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Monday, July 26, 2010

अंधेरे की तड़प और उजाले का ख्वाब

-चंद्रभूषण का कविता पाठ

जिस ट्रेन का इन्तजार आप कर रहे हैं/ वह रास्ता बदलकर कहीं और जा चुकी है......./ सोच कर देखिए जरा/ ज्यादा दुखदायी यह रतजगा है/ या कई रात जगाने वाली पांच मिनट की/ वह नींद/ और वह भी छोड़िए/ इसका क्या करें कि ट्रेनें ही ट्रेनें, वक्त ही वक्त/ मगर न जाने को कोई जगह है न रुकने की कोई वजह (स्टेशन पर रात)

आखिर सुविधाओं की होड़ वाले इस दौर में ऐसा क्या है जिसके छूट जाने की पीड़ा कभी पीछा नहीं छोड़ती और आदमी अकेला होता चला जाता है, निरर्थकता उस पर हावी होती चली जाती है। कविता में ट्रेन तो एक ऐसा रूपक था जो अपने सारे श्रोताओं में एक-समान कसक का अहसास छोड़ता चला गया। श्रोताओं की ओर से इन पंक्तियों को सुनाने की दुबारा फरमाइश हुई।

सी-10, नोएडा सेक्टर 15 में 11 जुलाई (रविवार) को आयोजित एक अनौपचारिक अन्तरंग गोष्ठी में कवि-पत्राकार चन्द्रभूषण की कविताओं को सुनना एक तरह से विडंबनाओं, घटियापन, पाखण्ड, मौकापरस्ती से भरे मध्यवर्गीय समाज में किसी संवेदनशील और ईमानदार मनुष्य के दु:स्वप्न, उदासी, अकेलापन, व्यथा, व्यंग्य और क्षोभ को सुनना था। एक बेहतर समाज और दुनिया चाहने वाले की चेतना पर बदतर दुनिया से होने वाले सायास-अनायास मुठभेड़ों और टकरावों से कैसे-कैसे विचारों की छाप निर्मित होती है, चन्द्रभूषण की कविताओं में यह सब कुछ महसूस हुआ।
कहीं कोई बनावट नहीं और न ही कोई नकली उम्मीद। उनकी कविता में जहां इस दौर की विसंगतियों की पहचान नज़र आई वहीं उसके बीच `दुविधा´ में फंसे उस आत्मा के सूरज का सच्चा हाल भी मिला जो क्षितिज पर अटका है, न उगता है, न डूबता है। इसलिए कि वह जहां है वहां `अपनी-अपनी नींदों में खोए/ सभी नाच रहे हैं/ बहुत बुरा है यहां खुली आंख रहना।´ लेकिन मुश्किल है कि अपने पांव भी थिरक रहे हैं, उन्हें न रोकना सम्भव हो पा रहा और न ही `चहार सू व्यापी एकरस लय´ में शामिल हो पाना। इसी दुविधा से तो अपने पास थोड़ा-बहुत आत्मा का सूरज रखने वाला हर व्यक्ति गुजर रहा है, खासकर मध्यवर्गीय व्यक्ति! अब यह एक ऐसा बिंदु है जहां से अपनी विवशता को ग्लैमराइज करते हुए आदमी आत्मा के सूरज से मुक्ति पाकर चौतरफा मौजूद नंगई के नाच में शामिल भी हो सकता है या फिर उसमें रहने की विवशता को झेलते हुए भी इस परिदृश्य पर व्यंग्य कर सकता है, हालांकि यह अपर्याप्त है यह वह भी जानता है और उसकी कामना है कि नंगई को महिमामण्डित करने वालों को खदेड़ा जाए, पर ऐसा हो नहीं रहा और कविता के लिए भी जैसे यह कोई बड़ी फिक्र नहीं है, कवि को लगता है कि जब किसी वक्त नंगई के खिलाफ बैरिकेड लगेगा, तब आज की कविता
के बारे में शोधकर्ता यही कहेंगे कि घटिया जमाने के कवि भी घटिया थे। और उसके लिए यह `सबसे बड़ा अफसोस´ है।
बेशक जमाना तो घटिया है और इस घटियापन से कवि को अलग रखने का कोई घेरा है नहीं, ऐसे में श्रोताओं के लिए यह महसूस करना दिलचस्प था कि चन्द्रभूषण के कवि ने अपने लिए कौन-सा रास्ता चुना है। इस `दुविधा´ वाली राह से आगे बढ़ते हुए, कवि ने `पैसे का क्या है´ कविता के जरिए स्पष्ट रूप से जैसे अपने जमाने की नियति को तय कर दिया-
जब यार-दोस्त होते हैं, पैसा नहीं होता
जब दिल लगता है तो पैसा नहीं होता
जब खुद में खोए रहो तो भी वो नहीं होता
फिर पीछे पड़ो उसके
तो उठ-उठ कर सब जाने लगते हैं
पहले दृश्य, फिर रिश्ते, फिर एहसास
फिर थक कर तुम खुद भी चले जाते हो
दूर तक कहीं जब कुछ नहीं होता
तो पैसा होता है
पैसे का क्या है
वो तो....

जिस वक्त व्यावहारिक दुनिया में पैसे को ही मुक्तिदाता समझा जा रहा हो, व्यक्ति-स्वातन्त्रय के तर्क उसी के भीतर से निकलते हों और उसी के द्वारा बख्सी गई आजादी और सुख के भ्रम में लोग डूब-उतरा रहे हों और अपने अकेलपन और असुरक्षा की असली वजह उन्हें समझ में न आ रही हो, उस वक्त इस कविता को सुनना मानो अत्यन्त सहज अन्दाज़ में एक गम्भीर चेतावनी को सुनना था। इसी पैसे और पैसे के बल पर हासिल सुविधाओं और श्रेष्ठता के मिथ्या होड़ में गले तक डूबी- दंभ, समझौतों, मौकापरस्ती, पाखण्ड, बेईमानी से लैस नितान्त स्वार्थी और वैचारिक तौर पर उच्छृखंल आवाजें जहां परिदृश्य पर छाई हुई हों, वहां गहरी संवेदना से युक्त और हर छोटे-बड़े अहसास को आलोचनात्मक दृष्टि से देखते हुए बड़े कन्वसिंग अन्दाज में किसी वैचारिक सूत्रा या निष्कर्ष तक ले जाने वाली चन्द्रभूषण की कविताएं पाठकों और श्रोताओं के मन पर गहरा असर छोड़ गईं।
(जारी..)--सुधीर सुमन

Thursday, March 25, 2010

इलाहाबाद का सांस्कृतिक हलका डूबा मार्कण्डेय के शोक में


२० मार्च, २०१०. इलाहाबाद.
आज सायं ५ बजे से वरिष्ठ कथाकार मार्कण्डेय की स्मृति सभा का आरंभ महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय विश्विद्यालय दूरस्थ शिक्षा इकाई के सत्यप्रकाश मिश्र स्मृति सभागर में हुआ. इलाहाबाद शहर के तमाम बुद्धिजीवी, संस्कृतिकर्मी और वाम कार्यकर्ता मार्कण्डेय को श्रद्धांजलि देने उपस्थित थे. इस अवसर पर उपस्थित वरिष्ठ आलोचक मैनेजर पांडेय ने मार्कण्डॆय के साथ अपने २५ साल पुराने रिश्ते को याद किया. उन्होंने कहा कि नई कहानी आंदोलन के समय प्रेमचंद की परम्परा के खिलाफ़ जितना कुछ लिखा गया, उतना न उस दौर के पहले और न उसके बाद लिखा गया. नई कहानी के संग विकसित आलोचना ने मानो शहरीपन को ही कहानी का पर्याय बना दिया. केंद्र में लाए गए राकेश, राजेंद्र यादव और कमलेश्वर जबकि बदलते हुए ग्रामीण यथार्थ को सामने लाने वाले कथाकारों खासकर रेणु, मार्कण्डेय और शिवप्रसाद सिंह की उपेक्षा की गई. दरअसल, यही लोग प्रेमचंद की परम्परा को आगे बढ़ा रहे थे. ये ऎसे कथाकार थे जो आलोचना के बल पर नहीं, बल्कि अपनी कहानियों के दम पर, उनके पाठकों के दम पर हिंदी जगत में समादर के पात्र रहे. एक कहानीकार के रूप में मार्कण्डेय के महत्व को सचमुच रेखांकित करने के लिए उस दौर की कहानी संबंधी बहसों का पुनर्मूल्यांकन ज़रूरी है.
प्रों मैनेजर पांडेय ने कहा कि मार्कण्डॆय व्यापक धरातल पर जनवादी और प्रगतिशील रचनाओं को देखते थे, कभी उन्होंने कट्टरता नहीं बरती, विरोध करनेवालों की भी ज़रूरत के वक्त मदद करने से नहीं झिझके. वरिष्ठ कथाकार शेखर जोशी मार्कण्डॆय का स्मरण कर भावुक हो उठे. उन्होंने कहा कि मार्कण्डॆय जिस परम्परा के थे, उसे वहन करने वालों का अतिशय सम्मान करते थे. 'गुलरा के बाबा' नाम की कहानी में भी उनका यह दृष्टिकोण व्यक्त हुआ है. शेखर जी ने कहा कि उनका और अमरकांत का पहला कहानी संग्रह तथा ठाकुर प्रसाद सिंह का पहला काव्य-संग्रह मार्कण्डॆय जी के 'नया साहित्य'प्रकाशन से ही छप कर आया.शेखरजी ने कहा कि सरल स्वभाव के होने के चलते वे कष्ट देने वाले लोगों को भी आसानी से माफ़ कर देते थे.
समकालीन जनमत के संपादक श्री रामजी राय ने कहा कि इलाहाबाद में फ़िराक़ के बाद नौजवानों की इतनी हौसला आफ़ज़ाई करने वाला मार्कण्डॆय के अलावा कोई दूसरा वरिष्ठ लेखक न था. किसान जीवन उनके रचना कर्म और चिंताओं की धुरी बना रहा. रामजी राय ने उनसे जुड़े अनेक आत्मीय प्रसंगों को याद करते हुए बताया कि वे किस्सागो तबीयत के आदमी थे. उनके पास बैठने वालों को कतई अजनबियत का अहसास नहीं होता था. उनके व्यक्तित्व की सरलता बांध लेती थी.
प्रो. राजेंद्र कुमार ने कहा कि इलाहाबाद शहर की कथाकार-त्रयी यानी अमरकांत-मार्कण्डेय-शेखर जोशी में से एक कड़ी टूट गई है. 'कथा' पत्रिका जिसके वे जीवनपर्यंत संपादक रहे, को यह श्रेय जाता है कि उसने बाद में प्रसिद्ध हुए अनेक रचनाकारों की पहली रचनाएं छापीं. कथाकार अनिता गोपेश ने कहा कि मार्कण्डेय जी विरोधी विचारों के प्रति सदैव सहनशील थे और नए लोगों को प्रोत्साहित करने का कोई मौका हाथ से जाने न देते थे. वयोवृद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कामरेड ज़िया-उल-हक ने मार्कण्डेय जी को याद करते हुए कहा कि प्रतिवाद , प्रतिरोध के हर कार्यक्रम में आने की , सदारत करने की सबसे सहज स्वीकृति मार्कण्डेय से मिलती थी. छात्रों और बौद्दिकों के तमाम कार्यक्रमों में वे अनिवार्य उपस्थिति थे.
स्मृति सभा का संचालन विवेक निराला और संयोजन संतोष भदौरिया ने किया.
मार्कण्डेय ( जन्म-२ मई, १९३०, जौनपुर -- मृत्यु- १८ मार्च, २०१०, दिल्ली )
पिछले दो सालों से गले के कैंसर से संघर्षरत थे. वे अपने पीछे पत्नी विद्या जी, दो पुत्रियों डा. स्वस्ति सिंह, शस्या नागर व पुत्र सौमित्र समेत भरा पूरा परिवार छोड़ गये. बीमारी के दिनों में भी युवा कवि संतोष चतुर्वेदी के सहयोग से 'कथा' पत्रिका पूरे मनोयोग से निकालते रहे. इतना ही नहीं इलाहाबाद के तमाम साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों में आना-जाना उन्होंने बीमारी के बावजूद नहीं छोड़ा. 1965 में उन्होंने माया के साहित्य महाविशेषांक का संपादन किया। कई महत्वपूर्ण कहानीकार इसके बाद सामने आये. 1969 में उन्होंने साहित्यिक पत्रिका 'कथा' का संपादन शुरू किया. उन्होंने जीवनभर कोई नौकरी नहीं की. अग्निबीज, सेमल के फूल (उपन्यास), पान फूल, महुवे का पेड़, हंसा जाए अकेला, सहज और शुभ, भूदान, माही, बीच के लोग (कहानी संग्रह), सपने तुम्हारे थे (कविता संग्रह), कहानी की बात (आलोचनात्मक कृति), पत्थर और परछाइयां (एकांकी संग्रह) आदि उनकी महत्वपूर्ण कृतियां हैं। हलयोग (कहानी संग्रह)
प्रकाशनाधीन है. उनकी कहानियों का अंग्रेजी, रुसी, चीनी, जापानी, जर्मनी आदि में अनुवाद हो चुका है. उनकी रचनाओं पर 20 से अधिक शोध हुए हैं.'अग्निबीज' उपन्यास का दूसरा खंड लिखने, आत्मकथा लिखने, अप्रकाशित कविताओं का संग्रह निकलवाने, मसीही मिशनरी कार्यों पर केंद्रित अधूरे उपन्यास ''मिं पाल' को पूरा करने तथा 'हलयोग' शीर्षक से नया कहानी संग्रह प्रकाश में लाने की उनकी योजनाएं अधूरी ही रह गईं.राजीव गांधी कैंसर इंस्टीट्यूट में इलाज करा रहे मार्कण्डेय ने १८ मार्च को दिल्ली में आखीरी सांसें लीं. अगले दिन( १९ मार्च )को उनका शव रींवांचल एक्सप्रेस से इलाहाबाद लाया गया तथा एकांकी कुंज स्थित उनके आवास पर सुबह १० बजे से दोपहर १ बजे तक लोगों के दर्शनार्थ रखा गया. इसके बाद रसूलाबाद घाट पर अंत्येष्टि सम्पन्न हुई. अंतिम दर्शन के समय और स्मृति सभा में उपस्थित
सैकड़ों लोगों में कथाकार अमरकांत, शेखर जोशी, दूधनाथ सिंह, सतीश जमाली,नीलकांत, विद्याधर शुक्ल, बलभद्र, सुभाष गांगुली, नीलम शंकर, अनिता गोपेश,असरार गांधी,श्रीप्रकाश मिश्र, उर्मिला जैन, महेंद्र राजा जैन, आलोचक मैनेजर पांडेय, अली अहमद फ़ातमी, राजेंद्र कुमार, रामजी राय, प्रणय कृष्ण,सूर्यनारायण, मुश्ताक अली, रामकिशोर शर्मा, कृपाशंकर पांडेय, कवि हरिश्चंद्र पांडेय, यश मालवीय, विवेक निराला,श्लेष गौतम, नंदल हितैषी,सुधांशु उपाध्याय, शैलेंद्र मधुर,संतोष चतुर्वेदी, रंगकर्मी अनिल भौमिक,अनुपम आनंद और प्रवीण शेखर, संस्कृतिकर्मी ज़फ़र बख्त, सुरेंद्र राही,
वरिष्ठ अधिवक्ता उमेश नारायण शर्मा और विनोद्चंद्र दुबे, महापौर चौधरी जितेंद्र नाथ, ट्रेड यूनियन व वाम दलों के नेतागण तथा ज़िले के कई प्रशासनिक अधिकारी शामिल थे.

