनों में से किसी फिल्म में यह नहीं दिखाया कि स्पार्टा के ३०० सैनिकों ने पर्शिया को नेस्तेनाबूद किया। दोनों में सिर्फ़ स्पार्टा के ३०० बहादुरों और थेस्पिआ के ७०० रणबांकुरों(यह 300 में नहीं वरन्‌ 300 Spartans में दिखाया है और इतिहास के अनुसार सत्यता के निकट है) की वीरता दिखाई है कि वे ज़र्कसीस की सागर जैसी सेना के सामने डटे रहे और लड़ते हुए प्राण त्यागे। और यह इतिहास में दर्ज है कि थरमाप्ली की भीषण लड़ाई के बाद प्लैटेया पर ज़र्कसीस की बाकी सेना का मुकाबला अन्य यूनानी राज्यों की सेनाओं से हुआ था और ज़र्कसीस की सेना की इतनी मारकाट हुई थी कि वह आखिरकार अपनी सेना छोड़ के वापस पर्शिया भाग गया था।

अब जो इतिहास है सो है, उससे किसी की संस्कृति कैसे नष्ट होती है यह मेरे को समझ नहीं आता। कल को कोई फिल्म बनाता है जिसमें दिखाता है कि डेढ़ सौ वर्ष भारत अंग्रेज़ों का गुलाम रहा और कैसे अंग्रेज़ों ने भारतीयों का शोषण किया तो क्या उससे भारत की संस्कृति नष्ट हो जाएगी? या कोई यह फिल्म बनाता है कि कैसे बाबर ने दिल्ली का तख्त हासिल किया और मुग़ल सल्तनत की नींव रखी तो उससे भारत की संस्कृति नष्ट हो जाएगी?

Monday, September 17, 2007

आदिवासी स्त्रियां और विद्रोह




"तुम हमारा जिक्र इतिहास में नहीं पाओगे

क्योंकि हमने अपने को इतिहास के विरूद्ध दे दिया है

छूटी हुई जगह दिखे जहां-तहां

या दबी हुई चीख का अहसास हो

समझना हम वहीं मौजूद थे.


दरअसल कवि विजय देवनारायण साही की ये पंक्तियां विद्रोह हैं, गैर बराबरी वाले समाज से, सड़ चुकीं सांस्कृतिक मान्यताओं से, लड़ती गिरती और गिर-गिर कर लड़ने को आतुर आधी दुनिया का। जिसमें आदिवासी महिलाएं सबसे आगे हैं, इसलिए जाहिर है ये इतिहास और इतिहासकारों के द्वारा आदिवासी महिलाओं के मुक्तकामी विद्रोहों को दबाने की तमाम कोशिशों के खिलाफ भी हैं। ऐसा नहीं है कि इतिहासकारों और मानवशास्त्रियों ने अंग्रेजों और सामंतों के विरूद्ध आदिवासी विद्रोहों का वर्णन नहीं किया है, परंतु इन विद्रोहों में पुरुषों के साथ कन्धे से कन्धा मिला कर चलने वाली आदिवासी महिलाओं का जिक्र तक नहीं है (और ये बात परंपरागत इतिहास कारों को तो छोड़िए, मार्क्सवादी इतिहासकारों के लेखन में भी मौजूद है)। ऐसा लगता है कि आदिवासी महिलाएं इन विद्रोहों से पूर्णतः अछूती रहीं हैं। दरअसल, लोकतांत्रिक सामाजिक सरोकारों में तो उन्हें हाशिए पर रखा गया है, जबकि सामंती सरोकारों को पूरा करने के मामले में वो धूरी बनी रही हैं। इसका असर इतिहास लेखन में माहिलाओं की स्थिति में भी देखने को मिलता है। इतिहास लेखन में वो सांस्कृतिक नजरिए से ही देखी गई हैं, उसमें भी उनकी परपंरा निर्वाहनी की ही भूमिका अधिक नजर आती है। वे गीतों में तो हैं, लेकिन शोक गीतों में। सामाजिक विद्रोह के ताने-बाने में वे हैं भी, तो धूमिल छवि के साथ। उन्हें याद करना भी गवांरा नहीं समझा जाता । और समझा भी जाता है, तो महज रिसर्च और कुछ उद्देश्यहीन एनजीओ लेखन में वे देखने को मिलती हैं, जहां उनके विद्रोह को हवा नहीं दी जाती, उलटी दिशा दी जाती है । यानी कुल मिला कर उनका विद्गोह पुरुष सहभागिता में स्त्री की अनिवार्य सेवा बन कर रह जाता है, लेकिन ये हकीकत नहीं है। किसी भी समाज में विद्रोह की भूमिका में स्त्री की भूमिका बराबरी की होती है।
अब यह जरूर है कि बहुत से लोगों को स्त्री की भूमिका किसी भी आंदोलन या विद्रोह में कमतर ही लगती है। इसकी कई वजहें हैं। इसमें सबसे खास है स्त्री के विद्रोह को मुखर अभिव्यक्ति का नहीं मिलना। दरअसल उसका विद्रोह इतना आम है कि उस पर किसी की नजर नहीं पड़ती, क्योंकी उसका यह विद्रोह समूची सत्ता और व्यवस्था के खिलाफ होता है। फिर चाहे वह आदिवासी समाज हो या फिर सामंती समाज। हां, इतिहास में उनकी चर्चा जरूर होती है, लेकिन उन्हीं महिलाओं की, जिन्होंने सत्ता या विद्रोही पुरुष नेता की मनचाही स्थिति पाने के लिए कदमताल किया हो। सफल मार्क्सवादी विद्रोह भी इसी मामले में असफल रहे हैं कि वे कोई ऐसी व्यवस्था नहीं गढ़ पाए जहां स्त्री मुक्त हो अपनी तमाम मानसिक, जैविक और आर्थिक जरूरतों के मुताबिक। ऐसे में आदिवासी स्त्रियों का विद्रोह और अध्ययन की दरकार रखता है।

