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Wednesday, September 3, 2008

आखिर ठग ही लिया अमेरिका ने....


जिसका डर था वही हुआ। न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप यानी एनएसजी की महत्वपूर्ण बैठक से ठीक एक दिन पहले अमेरिकी सरकार के उस सिक्रेट लेटर का खुलासा हो गया है जिसमें कहा गया है कि भारत अगर परमाणु परीक्षण करता है तो अमेरिका उस पर प्रतिबंध लगा सकता है। उस ईंधन की सप्लाई रोकने की आजादी है। मनमोहन सिंह सरकार चींख चीखकर यह बता रही थी कि हमने देश की आजादी को गिरवी नहीं रखा है और हम परमाणु परीक्षण के लिए स्वतंत्र हैं। सिक्रेट लेटर का खुलासा भारतीय राजनेताओं को समझौते की असलियत बताने के लिए नहीं बल्कि अमेरिकी कांग्रेस के उन विरोधी सदस्यों के लिए है जिन्हे यह आशंका थी कि भारत को इतनी छूट क्यों दी जा रही है। इस लेटर के जरिए इस शंका को दूर किया गया है कि आखिर अमेरिका एनपीटी पर हस्ताक्षर नहीं करने वाले देश के प्रति उदारता क्यों दिखा रहा है। समझौते की शर्त अमेरिका के पक्ष में है।
पिछले नौ महीने से यह लेटर सिक्रेट था। जिसमें अमेरिका ने एनएसजी से भारत पर कुछ प्रतिबंध लागने की भी अपील की गई थी। अमेरिकी सरकार के एक बड़े अधिकारी ने कहा है कि लेटर को अमेरिकी सरकार ने इसलिए छुपाया था कि कहीं इससे भारत की मनमोहन सरकार गिर न जाए। वाशिंग्टन पोस्ट के रिपोर्टर का कहना है कि भारतीय वार्ताकारों और मनमोहन सिंह सरकार को इस शर्त के बारे में पहले से पता था।
ग्लेन केसलर की वाशिंग्टन पोस्ट में छपी पूरी रिपोर्ट पढ़ें-
In Secret Letter, Tough U.S. Line on India Nuclear Deal
By Glenn Kessler
Washington Post Staff Writer
Wednesday, September 3, 2008; A10


