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Thursday, March 6, 2008

जातियों के वजूद के लिए स्त्री हत्या जरूरी !


अंबेडकर यह खोज करने का दावा करते हैं कि – जाति समस्या के अलावा ‘सती प्रथा’,विधवाओं पर प्रतिबंध और बालिका विवाह( बालक-विवाह नहीं) की समस्याएं ब्राह्मण वर्ग द्वारा सजातीय विवाह पद्धति लागू करने के कारण उपजीं। उनकी यह व्याख्या कि ये समस्याएं किस तरह जाति व्यवस्था से जुड़ी हैं, इस प्रकार है-
सजातीय विवाह से हमारा तात्पर्य उन विवाहों से है जो जाति के भीतर ही होते हैं। किसी जाति में स्त्रियों की संख्या पुरुषों की संख्या से मेल खानी चाहिए। हमें यह देखने को मिलता है कि पत्नियो के जीते जी पति मर जाते हैं और पतियों के जीते जी पत्नियां मर जाती हैं यदि कोई पत्नी मर जाए और उसका पति जीवित हो तो वह अतिरिक्त पुरुष होता है औऱ यदि पति मर जाय और पत्नी जीवित हो तो वह ‘अतिरिक्त स्त्री’ होती है। ये शब्दावलियां अंबेडकर ने गढ़ी हैं। यदि ऐसी अतिरिक्त स्त्रियां और अतिरिक्त पुरुष अब भी युवावस्था या अधेड़ उम्र में हों तो उन्हे फिर से विवाह करना होगा। ऐसे विवाह उसी जाति में करने होंगे, अन्यथा वे अपने पुनर्विवाह के लिए दूसरी जातियों में झांक संकते हैं। तब जाति-व्यवस्था भंग हो सकती है। ऐसा जोखिम उठाए बिना पुनर्विवाह की इस समस्या का क्या समाधान हो सकता है?
अंबेडकर को पुनर्विवाह की समस्या मुश्किल में डाल देती है। उन्होने इस बात की विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत की कि स्त्रियों की सती प्रथा जैसी सभी समस्याएँ, पुनर्विवाह की समस्या के कारण उत्पन्न हुई।
“….(जाति से) बाहर विवाह रोकने की यह घेरा बंदी अनिवार्यत: समस्या पैदा कर देती है जिनका समाधान बहुत आसान नहीं है...यदि सजातीय विवाह पद्धति को निरापद रखना है तो यह आवश्यक रुप से दांपत्य अधिकारों का प्रावधान करना होगा, अन्यथा समूह के सदस्या येन-केन प्रकारेण अपना काम बनाने के लिए घेरे से बाहर निकल जाएंगे। परंतु दांपत्य अधिकारों का आवश्यक रुप से प्रावधान करने के लिए यह परम आवश्यक है कि समूह के भीतर दो लिंगो के विवाह-योग्य उन घटकों की आंकिक समानता कायम रखी जाय जो खुद को जाति में बनाए रखना चाहते हैं। केवल ऐसी समानता कायम रखने से ही यह संभव होगा कि समूह की आवश्यक सजातीयता को अक्षुण्ण रखा जा सके, और बहुत बड़ी विषमता से यह अवश्य टूट जाएगी। तब, जाति की समस्या जाति के भीतर दोनों लिंगों के विवाह योग्य घटकों के बीच विषमता को दुरुस्त करने की समस्या में बदल जाती है......यदि ध्यान न दिया जाय तो अतिरिक्त पुरुष और अतिरिक्त स्त्री, दोनों, जाति के लिए संकट खड़ा कर देते हैं..”(खंड 1 पृ 10)
अंबेडकर की व्याख्या जारी रहती है...
“…यदि हम उस समाधान की जांच करें जो हिंदुओं ने अतिरिक्त पुरुष और अतिरिक्त स्त्री की समस्याओँ को हल करने के लिए ढूंढा है तो हमारा काम आसान हो जाएगा...हिंदू समाज की कार्यपद्धति भले ही जटिल हो परंतु एक मामूली द्रष्टा को भी तीन अनूठे स्त्रियोचित प्रचलन देखने को मिलते हैं जिनका नांम है 1) सती प्रथा 2) बलात वैधव्य 3) बालिका विवाह ।...जहां तक मुझे पता है आज भी इस परिपाटी के उद्भव की कोई वैज्ञानिक व्याख्या नहीं मिलती है ”।( खंड 1 पृ 13)
बहरहाल, उन परिघटनाओं की वैज्ञानिक व्याख्या जो अभी तक दूसरों ने नहीं दी और जिसका अंबेडकर ने आविष्कार किया, इस प्रकार है:
“इस प्रश्न के बारे में कि क्यों वे उत्पन्न हुए, मेरा मानना है कि जाति व्यवस्था की संरचना निर्मित करने के लिए वे आवश्यक थे।”
जाति व्यवस्था की संरचना निर्मित करने के लिए ऐसे प्रचलन क्यों जरूरी हैं?
पहले हम अंबेडकर के शब्दों में ही इन दोनों प्रथाओं का अवलोकन करें..
“...अतिरिक्त स्त्री (=विधवा) को यदि ठिकाने नहीं लगाया जाए तो वह समूह में बनी रहेगी: लेकिन उसके बने रहने से दोहरा खतरा है। वह जाति से बाहर विवाह कर सकती है और सजातीय विवाह पद्धति का उल्लंघन कर सकती है, या वह जाति के अंदर विवाह कर सकती है और स्पर्धा के द्वारा उन अवसरों को अतिक्रमित कर सकती है जो जाति में संभावी वधुओं के चलिए अवश्य सुरक्षित होना चाहिए। इसलिए किसी भी दशा में वह अभिशाप है, और यदि उसके मृत पति के साथ उसे जलाया न जा सकता हो तो उसका अवश्य कुछ होना चाहिए। दूसरा उपाय यह है कि उसके शेष जीवन के लिए उस पर वैधव्य थोप दिया जाए”।(खंड 1, पृ 11)।
अंबेडकर के मुताबिक सती प्रथा और वैधव्य इसी प्रकार अस्तित्व में आए।
कई स्थानों पर अंबेडकर का तर्क विच्छिन्न है। हम किन्ही भी दो तर्कों में सामंजस्य नहीं पाते है। उन्हे इस बात की बिल्कुल शंका ही नहीं हुई कि किसी भी सूरत में बालिका विवाह अतिरिक्त पुरुष के पुनर्विवाह की समस्या को हल नहीं कर सकता। अंबेडकर का कहना है कि कुछ अतिरिक्त पुरुष ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं जबकि दूसरे विरक्त हो जाते हैं और यह टिप्पणी करते हैं कि यदि वे किसी एक रास्ते का इमानदारी से पालन करें तो कोई समस्या नहीं होगी अन्यथा जाति मर्यादा की सुरक्षा के लिए खतरा रहेगा। एक तरफ तो वे पुरुषों के प्रभुत्व की व्याख्या करते हैं और दूसरी तरफ वह उन पुरुषों की विशेषता बताते हैं मानों उनके पास मर्यादा है और होनी चाहिए ! क्योंकि, ‘किसी जाति में नियंत्रक अनुपात एक पुरष और एक स्त्री का होना चाहिए’ (खंड 1 पृ 12) मानो यह मर्यादा का सिद्धांत, जो आज भी लागू नहीं हुआ है, अतीत में पहले ही लागू हो चुका हो!
चाहे अतीत में हो या वर्तमान में, जिनकी पत्नियां मर जाती हैं, क्या वे बालिग स्त्री से विवाह नहीं करते हैं? क्या इससे ऐसी स्थिति निर्मित हो रही है जिससे अविवाहित पुरुष पत्नियां पाने में विफल हो जाएं। क्या पत्नियों के जीवित रहते हुए दूसरा विवाह, तीसरा विवाह और विवाह के बाद विवाह नहीं किए जा रहे हैं? एक पुरुष और एक स्त्री का यह नियंत्रक उपाय किस जाति में और किस समय मौजूद था?

