समकालीन जनमत (पत्रिका) के लिए संपर्क करें-समकालीन जनमत,171, कर्नलगंज (स्वराज भवन के सामने), इलाहाबाद-211002, मो. नं.-09451845553 ईमेल का पता: janmatmonthly@gmail.com

Friday, August 22, 2008

सुनता है गुरु ज्ञानी

कबीर के इस निर्गुण ज्यादातर लोग कुमार गंधर्व की आवाज में सुन चुके होंगे। लेकिन नई पीढ़ी के गायक राहुल देश पांडे की आवाज में सुनना भी एक नया अनुभव होगा।

Friday, August 15, 2008

प्रचंड नेपाल के नए प्रधानमंत्री


माओवादी नेता पुष्प कुमार दहल यानी प्रचंड नेपाल के नए प्रधानमंत्री होंगे. शुक्रवार को हुए चुनाव में उन्होंने भारी मतों से जीत हासिल की.
उनका मुक़ाबला तीन बार प्रधानमंत्री रह चुके शेर बहादुर देउबा से था. संविधान सभा में हुए मतदान में उन्हें 577 में से 464 सदस्यों ने मत दिए. जबकि 113 सदस्यों ने उनके ख़िलाफ़ मत दिए.

शेर बहादुर देउबा के नाम पर हुए मतदान के समय संविधान सभा में 551 सदस्य मौजूद थे जिनमें से 113 के ही मत उन्हें मिल पाए. 438 सदस्यों ने उनके ख़िलाफ़ मत डाले.

दरअसल एक-एक करके उम्मीदवारों के नाम संविधान सभा में रखे जाते हैं जिस पर सदस्य मतदान करते हैं. यानी प्रचंड के नाम पर अलग मतदान हुआ और शेर बहादुर देउबा के नाम पर अलग.

फिर यह देखा गया कि किसे ज़्यादा सदस्यों का समर्थन हासिल है. और इसमें बाज़ी मारी माओवादी नेता प्रचंड ने. उम्मीद है कि सोमवार को वे प्रधानमंत्री पद की शपथ लेंगे.

Thursday, August 14, 2008

अधिनायक


राष्ट्रगीत में भला कौन वह
भारत-भाग्य-विधाता है
फटा सुथन्ना पहने जिसका
गुन हरचरना गाता है।
मखमल टमटम बल्लम तुरही
पगड़ी छत्र चंवर के साथ
तोप छुड़ाकर ढोल बजाकर
जय-जय कौन कराता है।
पूरब-पश्चिम से आते हैं
नंगे-बूचे नरकंकाल
सिंहासन पर बैठा,उनके
तमगे कौन लगाता है।
कौन-कौन है वह जन-गण-मन
अधिनायक वह महाबली
डरा हुआ मन बेमन जिसका
बाजा रोज बजाता है।
-रघुवीर सहाय

Wednesday, July 30, 2008

आप सादर आमंत्रित हैं



जन संस्कृति मंच
दिल्ली


‘कविता के युवा तेवर’

युवा कवियों का काव्यपाठ और चर्चा

कविः व्योमेश शुक्ल, मुकुल सरल,विजय कुमार निशांत, सपना चमड़िया, पंकज पराशर, मृत्युजंय प्रभाकर, अच्युतानंद मिश्रा, प्रमोद तिवारी, उमाशंकर चौधरी, सूरज बड़ात्या, रोहित प्रकाश, आकांक्षा पारे, हरिओम और सुधीर सुमन

वक्ताः मैनेजर पाण्डेय,वीरेन डंगवाल, सुदीप बनर्जी, विष्णु नागर, असद जैदी, मंगलेश डबराल, अजय सिंह, प्रणय कृष्ण और आशुतोष

तारीखः शुक्रवार, 1 अगस्त 2008, समयःशाम 5:00 बजे

स्थानः साहित्य अकादमी सभागार, मंडी हाउस, दिल्ली

आप सादर आमंत्रित हैं

संपर्कः भाषा सिंह, संयोजक, दिल्ली इकाई, जसम, मलिक कॉटेज, एफ 6/54,जनता गार्डन,पांडव नगर,दिल्ली-110091,फोन-9818755922