इलाहाबाद से दुर्गा सिंह

Sunday, January 24, 2010

साहित्य की स्वाधीन और जनपक्षधर परंपरा का उपहास है समसुंग पुरस्कार



समसुंग कंपनी और साहित्य अकादमी की ओर से दिया जा रहा टैगोर साहित्य पुरस्कार साहित्य अकादमी की स्वायत्ता, भारतीय साहित्य की गौरवशाली परंपरा और टैगोर की विरासत के ऊपर एक हमला है। देश की तमाम भाषाओं के साहित्यकारों व साहित्यिक-सांस्कृतिक संगठनों को इस प्रवृत्ति का सामूहिक तौर पर प्रतिरोध करना चाहिए.। साहित्य अकादमी को सत्तापरस्ती और पूंजीपरस्ती से मुक्त किया जाना चाहिए।
जिस तरह साहित्य अकादमी ने लेखकों का नाम चयन करके पुरस्कार के लिए समसुंग के पास भेजा है वह भारतीय साहित्यकारों के स्वाभिमान को चोट पहुंचाने वाला कृत्य है और इससे साहित्य अकादमी की स्वायत्तता पर प्रश्नचिह्न लग गया है. क्या अब इस देश की साहित्य अकादमी समसुंग जैसी कंपनियों के सांस्कृतिक एजेंट की भूमिका निभाएगीर्षोर्षो यह खुद अकादमी के संविधान का उपहास उड़ाने जैसा है।
गणतन्त्र दिवस की पूर्व संध्या पर दिए जाने वाला यह पुरस्कार स्वाधीनता और जनता के लिए प्रतिबद्ध इस देश की लंबी और बेमिसाल साहित्यिक परंपरा पर कुठाराघात के समान है। बेशक देश की ज्यादातर पार्टियां और उनकी सरकारें साम्राज्यवादपरस्ती और निजीकरण की राह पर निर्बंध तरीके से चल रही हैं। देशी पूंजीपति घराने भी साहित्य-संस्कृति को पुरस्कारों और सुविधाओं के जरिए अपना चेरी बना लेने की लगातार कोशिश करते रहे हैं, बावजूद इसके देश के साहित्यकारों और संस्कृतिकर्मियों की बहुत बड़ी तादाद अपनी रचनाओं में इनका विरोध ही करती रही है। साहित्य अकादमी और समसुंग के पुरस्कारों के जरिए इस विरोध को ही अगूंठा दिखाने का उपहासजनक प्रयास किया जा रहा है और इसके लिए समय भी सोच समझकर चुना गया है। गणतन्त्र दिवस की पूर्व संध्या पर पूरे देश को एक तरह का संकेत देने की तरह है कि जैसी साम्राज्यवादपरस्त जनविरोधी अर्थनीति पिछले दो दशक में इस देश पर लाद दी गई है, वैसे ही मूल्यों को साहित्य में प्रश्रय दिया जाएगा और साहित्य अकादमी जैसी अकादमियां इसका माध्यम बनेंगी। बेशक साहित्य अकादमी सरकारी अनुदान से चलती है, मगर इसी कारण उसे सरकारी संस्कृति का प्रचार संस्थान बनने नहीं दिए जा सकता। जिस पैसे के जरिए यह अकादमी चलती है वह पैसा जनता के खून-पसीने का है और इसीलिए उस संस्था का एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के जश्न का ठेकेदारी ले लेना आपत्तिजनक है। इस पुरस्कार का विरोध करना साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों के साथ-साथ इस देश की जनता का भी फर्ज है।
साहित्य अकादमी को और भी स्वायत्त बनाने और सही मायने में एक लोकतांि़त्रक देश की राष्ट्रीय साहित्य अकादमी बनाने की जरूरत है। जिस शर्मनाक ढंग से समसुंग के समक्ष समर्पण किया गया है उसे देखते हुए सवाल खड़ा होता है कि क्या साहित्य अकादमी की विभिन्न समितियों में जो लेखक हैं, वे इस हद तक पूंजीपरस्त हो चुके हैं। उनका यह विवेकहीन निर्णय इस जरूरत को सामने लाता है कि अकादमी को लोकतान्त्रिक बनाया जाए और उसे सत्तापरस्ती से मुक्त किया जाए।
टैगोर ने साहित्य-संस्कृति, शिक्षा और विचार को जनता से काटकर इस तरह समसुंग जैसी किसी कंपनी की सेवा में लगाने का काम नहीं किया था। जबकि आज साहित्य अकादमी ठीक इसके विपरीत आचरण कर रही है। यह टैगोर की विरासत के साथ भी दुव्र्यवहार है। देश के तमाम जनपक्षधर साहित्यकारों, संस्कृतिकर्मियों और लोकतन्त्रपसन्द-आजादीपसन्द जनमत का ख्याल करते हुए पुरस्कृत लेखकों को भी एक बार जरूर पुनर्विचार करना चाहिए कि वे किन मूल्यों के साथ खड़े हो रहे हैं और इससे वे किनका भला कर रहे हैं। साहित्य मूल्यों और आदर्श का क्षेत्र है। बेहतर हो कि वे उसके पतन का वाहक न बनें और इस पुरस्कार को ठुकराकर एक मिसाल कायम करें। 25 जनवरी को पुरस्कार समारोह के वक्त अपराह्न 3 बजे जन संस्कृति मंच के सदस्यों समेत दिल्ली के कई साहित्यकार-संस्कृतिकर्मी साहित्य अकादमी (पुश्किन की मुर्ति के पास) के सामने जो शान्तिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं उसमें ज्यादा से ज्यादा लोगों को शामिल होना चाहिए।
सुधीर सुमन, संपादक, समकालीन जनमत, राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य, जन संस्कृति मंच