अंबेडकर लिखते हैं-
“मेरे विचार में, यह जातियों की व्यवस्था में किसी जाति की एक सामान्य प्रक्रिया है” (खंड 1 पृ 13)

इसका अर्थ यह हुआ कि अगर आप किसी जाति को सतत बनाए रखना चाहते हैं तो ये सभी प्रथाएं प्रकट होंगी।
ठीक है तो क्या ये प्रथाएं निचली जातियों में भी मिलती है? ब्राह्मण जाति की तरह, हमें हर जाति में अतिरिक्त स्त्रियां और अतिरिक्त पुरुष अवश्य मिलते हैं। सभी जातियों को जातियों के रूप में सतत बनाए रखने के लिए, आप यह अपेक्षा करेंगे कि सती, वैधव्य और बाल-विवाह की प्रथाएं सभी जातियों में मौजूद रहनी चाहिए। क्या वे मौजूद थीं?
(जारी...)

Wednesday, February 27, 2008

जाति से पहले वर्ण!


जातियों से पहले वर्ण थे...चौकिए नहीं ये हम नहीं कहते बल्कि अंबेडकर कहते हैं.... खुद अंबेडकर के शब्दों में –
“हमें अच्छी तरह याद होगा कि हिंदु समाज दूसरे समाजों की तरह वर्गों से मिलकर बना था और उसमें 1) ब्राह्मण या पुरोहित वर्ग 2) क्षत्रिय या सैन्य वर्ग 3) वैश्य या वणिक वर्ग 4) शूद्र या दस्तकार और दास वर्ग जैसे ज्ञात वर्ग थे। इस तथ्य की ओर विशेष रुप से ध्यान देना होगा कि यह अनिवार्यत: एक ऐसी वर्ग-व्यवस्था थी जिसके तहत योग्यता के अनुसार लोग अपना वर्ग बदल सकते थे, और इसलिए वर्गों को व्यक्तियों के कार्य की परिवर्तनशीलता स्वीकार्य थी”। खंड 1, पृ. 18)
यहां ‘वर्गों’ से आशय उन ‘वर्गों’ से नहीं है जो “श्रम के शोषण की वजह से बनते हैं”। बोलचाल की भाषा में समाज के विभिन्न हिस्सों को “वर्ग” ही कह देते हैं। अंबेडकर ठीक इसी अर्थ में यहां पर “वर्णों” के संदर्भ में “वर्गों” का जिक्र कर रहे हैं।
अंबेडकर की व्याख्या के मुताबिक हमें चार वर्णों के निम्न पक्षों पर ज्यादा ध्यान देना होगा।
1)- वे अभी जातियां नहीं है। जातियां अभी भी नहीं बनी हैं। ये महज प्रारंभिक ज्ञात वर्ग हैं।
2)- ये व्यवसाय के आधार पर बने हैं। इन वर्गों के चार अलग-अलग किस्म के व्यवसाय हैं।
3)-इन वर्गों के लोग किसी भी तरफ जाकर अपने वर्ग बदल सकते हैं। जो कोई एक व्यक्ति शुद्र रहा हो तो वह अपनी योग्यता को सुधारकर ब्राह्मण या किसी दूसरे वर्ग में शामिल हो सकता है। यदि ब्राह्मण या किसी दूसरे वर्ग के लोगों में योग्यता की कमी हुई तो वह शुद्र हो जाएगा।
4)-ये ही भारत के वे चार वर्ण है जिन्हे अंबेडकर ने उन “समूहों” के रूप में समझा जो मिल-खपकर “एकीकृत समाज” हो गए थे। इस तथ्य के बावजूद कि एक समूह पुरोहित वर्ग के रूप में और दूसरा दास वर्ग के रूप में मौजूद था, उन्होने समूहों के सम्मीलन और स्वांगीकरण की बात कही। आगे भी उन्होने उन्ही चार वर्णों के सिलसिले में अंतरजातीय विवाहों की बात कही जो अलग-अलग वर्णों के बीच होते थे।
हमें अंबेडकर को समझने के लिए कुछ खास बिंदुओं को याद रखना होगा।
वर्ण व्यवस्था जाति –व्यवस्था में रुपांतरित हो जाता है। लेकिन अंबेडकर के अनुसार वर्ण-व्यवस्था जाति व्यवस्था से काफी श्रेष्ठ है क्योंकि वर्ण-व्यवस्था में कोई व्यक्ति अपना वर्ण बदल सकता था।
पहले, योग्यता के आधार पर लोगों के किसी ओर भी वर्ण बदल सकने के मुद्दे पर चर्चा करेत हैं। यदि लोग अपना वर्ण बदलना चाहते थे तो योग्यताओं का निर्धारण कौन करता था ? वे कौन-सी योग्यताएं हैं? यह प्रक्रिया अमल में कैसे आएगी?
अंबेडकर बताते हैं कि ऐसे निर्णय लेने का अधिकार मनु और सप्तर्षि को था जो चार वर्ष में एक बार लोगों की परीक्षा लेते थे और उनका वर्ण निर्धारित करते थे। ऐसा बताते समय अंबेडकर परिवर्तन की इस प्रक्रिया का खुलासा कुछ इस तरह करते हैं-

