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Wednesday, July 9, 2008

सेफगार्ड पर बहस जरूरी

क्या लेफ्ट का यूपीए से अलग होना और समाजवादी पार्टी का समर्थन देना ही आपके लिए खबर है? भारत-अमेरिकी परमाणु समझौते ने कॉरपोरेट और नॉन कॉरपोरेट के बीच की खाईं को और चौड़ा कर दिया है। इसका पहला हिस्सा जोर-शोर से दूसरे हिस्से को मूर्ख साबित करने में जुटा है।
परमाणु उर्जा की जरूरत के लिए किया गया समझौता किस बिंदु पर आकर मजबूरी बन जाएगा यह जानना जरूरी है।
उद्योग जगत और उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व करने वाला हिस्सा इस समझौते को महज ट्रेड बता रहे हैं लेकिन अमेरिकी सरकार के लिए इसका मतलब ट्रेड से बढ़कर है। जुलाई 2005 में 123 समझौते के अमेरिकी कानून से तालमेल बिठाने के लिए हेनरी जे हाईड ने कुछ सुझाव दिया। हाईड एक्ट में साफतौर पर कहा गया है कि भारत अमेरिका समझौते के तहत फास्ट ब्रिडर रिएक्टर के लिए आजीवन ईंधन देने का गारंटी नहीं होगी। हाईड एक्ट भारत अमेरिका परमाणु समझौते के अमेरिकी कानूनी हित को ध्यान में रखकर बना है। इस कानून में समझौते की सीमा तय करते हुए कहा गया है कि भारत को सेंसटिव न्यूक्लियर टेक्नॉलॉजी (SNT) खासकर हैवी वाटर से जुड़ी तकनीक,न्यूक्लियर फ्यूल इनरिचमेंट और उसके रिप्रोसेसिंग पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है।

भारत को इस समझौते पर आगे बढ़ने के लिए पहले परमाणु उर्जा एजेंसी IAEA के पास जाना होगा। 123 एग्रीमेंट यह दावा करता है कि एक "इन्डियन स्पेशिफिक प्यूल सप्लाइ ऐग्रीमेन्ट" पर IAEA के साथ भारत की बात-चीत में यूएस साथ होगा। IAEA उन सेफगार्ड एग्रीमेंट पर अपनी मोहर लगाएगी। फिर यह सेफगार्ड 45 देशों के समूह यानी एनएसजी के पास जाएगा। लेकिन IAEA का तो फ्यूल सप्लाई से कोई लेना देना नहीं है उसको केवल न्यूक्लियर उपकरण और सामग्री के सुरक्षा मानक लागू करने से मतलब है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि भारत के मामले में IAEA सेफगार्ड एग्रीमेंट इंधन सप्लाई की गारंटी किस आधार पर देता है। साथ ही सवाल यह भी है कि जो सेफगार्ड एग्रीमेंट भारत सरकार ने तैयार किया है उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा है?
यूपीए सरकार ने यूपीए-लेफ्ट को-ऑरिड्नेशन कमेटी के सामने IAEA सेफगार्ड के दस्तावेज को प्रस्तुत करने से मना कर दिया है। यूपीए सरकार बिना सेफगार्ड दस्तावेज को सार्वजनिक किए IAEA कैसे जा सकती है। पहले यूपीए लेफ्ट ने नवंबर 2007 में तय किया था कि IAEA जाने से पहले यूपीए लेफ्ट कमेटी के सामने दस्तावेज रखा जाएगा। लेकिन वह अंत तक नहीं पेश किया गया। हमें 1963 के अनुभव से यह सीख लेनी चाहिए जिसमें अमेरिका ने तारापुर एटॉमिक स्टेशन को परमाणु ईधन देने से मना कर दिया था।
इस मामले में भी ऐसी परिस्थिति में IAEA के सेफगार्ड जारी रहेंगे क्योंकि वे संपूर्ण नागरिक परमाणु सेक्टर में लागू होते हैं।
अगर न्यूक्कलियर इंधन की बाहर से आने वाली सप्लाई रोक दी जाय तो हमार पास क्या उपाय होगा? ऐसे हालात में IAEA सेफगार्ड एग्रीमेंट का सार्वजनिक होना और उस पर बहस होना जरूरी है ताकि यह समझा जा सके कि इंडिया के पक्ष में कोई करेक्टिव एक्शन संभव है कि नहीं?


