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Monday, September 3, 2007

हरिप्रसाद चौरसिया का पॉवर एंड ग्रेस-1



गिरिजेश ने इस साप्ताहिक कॉलम में कुछ बदलाव किया गया है। अब एल्बम के संगीत की समीक्षा के साथ रागों के बारे में पॉपुलर तरीके से जानकारी देंगे। हरिप्रसाद चौरसिया का पॉवर एंड ग्रेस पार्ट 1 की समीक्षा कुछ इसी नजरिए से की गई है। जिसमें हम राग दुर्गा के साथ मालकौंस तक से आपको रूबरू कराएंगे । हमारी इस पहल पर अपनी प्रतिक्रिया जरूर दें।

कलाकार - पं हरिप्रसाद चौरसिया
लेबल- टाइम्स म्यूजिक

कीमत- 295 रु


किशोरी अमोनकर का गाया 'गीत गाया पत्थरों ने' याद कीजिए। अब लता-मुकेश का 'चंदा रे मोरी पतिया ले जा ' गुनगुनाकर देखिए। कुछ कॉमन लगता है? आपको महूसस होगा कि दोनों के सुर काफी मिलते-जुलते हैं। दरअसल ये दोनों गाने एक ही राग पर आधारित है। राग है - दुर्गा । भक्ति रस से भरा शाम का खूबसूरत राग है। सोचिए कि जिन सुरों का चंचल सा इस्तेमाल करके इतने मधुर गीत बने हैं वो सुर , वो राग जब अपनी गति में, अपने पूरे विस्तार के साथ सामने आएगा तो कैसा दिखेगा। सीडी की शुरुआत में पं हरिप्रसाद चौरसिया कहते हैं कि वो सुबह की आराधना के तौर पर राग दुर्गा ही बजाते हैं। मैहर घराने के हरिप्रसाद चौरसिया सिद्ध संगीतकार हैं। हाथ भर की बांसुरी की देह में जब उनसी फूंक प्रवेश करती है तो नन्हीं सी , बेजान बांसुरी गाने लगती है। कोई मीठा सा राग, कोई आंचलिक धुन आस-पास भर जाती है। पक्के सुरों और सधे हुए विस्तार से आस- पास की कैफ़ियत बदल जाती है। आंखें मुंद जाती हैं। आप राग-रागिनी के बारे में कुछ भी नहीं जानते तो भी सुनते हुए आपको लगता है - इसमें कुछ है , इसी को संगीत कहते होंगे।

ये सीडी 2001 में अहमदाबाद में हुए सप्तक म्यूजिक फेस्टिवल की रिकॉर्डिंग है। इंट्रोडक्शन के बाद पहला ट्रैक है राग दुर्गा। सबसे पहले शांत, ठहरा सा आलाप शुरू होता है। मंद्र के सुरों से सा पर आना। उसके बाद सा रे , सा ध़ के बीच खेलना। अच्छा संगीतकार आपको ललचाता है। हरि जी, जिस फोर्स से षड़ज से ऋषभ पर पहुंचते हैं उसके बाद आपको लगता है कि अब मध्यम की बारी है। लेकिन वो धीरे से सुरों की सीढ़ियां बनाते लौट आते हैं। फिर से सा , ध़, सा, रे..। उसके बाद रे-रे लगाते हुए मध्यम को छूकर लौट आना। राग में पांच ही सुर हैं - सा रे म प ध सां, अब इन्हीं के साथ खेलना है। इसलिए, धीरे-धीरे..।

अलबम के तकरीबन सत्रहवें सेंकेंड में जोड़ शुरू होता है। ध्रुपद शैली में। और यहां शामिल होते हैं कम दिखनेवाले, अति विलक्षण वाद्य पखावज के साधक पंडित भवानी शंकर। भवानी शंकर ऐसे घराने से आते हैं जो पखावज पर कथक के साथ संगत करने के लिए मशहूर था। बहरहाल , पखावज का पावर और बांसुरी का ग्रेस एक साथ निखरने लगते हैं। सुर के साज़ पर सुर के साथ ताल दिखने लगता है, ताल के साज़ पर ताल के साथ सुर। ताल के इर्द गिर्द बांसुरी और पखावज एक दूसरे से अठखेलियां करते हैं। दो महान संगीतकारों का ये समन्वय सुनने लायक है। तालियों की गड़गड़ाहट के साथ ट्रैक खत्म होता है।

अगला ट्रैक है राग मालकौंस। बहुत पॉपुलर राग है। शांत रस का राग है। गाने -बजाने का समय है आधी रात। आधा है चंद्रमा रात आधी, अंखियन संग अंखियां लागी आज , आए सुर के पंछी आए, मन तड़पत हरि दर्शन को आज - सब इसी राग पर बने हैं। तकरीबन तीन मिनट का आलाप। आलाप में हरि जी के सुर थोड़े उखड़े उखड़े से लग रहे हैं। शायद पिछले राग की द्रुत बजाने की थकान है । बहरहाल .. झपताल यानी 10 बीट्स में रचना शुरू होती है। तबले पर हैं फर्रुखाबाद घराने के बेहतरीन तबला वादक ऑनिंदो चटर्जी। तबले और बांसुरी की ये एक आम जुगलबंदी है। बहुत चमत्कार देखने को नहीं मिलता। बाइसवें मिनट में तबले पर लयकारी दिखती है। दस मात्रा की झपताल की लय बनाए रखते हुए आठ मात्रा और सोलह मात्रा की लयकारी। ये वो वक्त है से जब मुख्य कलाकार संगतकार को इशारा करता है - ले उड़ो। अनिंदो ने यहां अच्छी सी तिहाई ली है। अट्ठइसवें मिनट पर तबले को एक बार फिर मौका मिलता है। बांसुरी लय दे रही है- तबला मुख्य स्थान ले लेता है। तकरीबन एक मिनट तक उंगलियों की सफाई दिखाते हुए ऑनिंदो चटर्जी यहां भी एक सधी हुई तिहाई लेकर सम पर लौटते हैं। इसके बाद आखिरी के दो मिनट ध्यान खींचनेवाले हैं।

कुल मिलाकर, दुर्गा सुनने के लिए आप ये सीडी ले सकते हैं, लेकिन मालकौंस सूनने के लिए पचासों मिलेंगे।

गिरिजेश.

1 comment:

vimal verma said...

भाई बहुत बेहतर लगा.. लगे रहिये