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Monday, March 10, 2008

शर्म करो धनपशुओँ

रविवार को भारतीय हाकी टीम ओलंपिक से बाहर हो गई है। क्वालिफायर मुक़ाबले में भारतीय टीम ब्रिटेन की टीम से 0-2 से हार गई है। यह पिछले 80 साल में पहली बार ऐसा हुआ है कि भारतीय टीम ओलंपिक क्वालिफायर से ही बाहर हो गई है।
किसी देश के विकास का एक पैमाना खेल भी होता है। क्योंकि इसमें राज्यों की भूमिका साफतौर पर रंग लाती है। लेकिन क्या ये महज हाकी के खिलाड़ियों की दुर्गति कही जाएगी या हमारी खेल नीति की कमी मानी जाय?
दो से तीन देशों के बीच हुई प्रतियोंगिता को विश्वकप मानते हुए प्रसार माध्यम और खेल मंत्रालय पागलों की तरह तीन दिन बाजा बजाते रहे। मैच के लाइव प्रसारण के बावजूद पूरा दिन सर पीटते रहे। अपने समय में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाला खिलाड़ी उनका गेस्ट हो जाता है और शुरू हो जाता अजीबोगरिब सांख्यकी का प्रयोग।
हाकी की हार महज खेल नीति पर सवाल नहीं खड़ा करता। यह उस परिवेश की दिशा और दशा दोनों बताता है जिसमें क्रिकेट के अलावा सारे खेल दम तोड़ देंगे।

Sunday, March 9, 2008

पश्चिम रच रहा है नया होलोकॉस्ट




'sohah'को हिब्रु में होलोकॉस्ट कहते हैं। फिलिस्तिनियों को इजरायली रक्षा मंत्री इसी बात से डरा रहे हैं। 29 फरवरी को आर्मी रेडियो पर प्रसारित अपनी घोषणा में उन्होने कहा है कि गाजापट्टी से रॉकेटों से लगातार हमले हो रहे हैं जिसके मद्देनजर गाजा के लोगों को नए होलोकॉस्ट के लिए तैयार रहना होगा। इसके बाद 4 और 5 मार्च को अमेरिकी विदेश मंत्री कोडेलिजा राइस इजराइल की यात्रा पर थीं। उनकी यात्रा तथाकथित पीस प्रोसेस में गर्मी लाने के लिए थी। उसी वक्त इजरायली सैनिक ऑपरेशन पिन प्वाइंट के जरिए गाजा पट्टी के खान यूनूस में बंदूके ताने घुम रहे थे। इस दौरान तीन साल की अमिरा अबू असर को गोलियों से उड़ाते हुए इन सैनिकों ने 27 फरवरी से शुरू हुए हमले में 27 बच्चों को मारने का रिकॉर्ड कायम किया। इस इजारयली हमले में कुल 125 फिलिस्तीनी मारे गए जिसमें ज्यादातर नागरिक थे।
सबसे खतरनाक बात है इन हत्याओं की खबरों पर रोक लगाना। Electronic Intifada website पर छपी एक रिपोर्ट मे कहा गया है कि एपी जैसी न्यूज संस्थाओं ने बच्चों की हत्या से जुड़ी 85 परसेंट खबरों को लोगों तक पहुंचने नहीं दिया है। हालांकि ऐसे आपराधिक दिमाग हिंदुस्तान के मीडिया के साथ-साथ ब्लॉग की दुनिया में भी हैं। जो यह तर्क दे रहे हैं कि देश में ही इतनी समस्याएँ हैं तो गाजा के बारे में क्या सोचना! यह एक वैचारिक नस्ल है जो हर धरती पर मौजूद होती है। यहं संस्कृतनुमा हिंदी और अमेरिकीनुमा अंग्रेजी बोलती है। हमारी आप से अपील है कि इन हत्याओं की खबर को ज्यादा से ज्यादा लोगो तक पहुंचाई जाय और फिलिस्तीन के संघर्ष को खुलकर समर्थन दिया जाय।

Friday, March 7, 2008

रसेल कोरी की याद में....