Friday, October 16, 2009

संगमन के बहाने कथा-साहित्य की जनपक्षधरता पर विमर्श


हिन्दी साहित्य में गंभीर पहचान बना चुके ´संगमन´ का 15वां आयोजन उदयपुर में 2 से 4 अक्टूबर 2009 को हुआ। नगर के समीप गांव बेदला स्थित आस्था प्रशिक्षण केन्द्र में आयोजित इस समारोह के सहयोगी जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ (डीम्ड विश्वविद्यालय) के जन शिक्षण व विस्तार कार्यक्रम निदेशालय, आस्था व राजस्थान साहित्य अकादमी थे। तीन दिन के इस जमावड़े में बाहर से आये लगभग 40 कथाकारों और साहित्यकारों के अलावा नगर के साहित्यकार, पाठक व युवा छात्र-छात्राअों की सक्रिय भागीदारी रही। नगर के आस-पास के शहरों कस्बों के साहित्यकारों-पाठकों की आवाजाही ने आयोजन को जीवंत बनाया।
कथाकारों में सर्जनात्मक संवाद को सघन बनाने, युवा कथाकारों को मंच उपलब्ध करवाने व जन आन्दोलनों में साहित्यकारों की भागीदारी जैसे मुद्दों पर केिन्द्रत इस राष्ट्रीय संगोष्ठी ने साहित्य और सामाजिक सरोकारों में एक नया आयाम जोड़ा।
पहले दिन के सत्र का विषय ´नयी सदी का यथार्थ और मेरी प्रिय पुस्तक´ था। चर्चा की शुरुआत आलोचक विजय कुमार के वक्तव्य से हुई जो पोलेण्ड की विश्व विख्यात कवयित्री शिम्बोर्सका पर केिन्द्रत था। विजय कुमार ने कहा कि लेखिका ने वर्तमान के यथार्थ को उभारने का जो प्रयास किया है, वह हमको आज के समाज की यथार्थता के बिम्बों प प्रतीकों के मूल में छिपी नग्नता व छद्म को जानने की दृष्टि देने वाला है। उन्होंने कहा कि शिम्बोर्सका का जीवन यह भी दिखाता है कि एक रचनाकार किस तरह अपने समाज की विद्रुपताओं से जिरह करता हुआ समाज को वैचारिक ताकत देता है। विजय कुमार ने शिम्बोर्सका की कुछ महŸवपूर्ण कविताओं के अंशों को भी उद्धृत किया। चर्चित युवा कथाकार वन्दना राग ने राही मासूम रजा के प्रसिद्ध उपन्यास ´आधा गांव´ के माध्यम से व्यक्ति की सामाजिक मनोदशा को स्वरूप व दिशा देनेवाले कारणों की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि यह उपन्यास इस तथ्य को उद्घाटित करता है कि ´सत्ता´ किस तरह से सच्चाई से ज्यादा अफवाहों का आतंक फैलाकर अपना हित साधती है। बाहरी शक्तियों का असर हमारे अंदरूनी रिश्तों व समरसता की भावना को तोड़ता है। कवि व उपन्यासकार हरिराम मीणा ने ´आदि धर्म´ पुस्तक के माध्यम से आदिवासी जीवन व संस्कृति में पाये जाने वाले सकारात्मक पहलुओं को आत्मासात करते हुए आज के समाज में धर्म, पर्यावरण, वैचारिक संकीर्णता, अलगाव जैसी समस्याओं से निजात पाने की दृष्टि ग्रहण करने पर बल दिया। मीणा ने विकास के नाम पर आदिवासी समाज व जीवन पर आये संकटों की चर्चा करते हुए कहा कि सरकार की जन विरोधी नीतियों के कारण आदिवासी अिस्मता संकट में है। उन्होंने इस संकट से लड़ने में लेखकीय भागीदारी की अपेक्षा बताई। समालोचक एवं गद्यकार दुगाZप्रसाद अग्रवाल ने स्वयं प्रकाश के उपन्यास ´ईंधन´ की चर्चा की। उन्होंने ईंधन को आज के युवा वर्ग के जीवन मूल्यों में आ गये अन्तद्वZन्द्व, सामाजिक मनोवृित्त व व्यक्तिगत आकांक्षाओं के बीच नये अन्तर्विरोधों को समझने में आधारभूत उपन्यास बताया। उन्होंने उपन्यास से उदाहरण देकर स्पष्ट किया कि वैश्वीकरण और बाजारवाद का हमारे जीवन पर कितना गहरा असर पड़ा है। अग्रवाल ने इसे भारतीय परिदृश्य में हो रहे भूमण्डलीकरण पर लिखा गया पहला महŸवपूर्ण उपन्यास माना। इतिहास बोध के संपादक, इतिहासकार लाल बहादुर वर्मा ने अपने उद्बोधन में सबसे पहले गाँधी के व्यक्ति और कृतित्व की चर्चा की उन्होंने गाँधी की सबसे बड़ी ताकत अपने पर गहरा विश्वास और साहस बताते हुये कहा कि आज की नई मानव विरोधी स्थितियोंं से लड़ने में ऐसी ही ताकत की जरूरत है। उन्होंने अपनी प्रिय पुस्तक हार्वर्ड फास्ट की ´सिटीजन टोम्पेन´ के कथानक पर कहा कि सृजन व संघर्ष में एक अन्तद्वZन्द्वात्मक रिश्ता होता है, जिसे समझना बेहद जरूरी है। हर सृजन जीवन के संघर्ष से उत्पन्न होता है तथा जीवन में ही अपनी सार्थकता को स्थापित करता है। उन्होंने यथार्थ के सर्जनात्मक पक्षों को उद्घाटित करने के साहस व उसके साथ चलने को इस सदी की सबसे बड़ी चुनौती बताया। चर्चा में कथाकार लता शर्मा, कैलाश बनवासी, डॉ. सर्वतुिन्नसा खान, अनुपमा सिसोदिया ने भाग लिया। इससे पहले कथाकार महेश कटारे ने संगमन के शुभारंभ की घोषणा की। सुप्रसिद्ध कवि हरीश भादानी के निधन का समाचार सत्र के प्रारंभ होने से पहले मिल गया था अत: सभी ने दो मिनट का मौन रख श्रद्धांजलि दी। संगमन के स्थानीय संयोजक पल्लव ने सभी का स्वागत किया। सत्र का संयोजन कथाकार ओमा शर्मा ने किया।
दूसरे दिन आयोजित कहानी पाठ सत्र में जयपुर के युवा कथाकार राम कुमार सिंह ने अपनी कहानी ´शराबी उर्फ हम तुझे वली समझते´ व मुम्बई से आये वरुण ग्रोवर ने ´डैन्यूब के पत्थर´ का पाठ किया। अलग-अलग शैलियों में लिखी गई इन कहानियों पर विशद् चर्चा में यह बात मुखर हुई कि वरुण की कहानी प्रागैतिहासिक काल की होते हुए भी समकालीन सवालों टकराती है वहीं रामकुमार की कहानी को भाषायी रचनात्मकता व परिवेश को जीवंत बनाने के लिए उल्लेखनीय माना गया। कथाकार योगेन्द्र आहूजा ने वरुण की कहानी के कथ्य को समकालीन मुद्दों से बचाव की युक्ति कहा तो वरिष्ठ लेखक लाल बहादुर वर्मा ने इसे असाधारण को साधारण बनाने का प्रयास बताया। उन्होंने भाषा के वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर वरुण की कहानी को दुस्साहसी बताया। सुभाषचन्द्र कुशवाहा ने कहा कि ये कहानियां मनुष्यता के संकट को हमारे सामने रखती है। युवा फिल्म समीक्षक मिहिर पंड्या ने वरुण की कहानी पर टिप्पणी में कहा कि इसके नायक व खलनायक एक ही पात्र में नजर आने से कहानी की सुन्दरता बढ़ी है। समालोचक प्रो. नवल किशोर, देवेन्द्र, ओमा शर्मा, सीमा शफक, जितेन्द्र भारती व पल्लव ने भी चर्चा में भागीदारी की। गालिब़ की पंक्ति के शीर्षक में प्रयोग पर हुई बहस पर लक्ष्मण व्यास ने कहा कि यह इस्तेमाल दादा-पोते के सम्बन्ध जैसा है जिस पर आपित्त करना उचित नहीं होगा। इस सत्र का प्रभावी संचालन वरिष्ठ कथाकार शिवमूर्ति ने किया।
इस दिन की शाम उदयपुर भ्रमण हेतु रखी गई थी। सभी प्रतिभागी उदयपुर के समीप ऐतिहासिक स्थल सज्जनगढ़, बड़ी तालाब व फतहसागर गये। यहां की प्राकृतिक सुन्दरता ने लेखकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
तीसरे दिन के अन्तिम सत्र में ´प्रतिरोध, जन आन्दोलन और साहित्य´ विषय पर चर्चा का प्रवर्तन योगेन्द्र आहूजा के वक्तव्य से हुआ। कथाकार देवेन्द्र ने कहा कि कोई विचारधारा एक युग में महŸवपूर्ण होती है किन्तु वह अन्य युग में प्रभावहीन भी हो सकती है इसलिए विचारधारा से ज्यादा जरूरी विजन है। कथाकार शिवमूर्ति ने जन आन्दोलनों से लेखकों का जुड़ाव व अपनी रचनाओं में कला के सन्तुलित उपयोग को जरूरी बताया। आलोचक डॉ. माधव हाडा ने कहा कि लेखक को मध्य वर्ग के बदलते सरोकार एवं प्राथमिकताओं की जानकारी होनी चाहिये। शोधार्थी प्रज्ञा जोशी ने लेखकों के जन आन्दोलनों से जुड़ाव न होने से रचनाओं के प्रभाव में आ रही कमी को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि दमन के बढ़ते स्वरूपों को देखकर हमें प्रतिरोध के नये तरीकों को खोजना होगा। वरुण ग्रोवर ने जन आन्दोलनों को वर्तमान पीढ़ी के लिए अमूर्त विचार कहा। उनका कहना था कि क्या सच कहना ही प्रतिरोध नहीं है र्षोर्षो हिमांशु पंड्या ने कहा कि किसी और को जवाब देने से पहले जरूरी है अपने आप को जवाब देना। चर्चा में मधु कांकरिया, सुभाष चन्द्र कुशवाहा, रतन कुमार सांभरिया, मंजू चतुर्वेदी, मनीषा कुलश्रेष्ठ, डॉ. रईस अहमद, जितेन्द्र भारती, हबीब कैफी, विजय कुमार, कैलाश बनवासी और प्रो. नवल किशोर ने भाग लिया। समापन वक्तव्य में वरिष्ठ कथाकार गिरिराज किशोर ने कहा कि कथाकार वह है जो अमूर्त को आकृति दे। किसी रचना के स्वरूप को अस्वीकार किया जा सकता है किन्तु रचनाकार की ईमानदारी पर अंगुली उठाना अनुचित है। उन्होंने कहा कि प्रतिबद्धता विरोध ही है। बाहरी दृष्टि से मूल्यांकन की प्रवृित्त को अनुचित बताते हुए उन्होंने कहा कि रचनाकार उलझनों को सुलझाने का काम करता है। गिरिराज किशोर ने नामवर सिंह के आलोचना कर्म की द्विधा पर प्रहार कर इसे वैचारिक जकड़ बताया। सत्र का संयोजन महेश कटारे व ओमा शर्मा ने किया। हिमांशु पंड्या ने स्थानीय आयोजकों की ओर से आभार माना।
कथाकार प्रियंवद के संयोजन में हुए इस आयोजन के अन्य आकर्षणों में पंकज दीक्षित द्वारा लगाई गई कथा पोस्टर प्रदर्शनी, लघु पत्रिका प्रदर्शनी व पंडित जनार्दन राय नागर के साहित्य की प्रदर्शनी भी थी। राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा आयोजन स्थल पर पुस्तक बिक्री की व्यवस्था थी। तीन दिन तक चले आयोजन में मूलचन्द्र पाठक, हरिनारायण, नवीन कुमार नैथानी, चरणसिंह पथिक, सुशील कुमार, अश्विनी पालीवाल, क़मर मेवाड़ी, ज्योतिपुंज, माधव नागदा, नन्द चतुर्वेदी, अमरीक सिंह दीप, कनक जैन, जितेन्द्रसिंह, डी.एस. पालीवाल, गजेन्द्र मीणा, गणेशलाल मीणा सहित बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमियों ने भागीदारी की।


डॉ. सुधा चौधरी
सी-2, दुगाZ नर्सरी रोड, उदयपुर-313001

Tuesday, April 7, 2009

प्रणय कृष्ण का साक्षात्कार


प्रखर हिंदी आलोचना और जन संस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण को मिला देवी शंकर अवस्थी पुरस्कार उनकी समग्र रचनाधर्मिता का सम्मान है। प्रस्तुत है इस मौके पर अनिल सिद्धार्थ से उनककी बातचीत के प्रमुख अंश

हिंदी आलोचना के इस प्रतिष्ठित सम्मान पर आपकी त्वरित टिप्पणी ?