सवाल जिनका जवाब चाहिए-

1-आयातित रिएक्टर्स के लिए यूएस या दूसरी एनएसजी देश अगर फ्यूल सप्लाई का वादा तोड़ते हैं तो क्या सेफगार्ड में इन रिएक्टरों को हटाने का अधिकार होगा ?
2-यूएस /एनएसजी देश ईंधन सप्लाई गारंटी से मुकर जाते हैं तो क्या हम अपने घरेलू नागरिक परमाणु रिएक्टरों को IAEA के सेफगार्ड की शर्त से मुक्त रख सकते हैं ?
3-अगर आयातित रिएक्टरों के लिए ईंधन सप्लाई की गारंटी नहीं पूरी होती हमें अपने न्यूक्लियर प्रोग्राम के नॉन सेफगार्ड पार्ट से ईंधन लाने का अधिकार होगा?
4 अगर यूएस/एनएसजी देशों द्वारा इंधन सप्लाई बाधित कर दी जाय तो भारत कौन से करेक्टिव कदम उठा सकता है।
5- यदि करेक्टिव स्टेप्स को लागू करना है तो वह कौन सी शर्ते हैं जिसे भारत को पूरा करना होगा?

परमाणु उर्जा का अर्थशास्त्र


मई 2008 तक कुल 144,565 मेगावाट उर्जा उत्पादन क्षमता है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह चाहते हैं कि 2020 तक परमाणु ऊर्जा 40,000 मेगावाट क्षमता तक पहुंच जाय। फिलहाल यह 4,120 मेगावाट है जो कि कुल ऊर्जा का महज 2.9 फीसद है। यह कुल 17 रिएक्टर के जरिए मिलता है। देश की कुल उर्जा का 64.6 परसेंट हिस्सा थर्मल पावर से और 53.3 कोल से पैदा होता है। बाकी हिस्सा ज्यादातर गैसे आधारित पावर प्लांट के जरिए पैदा होता है।
11वें योजना आयोग की बैठक में राष्ट्रीय विकास परिषद ने खुलकर कहा कि भारत-अमेरिका परमाणु समझौते से परमाणु ईँधन की समस्या काफी हद तक आसान हो जाएगी। इससे ऊर्जा उत्पादन का एक नया रास्ता खुलेगा। इसमें कहा गया कि अगर समझौता अपने मुकाम तक नहीं पहुंचता है तो इससे परमाणु ईंधन की सप्लाई पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। इस बात के समर्थन में न्यूक्लियर पॉवर कॉरपोरेशन इंडिया लिमिटेड के स्टेशन की क्षमता को सामने लाया गया है। उदाहरण के लिए इस कंपनी के प्लांट स्टेशन की क्षमता 1995-96 में 60 परसेंट रही और 2001-02 में 82 परसेंट थी जबकि 2006-07 में यह घटकर 57 परसेंट पर आ गई। यानी युरेनियम की कमी से इस सरकारी कंपनी की क्षमता दिन ब दिन कम हो रही है।
परमाणु ऊर्जा के लिए सबसे बड़ी चुनौती यूरेनियम की आपूर्ति की है । यूरेनियम की मौजूदा सालाना जरूरत 600-650 टन की है जो कि अगले 15 महीनों में बढ़कर 1200 टन हो जाएगी। जबकि मौजूदा आर्थिक योजनाओं को देखते हुए यह माना जा रहा है कि 2015 तक सालाना करीब 3000 टन यूरेनियम की जरूरत होगी। जो कि सबसे मुश्किल सवाल खड़ा करती है। यूरेनियम की कमी केवल भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया भर में महसूस की जा रही है। पूरी दुनिया में यूरेनियम की सालाना जरूरत करीब 66,000 टन है और उत्पादन महज 45,000 टन का है। लिहाजा परमाणु ऊर्जा से जुड़े कई समझौतों का दौर शुरू हो चुका है। उद्योगपति और परमाणु इंधन बेचने वाले माफिया इस जरूरत से मुनाफा बटोरने की होड़ में हैं।

