समकालीन जनमत (पत्रिका) के लिए संपर्क करें-समकालीन जनमत,171, कर्नलगंज (स्वराज भवन के सामने), इलाहाबाद-211002, मो. नं.-09451845553 ईमेल का पता: janmatmonthly@gmail.com

Tuesday, January 22, 2008

जेपीएससी की धांधली पर कौन सी उपमा पेश करूं?


-सुधीर सुमन
आशंका तो थी कि झारखंड में व्याख्याताओं के लिए जो इंटरव्यू हुए उसके परिणाम में गड़बिड़यां होंगी,लेकिन धांधली और बेईमानी इस हद तक होगी, यह मैंने किसी दु:स्वप्न में भी नहीं सोचा था।
कोर्ट के निर्देष पर हुए इस इंटरव्यू में क़ानून, न्याय, नैतिकता सबकी धज्जियां उड़ाकर रख दी गई हैं। क्या कोर्ट इसके परिणामों की निष्पक्ष जांच करवाएगा? मेरा दावा है कि चयनित उम्मीदवारों की जांच उनके विषयों से संबंधित कोई निष्पक्ष कमेटी करे, तो भारी संख्या में लोग अयोग्य क़रार दिए जाएंगे। मेरा चुनाव नहीं हुआ इस कारण किसी प्रतिक्रिया में मैं यह नहीं कह रहा। मेरे पास इसके उदाहरण हैं। रोज़ नए-नए तथ्य सामने आ रहे हैं, जो मुझे एहसास करा रहे हैं कि उच्च शिक्षा की दुनिया में भ्रष्टाचार का ज़हर किस हद तक फैल चुका है। एमण्एण् में मेरी सहपाठी रह चुकी जिस लड़की का चुनाव हुआ है, उसकी एकमात्र योग्यता यह है कि उसका बाप प्रोफेसर है। हिंदी साहित्य में उसने ऑनर्स भी नहीं किया था, जो कि व्याख्याता के लिए अनिवार्य योग्यता है। मुझे जिन लोगों ने पढ़ाया और जितने सहपाठी थे, वे लोग इस चमत्कार पर हैरान हैं। उक्त प्रोफेसर की बेटी हिंदी साहित्य के किसी विषय पर ठीक से अपने विचार व्यक्त नहीं कर सकती। ठीक से बीस पच्चीस पंक्तियां भी लिख पाना उसके लिए संभव नहीं है। शायद इसे ही कहा जाता होगा कि ईश्वर चाहे तो अंधा देख सकता है, गूंगा बोल सकता है और लंगड़ा पहाड़ लांघ सकता है। यहां तो ईश्वर झारखंड पब्लिक सर्विस कमिशन के कर्ता-धर्ता ही हैं। सिर्फ़ यही एक घटना नहीं है, दूसरे विषयों में भी ऐसे उम्मीदवारों के चयन की सूचनाएं लगातार मुझे मिल रही हैं, जिनका एकेडमिक रिकॉर्ड और जिनकी योग्यता ऐसी है कि किसी हालत में उनका चयन नहीं होना चाहिए था।
कौन नहीं जानता कि धनवानों के फिसड्डी बेटे-बेटियों को बिहार-झारखंड के महाविद्यालयों में अच्छे अंक दिलवाए जाते रहे हैं। अगर यही लोग कॉलेज-यूनिवर्सिटियों की नौकरियों में जाएंगे, तो पढ़ाएंगे या सिर्फ़ वेतन उठाएंगे? इसका समाज के भीतर जो संदेश जा रहा है वह बेहद ख़तरनाक है कि किसी तरह धन जुटाओ, उसके बल पर कुछ भी ख़रीदा जा सकता है। क्या समाज में धन की होड़ में जो भ्रष्टाचार और अपराध बढ़ रहा है उसके लिए इस तरह की घटनाएं भी ज़िम्मेदार नहीं हैं?
मैं बहुत प्रतिभावान होने का दंभ नहीं रखता, लेकिन मुझे इसका भारी स्वाभिमान है कि मैंने पढ़ाई के दौरान किसी परीक्षा में ग़लत तरीक़े का सहारा नहीं लिया। अगर व्याख्याताओं के चयन में ईमानदारी बरती गई होती और मुझसे ज़्यादा योग्य लोग चुने गए होते, तो मुझे ज़रा भी दुख नहीं होता। लेकिन मुझे गहरी पीड़ा है कि जिस पैरवी, पहुंच, रिश्वत और जोड़तोड़ की प्रवृत्ति के िख़लाफ़ एक चुनौती की तरह छात्र जीवन में मैंने ख़ुद को खड़ा रखा और प्राय: मुझे जीत भी मिलती रही, आज उसने मुझे फिलहाल पराजित कर दिया है।
मैं हिंदी साहित्य का विद्यार्थी इसलिए नहीं बना था कि मुझे किसी दूसरे विषय में दािख़ला नहीं मिल रहा था। अपने समय और समाज की जो विडंबनाएं, विद्रूपताएं थीं, जो चुनौतियां थीं, उसने मुझे हिंदी साहित्य से जोड़ा था। पिछले बीस वषोंंZ में हिंदी साहित्य मेरे जीवन में घुलमिल गया है। इसके बग़ैर मेरे जीवन का कोई अर्थ नहीं हो सकता। मगर जेपीएससी की नज़र में मेरा हिंदी शिक्षक बनना ही कोई अर्थ नहीं रखता।
