समकालीन जनमत (पत्रिका) के लिए संपर्क करें-समकालीन जनमत,171, कर्नलगंज (स्वराज भवन के सामने), इलाहाबाद-211002, मो. नं.-09451845553 ईमेल का पता: janmatmonthly@gmail.com

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Sunday, January 24, 2010

सैमसुंग प्रायोजित साहित्य अकादमी पुरस्कार का बहिस्कार करें


जन संस्कृति मंच ने बहुराष्ट्रीय उपभोक्ता उत्पाद कंपनी सैमसंग के साथ मिलकर साहित्य अकादमी द्वारा दिए जा रहे टैगोर साहित्य पुरस्कारों की कड़ी भर्त्सना की है और लेखकों-साहित्यकारों से उनके बहिष्कार का आह्वान किया है।
साहित्य अकादमी द्वारा ये पुरस्कार सोमवार, 25 जनवरी को दिल्ली के एक पांच सितारा होटल में होने वाले भव्य समारोह में दिए जाने वाले हैं। जसम इसके विरोध में सोमवार को आयोजन स्थल ओबरॉय होटल के बाहर एक मानव श्रंखला बना रहा है। संगठन ने साहित्यकारों, कलाकारों व संस्कृतिकमिoयों से उसमें जुड़ने की अपील की है।
अपने बयान में जन संस्कृति मंच ने साहित्य पुरस्कारों के लिए सैमसंग के आयोजन को सांस्कृतिक स्वायत्तता के लिए खतरा बताया है। अफसोस की बात यह है कि इस खतरनाक साजिश को सम्मानजनक मुखौटा देने के लिए पुरस्कारों को टैगोर के
नाम पर दिया जा रहा है। जसम का मानना है कि इस तरह का गठजोड़ खुद अकादमी के संविधान का उल्लंघन है, लिहाजा इसे तुरन्त खत्म किया जाना चाहिए। ऐसा न हुआ तो इससे साहित्य व संस्कृति के क्षेत्र में व्यापक पैमाने पर विदेशी दखल के रास्ते खुल जाएंगे। जन संस्कृति मंच ने 13 दिसम्बर को अपने दिल्ली राज्य सम्मेलन में भी इस गठजोड़ के खिलाफ एक प्रस्ताव पारित किया था।
जसम ने इस मसले पर सभी साहित्यकारों, कलाकारों व संस्कृतिकमिoयों को एक मंच पर आकर मुखर विरोध जताने की
अपील की है।
भाषा सिंह
सचिव
जन संस्कृति मंच
दिल्ली

Wednesday, November 4, 2009

संरचनावाद के योद्धा लेवी स्ट्रॉस नहीं रहे



संरचनावादी मानवशास्त्री क्लाउद लेवी स्ट्रॉस नहीं रहे। सौ साल के थे। इस दार्शनिक और मानवशास्त्री ने दर्शन की पूरी समझ पर गहरा असर डाला है। पचास-साठ के दशक में जब युरोप के मशहूर दार्शनिक सात्र कमजोर हो रहे थे तब लेवी स्ट्रॉस के विचार,दर्शन से लेकर साहित्य और समाजिक विज्ञानों को प्रभावित करने लगे थे। लेवी स्ट्रॉस को सबसे बेहतर श्रद्धांजली यही होगी कि उनके विचारों को पाठकों तक पहुंचाई जाय। लेवी स्ट्रास के विचार जटिल लग सकते हैं लेकिन अगर तर्क प्रक्रिया को समझने की सामान्य सी कोशिश की जाय तो ये बहुत आसान भी है। लेवी स्ट्रॉस के बहाने हम अनुभववादी दर्शन के संकट और उसके बाद के उत्तर आधुनिक दर्शन तक की लंबी वैचारिक यात्रा को समझने की कोशिश करेंगे। लेवी स्ट्रॉस की श्रद्धांजली इसके लिए प्रस्थान बिंदु होगी।

पार्ट -1
फ्रांस के लेवी स्ट्रॉस मशहूर भाषाशास्त्री सॉस्योर से प्रभावित थे। ऐसे में सबसे पहले हमें सास्योर के विचार यानी संरचनावाद को जानना जरूरी होगा। सास्योर ने संरचनावाद की नींव भाषा के विश्लेषण के जरिए रखी।
सास्युर मानते हैं कि शब्दों के अर्थ बाहरी दुनिया की चीजों यानी वस्तुओं के संदर्भ से निर्धारित नहीं होते। फिर कैसे होते हैं? सास्युर कहते हैं कि ये संकेतों के जरिए निर्धारित होते हैं। इसे साफ करने के लिए सास्युर संकेतों को भी दो हिस्सो में तोड़ देते हैं एक हिस्सा जो पन्ने पर लिखा जाता है जिसे वे सिग्नीफायर यानी संकेतक कहते हैं। जबकि दूसरे हिस्से को वे संकेतित यानी सिग्नीफाइड मान लेते हैं। सिग्नीफायर वाला हिस्सा पन्ने पर रहता है जबकि सिग्नीफाइड हमारे मस्तिष्क में तस्वीर बनाता है। ये कुछ इस तरह है जैसे आपने पन्ने पर ‘जाल’ लिखा। ये संकेतक यानी सिग्नीफायर है और ‘जाल’ की जो तस्वीर हमारे मस्तिष्क में बनी वो सिग्नीफाइड है। सास्युर मानते हैं कि यह सिर्फ इस रूप में अर्थवान है कि यह माल,डाल,खाल,नाल जैसे संकेतकों से थोड़ा अलग दिखता है। अब यहां वे पन्ने पर लिखे शब्द को मस्तिष्क में उभरी तस्वीर से अलग करते हैं। सास्युर का कहना है सिग्नीफायर और सिग्नीफाइड कोई संबंध नहीं है। हो सकता है जाल की जगह कोई और सिग्नीफायर होता तो भी सिग्नीफाइड अपना वही अर्थ रखता। सास्युर साफतौर पर कहते हैं कि भाषा की व्यवस्था में केवल भिन्नताओं का अस्तित्व है। किसी भाषाई रूप में अर्थ देने के लिए उन्हे खास क्रम में पिरो दिया जाता है। भिन्नताओं की इस बुनावट में कोई खास संकेत अपनी जगह पर चिपक जाता है। फिर जाकर वह पुरे वाक्य की संरचना में अपना कोई अर्थ देता है। लेकिन सास्युर ने भाषा के इस अध्ययन के लिए एक शर्त बना ली थी। वो शर्त ये थी कि इसकी संरचना स्थिर रहे है। भाषा के ऐतिहासिक विकास की अवधारणा से दूर रहते हैं। सास्युर बोलचाल वाली भाषा को जगह नहीं देते हैं। वे केवल उसी भाषा को वैज्ञानिक नजरिए से विश्लेषण के योग्य मानते थे जिसमें संकेत नजर आएं।
संरचनावाद का मूल सिद्धांत को विस्तारित किया गया। इस सिद्धांत को भाषाशास्त्र से बाहर के समाज विज्ञानो में लागू किया गया। क्लाउद लेवी स्ट्रॉस पहले दार्शनिक और मानवशास्त्री थे जिन्होने संरचनावाद का इस्तेमाल संस्कृतियों के अध्ययन में किया। वे संस्कृतियों की संरचना में मिथकों के अध्ययन में संरचनावाद लागू करते हुए कहते हैं कि हर मिथक भी छोटे मिथकीय हिस्सों से निर्मित है। इन हिस्सों को उन्होने Mytheme नाम दिया। भाषा की तरह ये भी अपने जगह की वजह से अर्थ देते हैं। लेवी स्ट्रॉस मानते थे कि मिथकों की संरचनाएं मनुष्य के मानसिक संरचना से मेल खाती है। लेकिन वे इस बात के कायल थे कि मनुष्य के दिमाग में मिथक बनने से पहले मिथकों की संरचना मौजूद रहती है। मिथकों के अनुरूप गढ़ी गई संरचना उस कर्ता की चेतना का निर्माण करती है जो इस गफलत में रहता है कि अपनी चेतना और अपनी इच्छा शक्ति का स्रोत वह खुद ही है। मनुष्य मिथक नहीं गढ़ता बल्कि मिथक मनुष्यों को गढ़ते हैं।
लेवी स्ट्रॉस के इस समझ को जमकर आलोचना भी हुई। एक स्थिर संरचना में बाइनरी अपोजिशन की जरूरत पड़ती ही है इस लिहाज से लेवी स्ट्रॉस भी मिथकों के विश्लेषण में दुख-सुख,जीवन-मृत्यु जैसी अवधारणा के साथ मिथकों का विश्लेषण किया है।(जारी... )
-दीपू राय