Wednesday, July 9, 2008

सेफगार्ड पर बहस जरूरी

क्या लेफ्ट का यूपीए से अलग होना और समाजवादी पार्टी का समर्थन देना ही आपके लिए खबर है? भारत-अमेरिकी परमाणु समझौते ने कॉरपोरेट और नॉन कॉरपोरेट के बीच की खाईं को और चौड़ा कर दिया है। इसका पहला हिस्सा जोर-शोर से दूसरे हिस्से को मूर्ख साबित करने में जुटा है।
परमाणु उर्जा की जरूरत के लिए किया गया समझौता किस बिंदु पर आकर मजबूरी बन जाएगा यह जानना जरूरी है।
उद्योग जगत और उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व करने वाला हिस्सा इस समझौते को महज ट्रेड बता रहे हैं लेकिन अमेरिकी सरकार के लिए इसका मतलब ट्रेड से बढ़कर है। जुलाई 2005 में 123 समझौते के अमेरिकी कानून से तालमेल बिठाने के लिए हेनरी जे हाईड ने कुछ सुझाव दिया। हाईड एक्ट में साफतौर पर कहा गया है कि भारत अमेरिका समझौते के तहत फास्ट ब्रिडर रिएक्टर के लिए आजीवन ईंधन देने का गारंटी नहीं होगी। हाईड एक्ट भारत अमेरिका परमाणु समझौते के अमेरिकी कानूनी हित को ध्यान में रखकर बना है। इस कानून में समझौते की सीमा तय करते हुए कहा गया है कि भारत को सेंसटिव न्यूक्लियर टेक्नॉलॉजी (SNT) खासकर हैवी वाटर से जुड़ी तकनीक,न्यूक्लियर फ्यूल इनरिचमेंट और उसके रिप्रोसेसिंग पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है।

भारत को इस समझौते पर आगे बढ़ने के लिए पहले परमाणु उर्जा एजेंसी IAEA के पास जाना होगा। 123 एग्रीमेंट यह दावा करता है कि एक "इन्डियन स्पेशिफिक प्यूल सप्लाइ ऐग्रीमेन्ट" पर IAEA के साथ भारत की बात-चीत में यूएस साथ होगा। IAEA उन सेफगार्ड एग्रीमेंट पर अपनी मोहर लगाएगी। फिर यह सेफगार्ड 45 देशों के समूह यानी एनएसजी के पास जाएगा। लेकिन IAEA का तो फ्यूल सप्लाई से कोई लेना देना नहीं है उसको केवल न्यूक्लियर उपकरण और सामग्री के सुरक्षा मानक लागू करने से मतलब है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि भारत के मामले में IAEA सेफगार्ड एग्रीमेंट इंधन सप्लाई की गारंटी किस आधार पर देता है। साथ ही सवाल यह भी है कि जो सेफगार्ड एग्रीमेंट भारत सरकार ने तैयार किया है उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा है?
यूपीए सरकार ने यूपीए-लेफ्ट को-ऑरिड्नेशन कमेटी के सामने IAEA सेफगार्ड के दस्तावेज को प्रस्तुत करने से मना कर दिया है। यूपीए सरकार बिना सेफगार्ड दस्तावेज को सार्वजनिक किए IAEA कैसे जा सकती है। पहले यूपीए लेफ्ट ने नवंबर 2007 में तय किया था कि IAEA जाने से पहले यूपीए लेफ्ट कमेटी के सामने दस्तावेज रखा जाएगा। लेकिन वह अंत तक नहीं पेश किया गया। हमें 1963 के अनुभव से यह सीख लेनी चाहिए जिसमें अमेरिका ने तारापुर एटॉमिक स्टेशन को परमाणु ईधन देने से मना कर दिया था।
इस मामले में भी ऐसी परिस्थिति में IAEA के सेफगार्ड जारी रहेंगे क्योंकि वे संपूर्ण नागरिक परमाणु सेक्टर में लागू होते हैं।
अगर न्यूक्कलियर इंधन की बाहर से आने वाली सप्लाई रोक दी जाय तो हमार पास क्या उपाय होगा? ऐसे हालात में IAEA सेफगार्ड एग्रीमेंट का सार्वजनिक होना और उस पर बहस होना जरूरी है ताकि यह समझा जा सके कि इंडिया के पक्ष में कोई करेक्टिव एक्शन संभव है कि नहीं?