“ ये ही वे अवस्थाएं थी जिसमें वर्ण जाति में बदल गया। इस अवधारणा को उन परंपराओं से काफी बल मिलता है जो धार्मिक साहित्य में अंकित है। जब किसी ऐसी चीज को अंगीभूत किया जा सकता है जो बिल्कुल भरोसेमंद हो, तो ऐसा कोई कारण नहीं कि इस परंपर को न अपनाया जाए। इस परंपरा के अनुसार किसी व्यक्ति का वर्ण निर्धारित करने के कार्य का संपादन मनु एवं सप्तर्षि के पदनाम वाले अधिकारियों की मंडली द्वारा किया जाता था। लोगों के समूह से मनु उन लोगों का चयन करते जो क्षत्रिय और वैश्य होने के लिए योग्य होते और सप्तर्षि उन लोगों का चयन करते जो ब्राह्मण होने के योग्य होते। ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों के लिए मनु और सप्तर्षि द्वारा किए गए चयन के बाद जो लोग बच जाते वे शुद्र कहलाते थे। प्रत्येक चार वर्ष पर नए चयन के लिए मनु एवं सप्तर्षि के उसी पदनाम वाले अधिकारियों की नई मंडली लगाई जाती थी। होता यह था कि पिछली बार जो शुद्र की श्रेणी में रह जाते थे उनमें से कुछ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के लिए चुन लिए जाते थे जबकि पिछली बार ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य होने के लिए चुने गए होते थे उनमें से कुछ को केवल शूद्र के योग्य पाकर छोड़ दिया जाता था। इस प्रकार वर्ण के कार्मिक बदल जाते थे। यह एक तरह का आवर्ती उलट-फेर औऱ मनुष्यों के मानसिक रुझान व शारीरिक क्षमता और पेशों के अनुरूप उनका चुनाव था जो समुदाय जो समुदाय को जिंदा रखने के लिए आवश्यक था...। प्राचीन परंपरा के अनुसार जैसा कि पुराणों में दर्ज है, मनु एवं सप्तर्षि किसी व्यक्ति के वर्ण की जो अवधि तय करते थे, वह चार वर्ष की होती थी और यह युग कहलाता था”। खंड 3, पृ. 267-287

“ मनु एव सप्तर्षि एक तरह से साक्षात्कार मंडल के सदस्य होते थे जो इस आधार पर व्यक्ति का वर्ण तय करते थे कि उसने साक्षात्कार में अपनी कैसी छाप छोड़ी है ? “ खंड 3, पृ. 287

इस तरह लंबी चौड़ी व्याख्या चलती रहती है जो यह बताती है कि योग्यता के आधार पर व्यक्तियों के वर्णों निर्धारण की जो व्यवस्था अधिकारियों द्वारा की जाती है, वह श्रेष्ठ क्यों है।
यह तो ठीक है, लेकिन उन अधिकारियों का चयन कौन करता था? वे योग्यताएं क्या हैं जिनके आधार पर वे अधिकारी बनते थे? चार साल में वर्ण बदलने की बात किसे पचेगी? मानलीजिए कि किसी खास युग सभी लोगों की अच्छी योग्यता है और कोई शुद्र न बने फिर क्या होगा? क्या चार साल बिना शुद्रों के ही काम चलेगा?इस अवधि में उच्च वर्णों की सेवा-टहल का काम कौन करेगा? क्या उच्च वर्ण वाले लोग अपना काम खुद करेंगे? नहीं, वे ऐसा नहीं करेंगे। शुद्रों को आखिरी सांस तक ताबेदारी करने के लिए अस्तित्व में बने रहना होगा। इसका अर्थ यह होता है कि आबादी के एख हिस्से को हमेशा शुद्रों के रूप में मौजूद रहना होगा।
अधिकारियों द्वारा हर व्यक्ति का साक्षात्कार करना और उनका वर्ण बदलना। इसी हिसाब से लोगों का पुराना वर्ण छोड़कर नया वर्ण अपनाना! मतलब यह कि पुराना पेशा छोड़कर नया पेशा अपनाना ! यानी हर चार साल बाद पेशा बदलना! यह किस किस्म का सिद्धांत है ?
अगर कोई इन पौराणिक कथाओं को शब्दश: मान ले कि ब्राह्मण शूद्र बन जाते थे और शूद्र ब्राह्मण, और यह कहे कि अतीत में भारत के लोगों के इतिहास में ऐसा ही हुआ है, तो क्या हमें ऐसे सिद्धांत को स्वीकार करना होगा।

