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Sunday, February 14, 2010

फै़ज़ को क्यों और कैसे पढें


(मशहूर शायर फैज अहमद फैज की पैदाइश 13 फरवरी 1911 को सियालकोट में हुई। 2010 उनकी जन्मशती का साल है। एक मौका है जिसमें हम फैज के बारे और ज्यादा जानने की कोशिश कर सकते हैं। उनके विचारों को मौजूदा समय के साथ जोड़कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की जा सकती है। हमारी कोशिश होगी कि फैज से संबंधित ज्यादा से ज्यादा सामग्री आपतक पहुंचाई जाय। इसकी शुरुआत हम जन संस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण के लेख से कर रहे हैं।)

साहित्य की दुनिया में हमारे उपमहाद्वीप के लिए फै़ज़ का वही महत्व है जो लैटिन अमरीका के लिए नेरुदा का। ये इस कारण नहीं कि ये दोनों एक साथ राजनीतिक और अदबी शख्सियत थे, उनकी विचारधारा एक थी, बल्कि इसलिए कि दोनों ही अपने-अपने महाद्वीप/उपमहाद्वीप की सभ्यतागत भावसंरचना की विशिष्टता को सर्वाधिक संप्रेषित कर सके। आज़ादी के बाद के भारत में उर्दू भाषा को राजनैतिक-ऐतिहासिक कारणों से भारी नुकसान उठाना पड़ा जिसके चलते फारसी लिपि जानने वालों की संख्या कम होती गई। बावजूद इसके मुशायरों के प्रचलन से शायरी की मक़बूलियत बनी रही। धीरे-धीरे देवनागरी लिपि में सीमापार रहने वाले बड़े शायरों के लिप्यांतरण भी हिन्दी पाठकों तक पहुंचने लगे। लेकिऩ फै़ज का कलाम सर्वाधिक मौसीक़ी के जरिए-बेगम अख्तर से लेकर इकबाल बानों, नैयारा नूर, मेंहदी हसन और ज़िया मोहिउद्दीन की आवाज़ों में हम तक पहुंचा। न जाने कितनी ज़बानों में तर्जुमा होकर फ़ैज़ का कलाम पूरी दुनिया में पहुंचा। शायद हमारे उपमहाद्वीप के किसी कवि-शायर की आवाज़ पूरी दुनिया में इतने बड़े पैमाने पर नहीं फैली, जितनी कि फै़ज़ की आवाज़-किसी सूचना और संचार क्रान्ति के ज़रिए नहीं, बल्कि एक दर्द के रिश्ते के ज़रिए जिसे दुनिया के कई उपमहाद्वीपों, कई कौमों, कई देशों और ज्यादातर सताए हुए, वंचित लोग महसूस करते हैं। फै़ज़ की शायरी और उस शायरी के बारे में जो कुछ भी फारसी लिपि में मौजूद है, (लिपि न जानने के चलते) उससे महरूम रहते हुए बहुत से लोगों के लिए देवनागरी में फै़ज़ को जानने के सिवा कोई चारा नहीं है। कुछ लोग आज भी कहते हैं कि उर्दू अगर देवनागरी में लिखी जाए तो उम्रदराज़ होगी। ऐसे लोगों को सिर्फ इतना याद रखना चाहिए कि ज़बानें खत्म हो जाया करती हैं, लेकिन लिपि ज़िन्दा रहती है। लिपि किसी ज़बान की पहचान है, उसका चेहरा-मोहरा है, उसका संचित इतिहास है। किसी भाषा से उसकी लिपि छीनी नहीं जा सकती। फै़ज़ साहब की शायरी बयान नहीं है, वो अपने पाठकों और श्रोताओं में पहले से मौजूद कुछ जज्बातों, सपनों, यादों और