महिला दिवस ऐतिहासिक स्वरूप से आजादी और सच्चे लोकतंत्र की ओर उठाए गए कदमों महत्वपूर्ण कड़ी है। लेकिन जितना इसके नजदीक जाने के ढोल पिटते रहे यह उतना ही अपने मूल उद्देश्य से पीछे हटती गई। हमें याद रखना चाहिए कि हमें आजादी किसी सरकार से नहीं बल्कि लड़कर हासिल करने से मिली है। यदि हम अपनी आजादियों का इस्तेमाल नहीं करते, समय-समय पर उनको नहीं आजमाते तो वे हमसे वापस ले ली जाएंगी। यदि हमने अधिकतम आजादी की मांग नहीं की तो हमारे पास यह न्यूनतम रह जाएगी। पूरी दुनिया में आज आजादी की सुरक्षा के नाम पर आजादी के पंख कतरे जा रहे हैं। अभी भी दुनिया का बड़ा हिस्सा अपने वजूद को लेकर संघर्षरत है। आजादी की चाह रखने वाले दुनिया को भी आजाद देखना चाहते हैं और रसेल कोरी उनमें से एक थी। समकालीन जनमत ने जब महिला दिवस को रसेल कोरी के बहाने याद करने निर्णय लिया तो कई बार ये सवाल उठा कि रसेल कोरी ही क्यों...फिर लगा कि हमें महिला दिवस पर आजादी के किसी ऐसे प्रतीक को लेना चाहिए जो प्रासंगिक होने के साथ उसके संघर्ष अभी भी लोगों को हौसला देते हों....फिलिस्तीन में शहीद हुई अमेरिकी युवती रसेल कोरी से बेहतर कोई नहीं मिला..

रसेल कोरी की एक साथी ने उनकी शहादत के बाद एक फिल्म बनाई थी...रसेल की याद में आप भी देखिए

Thursday, March 6, 2008

जातियों के वजूद के लिए स्त्री हत्या जरूरी !