Thursday, October 29, 2009

चौथा खंभा भी गया


-पी साईनाथ
सी राम पंडित अब अखबार का साप्ताहिक कॉलम लिख सकते हैं। डॉ पंडित (बदला हुआ नाम) अर्से से महाराष्ट्र से निकलने वाले भारतीय भाषा के प्रतिष्ठित अखबार में कॉलम लिखते आए हैं। लेकिन महाराष्ट्र चुनाव में नामांकन वापस लेने की अंतिम तारीख के बाद उनका कॉलम बंद कर दिया गया था। अखबार के संपादक ने उनसे माफी मांगते हुए कहा कि पंडी जी आपका कॉलम अब 13 अक्टूबर से ही छप पाएगा। ऐसा इसलिए कि तब तक के लिए हमारे अखबार का हर पन्ना बिक चुका है। अखबार का संपादक व्यक्तिगत तौर पर ईमानदार था सो उसने सच्चाई बयां कर दी।
महाराष्ट्र के चुनाव में पैसे का खेल जमकर खेला गया और थैलीशाही की परंपरा को मीडिया ने इस बार थोड़ा बढ़ चढ़कर निर्वाह किया। सभी भले न शामिल हो लेकिन कुछ ने तो हद ही कर दी। छुटभैये अखबारों को तो छोड़िए बड़े अखबारों और टीवी चैनल्स भी इस खेल में शामिल पाए गए। कई उम्मीदवारों ने ‘उगाही’ की शिकायत की, लेकिन पुरजोर तरीके से नहीं। वे सूचना उगलने वाले ड्रैगनों से डर गए। पता नहीं कब किस मौके पर आग बरसाना शुरू कर दें।
कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों को प्रबंधन के सामने शर्मसार होना पड़ा। एक ने तो गुस्से में यहां तक कह डाला कि “इस चुनाव का सबसे बड़ा विजेता मीडिया है”। दूसरे ने कहा “मीडिया इस चुनावी मौसम में मंदी से हुए नुकसान की भरपाई कर रही है”। माना जा रहा है कि न्यूज के नाम पर उम्मीदवारों के प्रचार से करोड़ों रूपए कमाए गए। विज्ञापन से इतना पैसा कमाना मुश्किल ही नहीं असंभव होता।
विधान सभा के चुनाव में “कवरेज पैकेजेज’ वाली संस्कृति पूरे महाराष्ट्र में दिखी। छोटे से छोटे कवरेज के लिए उम्मीदवारों को थैली खोलनी पड़ी। जो मुद्दा सामने आना चाहिए था वो बिल्कुल नहीं आया। पैसा नहीं तो खबर नहीं। लेकिन इसका सबसे बड़ा नुकसान उन छोटी पार्टियों और निर्दलीय उम्मीदवारों को उठाना पड़ा जिनके पास ‘खबरों’ के लिए पैसे नहीं थे। जमीनी मुद्दों को उठाने के बावजूद दर्शकों और पाठकों ने उन्हे नजरंदाज कर दिया। ‘हिंदु’ (7 अप्रैल 2009) ने ऐसी ही एक रिपोर्ट लोकसभा चुनावों पर भी छापी थी। जब कुछ मीडिया हाउस ने बकायदा 15 लाख से 20 लाख रु रेट वाला ‘कवरेज पैकेज’ बनाया था। हाई एंड उम्मीदवारों के लिए ये रेट थोड़ा और ज्यादा था।
कुछ संपादकों का कहना है कि ये नया नहीं है। बस इसका दायरा और बढ़ गया है। दोनों ओर से की जा रही थेथरई या सीनाजोरी अब एक खतरनाक रूप धारण कर रही है। गिने-चुने पत्रकारों के पैसे लेकर खबर बनाने की कला अब मीडिया हाउसेज ने पकड़ ली है। ‘खबरों’ का ये संगठित कारोबार कई सौ करोड़ रु तक पहुंच गया है। पश्चिम महाराष्ट्र के एक बागी उम्मीदवार ने एक स्थानीय मीडिया के संपादक पर 1 करोड़ रु खर्च किया और वह जीत गया जबकि उसकी पार्टी के आधिकारीक उम्मीदवार हार गए।
महाराष्ट्र चुनाव में ऐसी डील का रेंज काफी बड़ा था। इसमें कई अलग-अलग कटेग्री और रेट थे। उम्मीदवार का प्रोफाइल करना है या इंटरव्यू या फिर उसके एचिवमेंट गिनाने हैं। कॉलम और समय के हिसाब से रेट लगे। इसमें उम्मीदवारों का कुछ घंटे या दिन भर पिछा करने वाले टेलीविजन प्रोग्राम भी शामिल थे। जिसे कई बार ‘लाइव कवरेज’ या ‘स्पेशल फोकस’ जैसे कटेग्री के साथ परोसा गया। विरोधी उम्मीदवार की बुराई और पैसा देने वाले उम्मीदवार के आपराधिक रिकॉर्ड को छुपाने का रेट भी लगा। यानी हर संस्कृति की अलग कीमत। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि महाराष्ट्र के 50 परसेंट चुने गए उम्मीदवार के नाम किसी न किसी आपराधिक रिकॉर्ड में दर्ज हैं। लेकिन इनमें से जितने उम्मीदवारों की प्रोफाइल मीडिया में आई है उसमें शायद ही किसी के आपराधिक रिकॉर्ड का जिक्र किया गया।
अखबार के मुकुट पर विज्ञापन और भीतर उम्मीदवार के यशगान वाले ‘स्पेशल सप्लिमेंट’ तो रेट के मामले में सभी कटेग्री को पीछे छोड़ गया। ‘स्पेशल सप्लिमेंट’ रेट था डेढ़ करोड़ रु । केवल एक मीडिया प्रोडक्ट पर किया गया ये खर्च उम्मीदवारों के खर्च की तय सीमा से 15 गुना अधिक है।
महाराष्ट्र में जो सबसे सस्ता और कॉमन लो एंड पकैज का रेट था चार लाख रु । यह पेज के हिसाब से कम ज्यादा भी हुआ। इस पैकेज में उम्मीदवार की प्रोफाइल, उम्मीदवार के पसंद वाले चार न्यूज आईटम शामिल थे। (उम्मीदवार के दिए न्यूज आईटम को ढंग से ड्रॉफ्ट करने का रेट थोड़ा ज्यादा) था।
जारी....-