The United States will not sell sensitive nuclear technologies to India and would immediately terminate nuclear trade if New Delhi conducted a nuclear test, the Bush administration told Congress in correspondence that has remained secret for nine months.
The correspondence, which also appears to contradict statements by Indian officials, was made public yesterday by Rep. Howard L. Berman (D-Calif.), chairman of the House Foreign Affairs Committee, just days before the 45-nation Nuclear Suppliers Group meets again in Vienna to consider exempting India from restrictions on nuclear trade as part of a landmark U.S.-India civil nuclear deal.
The NSG, which governs trade in reactors and uranium, poses a key hurdle for the U.S-India pact. The group operates by consensus, allowing even small nations to block or significantly amend any agreement. The United States has pressed the NSG to impose few conditions on India, even though it has tested nuclear weapons and has not signed the nuclear Non-Proliferation Treaty.
A significant group of nations balked at the proposal when the NSG first discussed it two weeks ago. Berman's release of the correspondence could make approval even more difficult because it demonstrates that U.S. conditions for nuclear trade with India are tougher than what the United States is requesting from the NSG on India's behalf.
About 20 nations offered more than 50 amendments to the U.S.-proposed draft text, focusing on terminating trade if India resumes testing and bans on the transfer of sensitive technologies.
The correspondence released by Berman is "going to reinforce the views of many states," said Daryl G. Kimball, executive director of the Arms Control Association, which opposes the U.S.-India agreement. "There is no reason why this should not be an NSG-wide policy."
The correspondence concerned 45 highly technical questions that members of Congress posed about the deal. In 2006, Congress passed a law, known as the Hyde Act, to provisionally accept the agreement. But some lawmakers raised concerns about whether a separate implementing agreement negotiated by the administration papered over critical details to assuage Indian concerns. The questions were addressed in a 26-page letter sent to Berman's predecessor, the late Rep. Tom Lantos (D-Calif.), on Jan. 16.
The answers were considered so sensitive, particularly because debate over the agreement in India could have toppled the government of Prime Minister Manmohan Singh, that the State Department requested they remain secret even though they were not classified.
Lynne Weil, a spokeswoman for Berman, said he made the answers public yesterday because, if NSG approval is granted, the U.S-India deal soon would be submitted to Congress for final approval and "he wants to assure that Congress has the relevant information."
In India, Singh and his aides have insisted that the deal would not constrain the country's right to nuclear tests and would provide an uninterrupted supply of fuel to India's nuclear reactors. In August 2007, Singh told Parliament, "The agreement does not in any way affect India's right to undertake future nuclear tests, if it is necessary."
The State Department's letter to Lantos gives a different story. It says the United States would help India deal only with "disruptions in supply to India that may result through no fault of its own," such as a trade war or market disruptions. "The fuel supply assurances are not, however, meant to insulate India against the consequences of a nuclear explosive test or a violation of nonproliferation commitments," the letter said.
The letter makes clear that terminating cooperation could be immediate and was within U.S. discretion, and that the supply assurances made by the United States are not legally binding but simply a commitment made by President Bush.
The letter also stated that the "U.S. government will not assist India in the design, construction or operation of sensitive nuclear technologies," even though the Hyde Act allowed transfers of such technology under certain circumstances. The U.S. government had no plans to seek to amend the deal to allow sensitive transfers, the letter said.
The administration is eager for NSG approval this week because there is a narrow window for final congressional action before lawmakers adjourn this month, although many of them say the prospects for quick action remain dim.
Reflecting the importance of the U.S.-India deal to Bush's foreign policy legacy, Secretary of State Condoleezza Rice is dispatching two top officials -- William J. Burns, undersecretary of state for political affairs, and John Rood, acting undersecretary of state for arms control and international security -- to the NSG session.
Concerns about the deal have been raised by a group of mostly smaller states, led by Ireland and New Zealand. But this week China also publicly urged caution, saying in a foreign ministry statement that the NSG must "strike a balance between nuclear nonproliferation and peaceful use of energy."

Wednesday, July 2, 2008

कौन हैं ये फ्यूचर्स ट्रेडर..


गतांक से आगे...

आखिर गोल्डमैन सैक क्यों कहता है कि तेल की कीमत दिसंबर 08 तक 200 डॉलर /बैरल होंगी? कहीं ऐसा तो नहीं कि दिसंबर में फ्यूचर्स कांट्रैक्ट की मैच्योरिटी डेट पूरी हो रही हों। फ्यूचर्स कांट्रैक्ट में इस तारीख तक डिलिवरी करनी जरूरी होती है। बहरहाल इसकी समीक्षा हम बाद में करेंगे। लेकिन तेल कीमतों को लेकर दुनिया दो हिस्सो में बंट चुकी हैं। कमजोर सरकारें मजबूत सरकारों और कारोबारियों का साथ दे रही हैं। वे बता रही हैं कि मांग काफी बढ़ गई है इसलिए कीमत ज्यादा हो चुकी है। गाड़ियों की मांग कम हुई है अमेरिका जैसे बड़े बाजार में कारों की बिक्री कम हुई है और आर्थिक मंदी से कारोबार कम हुआ है जिससे तेल की मांग में कमी साफ दिख रही है। लेकिन तेल की कीमते लगातार बढ़ रही हैं। आम आदमी को अर्थशास्त्र का पारंपरिक नियम पढ़ाने वालों की हकीकत जानना बहुत जरूरी है।