1960 में जीई कंपनी ने दो हल्के पानी वाले रिएक्टर बनाए जिनकी क्षमता करीब 160-160 मेगावाट थी। 300 मेगावाट के दो इंपोर्टेड और 11 घरेलू प्रेसराइज्ड हैवी वाटर रिएक्टर यानी PHWR । पांच प्रोजेक्ट अभी तैयार हो रहे हैं। इसके अलावा रुस के सहयोग से 2000 मेगावाट क्षमता का एक प्रोजेक्ट कोडानकुलम,तमिलनाडु में बन रहा है।
हमारे यहां अभी तक जितने घरेलू प्रेसराज्ड हैवी वाटर रिएक्टर यानी PHWR प्रोजेक्ट चल रहे हैं उसमें नेचुरल यूरेनियम प्रयोग हो रहा है। लेकिन उसमें से केवल 0.7 परसेंट यूरेनियम 235 का आईसोटोप ही प्रयोग हो पाता है। जबकि आयातित यूरेनियम 235 में आईसोटोप्स 3 से 4 परसेंट तक मिलता हैं। PHWR के जरिए यूरेनियम रिजर्व केवल दस हजार से 12 हजार मेगावाट क्षमता का उत्पादन कर सकता है। PHWR के द्वारा प्रयोग में लाई गई ईंधन से प्राप्त प्लूटोनियम बाईप्रोडक्ट को फास्ट ब्रीडर रिएक्टर में जलाया जा सकता है। फर्टाइल थोरियम (232) भारत में काफी मात्रा में मौजूद है और वह उसे विखंडित होने लायक यूरेनियम (233) में बदल सकता है। जो एक कवर की तरह प्रयोग होता है। कुल मिलाकर फास्ट ब्रिडर रिएक्टर की जरूरत महसूस की जा रही है।


कॉरपोरेट मॉफिया
भारत इस समझौते के मद्देनजर 14 परमाणु प्लांट खोलने की तैयारी कर रहा है। इसके साथ ही दर्जनों विदेशी कंपनियां भारत के परमाणु ऊर्जा व्यापार से जुड़ने की तैयारी में हैं। इसमें दुनिया की सबसे बड़ी परमाणु ऊर्जा बनाने वाली कंपनी अरेवा के साथ जनरल इलेक्ट्रिक, तोशिबा, वेस्टिंग हाउस और रुसी कंपनी रोसातोम भी परमाणु स्टेशन बनाने के ठेके लेने की तैयारी में है। इस ठेके के जरिए न्यूक्लियर पावर कॉरपोरशन ऑफ इंडिया यानी एनपीसीआईएल को क्षमता बढ़ाने में मदद मिलेगी। एनपीसीआईएल की ओर से कहा गया है कि इससे उसकी उत्पादन क्षमता में करीब 11,000 मेगावाट का इजाफा होगा । अगर भारत-अमेरिका परमाणु समझौते होता है तो उसका असर 12वी योजना(2012-17) में सामने आएगा।
विदेशी कंपनियों के साथ कई भारतीय कंपनियां भी इस दिशा में कदम बढ़ाने के लिए तैयार हैं। मौजूदा कानून के मुताबिक केवल 51 परसेंट सरकारी हिस्सेदारी वाली कोई कंपनी ही परमाणु ऊर्जा का उत्पादन कर सकती है। इस वजह से केवल एनपीसीआईएल का ही इस सेक्टर में दबदबा है। 2007 में टाटा पावर की सालाना मीटिंग में टाटा ग्रुप के चेयरमैन रतन टाटा के मुताबिक अगर सरकार निजी कंपनियों के इस क्षेत्र में जाने की इजाजत देती है तो टाटा पावर निश्चित रुप से अपना न्यूक्लियर पावर प्लांट लगाएगा। टाटा के अलावा अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस भी इसमें हाथ आजमाने की योजना बना रही है। इसके अलावा एनर्जी, एस्सार ग्रुप और जीएमआर भी तैयारी में जुटे हुए हैं। ऐसे में क्या समाजवादी पार्टी के समर्थन की वजह पूछना जरूरी है क्या?

