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Thursday, April 7, 2011

अन्ना हजारे को जसम का समर्थन


साथियों,
श्री अन्ना हजारे को जन लोकपाल विधेयक को लागू करने के लिए आमरण अनशन पर बैठे आज तीसरा दिन हो गया. देश भर से इस आन्दोलन को भारी समर्थन मिल रहा है. कई स्थानों पर हमारे साथियों ने प्रतिवाद में भाग लिया है. कल यानी ९ अप्रैल को कल जन संस्कृति मंच के साथी प्रो मैनेजर पाण्डेय के नेतृत्व में सुबह ११ बजे जंतर मंतर अपना समर्थन जताने पहुंचेंगे. आप सभी से अनुरोध है कि मित्रों, साथियों के साथ वहां कल पहुंचे और आन्दोलन को ताकत पहुचाएं. अभिवादन सहित , आपका प्रणय कृष्ण

Sunday, March 21, 2010

सृजनोत्सव: जनसंघर्ष और प्रतिरोध के संस्कृतिकर्म को राष्ट्रीय मंच देने की पहल

सो रहा संसार, पूंजी का विकट भ्रमजाल
किन्तु फिर भी सर्जना के एक छोटे से नगर में/ जागता है एक नुक्कड़
चिटकती चिंगारियां/ उठता धुंआ है/ सुलगता है एक लक्कड़
तिलमिलाते लोग सुनकर, देखकर अन्याय
और लड़ने का अब भी बनाते मन मछन्दर
फिर नए संघर्ष का उन्वान लेकर/ जाग मेरे मन मछन्दर


एक ओर सामाजिक-आर्थिक प्रगति के झूठ के प्रचार और अपने लूट को ढंकने वाली सत्ता संस्कृति के विज्ञापन और दूसरी ओर अराजक तरीके से किए जा रहे उपभोक्ता उत्पाद कंपनियों के विज्ञापन, बिहार में आजकल पहली नज़र में इसी की भरमार दिखती है. जनता के बुनियादी सवालों को घनघोर विज्ञापनबाजी के जरिए ढंक देने की जैसे एक जबर्दस्त कोशिश चल रही है. ऐसे ही समय में जसम ने बिहार की राजधानी पटना में 12से 14 मार्च तक जनकवि नागार्जुन की स्मृति को समर्पित सृजनोत्सव का आयोजन किया. जिसका उद्घाटन करते हुए जनसंस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण ने कहा कि सृजनोत्सव पूरे मुल्क में विभिन्न भाषाओं, बोलियों और कलारूपों में जनता के रोजमर्रे के संघर्षों और आन्दोलनों को एक मंच देने की ‘शुरुआत है. उद्घाटन वक्तव्य से पहले पंजाब से आए मेहनतकश जनता और दलित स्वाभिमान के संघर्षशील प्रतीक बन चुके जनगायक बन्त सिंह ने जिस तरह किसान-मजदूरों की एकता की जरूरत बताते हुए अपने गीत में न्याय के लिए लड़ने वाली बेटियों की आकांक्षा को स्वर दिया उसके जरिए भी इस आयोजन का मकसद अभिव्यक्त हुआ. अपने बेटी के बलात्कारियों को दण्डित करवाने के संघर्ष के दौरान कांग्रेस समर्थक जमीन्दारों ने बन्त सिंह के पैर और हाथ काट दिए थे, मगर इसके बावजूद प्रतिरोध की संस्कृति और राजनीति के लिए वे उतने ही बुलन्द इरादे से सक्रिय हैं.