अंबेडकर यह खोज करने का दावा करते हैं कि – जाति समस्या के अलावा ‘सती प्रथा’,विधवाओं पर प्रतिबंध और बालिका विवाह( बालक-विवाह नहीं) की समस्याएं ब्राह्मण वर्ग द्वारा सजातीय विवाह पद्धति लागू करने के कारण उपजीं। उनकी यह व्याख्या कि ये समस्याएं किस तरह जाति व्यवस्था से जुड़ी हैं, इस प्रकार है-
सजातीय विवाह से हमारा तात्पर्य उन विवाहों से है जो जाति के भीतर ही होते हैं। किसी जाति में स्त्रियों की संख्या पुरुषों की संख्या से मेल खानी चाहिए। हमें यह देखने को मिलता है कि पत्नियो के जीते जी पति मर जाते हैं और पतियों के जीते जी पत्नियां मर जाती हैं यदि कोई पत्नी मर जाए और उसका पति जीवित हो तो वह अतिरिक्त पुरुष होता है औऱ यदि पति मर जाय और पत्नी जीवित हो तो वह ‘अतिरिक्त स्त्री’ होती है। ये शब्दावलियां अंबेडकर ने गढ़ी हैं। यदि ऐसी अतिरिक्त स्त्रियां और अतिरिक्त पुरुष अब भी युवावस्था या अधेड़ उम्र में हों तो उन्हे फिर से विवाह करना होगा। ऐसे विवाह उसी जाति में करने होंगे, अन्यथा वे अपने पुनर्विवाह के लिए दूसरी जातियों में झांक संकते हैं। तब जाति-व्यवस्था भंग हो सकती है। ऐसा जोखिम उठाए बिना पुनर्विवाह की इस समस्या का क्या समाधान हो सकता है?
अंबेडकर को पुनर्विवाह की समस्या मुश्किल में डाल देती है। उन्होने इस बात की विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत की कि स्त्रियों की सती प्रथा जैसी सभी समस्याएँ, पुनर्विवाह की समस्या के कारण उत्पन्न हुई।
“….(जाति से) बाहर विवाह रोकने की यह घेरा बंदी अनिवार्यत: समस्या पैदा कर देती है जिनका समाधान बहुत आसान नहीं है...यदि सजातीय विवाह पद्धति को निरापद रखना है तो यह आवश्यक रुप से दांपत्य अधिकारों का प्रावधान करना होगा, अन्यथा समूह के सदस्या येन-केन प्रकारेण अपना काम बनाने के लिए घेरे से बाहर निकल जाएंगे। परंतु दांपत्य अधिकारों का आवश्यक रुप से प्रावधान करने के लिए यह परम आवश्यक है कि समूह के भीतर दो लिंगो के विवाह-योग्य उन घटकों की आंकिक समानता कायम रखी जाय जो खुद को जाति में बनाए रखना चाहते हैं। केवल ऐसी समानता कायम रखने से ही यह संभव होगा कि समूह की आवश्यक सजातीयता को अक्षुण्ण रखा जा सके, और बहुत बड़ी विषमता से यह अवश्य टूट जाएगी। तब, जाति की समस्या जाति के भीतर दोनों लिंगों के विवाह योग्य घटकों के बीच विषमता को दुरुस्त करने की समस्या में बदल जाती है......यदि ध्यान न दिया जाय तो अतिरिक्त पुरुष और अतिरिक्त स्त्री, दोनों, जाति के लिए संकट खड़ा कर देते हैं..”(खंड 1 पृ 10)
अंबेडकर की व्याख्या जारी रहती है...
“…यदि हम उस समाधान की जांच करें जो हिंदुओं ने अतिरिक्त पुरुष और अतिरिक्त स्त्री की समस्याओँ को हल करने के लिए ढूंढा है तो हमारा काम आसान हो जाएगा...हिंदू समाज की कार्यपद्धति भले ही जटिल हो परंतु एक मामूली द्रष्टा को भी तीन अनूठे स्त्रियोचित प्रचलन देखने को मिलते हैं जिनका नांम है 1) सती प्रथा 2) बलात वैधव्य 3) बालिका विवाह ।...जहां तक मुझे पता है आज भी इस परिपाटी के उद्भव की कोई वैज्ञानिक व्याख्या नहीं मिलती है ”।( खंड 1 पृ 13)
बहरहाल, उन परिघटनाओं की वैज्ञानिक व्याख्या जो अभी तक दूसरों ने नहीं दी और जिसका अंबेडकर ने आविष्कार किया, इस प्रकार है:
“इस प्रश्न के बारे में कि क्यों वे उत्पन्न हुए, मेरा मानना है कि जाति व्यवस्था की संरचना निर्मित करने के लिए वे आवश्यक थे।”
जाति व्यवस्था की संरचना निर्मित करने के लिए ऐसे प्रचलन क्यों जरूरी हैं?
पहले हम अंबेडकर के शब्दों में ही इन दोनों प्रथाओं का अवलोकन करें..
“...अतिरिक्त स्त्री (=विधवा) को यदि ठिकाने नहीं लगाया जाए तो वह समूह में बनी रहेगी: लेकिन उसके बने रहने से दोहरा खतरा है। वह जाति से बाहर विवाह कर सकती है और सजातीय विवाह पद्धति का उल्लंघन कर सकती है, या वह जाति के अंदर विवाह कर सकती है और स्पर्धा के द्वारा उन अवसरों को अतिक्रमित कर सकती है जो जाति में संभावी वधुओं के चलिए अवश्य सुरक्षित होना चाहिए। इसलिए किसी भी दशा में वह अभिशाप है, और यदि उसके मृत पति के साथ उसे जलाया न जा सकता हो तो उसका अवश्य कुछ होना चाहिए। दूसरा उपाय यह है कि उसके शेष जीवन के लिए उस पर वैधव्य थोप दिया जाए”।(खंड 1, पृ 11)।
अंबेडकर के मुताबिक सती प्रथा और वैधव्य इसी प्रकार अस्तित्व में आए।
कई स्थानों पर अंबेडकर का तर्क विच्छिन्न है। हम किन्ही भी दो तर्कों में सामंजस्य नहीं पाते है। उन्हे इस बात की बिल्कुल शंका ही नहीं हुई कि किसी भी सूरत में बालिका विवाह अतिरिक्त पुरुष के पुनर्विवाह की समस्या को हल नहीं कर सकता। अंबेडकर का कहना है कि कुछ अतिरिक्त पुरुष ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं जबकि दूसरे विरक्त हो जाते हैं और यह टिप्पणी करते हैं कि यदि वे किसी एक रास्ते का इमानदारी से पालन करें तो कोई समस्या नहीं होगी अन्यथा जाति मर्यादा की सुरक्षा के लिए खतरा रहेगा। एक तरफ तो वे पुरुषों के प्रभुत्व की व्याख्या करते हैं और दूसरी तरफ वह उन पुरुषों की विशेषता बताते हैं मानों उनके पास मर्यादा है और होनी चाहिए ! क्योंकि, ‘किसी जाति में नियंत्रक अनुपात एक पुरष और एक स्त्री का होना चाहिए’ (खंड 1 पृ 12) मानो यह मर्यादा का सिद्धांत, जो आज भी लागू नहीं हुआ है, अतीत में पहले ही लागू हो चुका हो!
चाहे अतीत में हो या वर्तमान में, जिनकी पत्नियां मर जाती हैं, क्या वे बालिग स्त्री से विवाह नहीं करते हैं? क्या इससे ऐसी स्थिति निर्मित हो रही है जिससे अविवाहित पुरुष पत्नियां पाने में विफल हो जाएं। क्या पत्नियों के जीवित रहते हुए दूसरा विवाह, तीसरा विवाह और विवाह के बाद विवाह नहीं किए जा रहे हैं? एक पुरुष और एक स्त्री का यह नियंत्रक उपाय किस जाति में और किस समय मौजूद था?