Sunday, October 18, 2009

पाकिस्तान का 'लाल बैंड'

‘लाल बैंड’ पाकिस्तान की प्रगतिशील गायन टीम है। आज ये बैंड फैज अहमद फैज,हबीब जालिब और अहमद फराज की रचनाओं को आम आदमी तक पहुंचा रहा है। लाल बैंड अपने को पाकिस्तान की प्रगतिशील परंपरा के हिस्से के बतौर देखता है। इस ग्रुप में चार सदस्य हैं, जिसमें तैमूर रहमान जो पाकिस्तान के मशहूर एकेडमिक सेंटर LUMS में प्रोफेसर हैं। लाल बैंड के लीड सिंगर शहराम अजहर है। इस्लामाबाद के इक्रा यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र पढ़ाने वाले शहराम उत्तर-भारतीय संगीत में खासी दिलचस्पी है। ग्रुप के ये दोनों सदस्य पाकिस्तान की कम्यूनिस्ट किसान पार्टी के सक्रिय सदस्य भी हैं। महवास वकार ग्रुप की बैकअप वोकल हैं और हैदर रहमान बांसुरी वादक हैं।
पाकिस्तान के जियो नेटवर्क ने ग्रुप के गीतों की लोकप्रियता को देखते हुए 'उम्मीद ए सहर' के नाम से एक अल्बम जारी किया है।
ग्रुप के इतने पॉपुलर हो चुके हैं कि इसे पाकिस्तान का जियो टीवी नेटवर्क एक अल्बम के रूप में लाने को राजी हो
सुनिए 'उम्मीद ए सहर' अल्बम का पहला गीत



लाल बैंड के गीत और इसके सदस्यों के बारे में और जानकारी के लिए आप तीन हिस्सों वाली डॉक्यूमेंट्री देख सकते हैं। लाल बैंड पार्ट 1


लाल बैंड पार्ट 2

लाल बैंड पार्ट 3

Tuesday, April 7, 2009

प्रणय कृष्ण का साक्षात्कार


प्रखर हिंदी आलोचना और जन संस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण को मिला देवी शंकर अवस्थी पुरस्कार उनकी समग्र रचनाधर्मिता का सम्मान है। प्रस्तुत है इस मौके पर अनिल सिद्धार्थ से उनककी बातचीत के प्रमुख अंश

हिंदी आलोचना के इस प्रतिष्ठित सम्मान पर आपकी त्वरित टिप्पणी ?

यह सम्मान देवी शंकर अवस्थी की स्मृति में दिया जाता है, जिनकी अकाल मृत्यु हो गई थी। उनकी आलोचना में जो ताजगी, अंतर्दृष्टि, खुलापन और सृजनशीलता मिलती है, उसकी दरकार युवा आलोचना से सदैव रहती है। यह पुरस्कार उनकी स्मृति को स्थायी बनाने का सुंदर उपक्रम है, जो एक तरह से आलोचना के यौवन को समर्पित है। सुखद है की यह न तो किसी सरकार और न ही किसी कॉरपोरेट घराने का है। इसलिए इसे हासिल करने में मुझे बेहद खुशी है।


किसी भी रचनाकार के लिए उसकी रचना धर्मिता के संदर्भ में कोई सम्मान कितना महत्वपूर्ण होता है?

देखिए, यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह सम्मान कौन दे रहा है और उसे किस रास्ते से पाया गया। मैं इतना कहूंगा कि मेरी राजनीति साम्राज्यवाद और सामंतवाद का विरोध है, मेरी विचारधारा मार्क्सवाद है और मेरा कर्मक्षेत्र, साहित्य और संस्कृति है। अगर किसी पुरस्कार से इन बुनियादी प्रतिबद्धताओं में कोई विचलन नहीं आता, तो वह मेरे लिए इस बात कि तसदीक है कि मेरी बुनियादी दिशा ठीक है। ऐसा ही मैं अन्य लोगों के लिए भी सोचता हूं।


किसी रचना पर आलोचनात्मक टिप्पणी क्यों और कितनी जरूरी है?