मेरा छोटा भाई लगातार मुझसे कह रहा था कि वहां पांच-पांच, सात-सात लाख रुपए की बोली चल रही है, आपका चुनाव नहीं होगा। मगर मित्रों और घरवालों की बहुत शिकायत थी कि मैं नौकरी पाने की कोशिश नहीं करता, इसलिए धांधली की आशंका होते हुए भी मैंने इंटरव्यू के लिए आवेदन दे दिया था।मेरे प्रिय शिक्षकों ने भी भोला भरोसा दिलाया था कि कुछ चयन तो गुणवत्ता के आधार पर होगा ही। अब जब परिणाम आया है तो सब आश्चर्यचकित और दुखी हैं। शैक्षणिक योग्यता के आधार पर इस चयन के लिए साठ अंक निर्धारित थे। तय मानकों के अनुसार मेरे सत्तावन अंक होते थे। इंटरव्यू के लिए चालीस अंक तय था। सवाल यह है कि इस चालीस में योग्यता के ठेकेदारों ने मुझे कितने अंक दिए?
इंटरव्यू के लिए माओवादियों के बंद और भारी बारिश को झेलते हुए हमलोग रांची पहुंचे थे। मेरे सहपाठी सुमन कुमार सिंह भी मेरे साथ थे। उनका क्रमांक ठीक मुझसे पहले था। हम नियत समय पर 10 बजे जेपीएससी कैंपस पहुंच गए। इंटरव्यू एक-डेढ़ घंटे बाद शुरू हुआ। हिंदी के लिए दो बोर्ड थे और हर रोज़ की तरह 40-40 उम्मीदवारों का इंटरव्यू होना था। हमारा इंटरव्यू गोपाल नारायण सिंह के बोर्ड में था। हमें बाहर जाने की इजाज़त नहीं थी। लगातार बारिश हो रही थी। हम भूखे-प्यासे अपनी बारी का इंतज़ार करते रहे। इस बीच इंटरव्यू लेने वालों ने उत्तम भोजन ग्रहण किया। हमलोगों की बारी आते-आते अपरान्ह के साढ़े चार बज गए। पहले सुमन कुमार सिंह अंदर गए और पांच-सात मिनट बाद ही काफी संतुष्ट भाव से निकले। मात्र पांच-सात मिनट के इंटरव्यू पर हमें थोड़ा आश्चर्य भी हो रहा था। ख़ैर, मैं भी अंदर पहुंचा।
सामने की चेयर पर एक तिलकधारी महानुभाव बैठे थे। उन्होंने बड़ा चमकीला कुर्ता पहन रखा था। अंदाज़ा लगाया कि यही गोपाल नारायण सिंह होंगे। दो और लोग मेरे बाएं-दाएं मौजूद थे। बाद में इंटरव्यू में आए एक उम्मीदवार ने बताया कि बाएं वाले विजय बहादुर सिंह थे, जो बनारस के हैं और दाएं वाले अलीगढ़ के, जिनका नाम मुझे आज तक नहीं पता । इनके अतिरिक्त एक सज्जन और थे, जो निश्चित तौर पर झारखंड के ही होंगे। मैंने ख़ास तौर पर लक्ष्य किया कि मेरे अंदर प्रवेश करते ही वे मुंह बनाते हुए बाहर निकल गए। इसकी वजह ऊब थी या कुछ और, मैं समझ नहीं पाया। जब तक इंटरव्यू चला वे बाहर ही रहे। वैसे भी इंटरव्यू चला ही पांच-सात मिनट। पता नहीं बाहर गए सज्जन ने मुझे कितना अंक दिया। शायद अपनी ग़ैरमौजूदगी के कारण शून्य दे दिया हो। वैसे वहां सर्वेसर्वा गोपालजी ही लग रहे थे, जिन्होंने मुझसे नाम, पता, शिक्षण संस्था और पीएचडी के गाइड के बारे में पूछा। गो कि यह सब कुछ मेरे आवेदन में लिखा हुआ था। उन्होंने मेरे मौजूदा कामकाज के बारे में पूछा। मैंने अपनी पत्रिका के संपादन के बारे में जानकारी दे दी।
इंटरव्यू के दौरान ही गोपाल नारायण सिंह की शालीन, किंतु दबंग मौजूदगी से मुझे महसूस हुआ कि यह शख़्स जो चाहेगा वही होगा। इंटरव्यू में जो मुझसे पूछा गया उसके आधार पर मुझे भरोसा था कि चालीस में कम-से-कम तीस अंक तो मिलना ही चाहिए। सिर्फ एक सवाल का जवाब मैं नहीं दे पाया था, जो प्राचीन काव्य के छंद से संबंधित था। पूछनेवाले वृद्ध सज्जन के बोलने का लहज़ा ऐसा था कि काव्यपंक्तियों को सुना पाना दुरूह था। उनके बोलने के लहज़े की ख़ासियत के बारे में उस बोर्ड के गुज़रे सारे उम्मीदवार बता सकते हैं। विजय बहादुर सिंह ने मुझसे पूछा कि आपने संजीव पर रिसर्च क्यों किया? इसका जवाब मैं बिल्कुल सहजता से दिया। उन्होंने कहा कि संजीव पर तो कई रिसर्च हो रहे हैं, आपने अपने शोध में किन विशेषताओं को चििन्हत किया है? मैंने उनकी विशेषताएं बतानी शुरू कीं। अभी एक पहलू पर बोला ही था कि सवालों का ट्रैक बदल गया। वृद्ध सज्जन, जो संभवत: अलीगढ़ के थे, उन्होंने मुझसे उपमा अलंकार के बारे में पूछा। मैंने बता दिया। उदाहरण पूछा तो एक प्रचलित उदाहरण दिया- `मुख चांद-सा सुंदर´। गोपालजी ने चुटकी ली कि तपते लोहे जैसा क्यों नहीं! उसके बाद उन्होंने यह कहते हुए इंटरव्यू ख़त्म किया कि ``ठीक है, जाइए। आप तो साहित्य में रमे हुए हैं।