सवाल जिनका जवाब चाहिए-

1-आयातित रिएक्टर्स के लिए यूएस या दूसरी एनएसजी देश अगर फ्यूल सप्लाई का वादा तोड़ते हैं तो क्या सेफगार्ड में इन रिएक्टरों को हटाने का अधिकार होगा ?
2-यूएस /एनएसजी देश ईंधन सप्लाई गारंटी से मुकर जाते हैं तो क्या हम अपने घरेलू नागरिक परमाणु रिएक्टरों को IAEA के सेफगार्ड की शर्त से मुक्त रख सकते हैं ?
3-अगर आयातित रिएक्टरों के लिए ईंधन सप्लाई की गारंटी नहीं पूरी होती हमें अपने न्यूक्लियर प्रोग्राम के नॉन सेफगार्ड पार्ट से ईंधन लाने का अधिकार होगा?
4 अगर यूएस/एनएसजी देशों द्वारा इंधन सप्लाई बाधित कर दी जाय तो भारत कौन से करेक्टिव कदम उठा सकता है।
5- यदि करेक्टिव स्टेप्स को लागू करना है तो वह कौन सी शर्ते हैं जिसे भारत को पूरा करना होगा?

परमाणु उर्जा का अर्थशास्त्र


मई 2008 तक कुल 144,565 मेगावाट उर्जा उत्पादन क्षमता है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह चाहते हैं कि 2020 तक परमाणु ऊर्जा 40,000 मेगावाट क्षमता तक पहुंच जाय। फिलहाल यह 4,120 मेगावाट है जो कि कुल ऊर्जा का महज 2.9 फीसद है। यह कुल 17 रिएक्टर के जरिए मिलता है। देश की कुल उर्जा का 64.6 परसेंट हिस्सा थर्मल पावर से और 53.3 कोल से पैदा होता है। बाकी हिस्सा ज्यादातर गैसे आधारित पावर प्लांट के जरिए पैदा होता है।
11वें योजना आयोग की बैठक में राष्ट्रीय विकास परिषद ने खुलकर कहा कि भारत-अमेरिका परमाणु समझौते से परमाणु ईँधन की समस्या काफी हद तक आसान हो जाएगी। इससे ऊर्जा उत्पादन का एक नया रास्ता खुलेगा। इसमें कहा गया कि अगर समझौता अपने मुकाम तक नहीं पहुंचता है तो इससे परमाणु ईंधन की सप्लाई पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। इस बात के समर्थन में न्यूक्लियर पॉवर कॉरपोरेशन इंडिया लिमिटेड के स्टेशन की क्षमता को सामने लाया गया है। उदाहरण के लिए इस कंपनी के प्लांट स्टेशन की क्षमता 1995-96 में 60 परसेंट रही और 2001-02 में 82 परसेंट थी जबकि 2006-07 में यह घटकर 57 परसेंट पर आ गई। यानी युरेनियम की कमी से इस सरकारी कंपनी की क्षमता दिन ब दिन कम हो रही है।
परमाणु ऊर्जा के लिए सबसे बड़ी चुनौती यूरेनियम की आपूर्ति की है । यूरेनियम की मौजूदा सालाना जरूरत 600-650 टन की है जो कि अगले 15 महीनों में बढ़कर 1200 टन हो जाएगी। जबकि मौजूदा आर्थिक योजनाओं को देखते हुए यह माना जा रहा है कि 2015 तक सालाना करीब 3000 टन यूरेनियम की जरूरत होगी। जो कि सबसे मुश्किल सवाल खड़ा करती है। यूरेनियम की कमी केवल भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया भर में महसूस की जा रही है। पूरी दुनिया में यूरेनियम की सालाना जरूरत करीब 66,000 टन है और उत्पादन महज 45,000 टन का है। लिहाजा परमाणु ऊर्जा से जुड़े कई समझौतों का दौर शुरू हो चुका है। उद्योगपति और परमाणु इंधन बेचने वाले माफिया इस जरूरत से मुनाफा बटोरने की होड़ में हैं।