यह सम्मान देवी शंकर अवस्थी की स्मृति में दिया जाता है, जिनकी अकाल मृत्यु हो गई थी। उनकी आलोचना में जो ताजगी, अंतर्दृष्टि, खुलापन और सृजनशीलता मिलती है, उसकी दरकार युवा आलोचना से सदैव रहती है। यह पुरस्कार उनकी स्मृति को स्थायी बनाने का सुंदर उपक्रम है, जो एक तरह से आलोचना के यौवन को समर्पित है। सुखद है की यह न तो किसी सरकार और न ही किसी कॉरपोरेट घराने का है। इसलिए इसे हासिल करने में मुझे बेहद खुशी है।


किसी भी रचनाकार के लिए उसकी रचना धर्मिता के संदर्भ में कोई सम्मान कितना महत्वपूर्ण होता है?

देखिए, यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह सम्मान कौन दे रहा है और उसे किस रास्ते से पाया गया। मैं इतना कहूंगा कि मेरी राजनीति साम्राज्यवाद और सामंतवाद का विरोध है, मेरी विचारधारा मार्क्सवाद है और मेरा कर्मक्षेत्र, साहित्य और संस्कृति है। अगर किसी पुरस्कार से इन बुनियादी प्रतिबद्धताओं में कोई विचलन नहीं आता, तो वह मेरे लिए इस बात कि तसदीक है कि मेरी बुनियादी दिशा ठीक है। ऐसा ही मैं अन्य लोगों के लिए भी सोचता हूं।


किसी रचना पर आलोचनात्मक टिप्पणी क्यों और कितनी जरूरी है?

बेहद जरूरी है, क्योंकि हर लेखक की इच्छा होती है कि उसे क्रिटिकल पाठक मिले, जो न सिर्फ उससे प्रभावित हो, बल्कि उसे यह भी बता सके कि वह क्यों और किन अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाया।


आज हिंदी आलोचना की जो दशा-दिशा है, उससे आप कितना संतुष्ट हैं?

हिंदी आलोचना के बहुत से अधूरे कार्यभार, जैसे ऐतिहासिक समाजशास्त्रीय दृष्टि को मुक्तिबोध ने एक खास मंजिल तक पहुंचाया था, वह कहीं खो गई लगती है। आलोचना के क्षेत्र में कई तरह के वैश्विक सिद्धांत हमारे हिंदी साहित्य में बिना परीक्षण और कभी-कभी अनजान में व्यवहार में लाए जाते हैं। हिंदी आलोचना की शुरुआत में ही आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपनी जमीन पर खड़े होकर उससे बहस की, जो कुछ भी पश्चिम में लिखा-पढ़ा जा रहा था। पर आज हम इसका अनुकरण नहीं करते हैं। आज जरूरत इस बात की है कि आलोचना अपनी इस परंपरा का वहन करे।


आलोचना का मुख्य दायित्व क्या है?


जन आंदोलन के साथ दूसरे सामाजिक अनुशासन, उद्योग, तकनीक और विज्ञान से साहित्य के संबंध को परिभाषित करना और हमारे समाज को अधिक समतावादी, तरक्की पसंद, खुला और धर्मनिरपेक्ष बनाने में साहित्य की उपादेयता को सिद्ध करना ही आलोचना का मुख्य कार्यभार है।


क्या आलोचना भी समय और समाज की परिवर्तनशीलता से प्रभावित होती है?

हिंदी आलोचना के लिए तीन घटनाएं ऐसी हुई हैं, जिन्होंने समाज और राजनीति ही नहीं, हमारे साहित्य को भी बहुत प्रभावित किया। इसमें से पहली घटना सोवियत संघ के विघटन के बाद एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था का बनना। दूसरी घटना थी- देश में एक ओर सांप्रदायिक फासीवाद का उभार, तो दूसरी ओर वर्ग की जगह अस्मितावादी क्षेत्रीय, जातिगत कोटियों में जनता का ध्रुवीकरण। तीसरी घटना थी, उत्तर आधुनिकता का एक वैश्विक चिंतन पद्धति के रूप में बढ़ावा। इन घटनाओं के कारण हमारी आलोचना पर एक गहरा विभ्रमकारी असर हुआ।


हिंदी में भी आलोचना खेमों में बंटे नजर आते हैं, इसका आलोचकीय संदर्भ में कितना नफा-नुकसान है?

वैचारिक आधार पर खेमे बनें, तो दिक्कत की बात नहीं है। हिंदी आलोचना इसकी गवाह है कि अलग-अलग विचारधारा के लोग एक ही मंच पर गंभीर बहसें करते हुए एक-दूसरे से लड़कर सीखते रहे हैं। हां, व्यक्तिगत गोलबंदी, लाभ-लोभ की दृष्टि नहीं होनी चाहिए।


इन दिनों क्या कर रहे हैं?

इन दिनों मैं उत्तरवादी सिद्धांतों से जूझ रहा हूं, क्योंकि हिंदी में इनका अनालोचनात्मक अनुकरण मुझे पसंद नहीं है। जहां तक अगली योजनाओं का प्रश्न है, तो 21वीं सदी के समाजवाद के यथार्थ और सपने को लेकर मन में कशमकश जारी है, जिसके बारे में बहुत कुछ पढ़ना-लिखना है।

सभार-अमर उजाला

Friday, January 25, 2008

ब्लैक लिस्ट होने का डर...


शिक्षा जगत में मौजूद धांधली के ऊपर उंगली उठाने की कोशिश बहुत कम लोग करते हैं। हालांकि शिक्षा जगत से जुड़े माफिया किसी भी मायने में बाकी सेक्टर से अलग नहीं है। जब बात हिंदी की हो तब तो कहना क्या। बात केवल नियुक्तियों तक सीमित नहीं है। इस भाषा के खिलाफ एक सांस्कृतिक पिछड़ेपन की अवधारणा को भी जोड़ने का सचेत प्रयास होता है। कई बार लगता है कि इसे संस्थान केवल मजबूरी में पढ़ाते हैं। नियुक्तियों की यह प्रक्रिया यही साबित करती है कि इस भाषा को समर्थ भाषा की पटरी से उतार दिया जाय। इसके दांवपेंच के बीच बेहतर जीवन जीने की शर्त को समझाते हुए एक अनाम पत्र मिला है। जिसने सुधीर सुमन के अनुभवों की तथ्यात्मक पुष्टि की है। साथ ही उन्हे इस समस्या से निपटने के लिए सलाह भी दी गई है।
सुधीर भाई, मेरे परिवार में साहित्य को एक विषय के रूप में तो कभी किसी ने नही पढा लेकिन हिन्दी साहित्य में पाठक नाम की यदि कोई जाति है तो आप उसमें मेरा नाम खानदानी पाठक के रूप में जोड़ सकते हैं. जहाँ तक मुझे हिन्दी साहित्य की पठन-पाठन परम्परा का ज्ञान है, आप को पता होगा की हजारी प्रसाद जी और नामवर जी जैसे लोगों को अपनी योग्यता से नौकरी नही मिल पाई और वो भी अपनी सिफारिश के लिए सुमन जी जैसे कम talented लोगों का मुंह देखने को अभिशप्त रहे. डॉ नागेंद्र ने अनगिनत लोगों की नियुक्तियां करवाईं.मेरी जानकारी में हिन्दी साहित्य में कोई नही है जिसने बिना सिफारिश नौकरी पाई हो.ये शाप हर प्रतिभा को ढोना है चाहे अप का कद जो भी हो,उससे कोई फर्क नही पड़ता.
मुक्तिबोध आजीवन बीड़ी पीते रहे और मास्टरी करते रहे, उनपर रिसर्च कराने वाले वीसी बन गए. किसी खुद्दार और प्रतिभाशाली साहित्यकार ने नौकरी को तवज्जो नही दी. राजेंद्र यादव,उदय प्रकाश,रवींद्र कालिया आदि की लम्बी सूची हमारे सामने है, पछले साल बीएचयू में पंकज चतुर्वेदी थे, इस साल झारखंड में आप हैं अगले साल कहीं कोई और होगा. जिन संजीव पर आप ने पीएचडी की है वो ख़ुद नौकरियों की तलाश में अनिश्चित जीवन जी रहे हैं. हिन्दी साहित्य की मेरी जानकारी ये कहती है की आप की युए पोस्ट आप को higher education में ब्लैक लिस्ट करवा देगी शर्तिया फ़िर भी अगर कोई संभावना शेष है तो मेरे मित्र चुपचाप अपनी बारी का इंतजार करो जब तुम्हारा कोई श्रधेय बोर्ड में बैठेगा और तुम्हें उपकृत करेगा दूसरा रास्ता ये है की कोर्ट में कफ़न बाँध कर उतर जाओ... तुम किस समाज के सुधारने की आस लगाए हो,जो हजारीजी, नामवर जी और एक चोरी की थीसिस से डिग्री कराने वाले में फर्क नही कर सकता...........................