बेहद जरूरी है, क्योंकि हर लेखक की इच्छा होती है कि उसे क्रिटिकल पाठक मिले, जो न सिर्फ उससे प्रभावित हो, बल्कि उसे यह भी बता सके कि वह क्यों और किन अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाया।


आज हिंदी आलोचना की जो दशा-दिशा है, उससे आप कितना संतुष्ट हैं?

हिंदी आलोचना के बहुत से अधूरे कार्यभार, जैसे ऐतिहासिक समाजशास्त्रीय दृष्टि को मुक्तिबोध ने एक खास मंजिल तक पहुंचाया था, वह कहीं खो गई लगती है। आलोचना के क्षेत्र में कई तरह के वैश्विक सिद्धांत हमारे हिंदी साहित्य में बिना परीक्षण और कभी-कभी अनजान में व्यवहार में लाए जाते हैं। हिंदी आलोचना की शुरुआत में ही आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपनी जमीन पर खड़े होकर उससे बहस की, जो कुछ भी पश्चिम में लिखा-पढ़ा जा रहा था। पर आज हम इसका अनुकरण नहीं करते हैं। आज जरूरत इस बात की है कि आलोचना अपनी इस परंपरा का वहन करे।


आलोचना का मुख्य दायित्व क्या है?


जन आंदोलन के साथ दूसरे सामाजिक अनुशासन, उद्योग, तकनीक और विज्ञान से साहित्य के संबंध को परिभाषित करना और हमारे समाज को अधिक समतावादी, तरक्की पसंद, खुला और धर्मनिरपेक्ष बनाने में साहित्य की उपादेयता को सिद्ध करना ही आलोचना का मुख्य कार्यभार है।


क्या आलोचना भी समय और समाज की परिवर्तनशीलता से प्रभावित होती है?

हिंदी आलोचना के लिए तीन घटनाएं ऐसी हुई हैं, जिन्होंने समाज और राजनीति ही नहीं, हमारे साहित्य को भी बहुत प्रभावित किया। इसमें से पहली घटना सोवियत संघ के विघटन के बाद एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था का बनना। दूसरी घटना थी- देश में एक ओर सांप्रदायिक फासीवाद का उभार, तो दूसरी ओर वर्ग की जगह अस्मितावादी क्षेत्रीय, जातिगत कोटियों में जनता का ध्रुवीकरण। तीसरी घटना थी, उत्तर आधुनिकता का एक वैश्विक चिंतन पद्धति के रूप में बढ़ावा। इन घटनाओं के कारण हमारी आलोचना पर एक गहरा विभ्रमकारी असर हुआ।


हिंदी में भी आलोचना खेमों में बंटे नजर आते हैं, इसका आलोचकीय संदर्भ में कितना नफा-नुकसान है?

वैचारिक आधार पर खेमे बनें, तो दिक्कत की बात नहीं है। हिंदी आलोचना इसकी गवाह है कि अलग-अलग विचारधारा के लोग एक ही मंच पर गंभीर बहसें करते हुए एक-दूसरे से लड़कर सीखते रहे हैं। हां, व्यक्तिगत गोलबंदी, लाभ-लोभ की दृष्टि नहीं होनी चाहिए।


इन दिनों क्या कर रहे हैं?

इन दिनों मैं उत्तरवादी सिद्धांतों से जूझ रहा हूं, क्योंकि हिंदी में इनका अनालोचनात्मक अनुकरण मुझे पसंद नहीं है। जहां तक अगली योजनाओं का प्रश्न है, तो 21वीं सदी के समाजवाद के यथार्थ और सपने को लेकर मन में कशमकश जारी है, जिसके बारे में बहुत कुछ पढ़ना-लिखना है।

सभार-अमर उजाला

Sunday, November 30, 2008

'बेहतर विकल्प'....!


निर्दोष लोगों की हत्याओं को कभी भी जायज नहीं ठहराया जा सकता। मुंबई की घटना को लेकर व्यवस्था पर सवाल उठाना गलत नहीं है। लेकिन अगर इस सवाल को विज्ञापनबाज नजरिए से धार्मिक हिंसा में यकीन रखने वाले ही उठाने लगें तो हमें सतर्क हो जाना चाहिए। क्योंकि यह फिर से हमें ऐसी ही हिंसा के आस पास लाकर पटकने की साजिश है।
पिछले दिनों मुंबई में जो कुछ भी घटा उसने आम हिंदुस्तानियों को भले ही झकझोर दिया हो लेकिन धार्मिक आतंकवाद के खास चेहरे ने राहत की सांस ली है। हमारे लिए अब यह चेहरा अजनबी नहीं है। सूचना से जुड़े सबसे सशक्त माध्यम भी उसके काले चेहरे को बेहतर राजनीतिक विकल्प के रूप में स्थापित करने की कोशिश में जुट गए हैं। लेकिन हमें मुंबई और मालेगांव दोनों की हकीकत को समझते हुए 'बेहतर विकल्प' की इस हकीकत को बेनकाब करना होगा।

Wednesday, October 1, 2008

फिर परमाणु समझौते पर विवाद क्यों था...


भारत-अमेरिकी परमाणु समझौते पर अमेरिकी संसद में बुधवार रात दस बजे बहस होगी। अमेरिकी संसद बहस और वोटिंग पर इस शर्त के साथ तैयार हुई है कि भारत कोई परमाणु परीक्षण नहीं करगा। इस शर्त को न मानने पर परमाणु समझौता खत्म हो जाएगा। परमाणु समझौता खत्म होने के बाद भी भारत को एक प्रमाण पत्र देना होगा कि उसने परीक्षण में अमेरिकी तकनीक का इस्तेमाल नहीं किया है।