1960 में जीई कंपनी ने दो हल्के पानी वाले रिएक्टर बनाए जिनकी क्षमता करीब 160-160 मेगावाट थी। 300 मेगावाट के दो इंपोर्टेड और 11 घरेलू प्रेसराइज्ड हैवी वाटर रिएक्टर यानी PHWR । पांच प्रोजेक्ट अभी तैयार हो रहे हैं। इसके अलावा रुस के सहयोग से 2000 मेगावाट क्षमता का एक प्रोजेक्ट कोडानकुलम,तमिलनाडु में बन रहा है।
हमारे यहां अभी तक जितने घरेलू प्रेसराज्ड हैवी वाटर रिएक्टर यानी PHWR प्रोजेक्ट चल रहे हैं उसमें नेचुरल यूरेनियम प्रयोग हो रहा है। लेकिन उसमें से केवल 0.7 परसेंट यूरेनियम 235 का आईसोटोप ही प्रयोग हो पाता है। जबकि आयातित यूरेनियम 235 में आईसोटोप्स 3 से 4 परसेंट तक मिलता हैं। PHWR के जरिए यूरेनियम रिजर्व केवल दस हजार से 12 हजार मेगावाट क्षमता का उत्पादन कर सकता है। PHWR के द्वारा प्रयोग में लाई गई ईंधन से प्राप्त प्लूटोनियम बाईप्रोडक्ट को फास्ट ब्रीडर रिएक्टर में जलाया जा सकता है। फर्टाइल थोरियम (232) भारत में काफी मात्रा में मौजूद है और वह उसे विखंडित होने लायक यूरेनियम (233) में बदल सकता है। जो एक कवर की तरह प्रयोग होता है। कुल मिलाकर फास्ट ब्रिडर रिएक्टर की जरूरत महसूस की जा रही है।


कॉरपोरेट मॉफिया
भारत इस समझौते के मद्देनजर 14 परमाणु प्लांट खोलने की तैयारी कर रहा है। इसके साथ ही दर्जनों विदेशी कंपनियां भारत के परमाणु ऊर्जा व्यापार से जुड़ने की तैयारी में हैं। इसमें दुनिया की सबसे बड़ी परमाणु ऊर्जा बनाने वाली कंपनी अरेवा के साथ जनरल इलेक्ट्रिक, तोशिबा, वेस्टिंग हाउस और रुसी कंपनी रोसातोम भी परमाणु स्टेशन बनाने के ठेके लेने की तैयारी में है। इस ठेके के जरिए न्यूक्लियर पावर कॉरपोरशन ऑफ इंडिया यानी एनपीसीआईएल को क्षमता बढ़ाने में मदद मिलेगी। एनपीसीआईएल की ओर से कहा गया है कि इससे उसकी उत्पादन क्षमता में करीब 11,000 मेगावाट का इजाफा होगा । अगर भारत-अमेरिका परमाणु समझौते होता है तो उसका असर 12वी योजना(2012-17) में सामने आएगा।
विदेशी कंपनियों के साथ कई भारतीय कंपनियां भी इस दिशा में कदम बढ़ाने के लिए तैयार हैं। मौजूदा कानून के मुताबिक केवल 51 परसेंट सरकारी हिस्सेदारी वाली कोई कंपनी ही परमाणु ऊर्जा का उत्पादन कर सकती है। इस वजह से केवल एनपीसीआईएल का ही इस सेक्टर में दबदबा है। 2007 में टाटा पावर की सालाना मीटिंग में टाटा ग्रुप के चेयरमैन रतन टाटा के मुताबिक अगर सरकार निजी कंपनियों के इस क्षेत्र में जाने की इजाजत देती है तो टाटा पावर निश्चित रुप से अपना न्यूक्लियर पावर प्लांट लगाएगा। टाटा के अलावा अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस भी इसमें हाथ आजमाने की योजना बना रही है। इसके अलावा एनर्जी, एस्सार ग्रुप और जीएमआर भी तैयारी में जुटे हुए हैं। ऐसे में क्या समाजवादी पार्टी के समर्थन की वजह पूछना जरूरी है क्या?

Wednesday, July 2, 2008

कौन हैं ये फ्यूचर्स ट्रेडर..


गतांक से आगे...

आखिर गोल्डमैन सैक क्यों कहता है कि तेल की कीमत दिसंबर 08 तक 200 डॉलर /बैरल होंगी? कहीं ऐसा तो नहीं कि दिसंबर में फ्यूचर्स कांट्रैक्ट की मैच्योरिटी डेट पूरी हो रही हों। फ्यूचर्स कांट्रैक्ट में इस तारीख तक डिलिवरी करनी जरूरी होती है। बहरहाल इसकी समीक्षा हम बाद में करेंगे। लेकिन तेल कीमतों को लेकर दुनिया दो हिस्सो में बंट चुकी हैं। कमजोर सरकारें मजबूत सरकारों और कारोबारियों का साथ दे रही हैं। वे बता रही हैं कि मांग काफी बढ़ गई है इसलिए कीमत ज्यादा हो चुकी है। गाड़ियों की मांग कम हुई है अमेरिका जैसे बड़े बाजार में कारों की बिक्री कम हुई है और आर्थिक मंदी से कारोबार कम हुआ है जिससे तेल की मांग में कमी साफ दिख रही है। लेकिन तेल की कीमते लगातार बढ़ रही हैं। आम आदमी को अर्थशास्त्र का पारंपरिक नियम पढ़ाने वालों की हकीकत जानना बहुत जरूरी है।