मौजूदा तेल की कीमतों का पारंपरिक मांग और आपूर्ति से कोई रिश्ता नहीं है। हालांकि मुक्त बाजार के पुरोधा खुद को मासूम और इस तेजी से सताया हुआ बता रहे हैं। सताने वालों में ये पहला नाम ओपेक का ले रहे हैं जो आपूर्ति बढ़ाने से इनकार कर रहा है। दूसरा निशाना भारत और चीन की बढ़ती हुई मांग है। उनके चापलूस एक्सपर्ट रूस और वेनेजुएला में तेल कंपनियों के हुए राष्ट्रीयकरण को भी जिम्मेदार मान रहे हैं। लोगों को बिल्कुल चौंकना नहीं चाहिए जब यूरोपीय यूनियन और अमेरिकी तंत्र अचानक ईरान और ओसामा बिन लादेन को खाड़ी देशों में अस्थिरता फैलाने वाला मानकर इसे बढ़ती तेल कीमतों से जोड़ दे। लेकिन चिल्ला चिल्लाकर खुद को मासूम बताने वाले क्या वाकई कीमतों उछाल के लिए जिम्मेदार नहीं हैं।
तेल की कीमतों को तय करने में न्यूयार्क के नाईमेक्स और लंदन के इंटर कांटिनेंटल एक्सचेंज यानी आईसीई अंतरराष्ट्रीय एक्सचेंज की भूमिका काफी बड़ी है। अब तीसरा एक्सचेंज भी जुड़ गया है वह है दुबई मर्केंटाइल एक्सचेंज यानी डीएमई। नाईमेक्स के प्रेसीडेंड जेम्स न्यूसम इसके बोर्ड में हैं और बाकी कर्ता-धर्ता भी अमेरिकी और यूरोपीय समुदाय के तथाकथित बैंकर्स और फंड्स हैं। दुनिया में तेल की कीमतों का रूख यहीं से तय होता है। यह काम दो किस्म के कच्चे तेल के फ्यूचर कांट्रैक्ट के जरिए होता है एक है वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट और दूसरा नार्थ सी ब्रेंट । फ्यूचर कांट्रैक्ट यानी एक निश्चित समय और कीमत पर तेल मिलने की गारंटी का लालच। । कई महाज्ञानी बैंक और हेज फंड इस धंधे में मुनाफा बटोरते हैं। भविष्य से डराते रहिए और ग्राहक पैदा कररते रहिये। जैसे किसी एयरलाइन को ये लगने लगे कि आने वाले दिनों में तेल की कीमत 200 डॉलर/ बैरल होगी तो वह आज ही 142 डॉलर/बैरल वाला कांट्रैक्ट खरीद लेगी। यह कुछ इस तरह है कि बीमा कंपनी अपने दुर्घटना उत्पाद को बेचने के लिए आवारा किस्म के ड्राइवर्स की फौज तैयार कर ले जो चौराहों पर लोगों को रौदना शुरू कर दे। फिर बिलखते परिवार की याद में आप प्रोडक्ट खरीद ही लेंगे। फ्यूचर ट्रेडिंग में ऐसी सूचनाएं कारोबार के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण होती हैं। कंपनियां एक बड़ा हिस्सा कांट्रैक्ट की बिक्री पर दिए अपने सुझाव को मनवाने में लगी रहती हैं। ऐसे कारोबार की वकालत करने वालों का सबसे बड़ा काम यह होता है कि वह पूरी दुनिया को समझाएं कि कीमतों में उतार चढ़ाव की वजह मांग और आपूर्ति के भीतर छिपा है।


अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में हर दिन के स्पॉट यानी कैश और लांग टर्म कांट्रैक्ट की वैल्यू में ब्रेंट का प्रयोग होता है। यह एक बेंच मार्क की तरह प्रयोग होता है। कीमत का प्रकाशन निजी तेल कंपनी की प्रकाशन संस्था प्लाट के जिम्मे है। रुस और नाइजीरिया जैसे बड़े तेल उत्पादक देश ब्रेंट को बेंच मार्क मानते हैं। कुछ यूरोपीय और एशियाई बाजार भी ऐसा करते हैं।
जहां तक वेस्ट टेक्सॉस इंटरमीडिएट यानी डब्लूटीआई की बात है तो यह ऐतिहासिक रूप से अमेरिकी क्रूड ऑयल का हिस्सा है। अमेरिकी क्रूड ऑयल फ्यूचर्स ट्रेडिंग के साथ-साथ बेचमार्क के रूप में इसका प्रयोग उत्पादन में भी करता है। इस बेंच मार्क के जरिए इंडेक्स ऑर्बिट्रेज यानी सीधे वाल स्ट्रीट मार्केट को मॉनिटर करके बोली लगाई जा सकती है।
ये दोनो बेंच मार्क रियल मार्केट के लिए हैं। सामान्य लोग इस बेंच मार्क के जरिए आपूर्ति और मांग के समीकरण को समझते हैं जबकि गोल्डमैन सैक्स और मॉर्गन स्टैनले जैसे लोग इसके उछलने और गिरने के खेल को फ्यूचर्स कांट्रैक्ट का फ्यूचर देखते हैं। चुनिंदा बैंकर्स हैं जो फ्यूचर्स कांट्रैक्ट के संभावित खरीदार और बेचने वालों के बारे में जानकारी रखते हैं। इस कारोबार में जुटे लोग इसे ‘पेपर ऑयल’ के नाम से जानते हैं। रियल में तेल है या नहीं लेकिन पेपर पर एक निश्चित कीमत पर तेल मिलने की गारंटी का कारोबार चलता रहता है। ‘पेपर ऑयल’ का कारोबार कुल काराबार के 90 परसेंट तक पहुंच जाता है। कारोबार के नियामकों में थोड़े बहुत अंतर के आधार पर कांट्रैक्ट और ऑप्सन जैसी शब्दावलियां आती हैं लेकिन इस पूरे कारोबार को अगर हम उनके ही शब्दों में डेरिवेटिव यानी वायदा से भी समझ सकते हैं।
ऊपर हमने जिन तीन बड़े एक्सचेंज की बात की है वो ओपेक जैसी संस्थाओं से कीमत का कोई मशविरा नहीं लेती हैं और सीधे वॉल स्ट्रीट से रिश्ता बना लेती हैं। जून 2006 में अमेरिकी सिनेट में पर्मानेंट सब कमेटी की रिपोर्ट "The Role of Market Speculation in rising oil and gas prices" आई जिसमें कहा गया कि "... there is substantial evidence supporting the conclusion that the large amount of speculation in the current market has significantly increased prices". यह साफतौर पर जाहिर था कि सरकार जानबूझकर डेरिवेटिव कारोबार के लिए कोई नियामक नहीं बना रही थी।
जारी.....