Thursday, September 25, 2008

आपराधिक अर्थशास्त्र की शिनाख्त


मौजूदा आर्थिक संकट को समझने के लिए बस एक ही उदाहरण काफी है वह है हर्षद और केतन पारीख जैसे लोगों की करतूत पर नजर डालना। जिस तरह केतन पारीख और हर्षद मेहता ने बैंकों के पैसे का इस्तेमाल किया उसी तरह बड़े रूप में जो लीमन और बाकी इन्वेस्टमेंट बैंकर्स ने किया। हमारे देश में तो यह व्यक्तिगत और सीमित दायरे वाला प्रयोग था जो काफी हद तक सफल रहा है। बस थोड़ी बहुत अड़चने थी वो रेगुलेटरी यानी नियामकों की ओर से आ रही थीं। जिसे अब नई अर्थनीति के तहत हटा दिया गया है। अब आपके पीएफ वाले पैसे रिलायंस या कोई दूसरी कंपनी मैनेज करेगी। ज्यादा मुनाफा मिलेगा। क्योंकि अब हर्षद का संस्थानीकरण हो चुका है। लेकिन जिस मॉडल को हम अपने कानून के साथ आजमा रहे थे। पूंजी को पूर्णतया कनवर्टेबल बनाने जा रहे थे तभी यह खतरे में कैसे पड़ गया। आका के देश की हालत खराब होने लगी है। सभी डुबती कंपनियों को आका खरीद रहे हैं कहां हम बेचन आयोग बनाकर संभावना तलाश रहे थ। हमारे चापलूस पत्रकार संसद में बहुमत के बाद न जाने कौन-कौन से आर्थिक सुधार की गुंजाइश देख रहे थे। लेकिन अब तो आका ही अपने देशवाशियों से 700 अरब डॉलर की भीख मांग रहे हैं और साथ में चेतावनी भी दे रहे हैं।
हम इस लोभी अर्थव्यवस्था के तमाम पहलुओं तक आपको ले जाएंगे जो इसे संकट तक ले गईं। यह कोई चौंकाने वाली घटना नहीं है बल्कि यह हर सदी में इसे ले जाती है। लेकिन इससे सबक लेना बहुत जरूरी है क्योंकि जब-जब यह संकट में फंसदी है तो उससे उबरने के क्रम में यह भयानक मानवीय अपराध को जन्म देती है। तेल और हथियार हासिल करने की कोशिश तेज होगी। क्रुरता भरे युद्ध के बहुत मानवीय कारण होंगे। लेकिन हम सबसे पहले इस आपराधिक अर्थव्यवस्था के तर्कों को सजगता के साथ समझना होगा।

वित्तीय बाजार में पूंजी संचय या कैपिटल एकुमलेशन की तय परणति ने उन तर्कों को बिखेर कर रख दिया, जिसमें पूंजी को आवारा बनाने में ही भलाई बताई जाती थी। लेकिन हैरत की बात यह है कि इस संकट का दोषारोपण महज कुछ सीईओ और उपरी अधिकारियों की गलती के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन अर्थशास्त्री फ्रिडमैन और अमेरिकी राष्ट्रपति उम्मीदवार मैकनेन अब मानने लगे हैं कि यह लालच और भ्रष्टाचार की परणति हैं। अर्थशास्त्र की संतुलनवादी विचारधारा के समर्थक मुंह छुपाते घुम रहे हैं।

लेकिन हमें यह सब समझने के लिए इनके रेगुलेटरी यानी नियामकों में सुधारों की प्रक्रिया पर गौर करना जरूरी है। 1970 स्टॉक ट्रेडिंग से ई रुकावटें कानूनी रूप से हटाई गई। जिसमें इन्वेस्टमेंट बैंकर्स और बैंक की भूमिका को अलग रूप में देखता था। 1990 में Glass-Steagall जैसे कानून को भी पिछली सीट पर बिठा दिया दिया। इस रियायत के साथ ही बैंक और इन्वेस्टमेंट बैंकर्स के बीच का फर्क पूरी तरह दूर हो गया। । बैंकर्स और निवेशक एक बन गए। Glass-Steagall के खात्मे के बाद इन्वेस्टमेंट बैंकर्स ने न केवल ट्रेडिंग में हांथ पांव फैलाना शुरू किया बल्कि वे कॉमर्शियल बैंक की उस पूंजी को भी बाजार में ले जाने लगे जो लोगों ने मेहनत से जमा की थी। जाहिर यह काम कॉमर्शियल बैंक की मिलीभगत से होता था और सरकार इसके लिए कानूनी सहुलियते प्रदान कर रही थी। धीरे-धीरे AIG जैसी बीमा कंपनियां भी इस कारोबारी गठजोड़ में शामिल हो गईं। मुनाफा कमाने की होड़ में वे मनी मार्केट तक कसे लिवरेज फंडिंग उगाहने में एक-दूसरे से होड़ लेने लगे। इसी लिवरेज में वे सिक्यूर्टाइजेशन के बिजनेस में बूरी तरह घुस गए। (जारी...)

Wednesday, September 10, 2008

पार्टिकल भौतिकी का इम्तहान


आज भौतिकी के पांच सिद्धांतों के सही गलत पर फैसला शुरू हो रहा है।। इन सिद्धांतो को विकसित करने के लिए वैज्ञानिकों ने अपना जीवन लगा दिया। हम पाठकों को बताने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर कौन से हैं वे पांच सिद्धांत और किस तरह से एलएचसी प्रयोग उन्हे कटघरे में खड़ा कर सकता है-
1-बिंग बैंग सिद्धांत- लार्ज हड्रॉन कोलाइडर्स में क्वार्क ग्लुआन प्लाज्मा तैयार करेगा। यह ऐसा तत्व है जो बिगबैंग के ‘तत्काल’ (मिली सेकेंड) बाद की अवस्था में मौजूद होता है। उस वक्त क्वार्क ग्लुआन प्लाज्मा अवस्था का तापमान सूरज के तापमान से 100,000 गुना ज्यादा होगा। लेकिन यह तेजी से ठंडा होकर क्वार्क में तब्दील होगा और बाकी कणों में विलीन हो जाएगा। यही वह कण है जिसे वैज्ञानिक देखने की कोशिश करेंगे। अगर वे इसे परख लेते हैं तो यह जानना आसान हो जाएगा कि आखिर न्यूट्रान और प्रोटान 100 गुना भारी क्यों हो जाते हैं।
वैज्ञानिक इस प्रयोग में एक ब्लैक होल पैदा करेंगे। जो इस प्रयोग को आलोचना के घेरे में ले लिया है। कुछ लोगों का मानना है कि अगर सुई की आंख के बराबर भी ब्लैक होल पैदा होगा तो सारी पृथ्वी को लील लेगा। लेकिन प्रयोग करने वाले इसे मजाक मानते हैं उनका कहना है कि वे एक लैंप के बराबर भी इस ब्लैक होल से एनर्जी नहीं निकलने देंगे।
2-सट्रींग सिंद्धांत- स्ट्रींग सिद्धांत मानता है कि कण शून्य आयाम वाला न होकर एक आयामी तार की तरह होता है। लेकिन इस प्रयोग से इस तैरते तार वाले आयाम की समझ तब संकट में पड़ सकती है जब एका नाम का कण का आयाम ऐसा न साबित करे।
कुछ वैज्ञानिक एका स्पार्टिक्लस नाम के कण को 11 वें आयाम से मिला संकेत मानते हैं। इस प्रयोग के बाद यह तय हो जाएगा कि वाकई दुनिया 11 आयाम वाली है। जिसमें से चार आयाम का तो हम अनुभव कर लेते हैं लेकिन बाकी सात आयाम प्रकृति की ताकत को एकीकृत करते हैं।