मौजूदा तेल की कीमतों का पारंपरिक मांग और आपूर्ति से कोई रिश्ता नहीं है। हालांकि मुक्त बाजार के पुरोधा खुद को मासूम और इस तेजी से सताया हुआ बता रहे हैं। सताने वालों में ये पहला नाम ओपेक का ले रहे हैं जो आपूर्ति बढ़ाने से इनकार कर रहा है। दूसरा निशाना भारत और चीन की बढ़ती हुई मांग है। उनके चापलूस एक्सपर्ट रूस और वेनेजुएला में तेल कंपनियों के हुए राष्ट्रीयकरण को भी जिम्मेदार मान रहे हैं। लोगों को बिल्कुल चौंकना नहीं चाहिए जब यूरोपीय यूनियन और अमेरिकी तंत्र अचानक ईरान और ओसामा बिन लादेन को खाड़ी देशों में अस्थिरता फैलाने वाला मानकर इसे बढ़ती तेल कीमतों से जोड़ दे। लेकिन चिल्ला चिल्लाकर खुद को मासूम बताने वाले क्या वाकई कीमतों उछाल के लिए जिम्मेदार नहीं हैं।
तेल की कीमतों को तय करने में न्यूयार्क के नाईमेक्स और लंदन के इंटर कांटिनेंटल एक्सचेंज यानी आईसीई अंतरराष्ट्रीय एक्सचेंज की भूमिका काफी बड़ी है। अब तीसरा एक्सचेंज भी जुड़ गया है वह है दुबई मर्केंटाइल एक्सचेंज यानी डीएमई। नाईमेक्स के प्रेसीडेंड जेम्स न्यूसम इसके बोर्ड में हैं और बाकी कर्ता-धर्ता भी अमेरिकी और यूरोपीय समुदाय के तथाकथित बैंकर्स और फंड्स हैं। दुनिया में तेल की कीमतों का रूख यहीं से तय होता है। यह काम दो किस्म के कच्चे तेल के फ्यूचर कांट्रैक्ट के जरिए होता है एक है वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट और दूसरा नार्थ सी ब्रेंट । फ्यूचर कांट्रैक्ट यानी एक निश्चित समय और कीमत पर तेल मिलने की गारंटी का लालच। । कई महाज्ञानी बैंक और हेज फंड इस धंधे में मुनाफा बटोरते हैं। भविष्य से डराते रहिए और ग्राहक पैदा कररते रहिये। जैसे किसी एयरलाइन को ये लगने लगे कि आने वाले दिनों में तेल की कीमत 200 डॉलर/ बैरल होगी तो वह आज ही 142 डॉलर/बैरल वाला कांट्रैक्ट खरीद लेगी। यह कुछ इस तरह है कि बीमा कंपनी अपने दुर्घटना उत्पाद को बेचने के लिए आवारा किस्म के ड्राइवर्स की फौज तैयार कर ले जो चौराहों पर लोगों को रौदना शुरू कर दे। फिर बिलखते परिवार की याद में आप प्रोडक्ट खरीद ही लेंगे। फ्यूचर ट्रेडिंग में ऐसी सूचनाएं कारोबार के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण होती हैं। कंपनियां एक बड़ा हिस्सा कांट्रैक्ट की बिक्री पर दिए अपने सुझाव को मनवाने में लगी रहती हैं। ऐसे कारोबार की वकालत करने वालों का सबसे बड़ा काम यह होता है कि वह पूरी दुनिया को समझाएं कि कीमतों में उतार चढ़ाव की वजह मांग और आपूर्ति के भीतर छिपा है।


अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में हर दिन के स्पॉट यानी कैश और लांग टर्म कांट्रैक्ट की वैल्यू में ब्रेंट का प्रयोग होता है। यह एक बेंच मार्क की तरह प्रयोग होता है। कीमत का प्रकाशन निजी तेल कंपनी की प्रकाशन संस्था प्लाट के जिम्मे है। रुस और नाइजीरिया जैसे बड़े तेल उत्पादक देश ब्रेंट को बेंच मार्क मानते हैं। कुछ यूरोपीय और एशियाई बाजार भी ऐसा करते हैं।
जहां तक वेस्ट टेक्सॉस इंटरमीडिएट यानी डब्लूटीआई की बात है तो यह ऐतिहासिक रूप से अमेरिकी क्रूड ऑयल का हिस्सा है। अमेरिकी क्रूड ऑयल फ्यूचर्स ट्रेडिंग के साथ-साथ बेचमार्क के रूप में इसका प्रयोग उत्पादन में भी करता है। इस बेंच मार्क के जरिए इंडेक्स ऑर्बिट्रेज यानी सीधे वाल स्ट्रीट मार्केट को मॉनिटर करके बोली लगाई जा सकती है।
ये दोनो बेंच मार्क रियल मार्केट के लिए हैं। सामान्य लोग इस बेंच मार्क के जरिए आपूर्ति और मांग के समीकरण को समझते हैं जबकि गोल्डमैन सैक्स और मॉर्गन स्टैनले जैसे लोग इसके उछलने और गिरने के खेल को फ्यूचर्स कांट्रैक्ट का फ्यूचर देखते हैं। चुनिंदा बैंकर्स हैं जो फ्यूचर्स कांट्रैक्ट के संभावित खरीदार और बेचने वालों के बारे में जानकारी रखते हैं। इस कारोबार में जुटे लोग इसे ‘पेपर ऑयल’ के नाम से जानते हैं। रियल में तेल है या नहीं लेकिन पेपर पर एक निश्चित कीमत पर तेल मिलने की गारंटी का कारोबार चलता रहता है। ‘पेपर ऑयल’ का कारोबार कुल काराबार के 90 परसेंट तक पहुंच जाता है। कारोबार के नियामकों में थोड़े बहुत अंतर के आधार पर कांट्रैक्ट और ऑप्सन जैसी शब्दावलियां आती हैं लेकिन इस पूरे कारोबार को अगर हम उनके ही शब्दों में डेरिवेटिव यानी वायदा से भी समझ सकते हैं।
ऊपर हमने जिन तीन बड़े एक्सचेंज की बात की है वो ओपेक जैसी संस्थाओं से कीमत का कोई मशविरा नहीं लेती हैं और सीधे वॉल स्ट्रीट से रिश्ता बना लेती हैं। जून 2006 में अमेरिकी सिनेट में पर्मानेंट सब कमेटी की रिपोर्ट "The Role of Market Speculation in rising oil and gas prices" आई जिसमें कहा गया कि "... there is substantial evidence supporting the conclusion that the large amount of speculation in the current market has significantly increased prices". यह साफतौर पर जाहिर था कि सरकार जानबूझकर डेरिवेटिव कारोबार के लिए कोई नियामक नहीं बना रही थी।
जारी.....

Sunday, June 29, 2008

कौन हैं ये फ्यूचर ट्रेडर?