´´ बाद में जब मैंने इंटरव्यू का हाल अपने प्रबंध संपादक केण्केण् पांडेय को सुनाया तो उन्होंने मज़ा लेते हुए कहा कि ``तो रमे रहिए, इसका मतलब है आपका नहीं होगा।´´ अब मैं सोचता हूं कि जेपीएससी के उस इंटरव्यू बोर्ड के प्रति किस उपमा का प्रयोग करूं?
परिणाम आने से पहले ही मेरे छोटे भाई का दोस्त बता रहा था कि उसके चाचा का मनोविज्ञान में चयन तय है, सात लाख रुपए लग रहे हैं। परिणाम आने के बाद उसने बताया कि उनका चयन हो गया। उसके पास पांच-छह अन्य लोगों के बारे में भी जानकारी थी, जिनका पैसे के बल पर चयन हुआ था। उसने यह भी बताया कि झारखंड के स्थानीय पता वाले उम्मीदवारों को प्राथमिकता दी गई है, कि उसके चाचा ने भी वहीं का पता दिया था। रांची से एक साहित्यकार मित्र ने बताया कि जिनका पता बिहार का था, उन्हें कुछ नज़रअंदाज़ किया गया है। मुझे समझ में नहीं आता कि यह चयन का आधार कैसे हो सकता है। मेरी जिस अयोग्य सहपाठी का चयन हुआ है, उसका पता तो बिहार का ही होगा!
एक ज़बरदस्त चर्चा यह भी है कि झारखंड पब्लिक सर्विस कमिशन में आरएसएस के पदाधिकारी भरे हुए हैं, जिन्होंने राजनीतिक नज़रिए से चुनाव किया है। यह तो आरएसएस में ज़रा भी आस्था रखने वाले उम्मीदवार ही जानें कि उनका संघी होना काम आया या उनमें भी बहुतेरे धन की ताक़त से पछा़ड़ दिए गए। मेरा चयन न करने में अगर संघी दृष्टि काम आई है तो कम-से-कम फिर एक बार यह साबित होगा कि संघ के लोग कितने संकीर्ण, चालबाज़, भ्रष्ट और पतित होते हैं।
मालूम नहीं विजय बहादुर सिंह इसकी गवाही देंगे या नहीं। इंटरव्यू के बाद संयोगवश बनारस में एक साहिित्यक बंधु ने मेरे रिसर्च का हवाला देते हुए उनसे जब जानकारी चाही तो उन्होंने बताया कि संजीव पर जिसका रिसर्च था, उसका इंटरव्यू तो अच्छा हुआ था। अगर अंतिम लिस्ट में कोई गड़बड़ी नहीं होगी तो उसका हो जाना चाहिए। मेरा विजय बहादुर सिंह से कोई परिचय नहीं रहा कभी। इंटरव्यू के बाद ही उनके बारे में पता चला। बाद में जब मेरे साहिित्यक मित्र को मालूम हुआ तो उसने कहा कि पहले बताना चाहिए था। मगर किसको पता था कि कौन इंटरव्यू लेने आ रहा है? और अगर आ भी रहा है तो यह तो मालूम नहीं था कि उसी के बोर्ड में इंटरव्यू होगा। पता भी रहता तो शायद मेरे जैसा आदमी इसका सहारा नहीं लेता।
रोज़ धांधली की सूचनाएं मिल रही हैं। मेरे कवि मित्र सुनील के साले ने बताया कि बीएचयू में दर्शनशास्त्र के तीन छात्रों ने पांच-पांच लाख रुपए देकर व्याख्याता की नौकरी हासिल की है। उनलोगों ने एक दिन होटल में दलालों को मुग़ाZ और शराब की पार्टी भी दी। भोजपुरी के एक युवा लेखक ने बताया कि हिंदी में रिक्तियां ज़्यादा थीं इसलिए रेट कुछ कम था। एबीवीपी के लोगों ने उससे संपर्क करके कहा था कि तीन लाख रुपए में नौकरी मिल जाएगी। उसने यह भी बताया कि इंटरव्यू लेने वालों को यह निर्देश था कि वे उम्मीदवारों का अंक पेंसिल से लिखें। इसकी और तीन लाख रेट की पुष्टि ख़ुद बाहर से इंटरव्यू लेने आए एक सज्जन ने क्षोभ के साथ उससे की। अगर यह सच है तो बेहद शर्मनाक है।
इसलिए मुझे लगता है इस नियुक्ति प्रक्रिया को अविलंब रोका जाना चाहिए और चुने गए उम्मीदवारों की योग्यता की जांच किसी निष्पक्ष कमेटी द्वारा करवानी चाहिए। वरना विश्वविद्यालयों को खाने और बबाZद करने का खेल इसी तरह जारी रहेगा और छात्रों के भविष्य को अंधेरे में ढकेला जाता रहेगा।