वैसे भी हमारे यहां स्त्री विद्रोह लेखन काफी कम हुआ है और जो उपलब्ध भी हैं, उसमें मुख्यत मध्यवर्ग और ऊँची जाति की स्त्रियों का ही जिक्र ज्यादा मिलता है। ऐसे में आदिवासी स्त्री विद्रोह पर लिखना या लिखा हुआ पढ़ना किसी सौभाग्य से कम नहीं लगता। यह बात भी ध्यान देने की है कि आदिवासी समाज पर लिखने वाले लेखकों, मानवशास्त्रियों, समाजशास्त्रियों व इतिहासकारों ने आदिवासी विद्रोहों की कड़ी में विद्रोही महिलाओं मसलन सिनगी दई, कइली दई, देवमनी और माकी जैसी स्त्री विद्रोही चरित्रों की चर्चा तक नहीं की है। उन्होंने सिद्धो कान्हू या बिरसा मुन्डा या धरती आबा की तरह उन्हें स्थापित करना तो दूर, इनकी सहभागिता का उल्लेख भी नहीं किया है। लगता है जैसे कि वो आदिवासी समाज की इन स्त्री चरित्रों से लगभग अंजान ही रहे हैं, लेकिन तमाम बुद्धिजीवियों की इस अनदेखी के बाद भी ये विद्रोही महिलाऐं आदिवासी समाज की ऐतिहासिक धरोहर —लोकगीतों और दन्त-कथाओं— में इतिहास को चुनौती देती नज़र आ ही जाती हैं। यही नहीं, उन्होंने इन विद्रोहों के दौरान अपने लिए और अपने संघर्षों को जिंदा रखने के लिए अपने ही तरह के प्रतीक गढ़े हैं। उनके लिए भाल लगी बिंदी किसी सुलज्जा स्त्री का श्रृंगार नहीं है, बल्कि अपनी ताकत से हासिल की गई (जनी शिकार) निशानी है। यानी सदियों से औरत के लिए तय किए गए प्रतीक कैसे उसके विद्रोहों के चलते उसकी मुक्ति का प्रतीक बन गए, इसे देखने के लिए आदिवासी विद्रोहों को समझना एक बेहतर माध्यम हो सकता है और ये आदिवासी विद्रोह और उनमें महिलाओं की भूमिका महज किसी तात्कालिक कारणों का हल तलाशना नहीं थी, बल्कि इसमें सामूहिक जीवन पद्धति, जंगल-जमीन, संस्कृति के साथ-साथ अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई ज्यादा थी। झारखंड की उरांव आदिवासी औरतों ने लगभग चार सौ साल पहले सिनगी दई और कइली दई के नेतृत्व में रोहतासगढ़ के दुर्ग पर तुर्क सेना के दांत खट्टे कर दिए थे। किवदन्ती यह है कि सरहुल पर्व में जब पुरुष मादक पेय हडिया पीकर नशे में डूबे थे(यह भी कहा जाता है कि पुरुष जंगल गये हुए थे)। उस दौरान रोहतासगढ़ किले पर फतह करने के लिए तीन बार तुर्क सेना का हमला हुआ। तीनों बार स्त्रियों ने सैनिक वेश धारण किए और तुर्क सेना को परास्त किया। इस विजय की खुशी में आज भी आदिवासी औरतें बराबरी का सपना बांटती जनी शिकार करती हैं और ऐतिहासिक विजय की याद दिलाती हैं। बारह सालों में एक बार जनी शिकार का पर्व झारखंड के उरांव जनजाति में मनाया जाता है और स्त्रियाँ दुश्मन के प्रतीक स्वरूप जंगली जानवरों का शिकार करती हैं। उनके द्वारा माथे पर तीन लकीरों का गोदना भी इसी विजय की याद में गुदवाया जाता है।