रिश्तों को जगा देती है। फ़ैज़ की काव्यभाषा मन्त्रों की तरह जन समुदाय की भावनाओं और अनुभवों का आवाहन करती है, भूले हुए एहसासों को जगाती है, दिल में गहरे दफन संवेदनाओं को पुकारती है और उन्हें एक ऐसी काव्यात्मक संरचना प्रदान करती है कि लोगों को उसमें अपने जीवन का मायने-मतलब और मूल्य समझ में आता है। उनकी पूरी शायरी अवाम के साथ एक ऐसा संवाद है जो अवाम की चेतना के दबा दिए गए हिस्सों से रूबरू है। कोई भी फै़ज़ का पैसिव श्रोता नहीं हो सकता। उन्हें सुनने वाली अवाम, उन्हें पढ़ने वाला पाठक उनकी शायरी में मानी, अर्थ भरता है। ये वो चीज़ है जो फै़ज़ की शायरी के अवामी और जम्हूरी चरित्र को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण है। उनकी शायरी एक चुम्बक है जिससे खिंचकर न जाने कितने अनुभव जुड़ जाते हैं। जो बात पैदा होती है, वह है एक ऐसी शायरी जो हमें आमन्त्रित करती है कि हम सब उसमें अपने अनुभव मिला दें।
फै़ज़ का पाठक या श्रोता यह एहसास किए बगैर नहीं रह सकता कि वो उनकी शायरी में शामिल है। फ़ैज़ इंकलाब के प्रचारक नहीं हैं। वे तो अवाम में उसके प्रति ललक, हासिल न हो पाने की मायूसी और अन्तहीन उम्मीद के शायर हैं। वे इन भावनाओं का जनता की तरफ से बयान नहीं करते, बल्कि शब्दों के जरिए जनता के भावयन्त्र को छेड़ देते हैं।
भारतीय ढंग की फारसी शायरी की सारी ही परंपरा को उन्होंने जज्ब कर लिया और साथ ही साथ जनपदीय बोलियों का रंग लिए कई सुन्दर गीत लिखे। माज़ी के महान शायरों को उन्हीं के रंग में याद किया। सौदा, ग़ालिब, अमीर खुसरो, इकबाल या फिर अपने हमअसरों को भी, चाहें वो मखदूम मोहिउद्दीन हो या सज्जाद जहीर। फ़ैज़ जिस देश में पैदा हुए वह एक ही था जो उनके जीवित रहते ही तीन हिस्सों में बंटा। एजाज अहमद ने एक जगह लिखा है कि हमारा राष्ट्रवाद शोकाकुल या गमज़दा राष्ट्रवाद है। एक से तीन हुए हमारे राष्ट्रों का यही प्रामाणिक राष्ट्रवाद है और उसके सबसे बड़े शायर निस्सन्देह फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ हैं। फ़ैज़ की शायरी बहुत जगह राष्ट्रगान या प्रार्थना जैसी सामूहिक अभिव्यक्तियां हैं, उन्हें लिखा भले ही किसी एक आदमी ने हो। फ़ैज़ साहब की एक खास नज्म तो प्रार्थना, राष्ट्रगान और प्रतिरोध की भी नज्म एक साथ है। ये अलग बात है कि ये राष्ट्रगान शासकों की कथित इस्लामिक राष्ट्रवाद की अत्याचार के खिलाफ आम जनता से एक राष्ट्र के बतौर उठ खडे होने का आह्वान भी है। सन् 67 में पाकिस्तान के स्वाधीनता दिवस पर लिखी इस नज्म की कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं-
आइए हाथ उठाएं हम भी
हम जिन्हें रस्मे-दुआ याद नहीं
हम जिन्हें सोज़े-मोहब्बत के सिवा
कोई बुत कोई खुदा याद नहीं