Sunday, December 2, 2007

''द्बिखंडित' की समीक्षा भाग-2


फिलहाल तस्लीमा नसरीन 'द्विखंडित' के कुछ हिस्सों को वापस ले रही हैं। लेकिन यह किताब कई ऐसे सवाल छोड़ती है जिसकी तह में जाने पर कई बने बनाए सामाजिक द्वंदों पर विचार जरूरी बन जाता है। प्रस्तुत है 'द्विखंडित' की समीक्षा का दूसरा और अंतिम भाग-
प्रणय कृष्ण
मध्यकाल के अंत तक तो विवाह एक ऐसा संबंध था जो कि दो प्रमुख पक्षकारों (पति और पत्नी) द्वारा तय ही नहीं किया जाता था। आरंभिक मानव समाजों में तो हर व्यक्ति संसार में शादी-शुदा ही आता था-विपरीत लिंग के पूरे समूह के साथ पहले से ही विवाहित। मानव समाज के विकास क्रम में समूह-विवाहों के बाद के रूपों में भी कमोबेश यही स्थिति कायम रही हालांकि समूह लगातार छोटे होते गए। समूह-विवाहों से आगे बढ़कर जोड़े वाले परिवारों के युग में मांए अपने बच्चों का विवाह गोत्र या कबीलों में युवा जोड़े की स्थिति मज़बूत करने के लिहाज से और नए संबंध बनाने के ख्याल से आयोजित करती थीं। जब सामुदायिक संपत्ति की अपेक्षा व्यक्तिगत संपत्ति का दबदबा बढ़ा और उत्तराधिकार के प्रश्न पर दिलचस्पी बढ़ी तक मातृ अधिकार की जगह पितृ अधिकार और एकनिष्ठ विवाह संस्थाबद्ध हुए और विवाह संस्था पहले के किसी भी समय की अपेक्षा आर्थिक कारकों पर अधिक निर्भर हुई। यहां खरीद फरोख्त के माध्यम से विवाह का रूप समाप्त होने लगा लेकिन स्त्री और पुरूष दोनों के लिए विवाह की योग्यता उनके व्यक्तिगत गुणों की जगह उनकी संपर्कों से आंकी जाने लगी। पूंजीवाद ने पुराने सारे संबंधों, परम्पराओं और ऐतिहासिक अधिकारों को मुक्त 'समझौतों` से बदला और विवाह संस्था के साथ भी ऐसा ही हुआ।
लेकिन सभ्यता के विकास क्रम में समूह-विवाह (पाशव अवस्था) , जोड़े में विवाह (बर्बर अवस्था) और एकनिष्ठ विवाह (सभ्य अवस्था) के साथ-साथ विवाहेतर संबंधों और वेश्यावृत्ति का भी विकास होता रहा। वास्तव में पूंजी के युग में संपित्ति के हस्तांतरण के लिए वैध संतानों की ज़रूरत के तहत विवाह में एकनिष्ठता स्त्री के लिए अनिवार्य मानी गई, वहीं आदिम समाजों में उपलब्ध यौन स्वच्छंदता उत्तरोत्तर पुरूषों के लिए ही उपलब्ध रही, खास तौर पर वेश्यावृत्ति के जरिए।
तस्लीमा की आत्मकथा में पुरूषों की खुली और ढंकी यौन-स्वच्छंदता और स्त्री के यौन-जीवन पर हिंसक नियंत्रण की लम्बी लोमहर्षक दास्तान है। रूद्र के साथ उसका प्रेम भी इस आख्यान का ही हिस्सा है। यदि परिपक्व अवस्था में पहुंची लेखिका 'रूद्र` के साथ अपने विशिश्ट संबंध को अन्य संबंधों की सामान्यता में विलीन कर देना चाहती है तो इसके पीछे यही सामाजिक सच्चाई और वैचारिक समझ काम कर रही है कि अंतिम विष्लेश् ाण में यह संबंध भी इसी आख्यान का हिस्सा है। मनौवैज्ञानिक तौर पर लेखिका उसकी विशिष्टता से मुक्त होना चाहती है।
इतिहास के पूंजीवादी दौर का दोगलापन उसके उत्पादन संबंधों से लेकर सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय मूल्यों तक व्याप्त है। स्त्री-पुरूष के बीच का प्रेम एक ऐसा क्षेत्र है जो इस दोगलेपन का प्रत्यक्ष और वास्तविक अनुभव मध्यवर्ग तक को करा देता है। रूद्र शादी के पहले और शादी के बाद भी वेश्याओं सहित अनेक स्त्रियों से संबंध रखता है-एक ही समय में। बूर्जुआ समाज इस बात का प्रचार करता है-दम भरता है कि स्त्री और पुरूष के बीच पूर्ण वरण की स्वतंत्रता और बराबरी के आधार पर संबंध उसने संभव किया है। स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व, लोकतंत्र, मानवाधिकार, सामाजिक न्याय आदि की तरह यह वादा भी कागज़ पर ही रहा। बूर्जुआ वर्ग के सबसे उन्नत समाज और धर्म सुधार आंदोलनों (लूथरवाद और काल्विनवाद) के उपरांत भी प्रेम और विवाह की अवस्था एंगेल्स के शब्दों में कुछ यों थी, ''विवाह वर्ग-विवाह ही रहा, लेकिन वर्ग की सीमा के भीतर दोनों पक्षों को एक हद एक दूसरे को चुनने की आजादी दी गई। नीतिशास्त्र और काव्यात्मक वर्णनों में, कागज पर, अकाट्य रूप से यही स्थापना की जाती रही कि स्त्री और पुरूष के बीच वास्तविक सहमति और परस्पर प्रेम के बगैर कोई भी विवाह अनैतिक है। संक्षेप में प्रेम विवाह को एक मानवाधिकार बनाया गया सिर्फ पुरूषों का अधिकार नहीं, बल्कि अपवाद स्वरूप महिलाओं का भी।``
एंगेल्स आगे लिखते है, ''लेकिन एक मामले में यह मानवाधिकार अन्य तमाम दूसरे तथाकथित मानवाधिकारों से भिन्न था। जहां दूसरे तमाम मानवाधिकार व्यवहार में सिर्फ शासक वर्ग यानि पूंजीपति वर्ग तक सीमित रहे तथा उत्पीड़ित सर्वहारा उनसे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर वंचित ही रहे-वहीं इतिहास की विडम्बना यहां फिर से जोर मारती है। शासक वर्ग आर्थिक प्रभावों से ही वशीमूत होकर शादी ब्याह के संबंधों में जाते है और अपवाद स्वरूप ही इस वर्ग में स्वैच्छिक विवाह होते है जबकि वंचित तबकों में स्वैच्छिक विवाह एक नियम की तरह है।``
प्रेम में पारस्परिकता, स्वतंत्रता आदि का प्रचार बूर्जुआ नीतिशास्त्र, काव्य और कानून ने खूब किया, लेकिन वास्तविकता में इसका निषेध किया। इसीलिए प्रेम का यह रूप वास्तविक दुनिया से बेदखल होकर स्वप्नों और फैंटेसी के रूप में लोगों की चेतना का अंग बना। हालांकि प्रेम के बारे में आदर्शवादी धारणा उच्च शासक समूह के युवाओं में प्राय: कम होती है क्योंकि वे स्त्री-पुरूष संबंधों के संपत्ति आधारित नियमन को अनुभवसिद्ध नियम के रूप में जानते हैं। ठीक इसी तरह जैसे कि एंगेल्स के एक उद्वरण में पहले कह आए हैं, सर्वहारा वर्ग में भी प्रेम की आदर्शवादी धारणा प्रचलित नहीं रहती क्योंकि पारस्परिक और मुक्त प्रेम व विवाह संबंध वहां सामान्य जिंदगी की वास्तविकता है, यों बूर्जुआ विकृतियों से वे भी आजाद नही हैं।
लिहाजा ये बीच का मध्यम वर्ग है जिसमें प्रेम और विवाह की आदर्शवादी धारणाएं सर्वाधिक प्रचलित है। अर्द्व-सामंती विशेषताएं वाले बूर्जुआ समाजों में मध्यवर्गीय युवाओं खासतौर पर युवतियों में यह आदर्शवादी धारणा विद्रोह के तत्व भी लिए रहती है। प्रेम के जरिए युवतियां परिवार और दूसरी सामाजिक संस्थाओं के दमघोंटू माहौल से अपना विद्रोह भी व्यक्त करती हैं। एक ऐसी ही लड़की है तस्लीमा जो रूद्र से, उसकी कविताओं और पत्रों के माध्यम से प्रेम कर बैठती है। उसके पत्रों और कविताओं में क्या है, जो तस्लीमा को आकर्शित करता है? वह तत्व है 'विद्रोह`-
''रूद्र मुहम्मद शहीदुल्लाह, ढाका का एक उदीयमान कवि!`` (उत्ताल हवाल, पृश्ठ १४१)
''रूद्र, सत्तर के दशक का उज्जवल तरूण था। सत्तर का दशक मौत की टूटती दरारों का दशक था; सत्तर का दशक कविता का दशक था; कविता में लाषों की गंध! चीत्कार! प्रतिवाद ७८! रूद्र ने अपनी कविता में उस दशक की अद्भुत तस्वीर आंकी थी।`` (उत्ताल हवा, पृष्ठ २१०-११)
''खैर, ढाका में रूद्र का वह जीवन भी, बाद में देख लिया। बेहिसाबी, बेपरवाह, उद्दाम-उत्ताल जीवन!`` (उत्ताल हवा, पृष्ठ २११)
७० का दशक बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम, पष्चिमी बंगाल में नक्सलबाड़ी आंदोलन जिसे 'वसंत के वज्रवाद` जैसे काव्यात्मक मुहावरे में याद किया जाता है, पष्चिमी दुनिया के युवाओं के वियतनाम युद्ध विरोधी आंदोलन से बने विश्वव्यापी साम्राज्यवाद विरोधी माहौल के लिए जाना जाता है। चे-ग्वेवारा इस दशक के सबसे बड़े युवा प्रतीक बने। ७० के दशक ने मध्यवर्गीय युवाओं को भी बुनियादी संघर्शों की दुनिया में खींच लिया था। इन आंदोलनों में स्वप्निलता और आदर्षमय कुहासा भी बहुत था। 'प्रेम-विद्रोह-काव्य` का समीकरण पूरे दौर पर छाया हुआ थाऱ्युवाओं के भावनात्मक उद्वेग की मुहर पूरे दौर पर लगी हुई थी। लेकिन इस दशक का रक्तरंजित यथार्थ भी 'प्रेम-विद्रोह-काव्य` के इस पूरे समीकरण को परिव्याप्त कर गया। तस्लीमा ने रूद्र की बिलकुल सटीक तस्वीर खींची है-उस दशक का एक प्रतिनिधि कवि-व्यक्तित्व। रूद्र और तस्लीमा का प्रेम बावजूद शब्दों/कविताओं की मध्यस्थता के, इस पूरे दौर की भावनात्मक और यथार्थ वास्तविकताओं के ताने-बाने से बुना हुआ है। 'रूद्र और तस्लीमा` की प्रेमकथा का नैरेशन गद्य और कविता में साथ-साथ चलता है-इतिहास, समाज और भीतरी-बाहरी संघर्शों को अपने घेरे में लिए हुए। परिपक्व लेखिका भले ही पष्चात्बुद्धि के तहत रूद्र के साथ संबंध को स्त्री-पुरूष के सामान्य बेमेल और शोश् ाणपरक संबंध के आख्यान में ही जगह देना चाहती है, लेकिन उसके भीतर की प्रेमिका और कवयित्री बिलकुल ही अलग स्वर धारण करती है। रूद्र के साथ-साथ ७० के दशक का क्रांतिकारी रोमान इस प्रेम को सारे अंतर्विरोधों के बावजूद किसी अन्य आख्यान का हिस्सा नहीं बनने देता। दोनों की प्रेमकथा कभी तस्लीमा का गद्य कहता है, कभी रूद्र की कविताएं। एक जबर्दस्त जुगलबंदी-विशाद के राग में श्रृंगार, रौद्र और भयानक का अद्भुत सन्निवेश। ७० के दशक का प्रतिनिधि विद्रोही बांग्ला कवि-व्यक्तित्व तस्लीमा की आत्मकथा के पन्नों पर अमर हो गया है। रूद्र का व्यक्तिगत पतनषील जीवन और उसकी कविताओं का 'उद्धाम-उ>ााल` स्वर जो कि एक क्रांतिकारी दशक की तमाम रचनात्मक और आंदोलनत्मक ऊर्जा, मानव नियति के गहन-भीश् ाण साक्षात्कार से प्रेरित है, एक अद्भुत विडम्बनामय विशाद की रचना करता है। 'उत्ताल हवा` में उद्धृत रूद्र की यह कविता ७० के दशक के मिजाज़ का अत्यंत प्रामाणिक दस्तावेज है-
''फर्ज करो, तुम चले जा रहे हो, और बिल्कुल अकेले हो!
तुम्हारे हाथ में उंगलियों जैसी जड़ें, मानो, उंगलियां
तुम्हारी हडडियों जैसी ध्वनि, मानो अस्थियां
तुम्हारी त्वचा में अनार्य की , रेशमी और ताम्रवर्णी
तुम चल रहे हो, फर्ज करो दो हज़ार सालों से बस, चलते जा रहे हो
तुम्हारे पिता का हत्यारा, कोई एक आर्य
तुम्हारे भाई का कातिल, कोई एक मुगल
एक अदद अंग्रेज ने तुम्हारा सर्वस्व लूट लिया
तुम चलते रहे हो, तुम अकेले हो, तुम चलते जा रहे हो दो हज़ार सालों से।
तुम्हारे पीछे है पराजय और ग्लानि....तुम्हारे सामने?
तुम चलते जा रहे हो, नहीं, नहीं तुम अकेले नहीं हो, तुम अब इतिहास हो
फर्ज करो, घर-घर में ताँत-करघे और उसके सृजन की आवाज़ें
सुनते-सुनते तुम चलते जा रहे हो, भठ्टी के इलाके महुआ के देश में,
फर्ज करो, यह है पाला-गीतों की मजलिस, फर्ज करो, वह सांवली औरत
तुम्हारे सीने के करीब नत नयन, थरथराते रक्तिम अधर
तुम चल रहे हो, दो हजार सालों से चलते जा रहे हो तुम!`` (उत्ताल हवा, पृश्ठ २६९)
उस दशक की कौन युवती भला इन शब्दों के जादू से बच सकती थी? ऐसे शब्द जिन्हें पढ़कर आज का पाठक भी रोमांचित हो जाए। जबरदस्त क्रांतिकारी आशावाद और हथियारबंद तरीके से दुनिया बदलने का जज्ब़ा-शहीद होने का जज्ब़ा-
''झोंप-झंखाड़भरे जंगल में आता है गुरिल्लाओं का झुंड
हाथों में चमकते हैं हथियार! झलकता है हाथों में
शेष प्रतिशोध! शोध लेंगे खून का, लेंगे तख्त का अधिकार,
उतर पड़ते हैं झंझा में; जाती है जान,
बेशक जाए, कोई फर्क नहीं पड़ता! गूंजती है हुंकार!
अर्जित करता है महा-क्षमता!
वह दिन आएगा! आएगा ज़रूर! समता के दिन!`` (उत्ताल हवा, पृश्ठ २७०)