अंबेडकर लिखते हैं-
“मेरे विचार में, यह जातियों की व्यवस्था में किसी जाति की एक सामान्य प्रक्रिया है” (खंड 1 पृ 13)

इसका अर्थ यह हुआ कि अगर आप किसी जाति को सतत बनाए रखना चाहते हैं तो ये सभी प्रथाएं प्रकट होंगी।
ठीक है तो क्या ये प्रथाएं निचली जातियों में भी मिलती है? ब्राह्मण जाति की तरह, हमें हर जाति में अतिरिक्त स्त्रियां और अतिरिक्त पुरुष अवश्य मिलते हैं। सभी जातियों को जातियों के रूप में सतत बनाए रखने के लिए, आप यह अपेक्षा करेंगे कि सती, वैधव्य और बाल-विवाह की प्रथाएं सभी जातियों में मौजूद रहनी चाहिए। क्या वे मौजूद थीं?
(जारी...)

Wednesday, February 27, 2008

जाति से पहले वर्ण!


जातियों से पहले वर्ण थे...चौकिए नहीं ये हम नहीं कहते बल्कि अंबेडकर कहते हैं.... खुद अंबेडकर के शब्दों में –
“हमें अच्छी तरह याद होगा कि हिंदु समाज दूसरे समाजों की तरह वर्गों से मिलकर बना था और उसमें 1) ब्राह्मण या पुरोहित वर्ग 2) क्षत्रिय या सैन्य वर्ग 3) वैश्य या वणिक वर्ग 4) शूद्र या दस्तकार और दास वर्ग जैसे ज्ञात वर्ग थे। इस तथ्य की ओर विशेष रुप से ध्यान देना होगा कि यह अनिवार्यत: एक ऐसी वर्ग-व्यवस्था थी जिसके तहत योग्यता के अनुसार लोग अपना वर्ग बदल सकते थे, और इसलिए वर्गों को व्यक्तियों के कार्य की परिवर्तनशीलता स्वीकार्य थी”। खंड 1, पृ. 18)
यहां ‘वर्गों’ से आशय उन ‘वर्गों’ से नहीं है जो “श्रम के शोषण की वजह से बनते हैं”। बोलचाल की भाषा में समाज के विभिन्न हिस्सों को “वर्ग” ही कह देते हैं। अंबेडकर ठीक इसी अर्थ में यहां पर “वर्णों” के संदर्भ में “वर्गों” का जिक्र कर रहे हैं।
अंबेडकर की व्याख्या के मुताबिक हमें चार वर्णों के निम्न पक्षों पर ज्यादा ध्यान देना होगा।
1)- वे अभी जातियां नहीं है। जातियां अभी भी नहीं बनी हैं। ये महज प्रारंभिक ज्ञात वर्ग हैं।
2)- ये व्यवसाय के आधार पर बने हैं। इन वर्गों के चार अलग-अलग किस्म के व्यवसाय हैं।
3)-इन वर्गों के लोग किसी भी तरफ जाकर अपने वर्ग बदल सकते हैं। जो कोई एक व्यक्ति शुद्र रहा हो तो वह अपनी योग्यता को सुधारकर ब्राह्मण या किसी दूसरे वर्ग में शामिल हो सकता है। यदि ब्राह्मण या किसी दूसरे वर्ग के लोगों में योग्यता की कमी हुई तो वह शुद्र हो जाएगा।
4)-ये ही भारत के वे चार वर्ण है जिन्हे अंबेडकर ने उन “समूहों” के रूप में समझा जो मिल-खपकर “एकीकृत समाज” हो गए थे। इस तथ्य के बावजूद कि एक समूह पुरोहित वर्ग के रूप में और दूसरा दास वर्ग के रूप में मौजूद था, उन्होने समूहों के सम्मीलन और स्वांगीकरण की बात कही। आगे भी उन्होने उन्ही चार वर्णों के सिलसिले में अंतरजातीय विवाहों की बात कही जो अलग-अलग वर्णों के बीच होते थे।
हमें अंबेडकर को समझने के लिए कुछ खास बिंदुओं को याद रखना होगा।
वर्ण व्यवस्था जाति –व्यवस्था में रुपांतरित हो जाता है। लेकिन अंबेडकर के अनुसार वर्ण-व्यवस्था जाति व्यवस्था से काफी श्रेष्ठ है क्योंकि वर्ण-व्यवस्था में कोई व्यक्ति अपना वर्ण बदल सकता था।
पहले, योग्यता के आधार पर लोगों के किसी ओर भी वर्ण बदल सकने के मुद्दे पर चर्चा करेत हैं। यदि लोग अपना वर्ण बदलना चाहते थे तो योग्यताओं का निर्धारण कौन करता था ? वे कौन-सी योग्यताएं हैं? यह प्रक्रिया अमल में कैसे आएगी?
अंबेडकर बताते हैं कि ऐसे निर्णय लेने का अधिकार मनु और सप्तर्षि को था जो चार वर्ष में एक बार लोगों की परीक्षा लेते थे और उनका वर्ण निर्धारित करते थे। ऐसा बताते समय अंबेडकर परिवर्तन की इस प्रक्रिया का खुलासा कुछ इस तरह करते हैं-