अपने उद्घाटन वक्तव्य में प्रणय कृश्ण ने कहा कि हिन्दुस्तान अभी भी करोड़ों मेहनतकशों का राश्ट्र नहीं बन सका है. ‘शासकवर्ग और बाजार के जरिए जिस संस्कृति को पेश किया जाता है, वहां मेहनतकशों की राष्ट्रीय संस्कृति नज़र नहीं आती. प्रभु वर्गों की कुलीन संस्कृति में मेहनतकश आदिवासी जनता सिर्फ सजावटी हिस्सा बनकर रह जाते हैं. उनके जीवन के संघर्ष, उनकी पीड़ा और उनकी आकांक्षा को वहां जगह नहीं मिलती. जिस तरह अमेरिका में रेड इण्डियन को नष्ट करके संग्रहालयों की चीज बना दिया गया, उसी तरह का व्यवहार यहां ‘शासकवर्ग आदिवासियों के साथ कर रहा है, जिसका जोरदार प्रतिरोध जरूरी है. यह सृजनोत्सव मेहनतकश जनता के संघर्ष और प्रतिरोध की संस्कृति तथा उनकी साझी राश्ट्रीय संस्कृति को ताकतवर बनाने और एक बेहतर मानवीय व्यवस्था के लिए जारी जद्दोजहद का एक अंग है.
प्रणय कृष्ण ने कहा कि नागार्जुन की पूरी जिन्दगी और उनका रचनाकर्म जनकार्रवाइयों और जनान्दोलनों के जरिए निर्मित हुआ था, नागार्जुन के साथ ही यह वर्ष केदारनाथ अग्रवाल, ‘शमशेर, अज्ञेय और फैज का भी जन्मशताब्दी वर्ष है. जसम की ओर से इस दौरान जन संस्कृति की परंपरा के मूल्यांकन और उसे मजबूत बनाने के लिहाज से इन सारे रचनाकारों पर पूरे देश में आयोजन किए जाएंगे.

मैथिली कथाकार अशोक ने निरन्तर बढ़ती आत्मकेन्द्रित संस्कृति के प्रति फिक्र जाहिर करते हुए नागार्जुन के जनजुड़ाव को एक जरूरत की तरह याद किया. अध्यक्षता कर रहे लोकयुद्ध पत्रिका के संपादक बृजबिहारी पाण्डेय ने कहा कि झूठ, लूट और दमन की ‘शासकवर्गीय संस्कृति के खिलाफ प्रतिरोध की सारी परंपराओं को साथ लेकर आगे बढ़ना होगा. यह वर्ष स्वामी सहजानन्द सरस्वती का भी जन्मशती वर्ष है, जिनके नेतृत्व में चले किसान आन्दोलन में व्यक्ति और रचनाकार दोनों स्तर पर नागार्जुन शामिल थे.