इतिहासकारों का दावा है कि माहात्मा गांधी को सत्याग्रह और असहयोग का रास्ता टाना भगतों ने दिखाया, लैकिन हकीकत ये है कि इसमें देवमनी उर्फ बंधनी के योगदान को नकारा नहीं जा सकता.. वह टाना भगत आंदोलन की एक स्तंभ रही है। जब बाहरी लोगों और अंग्रेजों ने आदिवासियों को उनकी भूमि से बेदखल कर दिया और हजारों एकड़ जमीन छीन ली तब विशुनपुर के चिंगरी गांव में पैदा हुए जतरा उरांव ने टाना आंदोलन चलाया। जतरा भगत ने उरांव समाज से कहा कि असहयोग करो। ड ा. सुदेशना बसु ने अपनी किताब पीजेंट रसिस्टेंट इन बिहार में लिखा है कि चिंगरी में टाना भगत आंदोलन का परचम लहराने वाले जतरा भगत को 1914 में गिरफ्तार किया गया और उन्हे लगभग डेढ़ साल कैद की सजा हुई, लेकिन टाना भगतों का असहयोग आंदोलन बिखरा नहीं। बटकुरी गांव के जतरा भगत की पत्नी देवमनी-बंधनी ने आंदोलन की बागडोर अपने हाथ में ले ली। देवमनी के नेतृत्व में टाना भगत आंदोलन अपनी ऊंचाई पर पहुंचा। इस दौरान इस आंदोलन का विस्तार आज के बिहार और झारखंड के पूरे क्षेत्र पर हुआ। देवमनी के नेतृत्व में हजारों आदिवासी टाना पंथी हुए। देवमनी की बहादुरी और समर्पण से अंग्रेजों तथा जमींदारों में खौफ पैदा हुआ। जंगल-जमीन के लिए गोलबंदी बढ़ी। और आदिवासी लोग बड़ी संख्या में जल-जंगल और जमीन के लिए संघर्ष के लिए एकजुट हुए। बिरसा विद्रोह के कदम-दर-कदम संघर्ष में स्त्रियों की व्यापक भागीदारी पाई गई। विद्रोह के नायक बिरसा मुंडा का साथ स्त्रियों ने कभी नही छोड़ा, खासकर चम्पी और साली ने। चम्पी और साली नामक विद्रोही स्त्रियाँ हर समय बिरसा की मदद के लिए साथ रहीं। इसी प्रकार बिरसा विद्रोह के महान सह-नायक गया मुंडा और उनकी पत्नी माकी के साथ पूरे परिवार के बलिदान को कैसे भुलाया जा सकता है जिन्होने आदिवासी समाज की अस्मिता की रक्षा के लिए अंग्रेजों से लोहा लिया अंग्रेजों से जुझते हुए गया मुंडा शहीद हुए और उनका पूरा परिवार जिनमें उनकी बेटियां और बहुएं भी थीं को अंग्रेजों ने जेल में कैद किया।