आइये, अर्ज गुज़ारें कि निगारे-हस्ती
ज़हरे-इमरोज़ में शीरीनी-ए-फर्दा भर दे
( निगारे-हस्ती- जीवन का सौन्दर्य, ज़हरे-इमरोज़- वर्तमान का विष, शीरीनी-ए-फर्दा- भविष्य की मिठास)
कहते हैं कि हर बड़ा शायर समझे जाने के लिए एक अलग काव्यशास्त्र की मांग करता है। रुमानियत का काव्यशास्त्र फ़ैज़ को समझने के लिए नाकाफी है। यों रुमानियत के साथ भी आजादी, खुदमुख्तारी और इंसाफ का तसत्वुर जुड़ा हुआ है। डॉ0 रामविलास शर्मा ने तो शेली में मार्क्स से पहले ही मुकम्मल समाजवाद का अक्स देख लिया। लेकिन फ़ैज़ की शायरी रुमानियत के बतौर इंकलाब, एहतेजाज़, इंसाफ की तहरीर के रूप में नहीं पढ़ी जा सकती। वे रुमानी शायर नहीं थे। इस बात को समझने के लिए 18वीं सदी की उर्दू गजल के काव्यशास्त्र में जाना होगा। इस शायरी में आंशिक ज़रूरी तौर पर शायर खुद नहीं होता था। इसी तरह माशूक़ ज़रूरी नहीं कि कोई हकीकत में ज़िन्दा इंसान हो। यह आशिक और माशूक का रिवायती इश्क था जिसकी मार्फत ज़िन्दगी की तमाम पेचीदगियां उजागर की जाती थीं। ग़ज़ल कोई लिरिक या प्रगीत नहीं था जिसमें शायर अपनी व्यक्तिगत भावनाओं और अनुभवों को एक रचनात्मक दबाव के तहत बयान करता था। रुमानी गीत में शायर की अपनी भावनाओं का दबाव ही ज्यादा होता है और इस तरह के कलाम को पाठक या श्रोता के साथ संवाद बनाने का कोई दबाव नहीं होता। यहां इस तरह की शायरी का काव्यशास्त्र बताने वाले इतना तो ठीक कहते हैं कि ग़ज़ल के आशिक और माशूक को ग़ज़ल कहने वाले की ज़ाती ज़िन्दगी में खोजने की कोशिश बेकार है। लेकिन जब वे इस पूरे काव्यशास्त्र को यथार्थवाद के खिलाफ खड़ा कर देते है, तो वे गलत कह रहे होते हैं। दरअसल, आशिक और माशूक के सम्बंधों की मार्फत दर्द-वियोग-मिलन, कुछ मूल्यवान खो जाने का एहसास, असहायता, समर्पण, शौक और इश्क की जिन भावनाओं को व्यक्त किया जाता है, वे किन्ही सामाजिक सच्चाइयों के दबाव में पैदा होती हैं। ये एक पूरी भाव-संरचना है जो रवायत में ढल जाती है और अलग-अलग परिस्थितियों में अपना अलग-अलग मानी पैदा करती है। फ़ैज़ ने शायरी के इस ढांचे को, उसकी रवायत की पूरी ताकत को अपने देश-समय और समाज के गम्भीर सवालों को संबोधित करने के लिए इस्तेमाल किया है। बात महज इतनी नहीं है कि उनके लिए माशूक कभी देश है या कभी क्रान्ति। महत्वपूर्ण ये है कि वे उदासी, बेबसी, तकलीफ, असफलता, इन्तजार, उम्मीद और निराशा की बेहद गहरी जिन भावनाओं को व्यक्त करते हैं, वे सब इतिहास और समाज ने एक पूरे उपमहाद्वीप में पैदा कर दी थी। फ़ैज़ की शायरी एक खास देश-काल में पैदा हुई भाव-संरचनाओं को व्यक्त करती है। शायरी का उपरी भावनात्मक ढ़ांचा रिवायती लग सकता है। लेकिन उसकी पूरी बुनावट उसे खास देश-काल में रख देती है।