आज के सांस्कृतिक संघर्षों के लिए हम अपनी परंपरा से क्या ले सकते हैं, इसकी बानगी सृजनोत्सव में विभिन्न कलारूपों और विधाओं तथा भाषाओं और बोलियों में हुई प्रस्तुतियों में नज़र आई. एक ओर हिरावल (पटना) ने भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के बेहद लोकप्रिय नाटक को आज के ‘शासकीय दमन के सन्दर्भों से जोड़कर पेश किया, वहीं दस्ता (बनारस) ने इंकलाबी ‘शायर वामिक जौनपुरी की रचनाओं को गाकर सुनाया. चर्चित युवा रचनाकार हरिओम द्वारा पूरे दक्षिण एशिया में मशहूर इंकलाबी ‘शायर फैज अहमद फैज की कई मकबूल गजलों और नज्मों को एक नए अन्दाज में पेश किया. इस तरह साझी संस्कृति और साझी विरासत के साथ ही इंकलाब के ख्वाब के प्रति हमारे दौर के संस्कृतिकर्मियों का जुड़ाव प्रदर्शित हुआ.
सृजनोत्सव का एक जबर्दस्त आकर्षण था भारत के महान जनवादी चित्रकारों चित्तप्रसाद, जैनुल आबेदीन और सोमनाथ होड़ के चित्रों की प्रदर्शनी. इस जनचित्रकला की परंपरा से लोगों को परिचित कराने में चित्रकार अशोक भौमिक की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. बंगाल के महाअकाल, महाराष्ट्र के अकाल और बाढ़, अनाथ, बाल श्रमिक से सम्बंधित चित्तप्रसाद के चित्र इस आयोजन में प्रदर्शित थे. चित्तप्रसाद ने नौसेना विद्रोह में हिस्सा लिया था और उस विद्रोह से सम्बंधित चित्र भी बनाए थे. उन्हीं की तरह जैनुल आबेदिन बांग्ला देश के मुक्तियुद्ध में सक्रिय थे. बंगाल के अकाल पर बनाए गए उनके चित्र दस्तावेज की मान्यता रखते हैं. तेभागा आन्दोलन के चित्रों के जरिए बहुचर्चित, `तेभागा डायरी´ के रचनाकार सोमनाथ होड़ द्वारा बनाए गए खेत मजदूरों के जीवन के अविस्मरणीय चित्र भी इस प्रदर्शनी में ‘शामिल थे. इसके साथ ही श्रमशील आदिवासी जीवन से सम्बंधित युवा मूर्तिकार-चित्रकार मनोज पंकज के कांस्य शिल्प और रेखाचित्र, महिलाओं की ‘शाक्ति और सामर्थ्य को दर्शाती मधुलिका पंकज के चित्र भी अपने पूर्वज कलाकारों की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए प्रतीत हुए. दिल्ली के युवा चित्रकार अनुपम राय द्वारा कामनवेल्थ गेम के बहाने चलाई जा रही निर्माण योजनाओं में काम करने वाले प्रवासी मजदूरों की जिन्दगी की विडंबनाओं पर बनाए गए चित्र एक तीखे कमेंट की तरह लगे.
बाजार की संस्कृति की तीखी आलोचना कन्दीर (कोलकाता) के कलाकारों द्वारा प्रस्तुत नाटक `टैलेंट हंट´ में थी, जो रियलिटी शो के खिलाफ था. आज लोक संस्कृति अपने शिल्प और प्रभाव में सत्ता और बाजार के सांस्कृतिक वर्चस्व को किस तरह चुनौती दे सकती है, इसकी बानगी देखने को मिली बंगाल से आई बाउल की टीम की प्रस्तुति के जरिए. जाति-संप्रदाय की बाड़ाबन्दियों को नकारती लालन फकीर के गीतों को बाउल कलाकारों ने जिस तरह पेश किया, वह अद्भुत था. लोकनृत्य का जादू फरी नृत्य में भी दिखा, जिसे जोगिया (कुशीनगर) के कलाकारों ने पेश किया. झारखण्ड संस्कृति मंच की महिला कलाकारों की टीम प्रेरणा द्वारा प्रस्तुत समूह नृत्य `जनी शिकार´ किया गया, जो आदिवासी प्रतिरोध की प्रथम नायिकाओं सिनगी-कैली देई के नेतृत्व में हुए संघर्ष की याद में किया जाता है.
सृजनोत्सव में बांग्ला, हिन्दी, उर्दू, पंजाबी की जनपक्षधर रचनाओं के साथ-साथ इन भाशाओं की बोलियों के साथ-साथ झारखण्ड की जनभाशाओं की रचनाओं और जनकला से भी लोग रूबरू हुए. पश्चिमी बंग गण परिषद के कलाकारों ने बांग्ला और हिन्दी जनगीत सुनाए.
एक सत्र हिन्दी कविता पर केन्द्रित था, जिसमें चर्चित कवि दिनेश कुमार ‘शुक्ल , शंभु बादल और रामाशंकर विद्रोही ने अपनी कविताओं का पाठ किया. दिनेश कुमार ‘शुक्ल की कविताओं ने जहां एक ओर मौजूदा साम्राज्यवादी-बाजारवादी संस्कृति द्वारा उत्पन्न संकटों के खिलाफ चेतना को जगाने का काम किया, वहीं उसने प्रगतिशील जनवादी कविता और लोककाव्य की सुदीर्घ परंपरा की ताकत का भी अहसास कराया. गोरख पाण्डेय की याद में लिखी गई कविता की पंक्तियों में वह जनता की ताकत के प्रति वह अभिनव आस्था दिखी, जिसके लिए दिनेश कुमार ‘शुक्ल मौजूदा हिन्दी कवियों में एक विशिश्ट स्थान रखते हैं- सो रहा संसार, पूंजी का विकट भ्रमजाल/ किन्तु फिर भी सर्जना के एक छोटे से नगर में/ जागता है एक नुक्कड़/ चिटकती चिंगारियां/ उठता धुंआ है/ सुलगता है एक लक्कड़/ तिलमिलाते लोग सुनकर, देखकर अन्याय/ और लड़ने का अब भी बनाते मन मछन्दर/ फिर नए संघर्ष का उन्वान लेकर/ जाग मेरे मन मछन्दर.
इतिहास में स्त्रियों के उत्पीड़न की लंबी दास्तान और उससे मुक्ति की आकांक्षा तथा धर्म के मिथ्या वजूद पर केन्द्रित रामाशंकर विद्रोही की लंबी कविताओं ने श्रोताओं को वैचारिक उत्तेजना से भर दिया. उन्होंने अपनी प्रसिद्ध कविता नूर मियां का भी पाठ किया. वरिष्ठ कवि शंभु बादल ने अपनी छोटी-छोटी कविताओं में मेहनतकश जनता की जिन्दगी के संघर्ष, आकांक्षा और परिवर्तन के स्वप्न को अभिव्यक्ति दी.
जसम बेगूसराय की टीम रंगनायक द्वारा नागार्जुन की कविताओं पर केन्द्रित नाटक `हरिजन गाथा´ सृजनोत्सव की आखिरी प्रस्तुति था. इस मौके पर अर्थशास्त्री नवलकिशोर चौधरी, रंगनिर्देशक कुणाल, प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. सत्यजीत और जसम के राष्ट्रीय पार्षदों समेत कई सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता और संस्कृतिकर्मी बतौर दशक आयोजन में मौजूद थे. भाकपा (माले) के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य भी अपने व्यस्त दिनचर्या के बीच से समय निकालकर गजलों और बाउल की प्रस्तुति के दौरान मौजूद रहे. सृजनोत्सव का संचालन जन संस्कृति मंच के बिहार राज्य सचिव युवा संस्कृतिकर्मी सन्तोश झा ने किया.