जब अंग्रेजों ने आदिवासी क्षेत्रों में पावं पसारना शुरू किया तो पहाड़-जंगल, नदी, गांव में बसा जीवन बाहरी लोगों के हस्तक्षेप से अशांत होने लगा तब विरोध की शुरुआत हुई। विद्रोहों की इस कड़ी में 1855-56 का संताल हूल आदिवासी संघर्ष का ऐसा उदाहरण है, जिसमें आत्मगौरव और आत्मसम्मान के लिए दस हजार से ज्यादा लोगों ने बलिदान दिया। संथाल औरतों का अपहरण और कुकर्म के बाद उनकी हत्या, अंग्रेजों, महाजनों तथा जमींदारों के अत्याचारों से आदिवासी त्रस्त हो उठे, तो औरत-मर्द सभी ने हथियार उठा लिया। संथाल हूल के नायक सिद्धो, कानू, चांद, भैरव के साथ उनकी दो बहनें फूलो और झानो ने योद्धा की भांति अंग्रेजों से मुकाबला किया। रात को तलवार लेकर निकली फूलो और झानो ने अंग्रेजों के शिविर में जाकर 21 सिपाहियों की हत्या कर दी। संथाल लोकगीतों मे आज भी इन बहादुर औरतों को याद किया जाता है।
ये वे आंदोलन हैं जिन्हें लोग किसी न किसी रूप में जानते हैं और हमारी सरकारें भी किसी न किसी रूप में इन आंदोलनों पर अपनी उत्सवधर्मिता दिखलाती रही हैं, लेकिन दुखद यह है कि ये आंदोलन पुरुष आंदोलनकारियों के सन्दर्भ में ही याद किए जाते हैं। नींव की ईंट की तरह स्त्री आदिवासी विद्रोही इसमें सिरे से गायब नजर आती हैं। बावजूद इसके प्रकृति से साक्षात् संवाद करने वाली इन वनपुत्रियों के विद्रोहों की और कई मिसाले हैं, जिनको याद किया जाना बेहद जरूरी है। केरल के कुरुचिया आदिवासी महिला नीली ने अंग्रेजी फौज से संघर्ष के लिए अलग महिला सेना का गठन किया था। उड़ीसा की आदिवासी महिलाओं ने यह निश्चय किया कि जिस रूप के पीछे ये गोरे लुटेरे हमारा अपहरण करते है, हम उस रूप को ही नष्ट कर देगें और उन्होने अपने चेहरे पर आड़ी तिरछी रेखाऐं गुदवा लीं। ऐसे ही भील आदिवासी आंदोलनों में भी स्त्रियों ने बढ़कर-चढ़कर हिस्सा लिया । फूलो, झानो, माकी, थीगी, नागी, लेंबू, साली, चंपी, देवमनी,सिनगी,कइली दई जैसे आदिवासी स्त्रियों की एक लंबी फेहरिश्त है, जिनके नाम गुमनामी में ही सही, आदिवासी लोकगीतों, कथाओं और प्रतीकों में किसी न किसी रूप में जिंदा हैं।
आदिवासी समाजों में महिलाएं हमारे सभ्य कहे जाने वाले समाज से ज्यादा स्वतंत्र रही हैं,इसका कारण उत्पादन प्रक्रिया में उनकी सीधी भागीदारी का होना है।यही कारण भी रहा कि उन्होने बाहरी विपत्तियों का सामना अपने पुरुष साथियों के साथ कन्धे से कन्धा मिला कर किया।चाहे मामला जंगल का हो या जमीन का,अस्मिता का हो या रोटी का,वे हर विद्रोह में उपस्थित रहीं हैं।यह बात और है कि उन्हे इतिहास में जगह नही दी गई। पर यह भी सच्चाई है कि इतिहास उनके बिना अधूरा रहा है और रहेगा।
# नूतन मौर्या