आगे चलकर वर्ण निर्धारण की प्रक्रिया में कुछ बदलाव हुआ। फिर पुरानी प्रक्रिया को अंबेडकर भोंड़ा बताते हुए और नई प्रक्रिया का बखान करते हैं और कहते हैं कि वर्णों का निर्धारण गुरुकुल के उपनयन संस्कार में होता था...(जारी)

विज्ञान की नई सफलता-सुनिए एक अणु की आवाज



कोई भी आवाज जो आप सुनते रहे हैं वह करोड़ों अणुओं के कंपन से निर्मित होती है। कंपन की वजह से आवाज सुनाई देती है जिसे आप अपने हिसाब से बदलकर सुरीला बनाते हैं। संगीतकार से जब संगीत की सबसे छोटी इकाई पूछी जाती है उसमें भी करोड़ अणुओं का कंपन होता है। इस जुगलबंदी में शामिल सभी अणुओं का अपनी खास कंपन होती है। Kan­sas State Un­ivers­ity के वैज्ञानिकों ने करोड़ो अणुओं में से एक अणु के कंपन की आवाज रिकॉर्ड करने में सफलता की है। यह अब तक की सबसे चुनौतीपूर्ण खोज रही है। रिसर्च टीम के सदस्य Uwe Thumm कहते हैं कि इसे आप अणु का साउंड मत कहिए बल्कि हमने उस मैटर को ढूंढ निकाला है जिसे दुनिया आवाज या साउंड कहती है। वैज्ञानिकों के मुताबिक कंपन बहुत तीव्र था और इसकी अवधि भी काफी छोटी थी। इसे रिकॉर्ड करते समय उन्होने पड़ोसी अणु में भी ऐसे ही कंपन की आवाज महसूस की। लेकिन हम जो आवाज सुनाने जा रहे हैं वह एक अणु की है जी हां ... individual molecules की।

इस आवाज को सुनने के लिए क्लिक करें.



सावधानी-इस ध्वनी को सुनने से माइग्रेन या सिर से जुड़ा दर्द बढ़ सकता है। सावधानी से औऱ कम आवाज पर सुनें।

Tuesday, February 26, 2008

क्या सजातीय विवाह ही जाति का आधार है?




बाजार से सामाजिक न्याय की उम्मीद है। इस तर्क को प्रचारित करने वाले आज भी रोना रो रहे हैं कि महत्वपूर्ण पदों पर दलितों की भागीदारी न के बराबर है। दरअसल दलितों के हक की लड़ाई एक ओर प्रगतिशील विचारधार के बदौलत लड़ी जा रही है और जबकि दूसरी ओर स्वघोषित चैंपियन दलित ब्राह्मणवादी विचारधारा के जरिए। उसके दाएं बाएं टुकड़ों में तर्क बटोरने के तौर तरीके ही खुद उसके अस्थिर और अध्यात्मवादी चिंतन के बीच खड़ा करते हैं। अपने पूरे कलेवर में यह मानव विकास विरोधी विचारधारा अंत में सामंती मूल्यों के सामने न केवल घुटने ही टेकती बल्कि खुलकर बताती है कि यही से दलित मुक्ति का रास्ता जाता है। मौजूदा दलित सत्ताओं के अनुपातवादी संघर्ष के साथ यह छद्म लड़ाई उनके आधारभूत सिद्धांतकारो में भी मौजूद है। अनुपातवादी चिंतन की बहस में लटकने की जद्दोजहद में उनके विचारक सिलसिलेवार ढंग से खुद की कही बातों का खंडन करते मिलते हैं। वे उस छद्म लड़ाई पर बहस नहीं करते बल्कि अभी अनुपात सही नहीं हुआ...वे ऐसे चौंकते हैं जैसे किसी दैव चमत्कार के जरिए यह होने वाला था। ये ऐसी छद्म लड़ाई है जिसमें कोई शहीद नहीं होता। सबकुछ सुविधाजनक तरीके से चलता है। यही वह मजबूरी है जो इन्हे आज बाजारवाद के साथ खड़ा कर रही है। कल को कोई और आस्थामूलक विचारधारा पैदा होती है तो फिर उसमें समा जाएंगे। इसलिए जरूरत है कि इस समझ के मूल सिद्दांतकारों की जड़ में जाकर देखा जाय कि क्या ये शुरू से ही ऐसे छद्म युद्ध लड़ते रहे हैं। देखते हैं कि जातियों के पैदा होने के बारे में अंबेडकर के विचार मैकाले के तर्क दिवस मनाने वालों के मुताबिक कितने तार्किक हैं।