Monday, January 28, 2008

सट्टेबाजी को बढ़ावा देते केंद्रीय बैंक


दीपू राय
स्पेकुलेशन यानी सट्टेबाजी आर्थिक विकास की शर्त है। यह तर्क किसी अर्थशास्त्री का नहीं है बल्कि देश के वित्तीय चाल चलन को गवर्न करने वाले केंद्रीय बैंकों का है। दुनिया के केंद्रीय बैंक अब इस तर्क की उंगली थामकर अपनी नीतियां तय कर रहे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक कोई अलग नहीं है। पूंजी बाजार, वित्तीय बाजार का हिस्सा है । लेकिन केंद्रीय बैंकों की रणनीति अब किसी भी तरह इस पूंजी बाजार को ही लेकर चलने की है। हर बार मुंह की खाने के बाद स्टॉक मार्केट को ये उम्मीद होती है कि केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में कटौती करके उसे उबार लेगा। यानी कहा जाय तो पूंजी बाजार यानी कैपिटल मार्केट को सहारा देने के लिए केंद्रीय बैंक वित्तीय बाजार की वास्तविक जरूरतों को भी नजरंदाज कर सकते हैं। लेकिन इस नुस्खे का खामियाजा अमेरिकी अर्थव्यवस्था अब उठा रही है। फेड बैंक की प्रयोगधर्मिता ही अब उसे डुबोने लगी है। वहां अब संकट खुद वित्तीय बाजार को अपने चपेट में ले चुका है। किसी ब्याज कटौती से स्टॉक मार्केट संभाले नहीं संभल रहा है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या भारत में ब्याज कटौती की यह कृत्रिम नीति कारगर होगी? लेकिन रिजर्व बैंक या आखिर कोई भी केंद्रीय बैंक मुद्रा स्फीति या नौकरियों की छंटनी जैसे मुद्दों को पूंजी बाजार की सट्टेबाजी के लिए क्यों ताक पर रख देता है। जाहिर इसे समझने के लिए देश के केंद्रीय बैंक के सलाहकार बोर्ड पर नजर डालना होगा। यह केवल कुछ चुनिंदा व्यक्तियों की बात नहीं है बल्कि केंद्रीय बैंकों पर यह आरोप लगने लगा है कि वे अर्थव्यवस्था के आम चाल चलन को ताक पर रखकर स्पेकुलेशन को बढ़ावा देते हैं। सट्टा बाजार वस्तुओं के पीछे मुनाफा नहीं देखता बल्कि उनके आगे-आगे मुनाफे का खेल खेलता है। ऐसे में दोनों के बीच की दूरी बाकी सांधनों के असंतुलन से बिगड़ जाती है। जिससे लगता है कि बाजार बाउंस बैक हो रहा है लेकिन केवल पूंजी बाजार ही बाउंस बैक होता है। एक तरह से अर्थव्यवस्था को निश्चित अंतराल के बाद काफी तेज झटका झेलना होता है। लेकिन थोड़े समय बाद आने वाले ये झटके अर्थव्यवस्था को खोखला बना देते हैं।
दुनिया का आर्थिक इतिहास साफ दिखाता है कि पिछले दो दशक से बड़ी मंदी और ब्याज दरों में कटौती केंद्रीय बैंकों का आसान नुस्खा बन गया है। पहले गुपचुप तरीके से सहायता करने वाला लेकिन अब यह नुस्खा परोक्ष रुप से सट्टेबाजी को प्रोत्साहित कर रहा है। अचानक तरलता की मांग उठाने वाले लोग आखिर कितने प्यासे हैं इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। ये ठीक उस बच्चे की तरह जिद है कि आखिर सरकार नोट छापकर गरीबी क्यों नहीं दूर कर देती। ब्याज दर में कटौती की मांग अर्थव्यवस्था के ऐसे हिस्से के जरिए की जा रही है जिसे तत्काल मुनाफा बटोरना है। लेकिन सवाल तो यह है कि क्या केंद्रीय बैंक की भूमिका बड़े आर्थिक उद्देश्यों को दरकिनार करते हुए केवल सट्टेबाजी को प्रश्रय देना भर रह गया है?