Sunday, July 29, 2007

क्यों डरती रही है भारत की सरकारें 1857 से-प्रणय कृष्ण

भारतीय राष्ट्र के जन्मकाल की प्रसव पीड़ा का प्रतीक था, 1857 का विद्रोह. संभवत: कार्ल मार्क्स वह पहले इनसान थे, जिन्होंने इसे भारत का पहला स्वाधीनता संग्राम कहा था. दरअसल भारतीय राष्ट्र की ओर से अंगरेजों से आजादी पाने और अपने आप को राष्ट्र के रूप में गठित करने की यही पहली कोशिश थी. इससे पहले हिंदुस्तान नाम का भूखंड था, वह अनेकों बादशाह-नवाबों, राजा-महाराजाओं आदि के राज्यों में बंटा था. उस दौर में चाहे राणा प्रताप और शिवाजी जैसे हिंदू मुगल बादशाह से या हिंदू और मुसलमान सामंत आपस में ही क्यों न लड़ते हों, सभी का उद्देश्य अपनी-अपनी रियासत का बचाव करना होता था. बस उतना ही भूखंड उनका देश था या उनकी मातृभूमि थी, जिसके वे अन्नदाता कहलाते थे. अंगरेजों ने एक -एक करके इन रियासतों को अपने कब्जे में या अपनी छत्रछाया में ले लिया था. अंगरेज किसी एक हिंदुस्तानी से लड़ते थे तो दूसरा हिंदुस्तानी सामंत उनकी मदद क रता था. जैसे 1857 के विद्रोह के बस 50-60 साल पहले जब अंगरेज टीपू सुलतान के खिलाफ लड़ रहे थे तो उन्होंने मराठों और निजाम को अपने पक्ष में कर रखा था. राष्ट्र नाम की कोई चेतना होती तो टीपू सुलतान के साथ मराठों, निजाम और दिल्ली दरबार का एक संश्रय बन गया होता और उसने अंगरेजों ही नहीं फ्रांसिसियों, डचों, पुर्तगालियों आदि तमाम उपनिवेशवादियों को हिंदुस्तान से निकाल बाहर किया होता. पिछले इतिहास में 1857 का फर्क सबसे बढ़ कर इसी बात में है कि इसके दौरान पूरब से लेक र पश्चिम तक हिंदुस्तान की आम आवाम अंगरेजों के खिलाफ इसी चेतना के साथ संघर्ष में उतरी कि वे बाहरी ताकत हैं जो हमारे देश को गुलाम बना रहे हैं. यह चेतना उन हजारों-हजार किसानों में फैली थी जो अंगरेजी उपनिवेशवाद से हथियारबंद होकर लड़े थे. यानी उसका मूल चरित्र किसान विद्रोह का था. इसे शुरू करनेवाले थे अंगरेजी सेना के भारतीय सिपाही, जो उत्तर भारत के ग्रामीण किसान पृष्ठभूमि से आते थे. इस विद्रोह का नाभिकेंद्र अवध प्रांत था. लेकिन इस विद्रोह के आगोश में समूचा हिंदी-उर्दू क्षेत्र आ गया और साथ ही इसका असर पंजाब, बंगाल, महाराष्ट्र, असम, झारखंड के आदिवासी अंचल तथा सुदूर दक्षिण में गोदावरी जिले तक फैला. भले ही इस विद्रोह को कोई सुसंगठित अखिल भारतीय नेतृत्व न प्राप्त रहा हो, लेकिन राजनीतिक रूप से 1857 का संग्राम भारतीय स्तर के राष्ट्रीय आंदोलन का सूचक था. यूं तो इस विद्रोह की शुरुआत मंगल पांडे ने 29 मार्च 1857 को कलकत्ता के पास बैरकपुर छावनी में कर दी थी, किंतु इसकी विधिवत शुरुआत 10 मई, 1857 को मेरठ छावनी में हिंदुस्तानी पलटन के विद्रोह से मानी जाती है. 