जातियों के पैदा होने के बारे में मुख्यतौर पर दो राय बनती है। एक धारा कहती है कि कबीले के बचेखुचे लोग जातियों में बदल गए होंगे जबकि दूसरी धारा इसे श्रम विभाजन से जोड़ कर देखती है। खुद पेशों से ही जातियों का उदय हुआ हो। इस विचार को ही ज्यादातर लोग मानते हैं। लेकिन अंबेडकर इसे नहीं मानते। उनका सवाल है क्या सभी देशों में श्रम विभाजन नहीं हुआ फिर वर्ण व्यवस्था भारत में ही क्यों पैदा हुई। जवाब में तर्क दिया जाता है विशेष परिस्थितियों का जो जातियों के निर्माण तक ले जाती है। लेकिन विशेष परिस्थितियां क्या थी इस पर सवाल अनसुलझा छोड़ा गया। लेकिन झटके से अंबेडकर ने कहा कि वे उस विशेष परिस्थिति को समझ गए हैं। वे सजातीय विवाह को जाति व्यवस्था का मूल मानते हैं। देखिए क्या कहते हैं वे
“उद्भव का प्रश्न हमेशा खीझ पैदा करने वाला रहा है और जाति व्यवस्था के अध्ययन में इसपर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया है। कुछ ने अपनी आंखे मूंद और कुछ न कन्नी काट ली। कुछ लोग अभी इस उहापोह में हैं कि क्या जाति जैसी चीज का कोई उद्भव हो सकता है जहां तक मेरा सवाल है मैं किसी उहापोह में नहीं हूं क्योंकि मैं यह सिद्ध कर चुका हुं कि सजातीय विवाह ही जाति का एकमात्र लक्षण है और जाति व्यवस्था के उद्भव से मेरा आशय यही है कि सजातीय विवाह पद्धति की संरचना और तंत्र का उद्भव” (खंड 1, पृ. 14)
अंत में की गई टिप्पणियों में कोई आपसी तालमेल नहीं है । एक जगह सजातीय विवाह ही कारण (मूल) है और ‘जाति’ इसका ‘प्रभाव’ है। यदि हम इस बात को इस रूप में देखें तो दोनों (सजातीय विवाह पद्धति और जाति व्यवस्था) समान नहीं है। लेकिन दूसर वाक्य में अंबेडकर का कहना है कि चाहे आप जाति व्यवस्था के उद्भव की बात करें या सजातीय विवाह पद्धति की संरचना और तंत्र के उद्भव की बात करें, दोनों का अर्थ एक है। यदि हम इस नजरिए से देखें तो जाति व्यवस्था और सजातीय विवाह पद्धति दोनों एक हैं। इन परस्पर असंगत विचारों में से हमें लेखक का कौन सा विचार ग्रहण करना चाहिए ?
अगर उनका यह कहना है कि सजातीय विवाह पद्धति ही जाति व्यवस्था का आधार है तो यह जाति का आधार ढूंढ लेने का दावा नहीं हो सकता। तब सवाल यह उठता है कि ठीक है, फिर सजातीय विवाह पद्धति का आधार क्या है? जब तक हम यह न जान लें तब तक समस्या नहीं सुलझ सकती।
यहां पर तो ऐसे कहा गया, लेकिन किसी और जगह अंबेडकर की जाति व्यवस्था की व्याख्या ‘चार वर्णों’ से आरंभ होती है।
(जारी..)

Monday, February 25, 2008

दलित उद्धारकों का प्रपंच

-अभिनव


-हकीकत तो यह है कि अमेरिका आज सिर्फ एक देश नहीं, एक विचार है। यह विचार साइंस, टेक्नॉलजी, संपदा, पूंजी प्रवाह और भविष्य को मिलाकर बनता है। क्या एक अरब लोगों का देश भारत इस विचार से खुद को दूर रखने का जोखिम उठा सकता है?

- चंद्रभान प्रसाद,नवभारत टाइम्स, नवबंर 2007

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-“जो देश अंग्रेजी से जितना दूर होगा, वह देश तरक्की से भी उतना ही दूर रहेगा। जो बात देशों के लिए सच है, वही व्यक्ति या परिवारों के लिए भी सच है। भारत में ही देख लें। कुछ लड़कियां अच्छा डांस करती हैं, अच्छा गाती हैं, आकर्षक भी हैं पर अंग्रेजी नहीं जानती, अत: ‘बार बालाएं’ बन जाती हैं, पुलिस की दबिश होती है, जेल भी जाना पड़ता है, पर, उन्हीं गुणों के साथ कुछ लड़कियां आइटम गर्ल बन जाती हैं, पेशा, इज्जत तथा शोहरत भी कमाती हैं”।

–चंद्रभान प्रसाद, जनवरी, राष्ट्रीय सहारा

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"मैकाले पुराण इस समय छेड़ने की वजह अक्टूबर महीने में यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिलवेनिया से मेरे पास आया एक निमंत्रण है। निमंत्रण एक पार्टीनुमा कार्यक्रम में शामिल होने का था। कार्यक्रम 26 अक्टूबर के लिए था। ये पढ़कर मैं चौंका कि ये निमंत्रण मैकाले का जन्मदिन मनाने के लिए किया जा रहा है। इसे डे ऑफ रिजन यानी तर्क-दिवस नाम दिया गया था। कार्यक्रम मैकाले के जन्मदिन के एक दिन बाद के लिए था। निमंत्रण में ये साफ लिखा था कि इसमें फिलाडेल्फिया की कंपनी टेंपसॉल्यूशंस के मालिक माइकल थेवर भी शामिल होंगे। माइकल थेवर मुंबई के स्लम में बड़े हुए और और अब वो अमेरिका में अफर्मेटिव एक्शन के चैंपियन हैं।"- दिलीप मंडल


दिलीप मंडल भले अफसोस कर रहे हों लेकिन चंद्रभान प्रसाद जी के नेतृत्व में मैकाले के जन्म दिन के आयोजन ने काफ़ी लोगों के चौंकाया है। इस आयोजन में अंग्रेज़ी-माता का देवी रूप में पोस्टर जारी किया गया, स्तुतियाँ गाई गईं। यह कामना की गई कि हर दलित नवजात बच्चा पहली ध्वनि-एबीसीडी की सुने। अंग्रेज़ी-माता या देवी की तसवीर स्टैच्यू ऑफ़ लिबर्टी का अनुकरण थी सिर्फ़ उसके हाथों में मशाल की जगह कलम थी। दिलीप मंडल ने भी ऐसे ही किसी आयोजन में बुलावे का जिक्र करते हुए अंबेडकर तक बहस ले गए।
हमारे यहां एक ग्रुप है जो अंग्रेजी भाषा भले न जानता हो लेकिन उसका जोरदार समर्थक है। इस छद्म भाषा प्रेम की कलई अब खुलने लगी है। समाज में बाजार के दर्शन को प्रचारित करने का काम मिशिनरी स्तर पर है। जिसमें अंग्रेजी की वकालत तो होती है लेकिन डार्विन की निंदी भी की जाती है। हिंदी ब्लॉग भी पिछले कुछ दिनों से मैकाले के स्टेमेंट के ऐतिहासिक साक्ष्य जुटा रहे हैं। जो लेख 2004 में चंद्रभान प्रसाद रिइन्वेंटिंग मैकाले में लिखते हैं वह अब हिंदी ब्लॉग में किसी और के नाम से फिर से आ रहा है। अंग्रेजी वकालत का पूरा नाटक सचेत तरीके से चलाया जाता है। पहले जब लोग कहते थे कि बस आफिरमेटिव एक्शन पर एक शोध प्रबंध जैसा कहीं छपा लो तो अमेरिका में स्कॉलरशिप मिल जाएगी तो यकीन नही होता था। आज अमेरिकी सरकार आफिरमेटिव एक्शन और एड्स पर समान रूप से खर्च करती है। आज भारत सहित दुनिया के कई देशों में बाजारवाद को कड़ी चुनौती मिल रही है। लिहाजा उसे एक दलालनुमा बड़ा हिस्सा चाहिए जो उसकी खोखली चमक में मंत्रमुग्ध होकर प्रवचन करता फिरे। इसके लिए सोशलिस्टों की नई फौज बड़ी आसानी से ये काम कर रही है। आज अमेरिका के दोस्त इजरायल या नॉटो सदस्य देशों को अंग्रेजी सीखने की जितनी दरकार नहीं है उतनी चंद्रभान प्रसाद और उनके चेलों की है। ये मानते हैं कि ग्लोबलाइजेशन के जरिए ही जाति व्यवस्था खत्म होगी। अब इन्हे कौन बताए कि पिछले दस-पंद्रह सालों से ग्लोबलजाइशेन के विकास के साथ दुनिया भर में दर्जनों देश जातिगत आधार पर निर्मित हुए हैं।
(जारी....)