5 comments:

पागलपंथी said...

यार तुम लोग हमेशा अमेरिकी विरोध की राजनीति करते रहते हो. तुम्हारे पास ना तो सेफ़गार्ड एग्रीमेंट के पूरे कागज़ात हैं और ना ही १२३ समझौते पर सरकार ने तुम्हें कुछ दिखाया-समझाया है. खामाखां लोगों को डरा-डराकर भयादोहन की राजनीतिक बिसात बिछाते घूमते-फिरते हो.
इतनी बड़ी-बड़ी बातें करने के बाद भी तुम्हें जनता का विश्वास हासिल नहीं होता. इससे भी बड़ा सवाल यह है कि हमारे राष्ट्राध्यक्ष इतने चूतिये हैं कि वो सारा फ़ायदा अमेरिका को उठाने देंगे. बिना परमाणु अप्रसार संधि साइन किए हमें कुछ फ़ायदा हो भी रहा है तो बुरा क्या है?
मुझे याद आता है कि १९९१ में भी तुम लोगों ने डंकल पर खूब डराया और भरमाया था. अब तुम्ही लोग उन सारे साधनों-माध्यमों का इस्तेमाल कर रहे हो जिनके बारे तुम बुराई किया करते थे. देश को बेचकर खा जाने तक का डर हमें तुमने दिखाया था. क्या हुआ इन पंद्रह सालों में? आखिर तुम्हारे कम्युनिस्ट देशों ने भी डब्ल्यूटीओ साइन किया है.
मुझे तो कभी कभी लगता है कि रूस और चीन में तुम्हारे जैसे लोगों को वहां की सरकारें सांस लेने नहीं देतीं. भला मानो कि हिन्दुस्तान में गंध फैलाने पर भी मौज कर रहे हो एनजीओ बना-बनाकर.
जिस विनायक सेन की तुम बातें कर रहे हो.. मैं व्यक्तिगत रूप से उन्हें जानता हूं. वो खुले तौर पर नक्सलियों का साथी है. बुद्धिजीवी होने से आप हिंसा को तर्कसंगत नहीं ठहरा सकते. अलक़ायदा जैसे संगठन अगर हिंसा के लिए धर्म का सहारा ले रहे हैं तो तुम जैसे लोग किताबों का जिनके सिद्घांत और विचार आज की दुनिया में अव्यवहारिक साबित हो चुके हैं. यक़ीन मानों.. मनमोहन सरकार देश को नहीं बेचेगी.. भरोसा कर सकते हो तो कर लो.. नहीं कर सकते तो भी कुछ होना-जाना नहीं है तुमसे. झोला टांगकर कब तक लोगों को उल्लू बनाकर राजनीतिक रोटियां सेंकते रहोगे.
वही रूस जिसके खिलाफ़ कभी अमेरिका ने अलक़ायदा को खड़ा किया था आज रूस के साथ गलबहियां करता है.. रूस-चीन-पाकिस्तान जैसे मुल्को़ में तु्म्हें लोकतंत्र दिखाई देता है..सारी पोलपट्टी जानते हो फिर भी तुम बाज़ नहीं आते.. सोचो यार.. कब तक उलूकनिद्रा मे व्यस्त रहोगे. आशंकाओं और भय के बाहर आओ.
दुनिया गोल है और दोस्त-दुश्मन राजनीतिक और सामरिक समीकरणों के हिसाब से बदलते रहते हैं. तुम हो कि रूस-चीन का दामन पकड़े बैठे हो.
अच्छा एक बात बताओ यार.. इस्लामी चरमपंथ पर कुछ लिखो.. ज़रा देखें कि तुम्हें उनकी राजनीति में कुछ बुरा नज़र आता है या नहीं?
इस वक़्त दुनिया को अमेरिका से नहीं बल्कि इस्लामी चरमपंथ से बचाने के लिए जुगत लगानी होगी.
मुझे गंगा-जमनी तहज़ीब से कोई कोफ़्त नहीं बल्कि तुम्हारे सामने एक सवाल करना चाहता हूं.
नेपाल एक हिन्दू राष्ट्र था.. खुशी की बात यह है कि वह राष्ट्र अब सेकुलर बनने की राह पर आ गया है और हिन्दू राष्ट्र का लबादा उसने उतार फेंका. क्या किसी मुस्लिम राष्ट्र में ऐसा होने की उम्मीद तुम्हें दिखाई देती है?
चलो मैं बहुत कह लिया.. तुम इतना बड़ा बड़ा लिखते हो तो क्या मेरा छोटा सा नहीं पढ़ोगे.. आगे और लिखेंगे.