वित्तीय अर्थव्यवस्था के नुमाइंदे तब तक संकट नहीं मानते जब तक शेयर ब्रोकर छतो से छलांग न लगाना शुरू कर दें। अर्थशास्त्री ड्यूजनबरी जब बताते हैं कि हम इनकम बढ़ने पर जिस तेजी से उपभोग करना शुरू करते हैं उतनी तेजी से अगर इनकम घटती है तो उपभोग को पुराने स्तर पर नहीं ला पाते। यह कमजोरी ही वित्तीय अर्थशास्त्र की ताकत है। छुटभैये निवेशकों से लेकर हेज फंड मालिकों और सरकारों तक को वित्तीय संकट की बात अभी भी नहीं पच रही है। वे नहीं मानेत कि दुनिया के आर्थिक विकास में 1970 से ही लगातार दशकीय ग्रोथ कम होता गया है। हालांकि आंकड़े लगातर बयान कर रहे हैं कि 70 के दशक का ग्रोथ रेट 60 से कम है और 80 का 90 से कम है। यह सिलसिला थमा नहीं है और 2000 सबसे कम ग्रोथ रेट वाला रहा है। यह दौर रहा है जब रियल इकोनॉमी वित्तीय सट्टेबाजी वाली अर्थव्यवस्था में बदल रही थी। सट्टेबाजी नीति अपने को बचाने में हर कोने को झासा दे रही है। फ्यूचर ट्रेडिंग इसका सीधा सबूत है। महंगाई अन्न की वजह से है या फिर कच्चे तेल से यह सरकारें समय समय पर तय करती रही हैं लेकिन दोनों में फ्यूचर ट्रेडिंग के सटोरिए कैसे व्यवहार करते हैं यह जानना काफी दिलचस्प है। इसमें सबसे पहले हम कच्चे तेल की कीमतों में घुसे सटोरियों की पड़ताल करेंगे। हम उनके कारोबार के तौर तरीके जानेंगे और देखेंगे कि आखिर 13 साल की महंगाई का रिकॉर्ड की पूंछ किनके पैरों के तले दबी है।
तेल संकट या सबप्राइम नुकसान की भरपाई
यह सवाल शायद आपके सामने पहली बार आ रहा होगा कि आखिर सबप्राइम संकट में मार खाए बैंकर्स अब कच्चे तेल के फ्यूचर ट्रेडिंग से कितना मुनाफा बटोरना चाहते हैं। क्या यह मुनाफा सबप्राइम घाटे को पूरा कर पाएगा।
सबसे पहले हम मौजूदा तेल बाजार में फ्यूचर कारोबारियों की भूमिका पर नजर डालेंगे। कच्चे तेल की कीमत 138 डॉलर प्रति बैरल पर है तो उसका 60 परसेंट हिस्सा अनरेगुलेटेड फ्यूचुर्स स्पेकुलेशन का है। यानी उस हिस्से पर अधिकार फ्यूचर ट्रेडर्स का है। ट्रेडर्स यह हिस्सेदारी लंदन के आईसीई फ्यूचर्स और न्यूयार्क के नाइमेक्स के अलावा अनरेगुलेटेड इंटर बैंक या ओवर काउंटर ट्रेडिंग एजेंसिया खरीद रहे हैं। अमेरिकी मार्जिन रूल के तहत सरकारी फ्यूचर ट्रेडिंग कॉरपोरेशन सट्टेबाजों को नाईमेक्स पर कांट्रैक्ट के महज 6 परसेंट कीमत पर सौदा करने की इजाजत देता है। अगर आज कीमत 138 डॉलर प्रति बैरल है तो सट्टेबाज महज 9 डॉलर प्रति बैरल कीमत चुकाकर फ्यूचर्स ट्रेडिंग कर सकते हैं। बाकी 129 डॉलर वह उधारी के रूप में ही कारोबार करेगा। कीमतों में 17 गुना की कम जोखिम पर मिलने वाली रियायत कच्चे तेल के खुले बाजार में कीमतों को बढ़ाने की सबसे खास वजह है।


अब देखिए कि इस सट्टेबाजी के किरदार कौन लोग हैं। इसके सरताजों में शामिल हैं गोल्डमैन सैक्स, मार्गन स्टेनले, ब्रिटिश पेट्रोलियम, फ्रेंच बैंकिंग समूह Société Générale,बैंक ऑफ अमेरिका और स्विस बैंक मर्क्यूरिया। इनमें से ज्यादातर संस्थाएं प्रत्यछ या परोक्ष रूप से सबप्राइम में भारी घाटा उठा चुकी हैं।
लंदन स्थित इंटरनेशनल पेट्रोलियम एक्सचेंज का नियंत्रण ब्रिटिश पेट्रोलियम के हाथो में है। यह एनर्जी फ्यूचर एंड ऑप्शन कारोबार कारोबार का सबसे बड़ा एक्सचेंज है। जिसे आईपीई के नाम से लोग जानते हैं। थोड़ा इस कंपनी के भीतर चलते हैं। इस कंपनी के मुख्य शेयरधारक गोल्डमैन सैक्स और मार्गन स्टैनले है। आखिर फ्रेंच अखबार ले मोंडे की प्रतियां क्यों चंद मिनटों में साफ हो गई जिसमें उन संस्थाओं के नाम थे जो तेल की कीमतों के बारे में अफवाह फैलाने के लिए मुंह मांगी रकम दे रही थे। उन संस्थाओं में शामिल था फ्रांस का Société Générale, बैंक ऑफ अमेरिका, ड्यूश बैंक पूरी तरह शामिल थे। (देखें-Miguel Angel Blanco, La Clave, Madrid, June 2008)
जारी...