Wednesday, February 20, 2008

इतिहास ने आपको सही साबित किया


क्यूबा के राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो जब बीमारी से घिर गए थे तो सनक से भरे मीडिया माध्यमों ने श्रद्धांजली के ढेरो कॉलम और पैकेज बना डाले। कल जब कास्त्रो ने सत्ता से दूर रहने का इरादा जताया तो ये सारे मैटेरियल थोड़े सुधार के साथ बजने और छपने लगे। आदमीनुमा दिखने वाला एक हिंसक जानवर जो अफ्रीका के दौरे पर है उसने वहीं से ऐलान किया है कि क्यूबा से आर्थिक प्रतिबंध नहीं हटाया जाएगा। मानवाधिकार हनन से लेकर तानाशाह शासक होने के आरोप कितने खोखले हैं यह फिदेल कास्त्रो के भाषण में साफ दिखता है।

सम्मान विक्रय के लिए नहीं है...
बमबारी समाप्ति के लिए हमसे कोई सौदेबाजी नहीं होगी। यदि उन्होने जिस दिन बमबारी शुरू की, मैं उनसे आगे हो जाउंगा...हम कोई भी मुर्खता नहीं करते हैं जिसका कि वो बहाना बना सकें। आप देख सकते हैं कि (ग्वानतानामों) आधार के लिए हम कितनी सहनशीलता का परिचय दे चुके हैं। यह क्यूबाई जमीन का छोटा सा टुकड़ा है और इसे वापस लेना का हमे पूरा अधिकार है। हम बहुत धैर्यशील हैं..हम कहते हैं कि 'नहीं,अपेक्षाकृत अपनी भूमि के प्यारे टुकड़े को स्वतंत्र कराने की अपेक्षा विश्व को स्वतंत्र करना अधिक महत्वपूर्ण है, वैसे वह हम उन्हे कभी नहीं देंगे।
वे मानवाधिकारों के मुद्दे पर हमसे क्या कह सकते हैं। हमारे यहां एक भी अनपढ़ व्यक्ति है? यहां एक भी बच्चा नहीं है जो स्कूल नहीं जाता हो, नही कोई भी ऐसा व्यक्ति है जिसे स्वास्थ्य सुविधाएं न मिलती हों। यहां कोई भी भिखारी नहीं है, यद्यपि कुछ गैर जिम्मेदार परिवार जरूर हैं जो अपने बच्चों को कुछ काम सौंप देते हैं। यह पर्यटन से सबंधित है और इसका प्रभाव है, यह हमारी अस्मिता नहीं है, बल्कि यह हमारा गौरव है। यहां कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो गलियों में निष्काषित पड़ा हो...इस देश में एक भी गुमशुदा नहीं है। यहां एक भी राजनीतिक हत्या नहीं हुई है न ही किसी एक व्यक्ति की हत्या की गई है। क्रांति के इतने सालों बाद हमें हमको विभाजित करने के ढेरों प्रयासों के बाद भी हम अपनी क्रांति को जीवित रखे हुए हैं...वे हमारे लोगों की लौह एकता, देशभक्ति और उनकी राजनीतिक-सांस्कृति के आगे समाप्त हो गए....

Tuesday, January 29, 2008

मौलिक होने की ज़िद...!!

आइये, जनमत के साथियों की मांग पर एक नया सिलसिला शुरु किया जाये...
जन संस्क्रिति मंच की गीत नाट्य इकाई 'हिरावल',पटना के गीतों की रेकोर्डिंग आपको सुनाते हैं.
'हिरावल' के बारे में जो लोग जानते हैं, वे हिरावल द्वारा तैयार गीतों की ताजगी और तेवर के मुरीद हुए बिना नहीं रहते, और जो नहीं जानते उन लोगों में लगातार कमी लायी जाये इसी विचार से ये कडी़ शुरु की जा रही है...
'हिरावल' अपने नाटकों और गीतों के माध्यम से बिहार के क्रान्तिकारी संघर्षों में कन्धे से कन्धा मिला कर लड़ने के साथ-साथ नये प्रयोगों के लिये भी जाना जाता है... चलिये कुछ नया- सा सुना जाये...
# 'मुक्तिबोध' की लम्बी कविता 'अन्धेरे में' का एक हिस्सा :


# 'कबीर' की रचना ' हमन है इश्क मस्ताना' :


# 'इंतसाब' जिसे लिखा है 'फ़ैज़ अहमद 'फ़ैज़' ने और जिसे
पहले भी कई व में कई मशहूर कलाकारों ने अपनी आवाज़ दी:


# फ़ैज़ की एक और रचना ' कुत्ते' :


# 'निराला' की एक रचना ' गहन है यह अन्धकारा' :


# समकालीन कवि वीरेन डंगवाल की कविता ' हमारा समाज' :


सभी गीतों में संगीत दिया है संतोष झा ने और गाया है संतोष झा और हिरावल के अन्य साथियों सुमन, समता, राजन, रोहित, बन्टू, विस्मोय और अन्कुर ने.
आगे की पोस्ट में 'हिरावल' के बारे में और जानकारी के साथ आप सुन सकते हैं
** 1857 के गीतों की recordings!!
** हिरावल के नाटक ' दुनिया रोज़ बदलती है' का पूरा video!!
** 'हिरावल' के कई live performances!!
** 'हिरावल' के गाये गये कई पुराने गीत...!!.
** और भी बहुत कुछ... इन्तज़ार करें...!!