Thursday, February 18, 2010

अभिनेता निर्मल पांडे नहीं रहे


अभिनेता निर्मल पांडे की दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गई है। सीने में दर्द के बाद निर्मल को अंधेरी, मुबंई के हॉस्पीटल में भर्ती किया गया था ।
निर्मल पांडे ने ‘बैंडिट क्वीन’ (1994), दायरा (1996), ‘गॉडमदर’ (1999), ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ और ‘इस रात की सुबह नहीं’ जैसी फिल्मों में अपने अभिनय का लोहा मनवाया था।

राष्ट्रीय नाट्य अकादमी से निकले निर्मल ने लंदन के ‘तारा’ नाट्य मंडली में कई नाटकों में काम किया और कई टीवी धारावाहिकों और फिल्मों में काम करने के बाद शेखर कपूर की ‘बैंडिट क्वीन’ से लोगों की नजर में आए।

उन्हें ‘दायरा’ में एक हिजड़े की भूमिका निभाने के लिए फ्रांस में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार भी मिला था।

Monday, February 1, 2010

दिल्ली पुस्तक मेला में जसम का अभियान


जन संस्कृति मंच ने अपने घोषित कार्यक्रम के तहत आज से विश्व पुस्तक मेले में साहित्यकारों और पाठकों के बीच साहित्य के कारपोरेटाइजेशन के खिलाफ अभियान के शुरुआत की। आज पुस्तक मेले के गेट न. 12 पर कवि आलोचक विष्णु खरे, कवि शोभा सिंह, कथाकार योगेन्द्र आहूजा, कवि रंजीत वर्मा, कवि कुमार मुकुल, उद्भावना के संपादक अजेय कुमार, कवि अच्युतानन्द मिश्र, जनमत पत्रिका के संपादक सुधीर सुमन, कवि मुकुल सरल, जसम दिल्ली की सचिव भाषा सिंह, कवि सुनील चौधरी, खालिद, उपेन्द्र, सुलेखा, रूबल, सखी, सहर आदि ने साहित्य अकादमी और सैमसंग के गठजोड़ के मामले में भारत सरकार और संस्कृति मन्त्रालय की भूमिका पर सवाल उठाने वाली तिख्तयां उठा रखी थीं। इसी दौरान आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने भी इस अभियान के समर्थन में वहां कुछ देर खड़े हुए। वहां गुजरने वाले साहित्यप्रेमियों और साहित्यकारों को पर्चे भी दिए जा रहे थे, जिनमें राष्ट्रीय साहित्य अकादमी की स्वायत्तता बरकरार रखने, टैगोर सरीखे साहित्यकारों की विरासत की रक्षा करने, अकादमी को कारपोरेट के प्रचार एजेंसी न बनने देने की अपील की गई थी। टैगौर के उद्धरणों वाले पर्चे जिनमें स्वाधीनता के मूल्यों का जिक्र है, भी लोगों को दिए गए।
जसम द्वारा यह अभियान पुस्तक मेले में रोजाना 2 बजे से 4 बजे के बीच जारी रहेगा। जो लोग साहित्य अकादमी की स्वायत्तता और उसके लोकतान्त्रिकरण के पक्ष में हैं उन पाठकों और साहित्यकारों के बीच कल से हस्ताक्षर अभियान भी चलाया जाएगा।
भाषा सिंह
सचिव, जनसंस्कृति मंच
दिल्ली