Thursday, January 17, 2008

फिल्म को फिल्म की तरह देखें.. मतलब !

हमने सोचा कि फिल्म 300 पर कोई बहस आगे नहीं बढ़ेगी। लेकिन बहस धीरे-धीरे ही सही बहस आगे बढ़ी । हालांकि लिखने वालों ने नाम नही दिया। आप भी जानिए फिल्म पर दी जाने वाली प्रतिक्रियाओं के बारे में।
Anonymous said...
सदी की बेहतरीन और जिम्मेदार सुझावों में से एक सुझाव। मैं इन महाशय से कहना चाहुंगा कि अगर आपको मैं दो पैरों पर चलने वाले बंदर की तरह देखा जाय या फिर अभिव्यक्ति की बेहतरीन क्षमता और अपने आसपास घटित घटनाओं की कारणता जानने वाले सजग मानव के रूप में। इतिहास थोड़ा पढ़े और किताब पढ़े( किताब लेकर घुमें नहीं) केवल इंटरनेट पढ़ेंगे तो साधु और ओझा की तरह ज्ञान का हवन कर डालेंगे। कम्युनिस्ट कभी बाप के द्वारा की गई हत्या की सजा बेटे को देने की वकालत नहीं करता। इसमें आप यकीन करते होंगे। हम हत्यारों और दलालों की दुनिया से वाकिफ हैं और उसे जड़ से काटने में ज्यादा यकीन रखते हैं। माफ करिएगा हम बहुत सीधा जवाब देना जानते हैं। हम मानव और मानवनुमा दिखने वालों के बीच फर्क करते हैं।

