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Monday, January 28, 2008

सट्टेबाजी को बढ़ावा देते केंद्रीय बैंक


दीपू राय
स्पेकुलेशन यानी सट्टेबाजी आर्थिक विकास की शर्त है। यह तर्क किसी अर्थशास्त्री का नहीं है बल्कि देश के वित्तीय चाल चलन को गवर्न करने वाले केंद्रीय बैंकों का है। दुनिया के केंद्रीय बैंक अब इस तर्क की उंगली थामकर अपनी नीतियां तय कर रहे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक कोई अलग नहीं है। पूंजी बाजार, वित्तीय बाजार का हिस्सा है । लेकिन केंद्रीय बैंकों की रणनीति अब किसी भी तरह इस पूंजी बाजार को ही लेकर चलने की है। हर बार मुंह की खाने के बाद स्टॉक मार्केट को ये उम्मीद होती है कि केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में कटौती करके उसे उबार लेगा। यानी कहा जाय तो पूंजी बाजार यानी कैपिटल मार्केट को सहारा देने के लिए केंद्रीय बैंक वित्तीय बाजार की वास्तविक जरूरतों को भी नजरंदाज कर सकते हैं। लेकिन इस नुस्खे का खामियाजा अमेरिकी अर्थव्यवस्था अब उठा रही है। फेड बैंक की प्रयोगधर्मिता ही अब उसे डुबोने लगी है। वहां अब संकट खुद वित्तीय बाजार को अपने चपेट में ले चुका है। किसी ब्याज कटौती से स्टॉक मार्केट संभाले नहीं संभल रहा है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या भारत में ब्याज कटौती की यह कृत्रिम नीति कारगर होगी? लेकिन रिजर्व बैंक या आखिर कोई भी केंद्रीय बैंक मुद्रा स्फीति या नौकरियों की छंटनी जैसे मुद्दों को पूंजी बाजार की सट्टेबाजी के लिए क्यों ताक पर रख देता है। जाहिर इसे समझने के लिए देश के केंद्रीय बैंक के सलाहकार बोर्ड पर नजर डालना होगा। यह केवल कुछ चुनिंदा व्यक्तियों की बात नहीं है बल्कि केंद्रीय बैंकों पर यह आरोप लगने लगा है कि वे अर्थव्यवस्था के आम चाल चलन को ताक पर रखकर स्पेकुलेशन को बढ़ावा देते हैं। सट्टा बाजार वस्तुओं के पीछे मुनाफा नहीं देखता बल्कि उनके आगे-आगे मुनाफे का खेल खेलता है। ऐसे में दोनों के बीच की दूरी बाकी सांधनों के असंतुलन से बिगड़ जाती है। जिससे लगता है कि बाजार बाउंस बैक हो रहा है लेकिन केवल पूंजी बाजार ही बाउंस बैक होता है। एक तरह से अर्थव्यवस्था को निश्चित अंतराल के बाद काफी तेज झटका झेलना होता है। लेकिन थोड़े समय बाद आने वाले ये झटके अर्थव्यवस्था को खोखला बना देते हैं।
दुनिया का आर्थिक इतिहास साफ दिखाता है कि पिछले दो दशक से बड़ी मंदी और ब्याज दरों में कटौती केंद्रीय बैंकों का आसान नुस्खा बन गया है। पहले गुपचुप तरीके से सहायता करने वाला लेकिन अब यह नुस्खा परोक्ष रुप से सट्टेबाजी को प्रोत्साहित कर रहा है। अचानक तरलता की मांग उठाने वाले लोग आखिर कितने प्यासे हैं इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। ये ठीक उस बच्चे की तरह जिद है कि आखिर सरकार नोट छापकर गरीबी क्यों नहीं दूर कर देती। ब्याज दर में कटौती की मांग अर्थव्यवस्था के ऐसे हिस्से के जरिए की जा रही है जिसे तत्काल मुनाफा बटोरना है। लेकिन सवाल तो यह है कि क्या केंद्रीय बैंक की भूमिका बड़े आर्थिक उद्देश्यों को दरकिनार करते हुए केवल सट्टेबाजी को प्रश्रय देना भर रह गया है?