Wednesday, May 14, 2008

जसम की ओर से साहित्यकार अमरकांत जी को सहयोग


जन संस्कृति मंच के प्रदेश अध्यक्ष डॉ0 राजेन्द्र कुमार और महासचिव प्रणय कृष्ण के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल अमरकांत जी से मिला और उन्हें 50,000 का चेक प्रदान किया। प्रतिनिधिमंडल में वरिष्ठ मानवाधिकार कार्यकर्ता चितरंजन सिंह, हिंदी विभाग (इ0वि0वि0) में प्राध्यापक सूर्यनारायण, भौतिकी विभाग (इ0वि0वि0) के प्राध्यापक विवेक तिवारी समेत अन्य लोग भी शामिल थे।
इस मौके पर अमरकांत जी ने कहा कि जसम जैसे संगठन यह जिम्मेदारी निभा रहे हैं यह बेहद खुशी की बात है। लेखकों को संगठनबद्ध होकर अपने अधिकारों के लिए आगे आना होगा। उन्होंने कहा कि हिंदी का पाठक समुदाय अभी अपने लेखकों के लिए सद्भावनापूर्ण व्यवहार रखता है।
जसम के प्रदेश अध्यक्ष डॉ0 राजेन्द्र कुमार ने कहा कि साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में कार्यरत निष्ठावानों और उनके शुभैषियों को अपने संगठित प्रयासों पर ही भरोसा करना होगा। जसम ने इसी उद्देश्य से अपनी `सांस्कृतिक संकुल´ योजना के तहत अपने सदस्यों-साथियों के आपसी सहयोग से स्थायी कोष बनाया है। साहित्यकारों-संस्कृतिकर्मियों को संकट में यथेष्ट राशि देने की इसी योजना के तहत अमरकांत जी को यह राशि दी गयी है। जसम ऐसे संस्कृतिकर्मियों को भविष्य में भी इस कोष से सहायता देगा जिससे वे अपनी जनता की आशाओं-आकांक्षाओं और असंतोषों को अपनी रचना के माध्यम से चििन्हत करने व उनके संघर्षों को बल देने के अपने कार्य में आर्थिक बाधा न महसूस करें। उन्होंने बताया कि `सांस्कृतिक संकुल´ की इसी योजना के तहत बिना सरकारी सहायता के जन-आधारित स्वतंत्र रंगमंडल और प्रकाशन गृह भी शुरू किया जाएगा।
महासचिव जसम, प्रणयकृष्ण ने कहा कि अमरकांत जी जैसे महान साहित्यशिल्पी की यातना और यंत्रणा हम लोगों से इतने दिनों तक छुपी रही, हमारे लिए यह अफसोस की बात है। ये उनके स्वाभिमान का परिचायक भी है। उन्होंने कहा कि अमरकांत जी की रचनाएं जहां-जहां पाठ्यक्रमों में शामिल हैं, वहां से और प्रकाशकों से उनकी पूरी रॉयल्टी मिलनी चाहिए। सरकारी खरीद की सूचियों में उनके संग्रह अनिवार्यता से शामिल किए जाए। उन्होंने कहा कि इसके अलावा जन संस्कृति मंच अमरकांत जी के पुत्र द्वारा प्रकाशित उनकी कृतियों के प्रचार-प्रसार की व्यवस्था एक अभियान के तौर पर अपने हाथ में लेगा।

अमरकांत
व्यक्तिगत जीवन - अमरकान्त का जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नगारा गाँव में हुआ। बलिया में पढ़ते समय ही उनका सम्पर्क स्वतन्त्रता आंदोलन के सेनानियों से हुआ। सन् १९४२ में वे स्वतन्त्रता-आंदोलन से जुड़ गए।

हिन्दी साहित्य - इनका साहित्य जीवन एक पत्रकार के रूप में हुआ। उन्होंने कई पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन किया। कहानीकार के रूप में अमरकान्त की ख्याति सन् १९५५ में 'डिप्टी कलेक्टरी' कहानी से हुई। उनकी कहानियों में मध्यवर्गीय जीवन का अत्यंत मार्मिक और मनोवैज्ञानिक चित्रण मिलता है।

कहानी-संग्रह - जिन्दगी और जोंक , देश के लोग, मौत का नगर , कुहासा

उपन्यास - सूखा पत्ता, काले उजले दिन, सुख जीवी, बीच की दीवार हिन्दी लेखक