3-‘हमारा अकेला यूनिवर्स नहीं है’ सिद्धांत
अगर वैज्ञानिक इस प्रयोग के जरिए ग्लुआन के सुपर सिमेट्रिक पार्टनर्स यानी ग्लुयानो को ढूंढ लेते हैं तो यह माना जा सकता है कि हम यूनिवर्स में अकेले नहीं हैं यानी हमारा यूनिवर्स इकलौता नहीं है।
4-यूनिवर्स का डार्क मैटर सिद्धांत –आज वैज्ञानिकों का बड़ा हिस्सा मानता है कि ब्रह्मंड का 96 फीसदी हिस्सा डार्क मैटर और उर्जा से बना है। जिसे न तो हम देख सकते हैं और शायद ही खोज सकते हैं। वैज्ञानिक मानते है कि यूनिवर्स का 26 फीसदी हिस्सा डार्क मैटर से बना है। इसका अहम तत्व है न्यूट्रिलिआनो है। वैज्ञानिक मानते हैं कि अगर यह पता चल जाय कि न्यूट्रिलिआनो ही इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है तो इसका उत्पादन करना आसाना होगा। एलएचसी के प्रयोग के दौरान अगर मलवे में न्यूट्रिलियानों मिलता है तब तो डार्क मैटर सिद्धांत बना रहेगा अन्यथा यह सिद्धांत भी सवालों के घेरे में होगा।

5-पार्टिकल भौतिकी का स्टैंडर्ड मॉडल –अगर हिग्स पार्टिकल या हिग्स की तरह के पार्टिकल्स मिलते हैं तो यह बहुत बड़ी खोज नहीं होगी। लेकिन ऐसा भी संभव है कि यह पार्टिकल भौतिकी में नए मोर्चे खोल दे। कुछ वैज्ञानिक मान रहे हैं कि एलएचसी प्रयोग में जो टक्कर से मलवा पैदा होगा उसमें केवल हिग्स पार्टिकल्स ही मिलें और कुछ नहीं। यानी प्रोजेक्ट की असलफलता।

Thursday, September 4, 2008

सिक्रेट लेटर की कॉपी

कुछ लोगों ने अमेरिका-भारत परमाणु समझौते के बारे में अमेरिकी सरकार के उस सिक्रेट लेटर की कॉपी मांगी है। जिसे हम पीडीएफ फाइल में उपलब्ध करा रहे हैं। लेटर की ओरिजनल कॉपी के लिए क्लिक करें।

Sunday, June 29, 2008

कौन हैं ये फ्यूचर ट्रेडर?


वित्तीय अर्थव्यवस्था के नुमाइंदे तब तक संकट नहीं मानते जब तक शेयर ब्रोकर छतो से छलांग न लगाना शुरू कर दें। अर्थशास्त्री ड्यूजनबरी जब बताते हैं कि हम इनकम बढ़ने पर जिस तेजी से उपभोग करना शुरू करते हैं उतनी तेजी से अगर इनकम घटती है तो उपभोग को पुराने स्तर पर नहीं ला पाते। यह कमजोरी ही वित्तीय अर्थशास्त्र की ताकत है। छुटभैये निवेशकों से लेकर हेज फंड मालिकों और सरकारों तक को वित्तीय संकट की बात अभी भी नहीं पच रही है। वे नहीं मानेत कि दुनिया के आर्थिक विकास में 1970 से ही लगातार दशकीय ग्रोथ कम होता गया है। हालांकि आंकड़े लगातर बयान कर रहे हैं कि 70 के दशक का ग्रोथ रेट 60 से कम है और 80 का 90 से कम है। यह सिलसिला थमा नहीं है और 2000 सबसे कम ग्रोथ रेट वाला रहा है। यह दौर रहा है जब रियल इकोनॉमी वित्तीय सट्टेबाजी वाली अर्थव्यवस्था में बदल रही थी। सट्टेबाजी नीति अपने को बचाने में हर कोने को झासा दे रही है। फ्यूचर ट्रेडिंग इसका सीधा सबूत है। महंगाई अन्न की वजह से है या फिर कच्चे तेल से यह सरकारें समय समय पर तय करती रही हैं लेकिन दोनों में फ्यूचर ट्रेडिंग के सटोरिए कैसे व्यवहार करते हैं यह जानना काफी दिलचस्प है। इसमें सबसे पहले हम कच्चे तेल की कीमतों में घुसे सटोरियों की पड़ताल करेंगे। हम उनके कारोबार के तौर तरीके जानेंगे और देखेंगे कि आखिर 13 साल की महंगाई का रिकॉर्ड की पूंछ किनके पैरों के तले दबी है।
तेल संकट या सबप्राइम नुकसान की भरपाई
यह सवाल शायद आपके सामने पहली बार आ रहा होगा कि आखिर सबप्राइम संकट में मार खाए बैंकर्स अब कच्चे तेल के फ्यूचर ट्रेडिंग से कितना मुनाफा बटोरना चाहते हैं। क्या यह मुनाफा सबप्राइम घाटे को पूरा कर पाएगा।
सबसे पहले हम मौजूदा तेल बाजार में फ्यूचर कारोबारियों की भूमिका पर नजर डालेंगे। कच्चे तेल की कीमत 138 डॉलर प्रति बैरल पर है तो उसका 60 परसेंट हिस्सा अनरेगुलेटेड फ्यूचुर्स स्पेकुलेशन का है। यानी उस हिस्से पर अधिकार फ्यूचर ट्रेडर्स का है। ट्रेडर्स यह हिस्सेदारी लंदन के आईसीई फ्यूचर्स और न्यूयार्क के नाइमेक्स के अलावा अनरेगुलेटेड इंटर बैंक या ओवर काउंटर ट्रेडिंग एजेंसिया खरीद रहे हैं। अमेरिकी मार्जिन रूल के तहत सरकारी फ्यूचर ट्रेडिंग कॉरपोरेशन सट्टेबाजों को नाईमेक्स पर कांट्रैक्ट के महज 6 परसेंट कीमत पर सौदा करने की इजाजत देता है। अगर आज कीमत 138 डॉलर प्रति बैरल है तो सट्टेबाज महज 9 डॉलर प्रति बैरल कीमत चुकाकर फ्यूचर्स ट्रेडिंग कर सकते हैं। बाकी 129 डॉलर वह उधारी के रूप में ही कारोबार करेगा। कीमतों में 17 गुना की कम जोखिम पर मिलने वाली रियायत कच्चे तेल के खुले बाजार में कीमतों को बढ़ाने की सबसे खास वजह है।