Monday, January 28, 2008

सट्टेबाजी को बढ़ावा देते केंद्रीय बैंक


दीपू राय
स्पेकुलेशन यानी सट्टेबाजी आर्थिक विकास की शर्त है। यह तर्क किसी अर्थशास्त्री का नहीं है बल्कि देश के वित्तीय चाल चलन को गवर्न करने वाले केंद्रीय बैंकों का है। दुनिया के केंद्रीय बैंक अब इस तर्क की उंगली थामकर अपनी नीतियां तय कर रहे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक कोई अलग नहीं है। पूंजी बाजार, वित्तीय बाजार का हिस्सा है । लेकिन केंद्रीय बैंकों की रणनीति अब किसी भी तरह इस पूंजी बाजार को ही लेकर चलने की है। हर बार मुंह की खाने के बाद स्टॉक मार्केट को ये उम्मीद होती है कि केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में कटौती करके उसे उबार लेगा। यानी कहा जाय तो पूंजी बाजार यानी कैपिटल मार्केट को सहारा देने के लिए केंद्रीय बैंक वित्तीय बाजार की वास्तविक जरूरतों को भी नजरंदाज कर सकते हैं। लेकिन इस नुस्खे का खामियाजा अमेरिकी अर्थव्यवस्था अब उठा रही है। फेड बैंक की प्रयोगधर्मिता ही अब उसे डुबोने लगी है। वहां अब संकट खुद वित्तीय बाजार को अपने चपेट में ले चुका है। किसी ब्याज कटौती से स्टॉक मार्केट संभाले नहीं संभल रहा है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या भारत में ब्याज कटौती की यह कृत्रिम नीति कारगर होगी? लेकिन रिजर्व बैंक या आखिर कोई भी केंद्रीय बैंक मुद्रा स्फीति या नौकरियों की छंटनी जैसे मुद्दों को पूंजी बाजार की सट्टेबाजी के लिए क्यों ताक पर रख देता है। जाहिर इसे समझने के लिए देश के केंद्रीय बैंक के सलाहकार बोर्ड पर नजर डालना होगा। यह केवल कुछ चुनिंदा व्यक्तियों की बात नहीं है बल्कि केंद्रीय बैंकों पर यह आरोप लगने लगा है कि वे अर्थव्यवस्था के आम चाल चलन को ताक पर रखकर स्पेकुलेशन को बढ़ावा देते हैं। सट्टा बाजार वस्तुओं के पीछे मुनाफा नहीं देखता बल्कि उनके आगे-आगे मुनाफे का खेल खेलता है। ऐसे में दोनों के बीच की दूरी बाकी सांधनों के असंतुलन से बिगड़ जाती है। जिससे लगता है कि बाजार बाउंस बैक हो रहा है लेकिन केवल पूंजी बाजार ही बाउंस बैक होता है। एक तरह से अर्थव्यवस्था को निश्चित अंतराल के बाद काफी तेज झटका झेलना होता है। लेकिन थोड़े समय बाद आने वाले ये झटके अर्थव्यवस्था को खोखला बना देते हैं।
दुनिया का आर्थिक इतिहास साफ दिखाता है कि पिछले दो दशक से बड़ी मंदी और ब्याज दरों में कटौती केंद्रीय बैंकों का आसान नुस्खा बन गया है। पहले गुपचुप तरीके से सहायता करने वाला लेकिन अब यह नुस्खा परोक्ष रुप से सट्टेबाजी को प्रोत्साहित कर रहा है। अचानक तरलता की मांग उठाने वाले लोग आखिर कितने प्यासे हैं इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। ये ठीक उस बच्चे की तरह जिद है कि आखिर सरकार नोट छापकर गरीबी क्यों नहीं दूर कर देती। ब्याज दर में कटौती की मांग अर्थव्यवस्था के ऐसे हिस्से के जरिए की जा रही है जिसे तत्काल मुनाफा बटोरना है। लेकिन सवाल तो यह है कि क्या केंद्रीय बैंक की भूमिका बड़े आर्थिक उद्देश्यों को दरकिनार करते हुए केवल सट्टेबाजी को प्रश्रय देना भर रह गया है?