अमेरिकी अर्थव्यवस्था फिर से एक भीषण संकट का सामना कर रही है। यह संकट हाउसिंग मार्केट से शुरू हुआ है जो आज तकरीबन हर सेक्टर को अपनी चपेट में ले लिया है। लेकिन इस संकट ने फेडरल बैंक की नीतियों को भी सवालों के घेरे में डाल दिया है। ब्याज कटौती जैसे प्रयोग के अगुवा रहे फेडरल बैंक के भूतपूर्व चेयरमैन एलन ग्रीन स्पान अपनी किताब द एज ऑफ टर्बूलेंस:एडवेंचर्स इन न्यू वर्ल्ड में मौजूदा संकट का जिक्र करते हुए कहते हैं कि यह विपरित परिस्थितियों वाला वक्त है और काफी दुखदायी है लेकिन इस संकट को तो आना ही था। खासतौर से तब जब हम ऐसे उपाय चुनते हैं जिसमें लोगों को ज्यादा से ज्यादा जोखिम उठाने की आजादी दी जाय तो इस तरह के संकट को कोई टाल नहीं सकता। 1929 में स्टॉक मार्केट के संकट और 1930 की महामंदी ने उस समय के आर्थिक नीतियों को विवाद के घेरे में डाल दिया। कुछ दशक बाद यह तर्क फिर मजबूती पकड़ा कि सट्टेबाजी अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद है। लेकिन 1960 की आर्थिक मंदी और 1970 में स्टॉक मार्केट की गिरावट ने सट्टेबाजी और उससे पैदा होने वाले आर्थिक मुश्किलों के बीच संबंध चिन्हित किए जाने लगे। कुछ लोगों ने इस संकट की वजह अरब जगत के प्रतिबंधों और तेल संकट से जोड़कर देखा।
एक दूसरे बूम के बाद 19 अक्टूबर 1987 को अमेरिका का शेयर बाजार 23 परसेंट की दर से औंधे मूंह गिरा। जिसे आर्थिक जगत 1929 की मंदी से जोड़कर चर्चा करने लगा। लेकिन बाजार ने फिर से पहले जैसी तेजी पकड़ी। तेजी के इस सिलसिले को 2000-2002 के इंटरनेट और टेक्नोलॉजी सेक्टर की तबाही ने तोड़ दिया। ग्रीन स्पान के लिए हर तीन साल के बाद आने वाला यह संकट संभावी था।
1987 से लेकर 2006 तक ग्रीन स्पान का कार्यकाल था और हर बड़े संकट के बाद उन्होने फेड रेट में कटौती की। केंद्रीय बैंक ने वित्तीय संस्थानों को कड़ा रुख अपनाने की जगह बाजार में ज्यादा तरलता लाने को बाध्य किया। जिससे सट्टेबाजी की प्रक्रिया ढीली न पड़े।
आज इतिहास एक बार फिर दोहरा रहा है। फेड ने रेट कम तो किए हैं । लेकिन अब यह सट्टेबाजी में भी जान नहीं डाल पा रहा है। क्योंकि अब संकट खुद लोन देने वाली वित्तीय संस्थाओं पर है। इन संस्थाओं को नवंबर 2007 में 20 अरब डॉलर के चपत का अंदाजा लगाया जा चुका है। बैंकों के अरबों डॉलर के घाटे की सूचना अभी भी लगतार मिल रही है। ज्यादातर बैंक ऐसे कर्ज देकर फंस चुके हैं जिनकी वापसी संभव नहीं है।
भारत स्थितियां ऊपर से भले देखने में अलग लगती है लेकिन वित्तीय कंपनियों की हालत बहुत अच्छी नहीं है। जमकर कर्ज बांटने की होड़ का असर तत्काल नहीं दिख रहा है लेकिन अमेरिकी अनुभवों से सबक लिया जाय तो 2008 के अंत तक वित्तीय संस्थान को गहरे संकट से जूझना पड़ सकता है।
रिजर्व बैंक के लिए कुछ दिनों पहले तक रियल एस्टेट और बाकी सेक्टर में इस संकट के लक्षण मिले थे। लेकिन पूंजी बाजार की लॉबी काफी मजबूती से काम की और केंद्रीय बैंक को थोड़ी नरमी दिखानी पड़ी। रिजर्व बैंक पिछले साल बढ़ते कर्ज से बैंको को आगाह किया था। केंद्रीय बैंक ने कर्ज देने वाली संस्थाओं का ब्यौरा दिखाते हुए कहा कि अक्टूबर 2006 में रिटेल और सेवा क्षेत्र के लिए सालाना उधारी की दर करीब 33.4 परसेंट रही। जिसमें कि रिटेल सेक्टर के भीतर हाउसिंग लोन की ग्रोथ रेट करीब 32.3 परसेंट है। जबकि कमर्शियल प्रॉपर्टी में 83.9 परसेंट का रिकॉर्ड तोड़ ग्रोथ रेट दर्ज किया गया है। इस तर्क के सहारे आरबीआई ने रियल एस्टेट के लिए जरूरी जोखिम धारिता को 1 परसेंट से बढ़ाकर 2 परसेंट कर दिया गया। फिलहाल क्रेडिट ग्रोथ रेट पर नजर डाली जाय तो यह नवंबर 2007 के मुकाबले 30 परसेंट से घटकर 20 परसेंट रह गया है।