“ ये ही वे अवस्थाएं थी जिसमें वर्ण जाति में बदल गया। इस अवधारणा को उन परंपराओं से काफी बल मिलता है जो धार्मिक साहित्य में अंकित है। जब किसी ऐसी चीज को अंगीभूत किया जा सकता है जो बिल्कुल भरोसेमंद हो, तो ऐसा कोई कारण नहीं कि इस परंपर को न अपनाया जाए। इस परंपरा के अनुसार किसी व्यक्ति का वर्ण निर्धारित करने के कार्य का संपादन मनु एवं सप्तर्षि के पदनाम वाले अधिकारियों की मंडली द्वारा किया जाता था। लोगों के समूह से मनु उन लोगों का चयन करते जो क्षत्रिय और वैश्य होने के लिए योग्य होते और सप्तर्षि उन लोगों का चयन करते जो ब्राह्मण होने के योग्य होते। ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों के लिए मनु और सप्तर्षि द्वारा किए गए चयन के बाद जो लोग बच जाते वे शुद्र कहलाते थे। प्रत्येक चार वर्ष पर नए चयन के लिए मनु एवं सप्तर्षि के उसी पदनाम वाले अधिकारियों की नई मंडली लगाई जाती थी। होता यह था कि पिछली बार जो शुद्र की श्रेणी में रह जाते थे उनमें से कुछ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के लिए चुन लिए जाते थे जबकि पिछली बार ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य होने के लिए चुने गए होते थे उनमें से कुछ को केवल शूद्र के योग्य पाकर छोड़ दिया जाता था। इस प्रकार वर्ण के कार्मिक बदल जाते थे। यह एक तरह का आवर्ती उलट-फेर औऱ मनुष्यों के मानसिक रुझान व शारीरिक क्षमता और पेशों के अनुरूप उनका चुनाव था जो समुदाय जो समुदाय को जिंदा रखने के लिए आवश्यक था...। प्राचीन परंपरा के अनुसार जैसा कि पुराणों में दर्ज है, मनु एवं सप्तर्षि किसी व्यक्ति के वर्ण की जो अवधि तय करते थे, वह चार वर्ष की होती थी और यह युग कहलाता था”। खंड 3, पृ. 267-287

“ मनु एव सप्तर्षि एक तरह से साक्षात्कार मंडल के सदस्य होते थे जो इस आधार पर व्यक्ति का वर्ण तय करते थे कि उसने साक्षात्कार में अपनी कैसी छाप छोड़ी है ? “ खंड 3, पृ. 287

इस तरह लंबी चौड़ी व्याख्या चलती रहती है जो यह बताती है कि योग्यता के आधार पर व्यक्तियों के वर्णों निर्धारण की जो व्यवस्था अधिकारियों द्वारा की जाती है, वह श्रेष्ठ क्यों है।
यह तो ठीक है, लेकिन उन अधिकारियों का चयन कौन करता था? वे योग्यताएं क्या हैं जिनके आधार पर वे अधिकारी बनते थे? चार साल में वर्ण बदलने की बात किसे पचेगी? मानलीजिए कि किसी खास युग सभी लोगों की अच्छी योग्यता है और कोई शुद्र न बने फिर क्या होगा? क्या चार साल बिना शुद्रों के ही काम चलेगा?इस अवधि में उच्च वर्णों की सेवा-टहल का काम कौन करेगा? क्या उच्च वर्ण वाले लोग अपना काम खुद करेंगे? नहीं, वे ऐसा नहीं करेंगे। शुद्रों को आखिरी सांस तक ताबेदारी करने के लिए अस्तित्व में बने रहना होगा। इसका अर्थ यह होता है कि आबादी के एख हिस्से को हमेशा शुद्रों के रूप में मौजूद रहना होगा।
अधिकारियों द्वारा हर व्यक्ति का साक्षात्कार करना और उनका वर्ण बदलना। इसी हिसाब से लोगों का पुराना वर्ण छोड़कर नया वर्ण अपनाना! मतलब यह कि पुराना पेशा छोड़कर नया पेशा अपनाना ! यानी हर चार साल बाद पेशा बदलना! यह किस किस्म का सिद्धांत है ?
अगर कोई इन पौराणिक कथाओं को शब्दश: मान ले कि ब्राह्मण शूद्र बन जाते थे और शूद्र ब्राह्मण, और यह कहे कि अतीत में भारत के लोगों के इतिहास में ऐसा ही हुआ है, तो क्या हमें ऐसे सिद्धांत को स्वीकार करना होगा।