अमेरिकी अर्थव्यवस्था फिर से एक भीषण संकट का सामना कर रही है। यह संकट हाउसिंग मार्केट से शुरू हुआ है जो आज तकरीबन हर सेक्टर को अपनी चपेट में ले लिया है। लेकिन इस संकट ने फेडरल बैंक की नीतियों को भी सवालों के घेरे में डाल दिया है। ब्याज कटौती जैसे प्रयोग के अगुवा रहे फेडरल बैंक के भूतपूर्व चेयरमैन एलन ग्रीन स्पान अपनी किताब द एज ऑफ टर्बूलेंस:एडवेंचर्स इन न्यू वर्ल्ड में मौजूदा संकट का जिक्र करते हुए कहते हैं कि यह विपरित परिस्थितियों वाला वक्त है और काफी दुखदायी है लेकिन इस संकट को तो आना ही था। खासतौर से तब जब हम ऐसे उपाय चुनते हैं जिसमें लोगों को ज्यादा से ज्यादा जोखिम उठाने की आजादी दी जाय तो इस तरह के संकट को कोई टाल नहीं सकता। 1929 में स्टॉक मार्केट के संकट और 1930 की महामंदी ने उस समय के आर्थिक नीतियों को विवाद के घेरे में डाल दिया। कुछ दशक बाद यह तर्क फिर मजबूती पकड़ा कि सट्टेबाजी अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद है। लेकिन 1960 की आर्थिक मंदी और 1970 में स्टॉक मार्केट की गिरावट ने सट्टेबाजी और उससे पैदा होने वाले आर्थिक मुश्किलों के बीच संबंध चिन्हित किए जाने लगे। कुछ लोगों ने इस संकट की वजह अरब जगत के प्रतिबंधों और तेल संकट से जोड़कर देखा।
एक दूसरे बूम के बाद 19 अक्टूबर 1987 को अमेरिका का शेयर बाजार 23 परसेंट की दर से औंधे मूंह गिरा। जिसे आर्थिक जगत 1929 की मंदी से जोड़कर चर्चा करने लगा। लेकिन बाजार ने फिर से पहले जैसी तेजी पकड़ी। तेजी के इस सिलसिले को 2000-2002 के इंटरनेट और टेक्नोलॉजी सेक्टर की तबाही ने तोड़ दिया। ग्रीन स्पान के लिए हर तीन साल के बाद आने वाला यह संकट संभावी था।
1987 से लेकर 2006 तक ग्रीन स्पान का कार्यकाल था और हर बड़े संकट के बाद उन्होने फेड रेट में कटौती की। केंद्रीय बैंक ने वित्तीय संस्थानों को कड़ा रुख अपनाने की जगह बाजार में ज्यादा तरलता लाने को बाध्य किया। जिससे सट्टेबाजी की प्रक्रिया ढीली न पड़े।
आज इतिहास एक बार फिर दोहरा रहा है। फेड ने रेट कम तो किए हैं । लेकिन अब यह सट्टेबाजी में भी जान नहीं डाल पा रहा है। क्योंकि अब संकट खुद लोन देने वाली वित्तीय संस्थाओं पर है। इन संस्थाओं को नवंबर 2007 में 20 अरब डॉलर के चपत का अंदाजा लगाया जा चुका है। बैंकों के अरबों डॉलर के घाटे की सूचना अभी भी लगतार मिल रही है। ज्यादातर बैंक ऐसे कर्ज देकर फंस चुके हैं जिनकी वापसी संभव नहीं है।
भारत स्थितियां ऊपर से भले देखने में अलग लगती है लेकिन वित्तीय कंपनियों की हालत बहुत अच्छी नहीं है। जमकर कर्ज बांटने की होड़ का असर तत्काल नहीं दिख रहा है लेकिन अमेरिकी अनुभवों से सबक लिया जाय तो 2008 के अंत तक वित्तीय संस्थान को गहरे संकट से जूझना पड़ सकता है।
रिजर्व बैंक के लिए कुछ दिनों पहले तक रियल एस्टेट और बाकी सेक्टर में इस संकट के लक्षण मिले थे। लेकिन पूंजी बाजार की लॉबी काफी मजबूती से काम की और केंद्रीय बैंक को थोड़ी नरमी दिखानी पड़ी। रिजर्व बैंक पिछले साल बढ़ते कर्ज से बैंको को आगाह किया था। केंद्रीय बैंक ने कर्ज देने वाली संस्थाओं का ब्यौरा दिखाते हुए कहा कि अक्टूबर 2006 में रिटेल और सेवा क्षेत्र के लिए सालाना उधारी की दर करीब 33.4 परसेंट रही। जिसमें कि रिटेल सेक्टर के भीतर हाउसिंग लोन की ग्रोथ रेट करीब 32.3 परसेंट है। जबकि कमर्शियल प्रॉपर्टी में 83.9 परसेंट का रिकॉर्ड तोड़ ग्रोथ रेट दर्ज किया गया है। इस तर्क के सहारे आरबीआई ने रियल एस्टेट के लिए जरूरी जोखिम धारिता को 1 परसेंट से बढ़ाकर 2 परसेंट कर दिया गया। फिलहाल क्रेडिट ग्रोथ रेट पर नजर डाली जाय तो यह नवंबर 2007 के मुकाबले 30 परसेंट से घटकर 20 परसेंट रह गया है।

बाजार में तरलता की मांग पूंजी बाजार को भले ही राहत देती हो लेकिन बड़े स्तर पर इसके भयानक परिणाम निकलते हैं। तात्कालिक तौर पर तो हम वस्तु बाजार में जरूरी चीजों की कीमतों को बढ़ते हुए देखते है। लेकिन लंबे समय के बाद यहां खरीदार ढूंढना मुश्किल हो जाता है क्योंकि लोगों की इनकम इस कदर नहीं रहती की इन्हे वो खरीद सकें। आसान लोन देकर अर्थव्यवस्था चलाना समझदारी नहीं है। क्योंकि इस तरीके को अपनाकर आप उसे चुकाने की ताकत को कमजोर कर रहे होते हैं। इसका सीधा संबंध बैंकों के दिवालिएपन की ओर ले जाता है। अर्थव्यवस्था की ताकत सट्टेबाजी से तय नहीं होती इसे केंद्रीय बैंक को समझना होगा। इस लिहाज से भारतीय रिजर्व बैंक को उन समष्टिगत कारणों पर गौर करते हुए फैसला लेना चाहिए। हालांकि इसकी बहुत कम उम्मीद है। ब्याज दरों को बढ़ाने की वकालत करने वाले लोग काफी मजबूत हैं । ऐसे लोगों ने मनोवैज्ञानिक साधनों को प्रभावित करने वाले प्रचार माध्यों का का सहारा लेते हुए आम लोगों में ब्याज दर की कटौती को जरूरी बना दिया है। लेकिन लोगों को नहीं पता कि वे शुरुआती कालीदास की भूमिका में है।