१८-१९ साल की युवती ने उसकी कविताओं और पत्रों की मार्फत उससे रिष्ता जोड़ लिया-
''खतों में इंसान को अपना बना लेना, मेरे स्वभाव में शामिल था।`` (उत्ताल हवा, पृश्ठ १४१)
''मेरा प्यार, रूद्र के शब्दों के साथ था। 'उपद्रुत उपकूल` की कविताओं और उसके खतों के अक्षरों के साथ था। इसके पीछे के इंसान को मैं नहीं पहचानती थी। मैंने तो उसे कभी देखा तक नहीं था, सिर्फ एक कल्पना भर कर ली थी कि आर-पार कोई अपूर्व, सुदर्षन पुरूष मौजूद है, जो पुरूष किसी दिन झूठ नहीं बोलता, इंसानों के साथ कोई अन्याय नहीं करता; जो उदार, मिलनसार, प्राणवंत है! जिसने अब तक किसी लड़की की तरफ नज़रें उठाकर भी नहीं देखा, वगैरह-वगैरह! ऐसी ही सैकड़ों खूबियां!`` (उत्ताल हवा, पृश्ठ २०५)
लेकिन इस व्यक्ति से जब युवती की मुलाकात हुई तो पाया कि ''दाढ़ीवाला, लंबे-लंबे बालोंवाला, लुंगीधारी लड़का सामने आ खड़ा हुआ और उसने बताया कि वही रूद्र है। प्रेमिका से पहली मुलाकात लुंगी में?`` (उत्ताल हवा, पृश्ठ २०६) उम्र में कई बरस बड़े रूद्र को जल्दी थी शादी की। तस्लीमा को अभी डाक्टरी की पढ़ाई करनी थी। ३-४ साल लगने थे। घर पर इस रिष्ते को छिपा कर ही रखना था। लेकिन रूद्र ने लगभग भावनात्मक ब्लैकमेल करके शादी के कागज़ पर दस्तखत ले लिए। 'बहू` संबोधन वाला खत घर में पकड़ गया-फिर यातना का सिलसिला।
'सुहागरात` का दृष्य तो जैसे बलात्कार का दृष्य हो-बेहद खौफनाक-
''मैंने अपनी मुंदी हुई आंखों को हथेलियों से ढंक लिया और यह सोचना षुरू किया कि यह मैं नहीं हूं, यह मेरी देह नहीं है; मानो मैं अपने घर में, अपने ही कमरे में लेटी हूं। यहां जो कुछ अष्लील घट रहा है, इससे मैं कहीं भी नहीं जुड़ी। जो कुछ घट रहा था, वह मेरी देह, मेरे जीवन में बिल्कुल भी नहीं घट रहा था। यह कोई और है; यह किसी और की देह है। इसके बाद, रूद्र मेरे समूचे शरीर पर चढ़ गया। इस बार मेरी आंखें ही नहीं, मेरी सांसें तक रूक गईं। अवश देह के दोनों पांव सिमटकर, घनिश्ठ होने की कोशिश में जूझते रहे। मेरे दोनों पांवों को रूद्र अपने दोनों पांवों में फंसाकर, तलपेट की संधि पर किसी अतिरिक्त कुछ का दबाव डालने लगा। मैं अपनी सांसें अवरूद्ध किए उस दबाव को, पति का स्वाभाविक दबाव मान लेने की कोशिश करती रही। लेकिन मेरी सोच बीच में ही टूट गई। न चाहते हुए भी मेरे गले से एक आर्त-चीत्कार गूंज उठी। रूद्र ने अपनी दोनों हथेलियों में मेरा मुंह दबोच दिया। लेकिन, नीचे का दबाव उसी तरह बना रहा। मैं तीखे दर्द से कराहने लगी। ऊपर का दबाव, नीचे का दबाव, सारा कुछ मेरी देह में प्रवेश नहीं कर पर रहा था। सारी रात रूद्र धीरे-धीरे, पूरे तरीके से, स्वाभाविक नियम माफिक मुझमें प्रवेश करने की कोशिश करता रहा। लेकिन हर बार, उसे समझाने की मेरी यंत्रणा, 'हाय अम्मी! हाय बाप रे!` की पुकार, समूची रात को मुखर किए रही, हर बार, मेरी चीत्कार पर रूद्र का दबाव और-और बढ़ता गया। उस दबाव को चीरते हुए, मेरी चीत्कार लगातार गूंजती रही।`` (उत्ताल हवा, पृश्ठ २८१)
१९-२० साल की लड़की जिसने अभी तक खुद को भावनात्मक रूप से विवहित जीवन के लिए तैयार ही नहीं किया था, उसके लिए ये सुहागरात हादसे से कम न थी। हमारे उपमहाद्वीप की अधिसंख्य लड़कियों की ही तरह। इस पूरे अनुभव से वो छूटते ही उबरना चाहती है-
''काश, सारी रात हम बातें करते हुए या कविताएं पढ़ते हुए गुजार देते; सिर्फ थोड़ी-बहुत छेड़छाड़, दो-एक निर्मल-विमल चुंबन में ही, हमने सारी रात बिता दी होती।`` (उत्ताल हवा, पृश्ठ २८२)
हालांकि बाद में सेक्स सम्पर्क के सामान्य होने के बाद-
''मैं गहरे सुख, महासुख में आकुल-व्याकुल होती रही।`` (उत्ताल हवा, पृश्ठ ३२३)
लेकिन रूद्र ने प्रेम का जो उपहार तस्लीमा को दिया-वह था सिफलिस का रोग जो उसने वेश्यागमन से हासिल किया था। इस विष्वासघात ने दिल के आइने को बुरी तरह चटखा दिया।
''......कोमल, कुंवारी औरत, विवाह के दिन, झुकाए बैठी है,
अपना लजाया-शर्माया चेहरा!
अजाने सुख के भय से थर-थर कांपती है। उसकी नीलाभ देह!
अब जाने क्या हो! शेष हो जाते हैं, शहनाई के सुर; रात बढ़ती जाती है!
दुल्हन की आवाज़ मंद पड़ जाती है, नि:शब्द, निर्जन कमरे में,
जब पहली बार दाखिल होगा पुरूष, जाने वह क्या कहे!
देवता नामक पति, दरवाज़े पर जड़कर सिटकिनी, कुटिल निगाहों से निहारता है,
मांसल, अनछुई-अनसूंघी बालिका की सलज्ज देहऱ्यश्टि!
चकले के कोठों में उसने उन्मोचित किए थे, बहुत-से तन, बहुत बार!
अबूझ, किशोरी, लड़की, कुचलकर अपने ख्वाब-साध!
दु:खी मन से बटोरती है हिम्मत!
शायद ऐसा ही होता है; शायद यही है दुनिया का नियम-कानून!
पैशाचिक चिक उल्लास करे, मसले हुए देह-मन में, वासना का खून!
परम प्यार में डूबी वधू ने किया उपहार स्वीकार, अंग-अंग में कबूल किया वर्जित रोग!
साल-भर बाद, औरत ने प्रसव किया, एक विकलांग शिशु!
जटिल रोग का ज़हर देह में धधकाए हुए अंगार, उसने स्वागत किया।
उस रोग का नाम है-सिफिलिस!`` (उत्ताल हवा, पृश्ठ ३७६-३७७)
आंदोलन-कविता और प्रेम के अलावा भी एक जीवन था रूद्र का-शराब, जुआ और वेश्यालय में डूबा हुआ। ढहते हुए जमींदार परिवार के कुछ दूसरे ही तर्क थे-दूसरे ही संस्कार। चदृग्राम स्थित ससुराल की हवेली में तस्लीमा को साड़ी पहनकर माथे पर आंचल भी डालना पड़ा। पांव छूकर बड़ों को सलाम भी करना पड़ा। ज़ेवर से शरीर को लादना भी पड़ा और घर से बाहर की तो कोई दुनिया ही नहीं थीं-ढहती जमींदारी के संयुक्त परिवार की बहु बनने के लिए उसने घर से विद्रोह नहीं किया था।
''मेरे मन ने कहा-नहीं, यह असंभव है। रूद्र तो उन अस्सी प्रतिशत लोगों के लिए कविताएं लिखता था, जो उसकी इस दो मंज़िला कोठी तक कभी पहुंच ही नहीं सकते। उन लोगों को तो कोठी के हरकारे-प्यादे, कोठी की सीढ़ियों से ही खदेड़ देते थे। जो सब खेतिहर-किसान, आग बरसाती धूप में जलते-तपते खेतों में हल चलाते हैं, जिनकी मेहनत-मशक्कत की फसल इस कोठी के भंडार में जमा होती है, उन लोगों को यहां आने का अधिकार कहां है? उन लोगों में और रूद्र में काफी फर्क है। मैं उस फर्क को कहीं से भी मिला नहीं पाई। रूद्र समान अधिकार के लिए पूरे दम से चीख-चीखकर कविताएं पढ़ता था, वह क्या सच ही समान अधिकार का पक्षधर है?`` (उत्ताल हवा, पृश्ठ ४४६)
सब कुछ को बर्दाष्त करने कदम-दर-कदम रूद्र की तमाम अराजकताओं के बीच भी उसे सम्मालती, नई ज़िंदगी की षुरूआत का सपना लिए वो रूद्र के साथ ढाका आ जाती है। लेकिन रूद्र के सपने बदल गए थे-
''अब रूद्र का सपना यह नहीं था कि कहीं एकांत में जाकर, मेरे साथ अपनी गृहस्थी बसाए। ढाका में रहने का सपना भी, अब उसके दिमाग से मिट चुका था। उन सब पुराने सपनों को परे धकेलकर, अब उसकी आंखों में नए-नए सपने सिर उठाकर खड़े हो गए थे। अब रूद्र का सपना था, चिंगड़ी मछली का धंधा करके, ढेर-ढेर रूपये कमाना। अब उसका सपना था, अपने छ: भाई-बहनों को शान-षौकत से बड़ा करना`` (उत्ताल हवा, पृश्ठ ४५७)
पढ़नेवाले को हैरत होती है कि एक मेधावी, रौशन ख्याल, सुंदर डाक्टर युवती जो खुद एक प्रतिभाशाली कवयित्री भी है, वो इस बदसूरत अराजक इंसान के साथ इतना क्यों निभाती है? वो बार-बार उसके पास क्यों लौटती हैं? बार-बार खुद को बदलने का झूठ बोलकर रूद्र उसे कैसे लौटा लाता है? उतार सरल नहीं है क्योंकि यहाँ मनुश्यों का 'आत्मजगत` उनकी भीतरी दुनिया दांव पर लगी हुई है। प्रेमी कहीं न कहीं अपनी एक अलग भावनात्मक दुनिया बसा ही लेते है। इस अलग दुनिया का सबूत ये है कि वे दुनिया में प्रचलित अपनी शिनाख्त (नाम) से अलग एक दूसरे का नाम भी रख लेते हैं जिससे सिर्फ वे ही एक दूसरे को पुकारते हैं। तस्लीमा और रूद्र ने क्रमश: 'सुबह` और 'धूप` नाम रख रखे हैं एक दूसरे को खतों में संबोधित करने के लिए-
''पता है, धूप, जब तुम मेरे पास होते हो, तो हैरत है, मैं सब कुछ भूल जाना चाहती हूं। मेरा और कोई आश्रय नहीं है, कहीं भी पनाह लेने की जगह नहीं है; पलटकर जाने की कोई राह भी नहीं-शायद , इसीलिए सब कुछ भूल जाने की कोशिश करती हूं; शायद इसीलिए मैं अपने सजाए हुए सपनों में ही खोई रहना चाहती हूं, तुम्हारे बर्बाद अतीत से मुकर जाने ही कोशिश करती हूं। लेकिन दरअसल ऐसा नहीं होता, अपने ही साथ कुछ ज़रूरत से ज्य़ादा ही नाटक हो जाता है। सीने में दबाई हुई तकलीफें, आग बनकर फैल जाती हैं। तुम तो प्यार करना जानते ही नहीं, इसीलिए तुम समझते भी नहीं कि कैसी होती है यह तकलीफ! किस कदर जलाती है यह!`` (उत्ताल हवा, पृश्ठ ३४९)
रूद्र के प्रति तस्लीमा का प्यार क्यों और कैसे धीरे-धीरे सहानुभूति और ममता में बदलता है, ये शायद हमारे उपमहाद्वीप की ज्य़ादतर स्त्रियां अपने जीवनानुभव के कारण ज्य़ादा महसूस कर सकती हैं। एक ऐसा प्यार जो कई जगह लम्बी चलने वाली हॉरर फिल्म की तरह लगे, उसकी उदा>ा परिणति सचमुच पाठक के बतौर हमें बेचैन करती है लेकिन क्या ऐसा ही हमारे आस-पास रोज़-रोज़ नहीं होता? लेकिन यदि यह एक स्त्री की सहनषीलता का आख्यान मात्र होता तो कोई खास बात इस कहानी में न होती। बात उससे ज्य़ादा गहरी है। रूद्र स्वयं द्विख् ाण्डित है, आत्म विभाजित है। तस्लीमा का प्यार उस रूद्र से है जो अपनी कविताओं में जिंदा है। न्याय, समता, विप्लव और निर्बंध प्यार की भावनाओं से लवरेज़। वास्तविक ज़िंदगी में एक हद तक वो इनकी कीमत चुकाता भी है। कवि और आंदोलनकारी जीवन का चुनाव यहीं से आता है। लेकिन ढहती ज़मीदारी के संयुक्त परिवार का तर्क, व्यक्तिवादी बौद्धिक अहं, कठिन राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियों और अत्यंत भावुक आत्मिक जीवन के द्वंद्व के बीच अराजकता में शरण लेना, अपनी ही कुत्सित आदतों की कैद से निकल पाने में उसे असफल बना डालता है। रूद्र अपनी वास्तविक जिंदगी में बेतरह बिखरा हुआ आदमी है लेकिन उसकी कविताएं सधी हुई हैं। उसके व्यक्तित्व का भावावेग ( चंपवद) कविता में संगठित और समेकित है लेकिन जिंदगी में उसे अराजक बना डालता है। चवमजपब ेमसि उसका दूसरा 'आत्म` है-वास्तविक जीवन से निर्वासित। वो दो जिंदगियां जी रहा है-कविता में एक ज़िदगी, वास्तविकता में दूसरी। कविता में वह स्वयं कर्ता है नइरमबज है - अपने शिल्प का मास्टर। वास्तविक जिंदगी में वो परिस्थितियों, आदतों और वासनाओं का दास है। तस्लीमा इस हाड़-मांस के वास्तविक रूद्र से भयानक दुख पाती है लेकिन कवि रूद्र का आकर्षण उसे लौटा लाता है बार-बार। इसे पूरे एनकाउंटर में वो खुद भी भीतर से टूट जाती है-द्विख् ाण्डित होती जाती है। कुचली हुई कोमल भावनाएं, न्याय और समतामूलक जीवन के स्वप्न जो जीवन में हर दिन रौंदे जाते है-आत्मकथा बन जाते हैं। रूद्र ही कविताएं और तस्लीमा की आत्मकथा दोनों ही दोनों के अलिंगनबद्ध निर्वासित 'आत्म` हैं। जिंदगी की असफल प्रेमकथा साहित्य के पन्नों में अमर, अत: सफल हो गई।
ऐसा नहीं कि उसे रूद्र से नफरत नहीं होती। ऐसा भी नहीं कि वह श्रद्धा की तरह मनु को क्षमा करने के लिए, उसपर वारी जाने के लिए ही पैदा हुई है। एक तरफ रूद्र के प्रति प्यार और सहानुभूति, तो दूसरी तरफ रूद्र से तीखी नफरत के ध्रुवान्तों पर वो झूलती रहती है-