आगे चलकर वर्ण निर्धारण की प्रक्रिया में कुछ बदलाव हुआ। फिर पुरानी प्रक्रिया को अंबेडकर भोंड़ा बताते हुए और नई प्रक्रिया का बखान करते हैं और कहते हैं कि वर्णों का निर्धारण गुरुकुल के उपनयन संस्कार में होता था...(जारी)

विज्ञान की नई सफलता-सुनिए एक अणु की आवाज



कोई भी आवाज जो आप सुनते रहे हैं वह करोड़ों अणुओं के कंपन से निर्मित होती है। कंपन की वजह से आवाज सुनाई देती है जिसे आप अपने हिसाब से बदलकर सुरीला बनाते हैं। संगीतकार से जब संगीत की सबसे छोटी इकाई पूछी जाती है उसमें भी करोड़ अणुओं का कंपन होता है। इस जुगलबंदी में शामिल सभी अणुओं का अपनी खास कंपन होती है। Kan­sas State Un­ivers­ity के वैज्ञानिकों ने करोड़ो अणुओं में से एक अणु के कंपन की आवाज रिकॉर्ड करने में सफलता की है। यह अब तक की सबसे चुनौतीपूर्ण खोज रही है। रिसर्च टीम के सदस्य Uwe Thumm कहते हैं कि इसे आप अणु का साउंड मत कहिए बल्कि हमने उस मैटर को ढूंढ निकाला है जिसे दुनिया आवाज या साउंड कहती है। वैज्ञानिकों के मुताबिक कंपन बहुत तीव्र था और इसकी अवधि भी काफी छोटी थी। इसे रिकॉर्ड करते समय उन्होने पड़ोसी अणु में भी ऐसे ही कंपन की आवाज महसूस की। लेकिन हम जो आवाज सुनाने जा रहे हैं वह एक अणु की है जी हां ... individual molecules की।

इस आवाज को सुनने के लिए क्लिक करें.



सावधानी-इस ध्वनी को सुनने से माइग्रेन या सिर से जुड़ा दर्द बढ़ सकता है। सावधानी से औऱ कम आवाज पर सुनें।

Tuesday, February 26, 2008

क्या सजातीय विवाह ही जाति का आधार है?




बाजार से सामाजिक न्याय की उम्मीद है। इस तर्क को प्रचारित करने वाले आज भी रोना रो रहे हैं कि महत्वपूर्ण पदों पर दलितों की भागीदारी न के बराबर है। दरअसल दलितों के हक की लड़ाई एक ओर प्रगतिशील विचारधार के बदौलत लड़ी जा रही है और जबकि दूसरी ओर स्वघोषित चैंपियन दलित ब्राह्मणवादी विचारधारा के जरिए। उसके दाएं बाएं टुकड़ों में तर्क बटोरने के तौर तरीके ही खुद उसके अस्थिर और अध्यात्मवादी चिंतन के बीच खड़ा करते हैं। अपने पूरे कलेवर में यह मानव विकास विरोधी विचारधारा अंत में सामंती मूल्यों के सामने न केवल घुटने ही टेकती बल्कि खुलकर बताती है कि यही से दलित मुक्ति का रास्ता जाता है। मौजूदा दलित सत्ताओं के अनुपातवादी संघर्ष के साथ यह छद्म लड़ाई उनके आधारभूत सिद्धांतकारो में भी मौजूद है। अनुपातवादी चिंतन की बहस में लटकने की जद्दोजहद में उनके विचारक सिलसिलेवार ढंग से खुद की कही बातों का खंडन करते मिलते हैं। वे उस छद्म लड़ाई पर बहस नहीं करते बल्कि अभी अनुपात सही नहीं हुआ...वे ऐसे चौंकते हैं जैसे किसी दैव चमत्कार के जरिए यह होने वाला था। ये ऐसी छद्म लड़ाई है जिसमें कोई शहीद नहीं होता। सबकुछ सुविधाजनक तरीके से चलता है। यही वह मजबूरी है जो इन्हे आज बाजारवाद के साथ खड़ा कर रही है। कल को कोई और आस्थामूलक विचारधारा पैदा होती है तो फिर उसमें समा जाएंगे। इसलिए जरूरत है कि इस समझ के मूल सिद्दांतकारों की जड़ में जाकर देखा जाय कि क्या ये शुरू से ही ऐसे छद्म युद्ध लड़ते रहे हैं। देखते हैं कि जातियों के पैदा होने के बारे में अंबेडकर के विचार मैकाले के तर्क दिवस मनाने वालों के मुताबिक कितने तार्किक हैं।