अब देखिए कि इस सट्टेबाजी के किरदार कौन लोग हैं। इसके सरताजों में शामिल हैं गोल्डमैन सैक्स, मार्गन स्टेनले, ब्रिटिश पेट्रोलियम, फ्रेंच बैंकिंग समूह Société Générale,बैंक ऑफ अमेरिका और स्विस बैंक मर्क्यूरिया। इनमें से ज्यादातर संस्थाएं प्रत्यछ या परोक्ष रूप से सबप्राइम में भारी घाटा उठा चुकी हैं।
लंदन स्थित इंटरनेशनल पेट्रोलियम एक्सचेंज का नियंत्रण ब्रिटिश पेट्रोलियम के हाथो में है। यह एनर्जी फ्यूचर एंड ऑप्शन कारोबार कारोबार का सबसे बड़ा एक्सचेंज है। जिसे आईपीई के नाम से लोग जानते हैं। थोड़ा इस कंपनी के भीतर चलते हैं। इस कंपनी के मुख्य शेयरधारक गोल्डमैन सैक्स और मार्गन स्टैनले है। आखिर फ्रेंच अखबार ले मोंडे की प्रतियां क्यों चंद मिनटों में साफ हो गई जिसमें उन संस्थाओं के नाम थे जो तेल की कीमतों के बारे में अफवाह फैलाने के लिए मुंह मांगी रकम दे रही थे। उन संस्थाओं में शामिल था फ्रांस का Société Générale, बैंक ऑफ अमेरिका, ड्यूश बैंक पूरी तरह शामिल थे। (देखें-Miguel Angel Blanco, La Clave, Madrid, June 2008)
जारी...