Tuesday, January 26, 2010

सैमसुंग-साहित्य अकादमी पुरस्कारों के खिलाफ मानव श्रृंखला

जन संस्कृति मंच ने बहुराष्ट्रीय उपभोक्ता उत्पाद कंपनी सैमसुंग के साथ मिलकर साहित्य अकादमी द्वारा टैगोर साहित्य पुरस्कार दिए जाने के विरोध में सोमवार को मानव श्रृंखला खला बनाई। पहले यह मानव श्रृंखला पुरस्कार के आयोजन स्थल ओबेराय होटल के सामने बनाई जानी थी, लेकिन रविवार देर शाम दिल्ली पुलिस द्वारा इसकी इजाजत न देने पर इसे मण्डी हाउस स्थित साहित्य अकादमी मुख्यालय के सामने आयोजित किया गया। इसमें शामिल साहित्यकारों-संस्कृतिकर्मियों ने सैमसुंग के साथ साहित्य
अकादमी के गठजोड़ के लिए भारत सरकार की सख्त आलोचना की, इसे साहित्य अकादमी को बेच डालने और उसकी स्वायत्तता को खत्म करने वाला तथा लोकतन्त्रविरोधी कदम बताया। वहां मौजूद साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों ने साहित्य अकादमी की स्वायत्तता और उसके लोकतान्त्रिकरण के लिए देश भर में लेखकों को एकजुट कर संघर्ष चलाने का संकल्प लिया।
जन संस्कृति मंच ने विगत 13 दिसम्बर को आयोजित अपने सम्मेलन में लिए गए प्रस्ताव के अनुरूप इस पुरस्कार के विरोध में लेखकों को एकजुट करने की पहल की है। मानव श्रृंखला में शामिल लेखकों ने साहित्य अकादमी की स्वायत्तता चाहिए, किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी की भीख नहीं´, `साहित्य अकादमी को किसी कंपनी का एड-एजेंसी मत बनाओ´, `संस्कृति मन्त्रालय को मत बेचो´ जैसे नारों तथा रवीन्द्रनाथ टैगोर
के उद्धरणों वाली तिख्तयां हाथों में ले रखी थी।
इस मौके पर वरिष्ठ कवि विष्णु खरे ने कहा कि अब यह साफ हो गया है कि इस शर्मनाक पुरस्कार के लिए सरकार सीधे तौर पर दोषी हैं। एक तरह से साहित्य अकादमी को सैमसुंग के हाथों बेच दिया गयाहै। इसके खिलाफ लेखकों को संघर्ष तेज करना चाहिए। जसम दिल्ली के अध्यक्ष कवि मंगलेश डबराल ने कहा कि एक ओर सरकार गांधी जी की सारी चीजें विदेशों से किसी कीमत पर भारत मंगवा रही है और
दूसरी ओर टैगोर की विरासत को विदेशी कंपनी के हाथों बेच रही है। यह अजीब विरोधाभास है।
समयान्तर पत्रिका के संपादक और कथाकार पंकज बिष्ट ने कहा कि दुनिया में कोई देश ऐसा नहीं है जिसकी अकादमियों में किसी विदेशी कंपनी का दखल है। इस पुरस्कार के जरिए साहित्य की गरिमा और स्वायत्तता को चोट पहुंचाई गई है। उद्भावना पत्रिका के संपादक अजेय कुमार ने कहा साम्राज्यवाद विरोधी साहित्य की गौरवशाली परंपरा को आघात पहुंचाने वाला है यह पुरस्कार। रंजीत वर्मा ने कहा कि इस शर्मनाक पुरस्कार ने साहित्यिक संगठनों को और भी मजबूत बनाने की जरूरत को सामने ला दिया
है। अधिवक्ता रवीन्द्र गढ़िया ने कहा कि यह सरकार का दिवालियापन है जो साहित्य संस्कृति के लिए स्पांसर तलाश रही है, साहित्य को उनके प्रचार का माध्यम बना रही है। कवि मुकुल सरल ने कहा कि सरकार अपनी साम्राज्यवादपरस्त नीतियों के लिए साहित्य में समर्थन जुटाने के लिए ऐसा कर रही है।
अवधेश ने कहा कि इस चारण-भांटों की संस्कृति के खिलाफ लेखकों के संघर्ष में छात्रों की भूमिका भी सुनिश्चित की जाएगी। सुधीर सुमन ने कहा कि गणतन्त्र दिवस की पूर्व संध्या पर इस सम्मान समारोह को आयोजित करके सरकार ने यही संकेत दिया है कि वह अपना साम्राज्यवादपरस्त एजेण्डा साहित्य में लागू करना चाहती है। लेकिन देश के साहित्यकारों की बड़ी आबादी जो अपने और अपने समाज के जीवन संघर्ष को रचनाओं मे दर्ज कर रही है। वह इन मूल्यों के विरोध में है। उनकी एकजुटता जरूर बनेगी।
मानव श्रृंखला में वैभव सिंह, कुमार मुकुल, सुनील सरीन, अलका सिंह, रमन कुमार सिंह, अंजनी कुमार, रामजी यादव, भूपेन, कपिल शर्मा, रंजीत अभिज्ञान, आलोक, योगेन्द्र आहूजा, अच्युतानन्द मिश्र आदि भी मौजूद थे।
सचिव
भाषा सिंह