जातियों के पैदा होने के बारे में मुख्यतौर पर दो राय बनती है। एक धारा कहती है कि कबीले के बचेखुचे लोग जातियों में बदल गए होंगे जबकि दूसरी धारा इसे श्रम विभाजन से जोड़ कर देखती है। खुद पेशों से ही जातियों का उदय हुआ हो। इस विचार को ही ज्यादातर लोग मानते हैं। लेकिन अंबेडकर इसे नहीं मानते। उनका सवाल है क्या सभी देशों में श्रम विभाजन नहीं हुआ फिर वर्ण व्यवस्था भारत में ही क्यों पैदा हुई। जवाब में तर्क दिया जाता है विशेष परिस्थितियों का जो जातियों के निर्माण तक ले जाती है। लेकिन विशेष परिस्थितियां क्या थी इस पर सवाल अनसुलझा छोड़ा गया। लेकिन झटके से अंबेडकर ने कहा कि वे उस विशेष परिस्थिति को समझ गए हैं। वे सजातीय विवाह को जाति व्यवस्था का मूल मानते हैं। देखिए क्या कहते हैं वे
“उद्भव का प्रश्न हमेशा खीझ पैदा करने वाला रहा है और जाति व्यवस्था के अध्ययन में इसपर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया है। कुछ ने अपनी आंखे मूंद और कुछ न कन्नी काट ली। कुछ लोग अभी इस उहापोह में हैं कि क्या जाति जैसी चीज का कोई उद्भव हो सकता है जहां तक मेरा सवाल है मैं किसी उहापोह में नहीं हूं क्योंकि मैं यह सिद्ध कर चुका हुं कि सजातीय विवाह ही जाति का एकमात्र लक्षण है और जाति व्यवस्था के उद्भव से मेरा आशय यही है कि सजातीय विवाह पद्धति की संरचना और तंत्र का उद्भव” (खंड 1, पृ. 14)
अंत में की गई टिप्पणियों में कोई आपसी तालमेल नहीं है । एक जगह सजातीय विवाह ही कारण (मूल) है और ‘जाति’ इसका ‘प्रभाव’ है। यदि हम इस बात को इस रूप में देखें तो दोनों (सजातीय विवाह पद्धति और जाति व्यवस्था) समान नहीं है। लेकिन दूसर वाक्य में अंबेडकर का कहना है कि चाहे आप जाति व्यवस्था के उद्भव की बात करें या सजातीय विवाह पद्धति की संरचना और तंत्र के उद्भव की बात करें, दोनों का अर्थ एक है। यदि हम इस नजरिए से देखें तो जाति व्यवस्था और सजातीय विवाह पद्धति दोनों एक हैं। इन परस्पर असंगत विचारों में से हमें लेखक का कौन सा विचार ग्रहण करना चाहिए ?
अगर उनका यह कहना है कि सजातीय विवाह पद्धति ही जाति व्यवस्था का आधार है तो यह जाति का आधार ढूंढ लेने का दावा नहीं हो सकता। तब सवाल यह उठता है कि ठीक है, फिर सजातीय विवाह पद्धति का आधार क्या है? जब तक हम यह न जान लें तब तक समस्या नहीं सुलझ सकती।
यहां पर तो ऐसे कहा गया, लेकिन किसी और जगह अंबेडकर की जाति व्यवस्था की व्याख्या ‘चार वर्णों’ से आरंभ होती है।
(जारी..)

Monday, February 25, 2008

दलित उद्धारकों का प्रपंच

-अभिनव


-हकीकत तो यह है कि अमेरिका आज सिर्फ एक देश नहीं, एक विचार है। यह विचार साइंस, टेक्नॉलजी, संपदा, पूंजी प्रवाह और भविष्य को मिलाकर बनता है। क्या एक अरब लोगों का देश भारत इस विचार से खुद को दूर रखने का जोखिम उठा सकता है?