अमेरिकी अर्थव्यवस्था फिर से एक भीषण संकट का सामना कर रही है। यह संकट हाउसिंग मार्केट से शुरू हुआ है जो आज तकरीबन हर सेक्टर को अपनी चपेट में ले लिया है। लेकिन इस संकट ने फेडरल बैंक की नीतियों को भी सवालों के घेरे में डाल दिया है। ब्याज कटौती जैसे प्रयोग के अगुवा रहे फेडरल बैंक के भूतपूर्व चेयरमैन एलन ग्रीन स्पान अपनी किताब द एज ऑफ टर्बूलेंस:एडवेंचर्स इन न्यू वर्ल्ड में मौजूदा संकट का जिक्र करते हुए कहते हैं कि यह विपरित परिस्थितियों वाला वक्त है और काफी दुखदायी है लेकिन इस संकट को तो आना ही था। खासतौर से तब जब हम ऐसे उपाय चुनते हैं जिसमें लोगों को ज्यादा से ज्यादा जोखिम उठाने की आजादी दी जाय तो इस तरह के संकट को कोई टाल नहीं सकता। 1929 में स्टॉक मार्केट के संकट और 1930 की महामंदी ने उस समय के आर्थिक नीतियों को विवाद के घेरे में डाल दिया। कुछ दशक बाद यह तर्क फिर मजबूती पकड़ा कि सट्टेबाजी अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद है। लेकिन 1960 की आर्थिक मंदी और 1970 में स्टॉक मार्केट की गिरावट ने सट्टेबाजी और उससे पैदा होने वाले आर्थिक मुश्किलों के बीच संबंध चिन्हित किए जाने लगे। कुछ लोगों ने इस संकट की वजह अरब जगत के प्रतिबंधों और तेल संकट से जोड़कर देखा।
एक दूसरे बूम के बाद 19 अक्टूबर 1987 को अमेरिका का शेयर बाजार 23 परसेंट की दर से औंधे मूंह गिरा। जिसे आर्थिक जगत 1929 की मंदी से जोड़कर चर्चा करने लगा। लेकिन बाजार ने फिर से पहले जैसी तेजी पकड़ी। तेजी के इस सिलसिले को 2000-2002 के इंटरनेट और टेक्नोलॉजी सेक्टर की तबाही ने तोड़ दिया। ग्रीन स्पान के लिए हर तीन साल के बाद आने वाला यह संकट संभावी था।
1987 से लेकर 2006 तक ग्रीन स्पान का कार्यकाल था और हर बड़े संकट के बाद उन्होने फेड रेट में कटौती की। केंद्रीय बैंक ने वित्तीय संस्थानों को कड़ा रुख अपनाने की जगह बाजार में ज्यादा तरलता लाने को बाध्य किया। जिससे सट्टेबाजी की प्रक्रिया ढीली न पड़े।
आज इतिहास एक बार फिर दोहरा रहा है। फेड ने रेट कम तो किए हैं । लेकिन अब यह सट्टेबाजी में भी जान नहीं डाल पा रहा है। क्योंकि अब संकट खुद लोन देने वाली वित्तीय संस्थाओं पर है। इन संस्थाओं को नवंबर 2007 में 20 अरब डॉलर के चपत का अंदाजा लगाया जा चुका है। बैंकों के अरबों डॉलर के घाटे की सूचना अभी भी लगतार मिल रही है। ज्यादातर बैंक ऐसे कर्ज देकर फंस चुके हैं जिनकी वापसी संभव नहीं है।
भारत स्थितियां ऊपर से भले देखने में अलग लगती है लेकिन वित्तीय कंपनियों की हालत बहुत अच्छी नहीं है। जमकर कर्ज बांटने की होड़ का असर तत्काल नहीं दिख रहा है लेकिन अमेरिकी अनुभवों से सबक लिया जाय तो 2008 के अंत तक वित्तीय संस्थान को गहरे संकट से जूझना पड़ सकता है।
रिजर्व बैंक के लिए कुछ दिनों पहले तक रियल एस्टेट और बाकी सेक्टर में इस संकट के लक्षण मिले थे। लेकिन पूंजी बाजार की लॉबी काफी मजबूती से काम की और केंद्रीय बैंक को थोड़ी नरमी दिखानी पड़ी। रिजर्व बैंक पिछले साल बढ़ते कर्ज से बैंको को आगाह किया था। केंद्रीय बैंक ने कर्ज देने वाली संस्थाओं का ब्यौरा दिखाते हुए कहा कि अक्टूबर 2006 में रिटेल और सेवा क्षेत्र के लिए सालाना उधारी की दर करीब 33.4 परसेंट रही। जिसमें कि रिटेल सेक्टर के भीतर हाउसिंग लोन की ग्रोथ रेट करीब 32.3 परसेंट है। जबकि कमर्शियल प्रॉपर्टी में 83.9 परसेंट का रिकॉर्ड तोड़ ग्रोथ रेट दर्ज किया गया है। इस तर्क के सहारे आरबीआई ने रियल एस्टेट के लिए जरूरी जोखिम धारिता को 1 परसेंट से बढ़ाकर 2 परसेंट कर दिया गया। फिलहाल क्रेडिट ग्रोथ रेट पर नजर डाली जाय तो यह नवंबर 2007 के मुकाबले 30 परसेंट से घटकर 20 परसेंट रह गया है।

बाजार में तरलता की मांग पूंजी बाजार को भले ही राहत देती हो लेकिन बड़े स्तर पर इसके भयानक परिणाम निकलते हैं। तात्कालिक तौर पर तो हम वस्तु बाजार में जरूरी चीजों की कीमतों को बढ़ते हुए देखते है। लेकिन लंबे समय के बाद यहां खरीदार ढूंढना मुश्किल हो जाता है क्योंकि लोगों की इनकम इस कदर नहीं रहती की इन्हे वो खरीद सकें। आसान लोन देकर अर्थव्यवस्था चलाना समझदारी नहीं है। क्योंकि इस तरीके को अपनाकर आप उसे चुकाने की ताकत को कमजोर कर रहे होते हैं। इसका सीधा संबंध बैंकों के दिवालिएपन की ओर ले जाता है। अर्थव्यवस्था की ताकत सट्टेबाजी से तय नहीं होती इसे केंद्रीय बैंक को समझना होगा। इस लिहाज से भारतीय रिजर्व बैंक को उन समष्टिगत कारणों पर गौर करते हुए फैसला लेना चाहिए। हालांकि इसकी बहुत कम उम्मीद है। ब्याज दरों को बढ़ाने की वकालत करने वाले लोग काफी मजबूत हैं । ऐसे लोगों ने मनोवैज्ञानिक साधनों को प्रभावित करने वाले प्रचार माध्यों का का सहारा लेते हुए आम लोगों में ब्याज दर की कटौती को जरूरी बना दिया है। लेकिन लोगों को नहीं पता कि वे शुरुआती कालीदास की भूमिका में है।

1 comment:

हर्षवर्धन said...

दीपू, बढ़िया शोध किया है। वैसे, पूरा बाजार ही सट्टा है। इसमें किसी तरह का संदेह कैसे हो सकता है।