Friday, October 16, 2009

संगमन के बहाने कथा-साहित्य की जनपक्षधरता पर विमर्श


हिन्दी साहित्य में गंभीर पहचान बना चुके ´संगमन´ का 15वां आयोजन उदयपुर में 2 से 4 अक्टूबर 2009 को हुआ। नगर के समीप गांव बेदला स्थित आस्था प्रशिक्षण केन्द्र में आयोजित इस समारोह के सहयोगी जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ (डीम्ड विश्वविद्यालय) के जन शिक्षण व विस्तार कार्यक्रम निदेशालय, आस्था व राजस्थान साहित्य अकादमी थे। तीन दिन के इस जमावड़े में बाहर से आये लगभग 40 कथाकारों और साहित्यकारों के अलावा नगर के साहित्यकार, पाठक व युवा छात्र-छात्राअों की सक्रिय भागीदारी रही। नगर के आस-पास के शहरों कस्बों के साहित्यकारों-पाठकों की आवाजाही ने आयोजन को जीवंत बनाया।
कथाकारों में सर्जनात्मक संवाद को सघन बनाने, युवा कथाकारों को मंच उपलब्ध करवाने व जन आन्दोलनों में साहित्यकारों की भागीदारी जैसे मुद्दों पर केिन्द्रत इस राष्ट्रीय संगोष्ठी ने साहित्य और सामाजिक सरोकारों में एक नया आयाम जोड़ा।
पहले दिन के सत्र का विषय ´नयी सदी का यथार्थ और मेरी प्रिय पुस्तक´ था। चर्चा की शुरुआत आलोचक विजय कुमार के वक्तव्य से हुई जो पोलेण्ड की विश्व विख्यात कवयित्री शिम्बोर्सका पर केिन्द्रत था। विजय कुमार ने कहा कि लेखिका ने वर्तमान के यथार्थ को उभारने का जो प्रयास किया है, वह हमको आज के समाज की यथार्थता के बिम्बों प प्रतीकों के मूल में छिपी नग्नता व छद्म को जानने की दृष्टि देने वाला है। उन्होंने कहा कि शिम्बोर्सका का जीवन यह भी दिखाता है कि एक रचनाकार किस तरह अपने समाज की विद्रुपताओं से जिरह करता हुआ समाज को वैचारिक ताकत देता है। विजय कुमार ने शिम्बोर्सका की कुछ महŸवपूर्ण कविताओं के अंशों को भी उद्धृत किया। चर्चित युवा कथाकार वन्दना राग ने राही मासूम रजा के प्रसिद्ध उपन्यास ´आधा गांव´ के माध्यम से व्यक्ति की सामाजिक मनोदशा को स्वरूप व दिशा देनेवाले कारणों की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि यह उपन्यास इस तथ्य को उद्घाटित करता है कि ´सत्ता´ किस तरह से सच्चाई से ज्यादा अफवाहों का आतंक फैलाकर अपना हित साधती है। बाहरी शक्तियों का असर हमारे अंदरूनी रिश्तों व समरसता की भावना को तोड़ता है। कवि व उपन्यासकार हरिराम मीणा ने ´आदि धर्म´ पुस्तक के माध्यम से आदिवासी जीवन व संस्कृति में पाये जाने वाले सकारात्मक पहलुओं को आत्मासात करते हुए आज के समाज में धर्म, पर्यावरण, वैचारिक संकीर्णता, अलगाव जैसी समस्याओं से निजात पाने की दृष्टि ग्रहण करने पर बल दिया। मीणा ने विकास के नाम पर आदिवासी समाज व जीवन पर आये संकटों की चर्चा करते हुए कहा कि सरकार की जन विरोधी नीतियों के कारण आदिवासी अिस्मता संकट में है। उन्होंने इस संकट से लड़ने में लेखकीय भागीदारी की अपेक्षा बताई। समालोचक एवं गद्यकार दुगाZप्रसाद अग्रवाल ने स्वयं प्रकाश के उपन्यास ´ईंधन´ की चर्चा की। उन्होंने ईंधन को आज के युवा वर्ग के जीवन मूल्यों में आ गये अन्तद्वZन्द्व, सामाजिक मनोवृित्त व व्यक्तिगत