फ़ैज़ की शायरी पाठ्यपुस्तकों में विर्णत काव्य के पारंपरिक वर्गीकरण-क्लासिकीय, रोमांटिक या आधुनिक में कहीं भी पूरी तरह अंट नहीं पाती। शायद इस कारण भी हिन्दी-उर्दू के पुराने कलावादी स्कूल के उत्तरआधुुनिक संस्करण ने एक आधी-अधूरी उत्तरसंरचनावादी पाठ पद्धति की आजमाइश फ़ैज़ की शायरी पर की है। उर्दू के एक प्रसिद्ध नक्काद गोपीचन्द नारंग साहब का लेख `फै़ज़ को कैसे न पढ़ें´ इसी का उदाहरण है। यह लेख हिन्दी पत्रिका कसौटी के 5वे अंक में छपा। फै़ज़ की शायरी
के बाबत इस लेख में नारंग साहब ने लिखा है - ``प्रसिद्धि में अनेकानेक प्रक्रियाओं का समावेश होता है, जैसे व्यक्तित्व की जादूगरी, जीवनगत परिस्थितियां (मुख्यत: यदि उनमें कारावास या ऐसी कोई प्रक्रिया शामिल हो,)सामाजिक स्थिति, किसी खेमे या धारणा से सम्बंध, संगीतज्ञों का गायन आदि। लेकिन जब इतिहास का ज़ालिम हाथ दूरी उत्पन्न करता है, तो कतिपय बरसातों के बाद सब दाग-धब्बे धुल जाते हैं और बाकी रहती है रचना के पाठ की बेदाग हरियाली की बहार और यही वह सरजमीन है, जिसकी यात्रा फै़ज़ के सच्चे चाहनेवालों ने कम की है।´´(पृष्ठ 49)
नारंग ने अल्थ्यूसर, मार्ले पोंटी और रोला बार्थ के कुछ पाठीय उपकरणों/सिद्धान्तों को जोड़-जाड़ कर फ़ैज़ के पाठ की एक ऐसी वैकल्पिक पद्धति का प्रस्ताव किया है जिसमें पंक्तियों/ शब्दों के बीच की जगह/अन्तराल और ख़ामोशियों के माध्यम से उनकी शायरी के गहरे, अचेतन, सौन्दर्यात्मक अर्थों की अनेक पर्तों को खंगालने की सलाह दी गई है, जो कि उनके अनुसार सामने की वैचारिक सतह के नीचे दब गई है। नारंग का अभिप्राय यह है कि इस पाठ पद्धति के जरिए अर्थ के दबे हुए संस्तर शायर के क्रान्तिकारी उद्देश्यों की बाहरी सतह को तोड़कर उभर आते हैं। नारंग को दु:ख है कि उर्दू आलोचना की मुख्यधारा फ़ैज़ की शायरी के सतही राजनैतिक-वैचारिक पाठ से आगे नहीं जाती। नारंग साहब की सुझाई पद्धति की मेरिट पर विचार करने का अवकाश इस लेख में नहीं है। उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है यह जानना कि क्यों वे इस पद्धति की वकालत फै़ज़ के पाठ के लिए कर रहे हैं. इससे वे हासिल क्या करना चाहते हैं। नारंग सौन्दर्यशास्त्र को मार्क्सवाद के, अर्थ को विचारधारा के मुखालिफ़ खड़ा करते हैं। बावजूद इसके उन्हें भी फ़ैज़ की शायरी की बहुस्तरीयता के बीच में एक स्तर उपनिवेश-विरोधी राजनीति का मानना ही पड़ता है। इसका कारण शायद यह है कि उत्तरसंरचनावादी ढब की उत्तरऔपनिवेशिकता भी पूरी तरह से `सौन्दर्यीकृत´ नहीं की जा सकती। उसमें राजनीति का दखल न चाहते हुए भी मानना ही पड़ता है। फ़ैज़ के पाठ की जिस पद्धति का सुझाव नारंग देते हैं वह फ़ैज़ की शायरी के अर्थ को नज़रअन्दाज करने का ही प्रस्ताव है। फ़ैज़ की शायरी वैचारिक-राजनीतिक सतह
के नीचे दबे हुए सौन्दर्यात्मक और आनन्दपूर्ण आशयों को खोद कर निकालने की चीज नहीं है जिसका कि पाठ के स्तर पर ही आस्वाद सम्भव हो क्योंकि इस शायरी की रचना प्रक्रिया और काव्यशास्त्र ही अलग है। उनके पाठक या श्रोताओं को कोई मुगालता नहीं रहता जब वे उनकी तमामतर ग़ज़लों में देश विभाजन की राजनैतिक विभीषिका से उत्पन्न मानवीय त्रासदी के अक्स उत्कीर्ण पाते हैं, जबकि ग़ज़ल पारंपरिक प्रेम कविता की विधा समझी जाती है। जब बेगम अख्तर की सन्नाटे को चीरती हुई ग़मज़दा और तड़पती हुई आवाज़ में हम सुनते हैं- ``आखीर-ए-शब के हमसफर फ़ैज़ न जाने क्या हुए/ किस जगह रुक गई सबा, सुबहो किधर निकल गई´´, तो यह हमें या इस उपमहाद्वीप के किसी व्यक्ति को महज़ `रोमांटिक एगोनी´ का स्वर नहीं लगेगा। हम इन पंक्तियों में उन दोस्तों, आत्मीयों के खो जाने की अनुगूंज सुनते हैं जबकि रात का अन्त और सुबह होने को थी, लेकिन जो सुबह किसी अज्ञात दिशा की ओर मुड़ गई थी और सुबह की खुशनुमा हवा बहनी बन्द हो गई थी। ये तमाम बिम्ब उस भीषण क्षति और उस जनता की अकथ वेदना के बिम्ब हैं जिसने अपने दुलारों को खोया था, जिसने बहुप्रतीक्षित आज़ादी की ठण्डी हवा को महसूस ही नहीं किया, जिसे अपने हालात पर छोड़ भविष्य की भोर आगे बढ़ गई और जिसके लिए `नियति से साक्षात्कार´ शुद्ध यन्त्रणा के अलावा कुछ नहीं था। यही वह ज़ख्म था जो फ़ैज़ की शायरी के सभी रूपों और विषयों में सतत प्रवाहित है, उनके कवि जीवन के अन्त तक। फ़ैज़ की शायरी महज़ दु:ख की यादों और खो गई दुनिया को ही नहीं उभारती बल्कि वह चाक किए हुए दिलों और रूहों को दिलासा देने, उन्हें दु:ख से ऊपर उठाने का दायित्व भी निभाती है-
शाम-ए-फिराक़ अब न पूछ आई और आ के टल गई
दिल था के: फिर बहल गया, जां थी के: फिर संभल गई