Anonymous said...

अमेरिका में जो हो रहा है वह पाप है और ईरान चूंकि प्रतिरोध करता है वह पवित्र है, यह दृष्टि ठीक नहीं. फ़िल्म को फ़िल्म की तरह भी देख लीजिए. यह इतिहास बताएगा की ईरान की महान सरकार प्रगतिशील थी या अमेरिका की तानाशाही व्यवस्था सड़ी-गली थी. अलबत्ता यह याद रखना चाहिए की खुमैनी की क्रांति के बाद सबसे पहले ईरान में मार्क्सवादियों को खड़ा करके गोलिओं से उडाया गया था. उसके लिए कुछ हज़ार साल पीछे नहीं ३८ साल पीछे जाना है.

Saturday, January 12, 2008

जरूरी है परमाणु समझौते को रद्द करना


-नॉंम चौमस्की
प्रजातियों का जीवन दांव पर लगा है। इस स्वीकारोक्ति के साथ आगे बढ़ने का एक बेहतर तरीका है सार्वभौमिक परमाणु निरस्त्रीकरण की जरूरत की ओर कदम बढ़ाया जाय।

नाभिकीय शस्त्र रखने और बनाने वाले राज्य अपराधिक राज्य हैं। हालांकि वो परमाणु हथियारं को नष्ट करने वाली परमाणु अप्रसार संधि के धारा 6 को भी मानते हैं। इस कानून पर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का भी ठप्पा है। यह न्यायालय परमाणु हथियारों को पूरी तरह नाश करने के लिए अच्छी नियत के साथ बातचीत चलाने की अपील करता है। लेकिन किसी भी परमाणु हथियार संपन्न राज्य ने इसे नहीं माना है। संयुक्त राज्य अमेरिका इसे नकारने वालों का मुखिया है। खासकर बुश प्रशासन जो ये मानता है कि यह धारा 6 का विषय ही नहीं है।