आकांक्षाओं के बीच नये अन्तर्विरोधों को समझने में आधारभूत उपन्यास बताया। उन्होंने उपन्यास से उदाहरण देकर स्पष्ट किया कि वैश्वीकरण और बाजारवाद का हमारे जीवन पर कितना गहरा असर पड़ा है। अग्रवाल ने इसे भारतीय परिदृश्य में हो रहे भूमण्डलीकरण पर लिखा गया पहला महŸवपूर्ण उपन्यास माना। इतिहास बोध के संपादक, इतिहासकार लाल बहादुर वर्मा ने अपने उद्बोधन में सबसे पहले गाँधी के व्यक्ति और कृतित्व की चर्चा की उन्होंने गाँधी की सबसे बड़ी ताकत अपने पर गहरा विश्वास और साहस बताते हुये कहा कि आज की नई मानव विरोधी स्थितियोंं से लड़ने में ऐसी ही ताकत की जरूरत है। उन्होंने अपनी प्रिय पुस्तक हार्वर्ड फास्ट की ´सिटीजन टोम्पेन´ के कथानक पर कहा कि सृजन व संघर्ष में एक अन्तद्वZन्द्वात्मक रिश्ता होता है, जिसे समझना बेहद जरूरी है। हर सृजन जीवन के संघर्ष से उत्पन्न होता है तथा जीवन में ही अपनी सार्थकता को स्थापित करता है। उन्होंने यथार्थ के सर्जनात्मक पक्षों को उद्घाटित करने के साहस व उसके साथ चलने को इस सदी की सबसे बड़ी चुनौती बताया। चर्चा में कथाकार लता शर्मा, कैलाश बनवासी, डॉ. सर्वतुिन्नसा खान, अनुपमा सिसोदिया ने भाग लिया। इससे पहले कथाकार महेश कटारे ने संगमन के शुभारंभ की घोषणा की। सुप्रसिद्ध कवि हरीश भादानी के निधन का समाचार सत्र के प्रारंभ होने से पहले मिल गया था अत: सभी ने दो मिनट का मौन रख श्रद्धांजलि दी। संगमन के स्थानीय संयोजक पल्लव ने सभी का स्वागत किया। सत्र का संयोजन कथाकार ओमा शर्मा ने किया।
दूसरे दिन आयोजित कहानी पाठ सत्र में जयपुर के युवा कथाकार राम कुमार सिंह ने अपनी कहानी ´शराबी उर्फ हम तुझे वली समझते´ व मुम्बई से आये वरुण ग्रोवर ने ´डैन्यूब के पत्थर´ का पाठ किया। अलग-अलग शैलियों में लिखी गई इन कहानियों पर विशद् चर्चा में यह बात मुखर हुई कि वरुण की कहानी प्रागैतिहासिक काल की होते हुए भी समकालीन सवालों टकराती है वहीं रामकुमार की कहानी को भाषायी रचनात्मकता व परिवेश को जीवंत बनाने के लिए उल्लेखनीय माना गया। कथाकार योगेन्द्र आहूजा ने वरुण की कहानी के कथ्य को समकालीन मुद्दों से बचाव की युक्ति कहा तो वरिष्ठ लेखक लाल बहादुर वर्मा ने इसे असाधारण को साधारण बनाने का प्रयास बताया। उन्होंने भाषा के वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर वरुण की कहानी को दुस्साहसी बताया। सुभाषचन्द्र कुशवाहा ने कहा कि ये कहानियां मनुष्यता के संकट को हमारे सामने रखती है। युवा फिल्म समीक्षक मिहिर पंड्या ने वरुण की कहानी पर टिप्पणी में कहा कि इसके नायक व खलनायक एक ही पात्र में नजर आने से कहानी की सुन्दरता बढ़ी है। समालोचक प्रो. नवल किशोर, देवेन्द्र, ओमा शर्मा, सीमा शफक, जितेन्द्र भारती व पल्लव ने भी चर्चा में भागीदारी की। गालिब़ की पंक्ति के शीर्षक में प्रयोग पर हुई बहस पर लक्ष्मण व्यास ने कहा कि यह इस्तेमाल दादा-पोते के सम्बन्ध जैसा है जिस पर आपित्त करना उचित नहीं होगा। इस सत्र का प्रभावी संचालन वरिष्ठ कथाकार शिवमूर्ति ने किया।