1857 से 1859, तीन वर्षों तक अंगरेजों के खिलाफ खुला छापामार युद्ध चला, जिसमें सैनिकों और किसानों के साथ-साथ समाज के सभी वर्गों ने यहां तक कि देशभक्त सामंतों ने भी हिस्सा लिया. झांसी में कोरी और कांछी तथा लखनऊ में सुरंगों की लड़ाई में पासियों की अदभुत वीरता से लेकर सिंहभूम और मानभूम के आदिवासियों की शौर्य की गाथाएं इतिहास में दर्ज हैं. इस विद्रोह में हजारों अनाम शहीद समाज के ऊंचे वर्गों या वर्णों से ही नहीं निचले वर्गों व वर्णों से भी थे. सिंधिया, पटियाला, नाभा, जिंद तथा कश्मीर व नेपाल जैसे गद्दार राजे-रजवाड़े के सहयोग से अंगरेजों को इस विद्रोह को कु चलने में सहायता जरूर मिली, लेकिन भारतीय राष्ट्र की नींव पड़ चुकी थी. इसलिए राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम को कुचलना अब अंगरेजों के बूते की बात नहीं रही. 1857 के विद्रोह को कुचलने के बाद भी अंगरेज उस विद्रोह को बदनाम करने, उसके महान योद्धाओं के चरित्र हनन करने तथा उसे भारतीय जनता की सामूहिक स्मृति से मिटा देने की लगातार कोशिश करते रहे. 19 वीं सदी के अंतिम भाग से लेकर 20 वीं सदी के मध्य तक जो स्वाधीनता संग्राम कांग्रेसी नेतृत्व में चला, उस पर समझौतापरस्त उद्योगपति वर्ग और मध्यमवर्गीय बौद्धिक तत्वों का दबदबा रहा. दुर्भाग्य की बात है कि उनके लिए भी 1857 शुरू से ही दु:स्वप्न बना रहा. इसी वजह से कांग्रेसी धारा किसानों, मजदूरों के संगठित क्रांतिकारी आंदोलनों तथा भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी देशभक्तों के राष्ट्रवाद से उसी तरह भयभीत रही जैसे कि अंगरेज. आजादी के आंदोलन की जो क हानी सरकारी तौर पर प्रचारित की जाती रही है, उसके अनुसार देश की आजादी अहिंसात्मक आंदोलन द्वारा प्राप्त की गयी थी. इस कहानी का सीधा सा मतलब यह है कि आजादी के आंदोलन में 1857 से लेकर भगत सिंह और नौसैनिक विद्रोह (1946) तक का कोई खास योगदान नहीं है. साम्राज्यवाद के खिलाफ सशस्त्र और सक्रिय प्रतिरोध से जन्मे किसानों व मजदूरों के तमाम आंदोलनों का कोई खास महत्व नहीं है. भारत की आजादी में अगर कहीं आम आदमी, मजदूर या किसान को जगह भी दी गयी तो महज संख्या के बतौर. बिना चेहरेवाले के गुमनाम लोगों की संख्या के बतौर. जाहिर है कि मेहनतकश जनता को न सिर्फ वर्तमान में उनके हक से वंचित कि या जा रहा है वरन अतीत में उनकी भूमिका को नकारा भी जा रहा है. आज अपनी इस शानदार विरासत का पुनरुद्धार करने और भारतीय जनता की अस्मिता के न्यायोचित गौरव को पुनर्स्थापित करने का कार्यभार इसलिए भी जरूरी हो उठा है, क्योंकि देश की सत्ता पर काबिज रही ताकतें न सिर्फ हमारे पूरे इतिहास को विकृत करने पर आमादा हैं बल्कि हमारी राष्ट्रीय भावना को, आजादी के आंदोलन के सारे मूल्यों को ही मटियामेट कर रही है. 1857 ने जिस राष्ट्रवाद का आगाज किया था, उसकी विरोधी शक्तियां आजाद भारत में सत्ता के शिखर पर पहुंच चुकी हैं. यानी पहली जंग-ए-आजादी ने नया हिंदुस्तान बनाने की जो चुनौतियां हमारे सामने उपस्थित की थीं, जो लक्ष्य निर्धारित किये थे, जो सपने देखे थे, वे आज न सिर्फ अधूरे हैं बल्कि सबसे बड़ी बाधा का सामना कर रहे हैं.