''अब तुम्हारा मुखौटा नोचकर, तुम्हारा वह असली वीभत्स चेहरा देखूं तो सही। अब और कितनी धोखाधड़ी करोगे? टूट-फूट का यह नृशंस खेल क्या इतना निर्मम होता है? पूर्णिमाहीन चांद, अषुभ अमावस्या को आवाज़ें देता है-आ! आ! जुगनू को रोशनी मानकर, मैं मगन थी, निकश अंधेरे के उत्सव में! यही मेरी भूल थी। यह है मेरा गुनाह, जाल में रूंधा-फंसा! अब मैं फरार होना चाहती हूं। अपने दांतों से काटकर, चीर देना चाहती हूं बंधन! अब मैं जीना चाहती हूं, अपने जान-प्राण में भर लेना चाहती हूं, विषुद्ध वाताश! और कितना चकमा दोगे? मैं क्या समझती नहीं तुम्हारी धूर्तता? अपनी ज़िंदगी में कूड़े का ढेर संजोए, तुम होठों की कोरों में खिलाते हो सुवासित हंसी? ग्लानि से भरा अतीत; ग्लानि से भरी देह; घृणित जीवन! फिर भी अमृत समझकर, मैंने छुई है ज़हर की आग!`` (उत्ताल हवा, पृश्ठ ३४२)
लेकिन जैसे ही रूद्र का वह दूसरा 'आत्म` कविताओं या पत्रों में उसे पुकारता है, वह खुद को रोक नहीं पाती-
''तुम्हें लौटा लाएगा प्रेम, आधी रात झरता हुआ, पलकों का शिशिर
सीने का ज़ख्म़, झुलसा हुआ चांद, तुम्हें लौटा लाएगा।
प्यार के लिए देगा सदाएं, आष्विन का उदास मेघ
तुम्हें लौटा लाएगा, सपना, पारिजात, धरती का कुसुम!
तुम्हें लौटा लाएंगे प्राण, यह प्राण-निशिद्ध ज़हर
तुम्हें लौटा लाएंगे नयन, इन नयनों की तेज़-तेज़ लपटें
तुम्हें लौटा लाएंगे हाथ, इन हाथों के निपुण सृजन
तुम्हें लौटा लाएंगे अंग-अंग, इस तन का तपा हुआ स्वर्ण
तुम्हें लौटा लाएंगे, इस बात रात के नींद-जगे पंछी
बाईं तरफ सीने में जमा, दु:खों का सियाह ताबूत
तुम्हें लौटा लाएंगे लहर-झाग, सागर की अदिगंत साध
खुशबू में नहाई आंखें, नील मत्स्य लौटा लाएंगे तुम्हें
यह विश-कंटकित लता, प्यार से रोक लेगी राह
झरे हरसिंगार का शव, पड़ा रहेगा राह पर,
निभृत अंगार चिरकाल, लौटा लाएगा तुम्हें
अफसोस में डूबा अंधियार, छू-छूकर मृत्यु, लौटा लाएगा तुम्हें!`` (उत्ताल हवा, पृश्ठ ३५९-३६०)
कौन कह सकता है इन शब्दों का शिल्पकार महज एक झूठा, मक्कार और लोलुप आदमी है, जो सिर्फ एक स्त्री की अबोधता या कमजोरी का फायदा उठा रहा है? दरअसल, रूद्र खुद अपने आत्मविभाजन को कहीं न कहीं जानता है और उसे प्यार करने वाली तस्लीमा भी। बहरहाल सपनों पर वास्तविकता हरदम भारी पड़ती है। कविता में जीवित रूद्र पर सदेह रूद्र के अनुभव भारी पड़ते हैं। तस्लीमा तलाक लेती है। उत्ताल हवा की अंतिम पंक्तियां हैं-
''न्ना, मेरी ज़िंदगी किसी की भी जिंदा बैसाखी बनने के लिए, हरगिज नहीं है। किसी दूसरे की बैसाखी बनने के लिए, मैं अपनी ज़िंदगी कुर्बान नहीं कर सकती। रूद्र के लिए मुझे अफसोस है। उसके लिए मुझे हमदर्दी होती है। लेकिन इससे भी ज्य़ादा हमदर्दी मुझे अपने लिए होती है।`` (उत्ताल हवा, पृश्ठ ४९४)
'द्विखण्डित` के दो अध्याय 'कर न पाया स्पर्ष, तुममें ही, तुमको ही` तथा 'दिवस रजनी जैसे मुझे किसी का इंतजार` रूद्र को समर्पित हैं। दोनों ही अध्यायों में अलगाव के बाद का वर्णन है। दोनों ही अध्याय प्रेम की उदात्तता का सुंदर आलेखन हैं। पहले अध्याय का षीर्शक रूद्र की उस कविता से है जिसमें पहली बार प्रेम की असफलता की उसने जिम्मेदारी ली-पहली बार आत्मालोचन किया। पहली बार उसके विद्रोही, विप्लवी, स्वाप्निल
चवमजपब ेमसि में एक दरार दिखाई दी। यह पश्चाताप, यह आत्मग्लानि, यह असफलता रूद्र के यथार्थ जीवन द्वारा उसके आदर्ष जीवन में, उसके कवि व्यक्तित्व में डाली गई दरार है।
''दूर हो तुम, बहुत दूर
कर न पाया स्पर्ष, तुममें ही, तुमको ही।
देह की तपिश में छानता-बीनता रहा सुख!
परस्पर खोदते-विदोरते खोजता रहा निभृति!
तुममें ही, तुमको ही कर न पाया स्पर्ष!
सीपी खोलकर, लोग जैसे खोजते हैं मोती
मुझे खोलते ही, तुम्हें मिला रोग!
मिली तुम्हें आग की तटहीन नदी!
तन-बदन के तीखे उल्लास में,
पढ़ते हुए तुम्हारे नयनों की भाशा, हुआ हूं विस्मित!
तुममें ही तुमको ही कर न पाया स्पर्ष!
जीवन पर रखे हुए विष्वास की हथेली,
जाने कब तो शिथिल हुई, भर गई लता
जाने कब तो फेंक दिया हिया, छुआ सिर्फ हतपिंड,
अब बैठा हूं उदास, आनंद मेले में!
तुम्हें कर न पाया स्पर्ष, तुम जो मेरी हो!
उन्म>ा बाघ-सा, करता रहा तहस-नहस
षांत आकाश की नीली पटभूमि,
मूसलाधार बारिश में भिगोता रहा हिया!
तुममें ही, तुमको ही, कर न पाया स्पर्ष! आज तक!`` (द्विखंडित, पृश्ठ ४४-४५)
ट्रेजिडी का पूर्वाभास जैसे इस कविता के माहौल में ही व्याप्त है। ऐसा नहीं कि रूद्र ने पहले कभी अपनी ज्य़ादतियों के लिए क्षमा नहीं मांगी, पष्चात्ताप नहीं किया। बातचीत और पत्रों में उसने कई बार ऐसा किया। लेकिन ये पष्चात्ताप हरदम अविष्वसनीय था क्योंकि वो सब तस्लीमा को मनाने और फिर से उसे पाने के लिए था। इस कविता से पहले काव्य में उसने ऐसा कभी नहीं किया (कम से कम लेखिका के बयान में ऐसी कोई कविता उद्धृत नहीं की गई) ये कविता रूद्र के प्यार की सबसे प्रामाणिक अभिव्यक्ति है। विडम्बना यह कि यह अभिव्यक्ति संबंध टूट जाने के बाद की है। रूद्र के जीवन में दाखिल हुई नयी प्रेमिका शिमुल के बारे में सुनकर तस्लीमा को रूद्र के साथ अपने दिन याद आते हैं, वेदना उमड़ आती है, लेकिन शिमुल के प्रति ईर्श्या का एक शब्द भी नहीं। प्रेम की पीर मनुश्य को कितना उदात्त बना सकती है, इसका प्रमाण है ये पंक्तियां जिनमें रूद्र की आंखों में शिमुल के फूल खिलने का बयान है-
''रूद्र ने मेरी आंखों में देखा। उसकी आंखों में शिमुल के अनगिनत फूल खिले हुए। उसने अपनी आंखें, खिड़की की तरफ मोड़ लीं। बाहर खिले कृश्णचूड़ा के फूलों को निहारते हुए, जाने कहीं वह शिमुल को तो नहीं ढूंढ़ रहा है?`` (द्विखंडित, पृश्ठ ५१)
'दिवस रजनी जैसे मुझे किसी का इंतजार` रूद्र की मृत्यु पर तस्लीमा का हदय विदारक हाहाकार है। जिसने इतने दुख दिए, जिससे संबंध भी खत्म हो चुका, उसके लिए ऐसा हाहाकार! ''रूद्र अब कविताएं नहीं लिखेगा। रूद्र अब कभी नहीं हंसेगा। रूद्र अब किसी मंच पर कविता नहीं पढ़ंगा। सभी लोग अपनी-अपनी जिंदगी जिएंगे, सिर्फ रूद्र ही नहीं होगा।`` (द्विखंडित, पृश्ठ २०२)
''सारा कुछ जैसा पहले था वैसा ही अब भी मौजूद था। सिर्फ रूद्र ही नहीं था। रूद्र अब किसी भी सड़क पर नहीं चलेगा; अब वह किसी भी फूल की खुशबु नहीं लेगा। किसी नदी का रूप नहीं निहारेगा, न भटियाली गाने सुनेगा। लेकिन मुझे विष्वास नहीं होता कि रूद्र अब घूमेगा-फिरेगा नहीं, खुशबु नहीं लेगा, कुछ देखेगा-सुनेगा नहीं। पता नहीं क्यों तो मेरा दिल कहता था कि रूद्र लौट आएगा।`` (द्विखंडित, पृश्ठ २०३)
''ढाका ष्मशान-ष्मशान जैसा लग रहा था इसलिए मयमनसिंह लौटी थी। मगर यहां आकर देखा, यह घर भी ष्मशान हो चुका था। मैंने पलंग के नीचे से अपना ट्रंक खींचकर, बाहर निकाला। उसे खोला! रूद्र की छुअन पाने के लिए खोला था। चाहे जैसे भी हो, मुझे रूद्र के परस की तलब थी। मैं उसे याद नहीं बनने देना चाहती। रूद्र के खत पढ़ते-पढ़ते पुराने दिन मेरी आंखों के सामने आ खड़े हुए! वे तमाम दिन मुझे इतने करीब लगे कि मैं उन गुजरे दिनों को छू-छूकर महसूस करती रही। मैं उन दिनों में तैरती रही, उनसे खेलती रही, उन्हें वेणी की तरह मैंने अपने से गूंथ लिया।``(द्विखंडित, पृश्ठ २०३) पूरा अध्याय 'मसमहल पद चतवेम`है। ट्रेजिडी का भाव तभी जागता है जब नायक को उसके पतन के लिए जिम्मेदार नहीं माना जाता। तभी वह पाठक/दर्षक की विराट सहानुभुति का पात्र होता है। यदि शहीदुल्ला रूद्र की मृत्यु एक ट्रेजिक भाव जगाती है, तो इसलिए कि तस्लीमा का बयान उसे उसकी मौत की जिम्मेदारी से संवेदना के धरातल पर मुक्त करता है। रूद्र जैसे व्यक्ति को यदि तस्लीमा की आंख से न देखें तो शायद ही उससे किसी को सहानुभूति हो-लेकिन ये संभावना ही अप्रासंगिक है क्योंकि रूद्र की कहानी तस्लीमा के बगैर पूरी ही नहीं होती-तस्लीमा के अलावा उसे बयान करने वाला भी कोई और नहीं। ७० के दशक ने रूद्र के कवि को पैदा किया, लेकिन व्यक्ति रूद्र को जिंदा नहीं छोड़ा। ७० के दशक में दुनिया के पैमाने पर भिन्न-भिन्न पृष्ठभूमि के तमाम युवा सामाजिक बदलाव की आंधी में खिचे चले आए। उनमें से बहुतों का रू पांतरण हो गया जिन्होंने जीवन की तमाम चाहतों और यहां तक की खुद जीवन को ही कुर्बान कर दिया। कई ऐसे भी थे जो इस दशक के बीतते-बीतते अपनी सुरक्षित दुनियाओं में वापस लौट गए। लेकिन कई का हश्र रूद्र की तरह चेतना और व्यक्तित्व के विभाजन में हुआ और आत्महन्ता रास्ते पर चल पड़ा। रूद्र का कवि व्यक्तित्व, उसकी चेतना का एक हिस्सा तूफानी दशक की विप्लवी और उत्सर्गमयी चेतना से एकमेकहो गया, लेकिन उसका व्यक्तिगत जीवन वंचित तबकों के साहचर्य के बावजूद सामंती संस्कारों और मध्यवर्गीय इच्छाओं के दबाव में रहा, रूपांतरित नहीं हो सका। पूरी प्रेमकहानी पर ७० के दशक की अमिट छाप है। तस्लीमा के लिए रूद्र को प्यार करना प्यार, विद्रोह, कविता, मनुश्यता के अपराजेय स्वप्नों की तामीर के लिए शहादतें देने वाले ७० के दशक को प्यार करना भी है, जिससे रूद्र की कविताओं का नाता था। रूद्र से प्यार करना, रूद्र के 'आत्म-निर्वासन` को 'समझना` भी है-रूद्र को अपने भीतर पालना भी है।
रूद्र ने कविता सिर्फ वंचितों की मुक्ति के लिए नहीं लिखी, अपनी मुक्ति के लिए भी लिखी। तस्लीमा ने भी आत्मकथा सिर्फ स्त्री-मुक्ति के लिए नहीं, आत्म-मुक्ति के लिए भी लिखी। काव्य और आत्मकथा दोनों के लिए अपने ही निर्वासित आत्म की पुनर्प्राप्ति की यात्रा है। तस्लीमा की आत्मकथा में दोनों निर्वासित 'आत्म` कहीं उच्चतर उदात्त स्तर पर जुड़ गए हैं। रूद्र का तस्लीमा के प्रति प्यार क्या सच्चा था? क्या वो सिर्फ देह की हवस नहीं थी? यदि वो सिर्फ देह की हवस होती, तो रूद्र को स्त्री-देह कई प्राप्त थे। वो उसे वापस लौटा लाने की कातर प्रार्थनाएं क्यों करता है?
वास्तव में रूद्र को उस लड़की से प्यार है जो उसके कवि को प्यार करती है क्योंकि उसके व्यक्तित्व के उस हिस्से को भी प्यार की तड़प है। वास्तविक जीवन की उसकी अराजकता और लोलुपता उसे दूर करती जाती है, जबकि उसकी कविताएं उसे लौटा लाती हैं। इस आत्मकथा में यही इतना दर्ज है।
हो सकता है कि विराट बदलावों का उथल-पुथल भरा समय फिर लौटे। हो सकता है कि फिर से लौटे इस समय में मानवीय आकांक्षाएं और कुर्बानियां पराजय और आत्म-विभाजन पर समाप्त न हों। हो सकता है कि उसके किरदारों का ट्रेजिक अंत न हो। हो सकता है कि सर्वतोंन्मुखी विद्रोहों के नए विश्वव्यापी कालखंडका प्रेम इतना अभिशप्त न हो। हो सकता है कि व्यक्तियों की मुक्ति सिर्फ काव्य और आत्मकथा में न होकर सचमुच सामाजिक परिवर्तन के रास्ते हो। रूद्र और तस्लीमा के प्रेम की काव्य-कथा अपनी वास्तविक, तर्कसंगत, परिणति की मुंतज़िर है।
नोट : एंगेल्स के उद्धरण उनकी बहुचर्चित पुस्तक 'परिवार, निजी संपत्तिऔर राज्य` से लिए गए हैं। 'उत्ताल हवा` और 'द्विखण्डित` उद्धरण वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इन पुस्तकों के क्रमश: सन् २००४ और सन् २००५ के सस्करणों से ।(समाप्त)