इस दिन की शाम उदयपुर भ्रमण हेतु रखी गई थी। सभी प्रतिभागी उदयपुर के समीप ऐतिहासिक स्थल सज्जनगढ़, बड़ी तालाब व फतहसागर गये। यहां की प्राकृतिक सुन्दरता ने लेखकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
तीसरे दिन के अन्तिम सत्र में ´प्रतिरोध, जन आन्दोलन और साहित्य´ विषय पर चर्चा का प्रवर्तन योगेन्द्र आहूजा के वक्तव्य से हुआ। कथाकार देवेन्द्र ने कहा कि कोई विचारधारा एक युग में महŸवपूर्ण होती है किन्तु वह अन्य युग में प्रभावहीन भी हो सकती है इसलिए विचारधारा से ज्यादा जरूरी विजन है। कथाकार शिवमूर्ति ने जन आन्दोलनों से लेखकों का जुड़ाव व अपनी रचनाओं में कला के सन्तुलित उपयोग को जरूरी बताया। आलोचक डॉ. माधव हाडा ने कहा कि लेखक को मध्य वर्ग के बदलते सरोकार एवं प्राथमिकताओं की जानकारी होनी चाहिये। शोधार्थी प्रज्ञा जोशी ने लेखकों के जन आन्दोलनों से जुड़ाव न होने से रचनाओं के प्रभाव में आ रही कमी को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि दमन के बढ़ते स्वरूपों को देखकर हमें प्रतिरोध के नये तरीकों को खोजना होगा। वरुण ग्रोवर ने जन आन्दोलनों को वर्तमान पीढ़ी के लिए अमूर्त विचार कहा। उनका कहना था कि क्या सच कहना ही प्रतिरोध नहीं है र्षोर्षो हिमांशु पंड्या ने कहा कि किसी और को जवाब देने से पहले जरूरी है अपने आप को जवाब देना। चर्चा में मधु कांकरिया, सुभाष चन्द्र कुशवाहा, रतन कुमार सांभरिया, मंजू चतुर्वेदी, मनीषा कुलश्रेष्ठ, डॉ. रईस अहमद, जितेन्द्र भारती, हबीब कैफी, विजय कुमार, कैलाश बनवासी और प्रो. नवल किशोर ने भाग लिया। समापन वक्तव्य में वरिष्ठ कथाकार गिरिराज किशोर ने कहा कि कथाकार वह है जो अमूर्त को आकृति दे। किसी रचना के स्वरूप को अस्वीकार किया जा सकता है किन्तु रचनाकार की ईमानदारी पर अंगुली उठाना अनुचित है। उन्होंने कहा कि प्रतिबद्धता विरोध ही है। बाहरी दृष्टि से मूल्यांकन की प्रवृित्त को अनुचित बताते हुए उन्होंने कहा कि रचनाकार उलझनों को सुलझाने का काम करता है। गिरिराज किशोर ने नामवर सिंह के आलोचना कर्म की द्विधा पर प्रहार कर इसे वैचारिक जकड़ बताया। सत्र का संयोजन महेश कटारे व ओमा शर्मा ने किया। हिमांशु पंड्या ने स्थानीय आयोजकों की ओर से आभार माना।
कथाकार प्रियंवद के संयोजन में हुए इस आयोजन के अन्य आकर्षणों में पंकज दीक्षित द्वारा लगाई गई कथा पोस्टर प्रदर्शनी, लघु पत्रिका प्रदर्शनी व पंडित जनार्दन राय नागर के साहित्य की प्रदर्शनी भी थी। राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा आयोजन स्थल पर पुस्तक बिक्री की व्यवस्था थी। तीन दिन तक चले आयोजन में मूलचन्द्र पाठक, हरिनारायण, नवीन कुमार नैथानी, चरणसिंह पथिक, सुशील कुमार, अश्विनी पालीवाल, क़मर मेवाड़ी, ज्योतिपुंज, माधव नागदा, नन्द चतुर्वेदी, अमरीक सिंह दीप, कनक जैन, जितेन्द्रसिंह, डी.एस. पालीवाल, गजेन्द्र मीणा, गणेशलाल मीणा सहित बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमियों ने भागीदारी की।


डॉ. सुधा चौधरी
सी-2, दुगाZ नर्सरी रोड, उदयपुर-313001