बाजार में तरलता की मांग पूंजी बाजार को भले ही राहत देती हो लेकिन बड़े स्तर पर इसके भयानक परिणाम निकलते हैं। तात्कालिक तौर पर तो हम वस्तु बाजार में जरूरी चीजों की कीमतों को बढ़ते हुए देखते है। लेकिन लंबे समय के बाद यहां खरीदार ढूंढना मुश्किल हो जाता है क्योंकि लोगों की इनकम इस कदर नहीं रहती की इन्हे वो खरीद सकें। आसान लोन देकर अर्थव्यवस्था चलाना समझदारी नहीं है। क्योंकि इस तरीके को अपनाकर आप उसे चुकाने की ताकत को कमजोर कर रहे होते हैं। इसका सीधा संबंध बैंकों के दिवालिएपन की ओर ले जाता है। अर्थव्यवस्था की ताकत सट्टेबाजी से तय नहीं होती इसे केंद्रीय बैंक को समझना होगा। इस लिहाज से भारतीय रिजर्व बैंक को उन समष्टिगत कारणों पर गौर करते हुए फैसला लेना चाहिए। हालांकि इसकी बहुत कम उम्मीद है। ब्याज दरों को बढ़ाने की वकालत करने वाले लोग काफी मजबूत हैं । ऐसे लोगों ने मनोवैज्ञानिक साधनों को प्रभावित करने वाले प्रचार माध्यों का का सहारा लेते हुए आम लोगों में ब्याज दर की कटौती को जरूरी बना दिया है। लेकिन लोगों को नहीं पता कि वे शुरुआती कालीदास की भूमिका में है।

Thursday, November 15, 2007

कहां गए नंदीग्राम के लोग




समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध,
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।



नंदीग्राम को फतह कर लिया गया है. 11 नवंबर को बंगाल और भारतीय वामपंथी राजनीति के इतिहास में एक और रक्त दिवस के रूप में याद किया जाएगा. लाल रंग सीपीएम का रंग है और बांग्ला में लाल को रोक्तो ही कहा जाता है. सीपीएम के राज्य नेता और मंत्री श्यामलाल चक्रवर्ती ने कहा है कि अब वहां शांति स्थापित हो चुकी है और लोग वहां की ताजा हवा में सांस ले सकते हैं. खून की गंध से भरी नंदीग्राम की हवा बहुत दिनों तक उनका पता पूछती रहेगी जो सीपीएम के इस क्रांतिकारी कब्जा अभियान में मारे गए. यहां बताना नामुमकिन है कि कितने कत्ल हुए और कितनी औरतों के साथ बलात्कार हुआ.