Tuesday, August 21, 2007

उर्दू लेखिका क़ुर्रतुल ऐन हैदर नहीं रहीं


उर्दू की विख्यात लेखिका क़ुर्रतुल ऐन हैदर का मंगलवार की सुबह राजधानी दिल्ली के पास एक अस्पताल में निधन हो गया वे 80 वर्ष की थीं।
'आग का दरिया' और 'कारे जहाँ दराज' जैसे उपन्यासों की रचनाकार क़ुर्रतुल 1947 में भारत विभाजन के बाद पाकिस्तान चलीं गई थी, लेकिन वहाँ उनका मन नहीं लगा और वह 1951 तक इंग्लैंड में रहीं. इसके बाद वह भारत लौट आईं।
उनका उपन्यास 'आखिर-ए-शब के हमसफ़र' को एक उर्दू क्लासिक माना जाता है. इसका हिंदी रूपांतर 'निशांत के सहयात्री' था.
क़ुर्रतुल ऐन हैदर का रचना संसार-

कहानी संग्रह

सितारों से आगे
शीशे के घर
पतझड़ की आवाज़
रौशनी की रफ़्तार

उपन्यास

आग का दरिया
सफ़ीन-ए-ग़मे दिल
आख़िरे-शब के हमसफ़र
गरदिशे-रंगे-चमन
मेरे भी सनम-ख़ाने
चार नावेलेट
सीता हरन
दिल रुबा
चाए के बाग़
अगले जन्म मोहे बिटया न कीजियो
चांदनी बेगम

रिपोर्ताज़

कोहे-दमावंद
छुटे असी तो बदला हुआ ज़माना था
गुलगश्ते जहां
ख़िज़्र सोचता है
सितम्बर का चाँद
दकन सा नहीं ठार संसार में
क़ैदख़ाने में तलातुम है कि हिंद आती है