विजय वर्मा said...

आप यकीन से कैसे कह सकते हैं पागलपंथी जी कि राष्ट्राध्यक्ष आपकी तरह नहीं होंगे। वैसे आपके लिखे से लग रहा है कि बाल नोंच नोंचकर टकले हो गए होंगें आप। वही नब्बे के दशक वाली खिसियाहट। वो भी इतनी की तुम्हारे नाखुन अपने ही मगज के संवेदनशील हिस्से पर टकराने लगे हो और यादास्त खत्म हो गई है। पूरी दुनिया करवट ले रही है कोई चिकना किनारा पकड़कर कट लो।
पागल जी आपने तुर्की का नाम सुना होगा। वहां धर्म निरपेक्षता की लड़ाई पर नजर डालिए। यार बोकरात करने की तुम्हारी अदा बहुत पुरानी है। सोवियत, चीन से आगे बढ़कर कुच सोचो। चलो तुम्हे आज पता तो चला कि दुनिया गोल है। वैसे लग रहा है कि गोले में घुमते घुमते तुम चकरा गए हो...

Raju Neera said...

पागलपंथी जी की बातें एेसी हैं मानाे dाेइ नर्सरी में पढ़ रहे लड़के ने देष के बारे में िचंता जािहर की हाे। उनकी सामानय समझ पर तरस अाता है।

Raju Neera said...

पागलपंथी जी की बातें एेसी हैं मानाे dाेइ नर्सरी में पढ़ रहे लड़के ने देष के बारे में िचंता जािहर की हाे। उनकी सामानय समझ पर तरस अाता है।

धीरज चौरसिया said...

लेकिन मुझे लगता है कही ना कही पागलपंथी जी के बातो मे सच्चाई है, प्रकृति का दोहन तो मनुष्य शुरु से ही करता आया है और रही बात ईस परमाणु डील की तो ये सारे डील आज से २० साल पहले चाईना और रुस कर चुके है और ईसी के तहत वो आस्ट्रेलीया से युरेनीयम लेते है, और ये जो परमाणु अर्थशास्त्र की बात करी है तो मुझे लगता है कि ये पुरी तरह से पुर्वाग्रह ग्रसित है आप एक बार फिर से बिना अपने वामपन्थी विचारो के चश्मा पहने बिना सोचे....