नंदीग्राम पर सीपीएम की घेराबंदी इतनी जबर्दस्त थी कि सीआरपीएफ को भी 11 नवंबर को लौट जाना पड़ा. पुलिस नंदीग्राम पहुंच नहीं पा रही है या उसे मना कर दिया गया है. आखिर इतने सालों से राज्य पुलिस सीपीएम की अनुचरी बनी रही है और यह भूल चुकी है कि उसका स्वतंत्र कर्तव्य क्या है. पत्रकारों का नंदीग्राम के भीतर जाना कठिन था और उनकी गाड़ियों पर सीपीएम के लोगों ने हमला किया और उन्हें लौटने पर मजबूर कर दिया. नंदीग्राम में सीपीएम के हमलों में घायल ग्रामवासियों में से अनेक का अपहरण कर लिया गया है. कई लापता हैं. उनका पता कैसे चले यह एक बड़ी समस्या है. ज्योति बसु पहले से कहते चले आ रहे हैं कि नंदीग्राम में अब शांति आने ही वाली है और अब शांति से उनका तात्पर्य बिल्कुल स्पष्ट हो चुका है.
लेकिन सीपीएम के इस खूनी कब्जे के बाद नंदीग्राम से भगा दिए गए प्रतिरोधी गांववालों के पुनर्वास का प्रश्न उठ खड़ा हुआ है. सीपीएम के लोग यह कह रहे हैं कि किसी पर कोई जुल्म नहीं होगा. सभी साथ-साथ रह सकते हैं और अपने राजनीतिक विचारों का पालन कर सकते हैं. लेकिन बंगाल को जानने वाला कोई भी अच्छी तरह यह जानता है कि यह दूसरी किसी जगह भले संभव हो, बंगाल में तो असंभव है. अगर बंगाल की राजनीतिक संस्कृति ऐसी होती तो नंदीग्राम की यह परिणति नहीं होती. सीपीएम जनता का पूरा समर्पण चाहती रही है. हमें ऐसे किस्से मालूम हैं कि शादी ब्याह जैसे नितांत निजी प्रसंगों में भी पार्टी की रजामंदी के बिना कोई कदम उठाना खतरनाक हो सकता है. विरोधी दल वालों के गांवों में रिश्ते नहीं किए जा सकते और ऐसा न होने देने के लिए सड़कें काट दी जाती हैं और गड्ढे खोद दिए जाते हैं. जमीन खरीद-बिक्री आदि में तो पार्टी का फैसला निहायत जरूरी है. बंगाल में लोकतांत्रिक स्वभाव का खात्मा हो चुका है इसलिए राजनीतिक विरोधियों की सह पाने की क्षमता भी जाती रही है. इस व्याधि के शिकार सीपीएम के अलावा और दल भी हैं. (अपुर्वानंद)

Tuesday, August 21, 2007

सिर कटे मुर्गे हैं भारतीय


अमेरिका में भारत के राजदूत रोनिन सेन पर दबाव कुछ इस तरह बढ़ा कि वो कुढ कर अकबक बोलने लगे। कहा कि
इसे (परमाणु समझौता) यहाँ राष्ट्रपति और वहाँ कैबिनेट ने पारित किया, तो फिर सिरकटे मुर्गे (हेडलेस चिकन) की तरह इधर उधर क्या भागना.''जैसे ये दोनों संस्थाएं या व्यक्ति ही इन देशों की किस्मत लिखेंगी।
अब इस बयान ने मामले को नया रुख दे दिया है। हालांकि लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने विपक्षी दलों की राजदूत को वापस बुलाने की माँग पर जवाब दिया है कि सिर्फ़ अख़बार की ख़बर के आधार पर कार्रवाई नहीं की जा सकती.

उन्होंने कहा कि यदि रोनेन सेन ने ऐसा कहा है तो वो उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करेंगे।

चुनाव होंगे या नहीं ..भाजपा बेचैन है और उस तर्ज पर सोचने वाले मीडियाकर्मी भी अगले चार महीने में चुनाव होता देख रहे हैं। लेकिन मुद्दे की गंभीरता क्या चुनावों तक सीमित है। इस मामले में अवसरवादी वामपंथ और दक्षिणपंथ एक मोर्चे पर नजर आते हैं।
ऐसे में परमाणु समझौते के हिडेन एक्ट के साथ राजनीतिक ध्रुवीकरण पर ध्यान देना जरूरी है।