Friday, March 21, 2008

मौलिकता के बदलते प्रतिमान



कभी-कभी बचकानी बहस बड़ी बहस में बदल जाती है। हिंदी ब्लॉग के लेखन या टिप्पणी से कई बने बनाए विचारों और विचारकों की इमेज बन बिगड़ रही है। नए सवाल चाहे जिस मजबूरी में अपने दौर में नहीं उठाए गए हों या उन पर सुनवाई नही हुई हो वह फिर से उठाए जा रहे हैं। हालांकि कई बार लग सकता है कि ये तो नए अनुभवों और विकास क्रम से कटकर बात चलाई जा रही है। मानने या न मानने की जिद फिर भी चलेगी। कुछ लोग सही संदर्भ में समझने की मांग उठा सकते हैं। यहां जिन सही संदर्भ की मांग होगी वो हिंदी ब्लॉग या किसी दस्तावेजी माध्यम के बजाय आचार-व्यवहार वाली जगहों पर ही ढूंढना बेहतर होगा।
जो भी हो आचार-व्यवहार को दर्शन से अलग करके देखने की धारा से लेकर टॉफ्लर के विचार के जरिए मौलिकता के छटपटाते हाथ ने एक बेहतरीन बहस को जन्म दिया है। हमारी कोशिश होगी कि बहस स्वस्थ रहे, लेकिन गलत या सही होने की प्रवृत्ति पर खुलकर बातें होंगी। यहां दार्शनिक से लेकर सामाजिक विचलन की सीमाओं को गाढ़े रंगों के साथ दिखाया जाएगा। हम व्यक्ति विशेष की हरकतों को ताक पर रखने की कोशिश करेंगे। इसी उम्मीद के साथ हम बहस में हस्तक्षेप कर रहे हैं।
-प्रसून
मौलिकता पर बहस शुरू हुई। जिसमें आरोप लगा कि एक विचारधारा विशेष लोगों को टाइप्ड बनाती हैं। अनुभवजनित बात को बहुत बड़े स्तर पर उठाया गया है। हालांकि यह सवाल, मनचाहे जवाब के आग्रह के साथ उठाया गया, लेकिन इस सवाल और जवाब के सिलसिले ने अर्थ, दर्शन, समाज विज्ञान की भूमिका पर भी सवाल खड़ा करना शुरू किया। इसमें एक विचारधारा को केंद्र में करके कही गई बात कुछ खास विचारों के समर्थन में कही गई है। अब इस पर लौटते हैं कि बात क्या है।
अनुभव के आधार पर टाइप्ड किस्म के लोगों की संख्या का हवाला देते हुए यह बताना कि मौजूद व्यवस्था किसी भी चीज को रेडिमेड बनाती है। वस्तुओं से पहले यह प्रक्रिया इंसानों में विकसित करने का दोष एक विचारधारा विशेष पर मढ़ा गया है(हम ज्ञान की संचयी अवधारणा को अगर बरकार रखें तो पाठकों को आसानी होगी और लेखक की इमानदारी और बढ़ेगी)। लेकिन थर्ड वेब के मशहूर लेखक अल्विन टॉफ्लर को जिसने भी पढ़ा होगा उसे छटपटाती मौलिकता की अपील थोड़े ठीक ढंग से समझ में आएगी। टॉफ्लर का अंतिम प्रायोजन संस्कृति के बायोलॉजिकल मॉडल के आधुनिक संस्करण तक जाना रहा है। बायोलॉजिकल मॉडल संस्कृति को बहुत स्थिर चीज मानकर चलता है। इस विचार के अनुसार संस्कृति का जो भी मॉडल है उसमें भाषा प्राथमिक महत्व की चीज है। इसी विचार से यह बात निकली कि हर भाषा बोलने वालों की अपनी एक अलग संस्कृति है। जिसे टॉफ्लर के टाइप्ड नुमा चश्मे ने सांस्कृतिक एकरूपता जैसी चीज को जन्म दे दिया। बाकी लेखकों ने भी कम्यूनिज्म के मामले में इस तर्क का पूरा प्रयोग किया है। खासकर नोबेल पुरस्कार वाले लेखकों ने। लेकिन अब यह साफ हो चुका है कि सास्कृति व्यवहार के अध्ययन का ये मॉडल नस्लवाद का घनघोर समर्थक है। जो कि विचारधारा विशेष को एक ठहराव में देखने की आदि हो जाती है वह बताना शुरू कर देती है कि फलां विचारधारा में मौलिकता नष्ट हो रही है।
आखिर ये नजरिया पैदा किस तरह से होता है। सबसे पहले रूप के स्तर पर बात शुरू होती है। लेकिन बायलॉजिकल मॉडल का सबसे असरदार हथियार भाषा रहा है। नए दौर का मॉडल भी भाषाई स्थिरता से ही अपनी बात शुरू करता है। क्योंकि यहां आलोचना एक विचारधारा को स्थापित होने से रोकने के एवज में शुरू की जाती है। रूपवादी विचारधारा का आधुनिक संस्करण तो थोड़ा और आगे बढ़ जाता है वह मानता ही नहीं कि कोई कला भी किसी विचार विशेष की वाहक हो सकती है।
इस बहस में एक बात ये उठ रही है व्यक्तिवाद को कम्यूनिस्ट विचारधारा ने खलनायक मान लिया है इसलिए मौलिकता का टोंटा पड़ गया। हालांकि जिन देशों में व्यक्तिवाद का आधुनिक रूप मौजूद है वह अपने सौदर्यबोध तक में विविधता नहीं ला पाए। विचारों की बात तो छोड़ दीजिए। लेकिन यहां बात केवल मौलिकता के बहस पर आकर नहीं टिकती। जैसा कि यह विचार मान रहा है कि कला और विज्ञान के विकास के लिए व्यक्तिवाद जरूरी है। यहां तक तो ठीक है लेकिन ये मांग दर्शन के खास दायरे में रहते हुए बहस की गुंजाइश ढूंढता है। ऐसा दर्शन जो आचार-व्यवहार से परे हो। आचार-व्यवहार से परे जाने की कोशिश का अर्थ हुआ कि दर्शन पर उस नजरिए से बहस करना जहां व्यक्तिवाद को पूजा जाता हो। ऐसे में फिर ज्ञानमीमांशीय स्वतंत्रता की मांग करनी होगी। इस कोशिश से यह बात सामने आती है कि कला और विज्ञान को भी परोक्ष तरीके से रूपवादी नजरिए से देखने की मांग कर बैठते हैं।
जॉन क्रो रैंन्सम की पुस्तक द न्यू क्रिटिसिज्म, जिसे दुनिया नई आलोचना वाले आंदोलन के स्रोत के रूप में देखती है, उसका खास जोर विचारधाराओं के आतंक से कला को मुक्त करने का रहा है। यह मौलिक बनाने की ऐसी मांग कर बैठती है जिसमें केवल रूप पर बहस के लिए जगह बचती है। इस स्कूल ने नारा तक दे दिया कि रिटर्न टू रेटरिक यानी अलंकार की ओर लौट चलो। अंतर्वस्तु से नहीं रुप से कला मौलिक बनती है।
हालांकि अपनी कविताओ पर विचार करते समय कुछ लेखक इसे नकार रहे है। वे कविता के निरपेक्ष स्वायत्तता की अपील को खारिज कर देते है। थोड़ा आगे बढ़कर कहें तो उन्हे अपनी कविता के मामले में मौलिकता की समस्या नहीं लगती।
लेकिन दूसरे पहलू से साहित्य, कला और विज्ञान के बारे में खलनायक व्यक्तिवाद की जरूरत क्यों पड़ रही है। हम साफ करते चलें कि व्यक्तिवाद ही अपने अंतिम निष्कर्षों में रूपवाद तक पहुंचता है। कला दर्शन में इस रूपवाद को पूरे साहित्य पर लागू कराने वाले मार्क शोरर के जरिए हम इसके लक्ष्य को ठीक से बता पाएं शोरर लिखते हैं कि (हडसन रिव्यू के मशहूर लेख टेक्निक एज डिस्कवरी के लेखक) “आधुनिक समीक्षा ने यह दिखा दिया है कि वस्तु की चर्चा करना कला की जरूरत नहीं बल्कि अनुभव की बात करना है..” अनुभव यानी आचार व्यवहार पर कला या साहित्य को तौलना कला की जरूरत नही हैं।
विज्ञान के विकास में व्यक्तिवाद की भूमिका पर भी बात उठी है। विज्ञान का विकास अनायास तो होता नहीं है। जरूरत के मुताबिक ही यह विकसित होता है। विज्ञान अपने मूल स्वरूप में समाजवादी इस नजरिए से होता है कि यह संचित ज्ञान पर आधारित होता है। जे डी बर्नाल के शब्दों में कहें तो “विज्ञान के अभिप्राय और मूल्य की अंतिम निर्णायक जनता होती है। लेकिन जहां विज्ञान को मुट्ठीभर लोगों के हाथों में रहस्य बनाकर रखा जाता है, वहां वह अनिवार्य रुप से शासक वर्ग के हितों से जुड़ जाता है। वह उस समझदारी और प्रेरणा से कट जाता है, जो जनता की आवश्यकताओं और क्षमताओं से पैदा होती है”।
शायद यही वजह है कि विज्ञान का विकास सबसे ज्यादा तब हुआ जब व्यक्तिवाद का केंद्र टूट रहा था।
कुल मिलाकर मौलिकता के आग्रह पर बात आकर टिकती है कि वह किस नजरिए से मौलिक होने का आग्रह लिए हुए विकसित होती है। उसकी मौलिकता हितों के संघर्ष में व्यक्ति के साथ खड़ा होता है या फिर समाज के साथ। (जारी..)