- चंद्रभान प्रसाद,नवभारत टाइम्स, नवबंर 2007

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-“जो देश अंग्रेजी से जितना दूर होगा, वह देश तरक्की से भी उतना ही दूर रहेगा। जो बात देशों के लिए सच है, वही व्यक्ति या परिवारों के लिए भी सच है। भारत में ही देख लें। कुछ लड़कियां अच्छा डांस करती हैं, अच्छा गाती हैं, आकर्षक भी हैं पर अंग्रेजी नहीं जानती, अत: ‘बार बालाएं’ बन जाती हैं, पुलिस की दबिश होती है, जेल भी जाना पड़ता है, पर, उन्हीं गुणों के साथ कुछ लड़कियां आइटम गर्ल बन जाती हैं, पेशा, इज्जत तथा शोहरत भी कमाती हैं”।

–चंद्रभान प्रसाद, जनवरी, राष्ट्रीय सहारा

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"मैकाले पुराण इस समय छेड़ने की वजह अक्टूबर महीने में यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिलवेनिया से मेरे पास आया एक निमंत्रण है। निमंत्रण एक पार्टीनुमा कार्यक्रम में शामिल होने का था। कार्यक्रम 26 अक्टूबर के लिए था। ये पढ़कर मैं चौंका कि ये निमंत्रण मैकाले का जन्मदिन मनाने के लिए किया जा रहा है। इसे डे ऑफ रिजन यानी तर्क-दिवस नाम दिया गया था। कार्यक्रम मैकाले के जन्मदिन के एक दिन बाद के लिए था। निमंत्रण में ये साफ लिखा था कि इसमें फिलाडेल्फिया की कंपनी टेंपसॉल्यूशंस के मालिक माइकल थेवर भी शामिल होंगे। माइकल थेवर मुंबई के स्लम में बड़े हुए और और अब वो अमेरिका में अफर्मेटिव एक्शन के चैंपियन हैं।"- दिलीप मंडल


दिलीप मंडल भले अफसोस कर रहे हों लेकिन चंद्रभान प्रसाद जी के नेतृत्व में मैकाले के जन्म दिन के आयोजन ने काफ़ी लोगों के चौंकाया है। इस आयोजन में अंग्रेज़ी-माता का देवी रूप में पोस्टर जारी किया गया, स्तुतियाँ गाई गईं। यह कामना की गई कि हर दलित नवजात बच्चा पहली ध्वनि-एबीसीडी की सुने। अंग्रेज़ी-माता या देवी की तसवीर स्टैच्यू ऑफ़ लिबर्टी का अनुकरण थी सिर्फ़ उसके हाथों में मशाल की जगह कलम थी। दिलीप मंडल ने भी ऐसे ही किसी आयोजन में बुलावे का जिक्र करते हुए अंबेडकर तक बहस ले गए।
हमारे यहां एक ग्रुप है जो अंग्रेजी भाषा भले न जानता हो लेकिन उसका जोरदार समर्थक है। इस छद्म भाषा प्रेम की कलई अब खुलने लगी है। समाज में बाजार के दर्शन को प्रचारित करने का काम मिशिनरी स्तर पर है। जिसमें अंग्रेजी की वकालत तो होती है लेकिन डार्विन की निंदी भी की जाती है। हिंदी ब्लॉग भी पिछले कुछ दिनों से मैकाले के स्टेमेंट के ऐतिहासिक साक्ष्य जुटा रहे हैं। जो लेख 2004 में चंद्रभान प्रसाद रिइन्वेंटिंग मैकाले में लिखते हैं वह अब हिंदी ब्लॉग में किसी और के नाम से फिर से आ रहा है। अंग्रेजी वकालत का पूरा नाटक सचेत तरीके से चलाया जाता है। पहले जब लोग कहते थे कि बस आफिरमेटिव एक्शन पर एक शोध प्रबंध जैसा कहीं छपा लो तो अमेरिका में स्कॉलरशिप मिल जाएगी तो यकीन नही होता था। आज अमेरिकी सरकार आफिरमेटिव एक्शन और एड्स पर समान रूप से खर्च करती है। आज भारत सहित दुनिया के कई देशों में बाजारवाद को कड़ी चुनौती मिल रही है। लिहाजा उसे एक दलालनुमा बड़ा हिस्सा चाहिए जो उसकी खोखली चमक में मंत्रमुग्ध होकर प्रवचन करता फिरे। इसके लिए सोशलिस्टों की नई फौज बड़ी आसानी से ये काम कर रही है। आज अमेरिका के दोस्त इजरायल या नॉटो सदस्य देशों को अंग्रेजी सीखने की जितनी दरकार नहीं है उतनी चंद्रभान प्रसाद और उनके चेलों की है। ये मानते हैं कि ग्लोबलाइजेशन के जरिए ही जाति व्यवस्था खत्म होगी। अब इन्हे कौन बताए कि पिछले दस-पंद्रह सालों से ग्लोबलजाइशेन के विकास के साथ दुनिया भर में दर्जनों देश जातिगत आधार पर निर्मित हुए हैं।
(जारी....)