देश विभाजन की राजनैतिक विभीषिका को काव्य में दर्ज करने की शुरुआत `सुब्ह-ए-आज़ादी: अगस्त 1947´ शीर्षक नज्म से हुई थी। मशहूर मार्क्सवादी इक़बाल अहमद के शब्दों में ``फ़ैज़ ने अद्भुत पूर्वानुमान के साथ स्वतन्त्र हुए उपनिवेशों की उत्तरऔपनिवेशिक राजसत्ताओं के प्रति मोहभंग के मूड को पकड़ लिया था।
(जारी)

4 comments:

Suman said...

आइए हाथ उठाएं हम भी
हम जिन्हें रस्मे-दुआ याद नहीं
हम जिन्हें सोज़े-मोहब्बत के सिवा
कोई बुत कोई खुदा याद नहीं
आइये, अर्ज गुज़ारें कि निगारे-हस्ती.nice

गिरिजेश राव said...

पढ़ रहे हैं। चलाते रहिए।
पैरा वगैरह में लिखिए न। पाठक को सुभीता रहता है।

रवि कुमार, रावतभाटा said...

फ़ैज़ पर उम्दा आलेख...

मनीषा पांडे said...

बहुत अच्‍छा आलेख है। दादा को पढ़ना हमेशा ही enrich करने वाला होता है।

ये Word Verification वाला ऑप्‍शन हटा दीजिए। टिप्‍पणी करने में थोड़ी जहमत उठानी पड़ती है।