27 जुलाई को वांशिंगटन ने भारत के साथ एक समझौता किया। यह समझौता एनपीटी मुख्य हिस्से को ही खा गया। इसका दोनों ही देशों में पुरजोर विरोध हुआ है। इज़रायल और पाकिस्तान की तरह (लेकिन इरान से अलग) भारत भी एनपीटी का हस्ताक्षरकर्ता देश नहीं हैं। संधि को धत्ता बताते हुए इसने नाभिकीय हथियारों को विकसित कर लिया है। हाल के समझौते से बुश प्रशासन इस अलग किस्म (कानून से बाहर) के व्यवहार को प्रभावी रूप से समर्थन और सुविधा प्रदान करता है। यह समझौता संयुक्त राज्य के कानून का भी उल्लघंन करता है और परमाणु हथियारों की आपूर्ति करने वाले ग्रुप को अनदेखा करता है। ऐसे 45 देश हैं जिन्होने परमाणु हथियार प्रसार के खतरे को कम करने के लिए कड़े नियमों को स्थापित किया है।
आर्म्स कट्रोल एसोसिएशन के कार्यकारी निदेशक डेरिल किम्बॉल कहते हैं कि "यह समझौता भारत की ओर से भविष्य में किए जाने वाले नाभिकीय परिक्षण को नहीं रोकता है। यह समझौता आश्चर्यजनक रुप से भारत के परमाणु परीक्षण करने पर वाशिंगटन, नई दिल्ली को दूसरे देशों से ईधन हासिल करने के लिए प्रतिबद्ध करता है। " यह भारत को "बम बनाने के लिए सीमित घरेलु सप्लाई को भी मुक्त करने" की छूट देता है। ये सभी कदम अंतर्राष्ट्रीय अप्रसार संधियों का सीधा-सीधा उल्लघंन करते हैं।
भारत-अमेरिका परमाणु समझौता दूसरों को भी इस तरह के नियमों को तोडने के लिए संभावित रुप से उकसाता है। ऐसी चर्चा है कि पाकिस्तान नाभिकीय हथियारों के लिए एक प्लुटोनियम उत्पादक रिऐक्टर बनाने जा रहा है। ऐसा लगता है कि हथियारों के रुपों की एक ज्यादा उन्नत अवस्था की शुरुआत हो रही है। क्षेत्रीय नाभिकीय महाशक्ति इजराइल भारत की तरह विशेषाधिकार के लिए कांग्रेस के साथ गुटबाजी करता आ रहा है। उसने नियमों से छूट पाने के निवेदन के साथ परमाणु आपूर्ति समूह से भी संपर्क साधा है। अब फ्रासं रुस और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने भारत के साथ परमाणु समझौता करने की तरफ कदम बढ़ा चुके हैं। चीन का पाकिस्तान के साथ है और यह चौंकाने वाली बात है कि किसी समय के सार्वभौमिक महाशक्ति नें दरवाजे खोल दिये हैं।
भारत-अमेरिका समझौता सैन्य और वाणिज्यिक दोनों उद्देश्यों को एक कर देता है। परमाणु हथियारों के विशेषज्ञ गैरी मिल्होलीन ने सेक्रेटरी ऑफ स्टेट कोन्डोलिजा राइस के द्वारा कांग्रेस को दी गयी सफाई को उल्लेखित करते हैं कि समझौता "निजी क्षेत्र को दृढतापूर्वक ध्यान में रख कर बनाया" गया था, खासकर हवाईजहाज और रिऐक्टर्स बनाने वाली कंपनियों के। मिल्होलिन जोर देते हुए कहते हैं कि उसमें सैन्य ऐयरक्राफ्ट शामिल है। इसके अलावा वो आगे कहते हैं कि परमाणु युद्ध के खिलाफ खड़ी रुकावटों को कम आंकने से समझौता न केवल क्षेत्रीय तनाव बढाता है बल्कि "उस दिन की तरफ भी शीघ्रता से बढ़ता है जब एक परमाणु विस्फोट एक अमेरिकी शहर को नष्ट कर देगा"। वाशिगंटन का संदेश हैं कि "संयुक्त राज्य के लिए पैसे की तुलना में आपात नियंत्रण कम महत्वपूर्ण हैं"—अर्थात्, संयुक्त राज्य के व्यापरिक मण्डल के लिए लाभ जरूरी है—चाहे संभावित खतरे कुछ भी हों। किम्बॉल कहते हैं कि संयुक्त राज्य भारत को "एनपीटी पर करार करने वाले देशों के मुकाबले परमाणु व्यापार की ज्यादा सुविधाजनक शर्तें" प्रदान कर रहा है। दुनिया में बहुत कम लोग होंगे जो जो इस कुटिलता को देखने में असफल हैं। वाशिंगटन उन सहयोगियों और ग्राहकों को पुरस्कृत करता है जिन्होने एनपीटी नियमों को पूरी तरह अनदेखा किया है। जबकि इरान के विरुद्ध युद्ध की धमकी दे रहा है जो चरम उकसाव के बाद भी एनपीटी के उल्लघंन के लिए नहीं जाना जाता। अमेरिका ने इरान के दो पड़ोसियों पर कब्जा किया है।1979 में अमेरिकी नियंत्रण से मुक्त होने के बाद से वह खुले तौर पर इरानी राज्य को उखाड फैकने का प्रयास करता रहा है।
पिछले कुछ सालों से भारत और पाकिस्तान ने अपने बीच तनावों को कम करने की दिशा में प्रगति की है। लोगों के बीच संपर्क बढ़ा है और सरकारें दोनों राज्यों को अलग करने वाले कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार-विमर्श कर रहीं है। लेकिन उम्मीद जगाने वाली यह प्रगति भारत-अमेरिकी परमाणु समझौते से उलट भी सकती है। इस पूरे क्षेत्र में विश्वास पैदा करने वाले माध्यमों में से एक था इरान से लेकर पाकिस्तान से होकर भारत में प्राकृतिक गैस पाइपलाइन का निर्माण था। "शान्ति पाइपलाइन" क्षेत्र को एक सूत्र में बांध दी होती और आगे भी शान्तिपूर्ण एकीकरण की संभावनाओं का द्वार खोलती। पाइपलाइन के जरिए जो उम्मीद लग रही है वह भारत-अमेरिकी समझौते की बलि चढ सकती है। वाशिंगटन भारत को इरानी गैस के बदले में नाभिकीय शक्ति को प्रस्तावित करने की रणनीति को दुश्मन को अलग-थलग करने के एक उपाय की तरह देखता है।
भारत-अमेरिका परमाणु समझौता वाशिगंटन के ईरान को अलग-थलग करने की रणनीति का ही हिस्सा है। 2006 में अमेरिकी कांग्रेस ने हाईड एक्ट पारित किया । यह एक्ट विशेषरुप से मांग करता है कि अमेरिकी सरकार " इरान के सामूहिक विनाश वाले हथियारों को हासिल करने के प्रयास के लिए हतोत्साहित करने, अलग-थलग करने और अगर जरुरी हो तो प्रतिबन्ध लगाने और रुकावट डालने के प्रयासों में भारत की पूरी और सक्रीय भागीदारी सुनिश्चित करे" ।
यह गौर करने वाली बात है कि बड़ी संख्या में अमेरिकी और इरानी जनता इजरायल और इरान को शामिल करते हुए इस पूरे क्षेत्र को ही नाभिकीय हथियार मुक्त क्षेत्र में बदलने के पक्ष में है। 3 अप्रैल, 1991 के संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का प्रस्ताव 687 तो बहुत से लोगों को याद होगा । जो कि मांग करता है कि " मध्य पूर्व में सामूहिक विनाश वाले हथियारों और उनको संचालित करने वाली सभी मिशाइलों से मुक्त क्षेत्र की स्थापना की जाय।" अमेरिका ने इराक पर अपने आक्रमण की सफाई के दौरान नियमित रुप से इस अपील का सहारा लेता रहा है।
अनुवाद-नूतन मौर्या

Wednesday, January 2, 2008

दंभी लोगों की गूंज है फिल्म 300


-विनिता
३०० की ऎतिहासिक पृष्ठभूमि एक बात है लेकिन उसका फिल्मी रुपान्तरण सिर्फ तथ्यों को नही रखता। इरानी सेना को दैत्यों, जादूगरों और पशुवत लोगों से भरा दिखाकर यह फिल्म जो कह रही है उसको समझने में किसी भी न्यूनतम राजनैतिक समझदारी रखने वाले को दिक्कत नहीं होनी चाहिए। फिल्म में लियोनायडस के जरिये कही गई बात कि दुनिया में सभ्यता और स्वतंत्रता कि आखरी उम्मीद स्पार्टा है,में निश्चित तौर से आज के पश्चिमी महाबलियों कि भाषा की दंभी गूंज सुनी जा सकती है। इतिहास कि इस तरह कि तोड़-मरोड़ का हर तरह से प्रतिरोध होना चाहिए, निश्चित तौरपर सांस्कृतिक रुपों में भी, जिसका ईरानी संगीतकार यास एक अच्छा उदाहरण पेश करते हैं।

जो इतिहास है सो है...

इतिहास पर फिल्म बनाना वर्तमान को आइना दिखाना होता है। उसे सबक देना होता है। एक विषय के रूप में भी शायद इतिहास की जरूरत हमें इसीलिए होती है। फिल्म चाहे पचास बार बनाई जाय उसका मूल्यांकन उसके देखे जाने वाले समय के हिसाब से होगा। हिटलर के समय यहूदियों पर हुए अत्याचार के जरिए हम आज इजराइल की हरकत को वाजिब नहीं ठहरा सकते। लेकिन अमित जी मानते हैं कि ऐसा नहीं होता। वे 300 को ऐतिहासिक रूप से सही मानते हैं। इतिहास तो इतिहास है उसे बताने या दिखाने से संस्कृति कैसे नष्ट हो सकती है? अमित जी का यही सवाल है।

अमित जी लिखते हैं...
जनाब, यदि यहाँ देखेंगे तो यह आपको पता चलेगा कि इस कहानी पर फिल्म आज से 45 वर्ष पहले भी बनी है। यह कहानी ऐसी है कि उस समय के बाद से युद्ध विज्ञान और रणनीती के हर स्कूल में इसका अध्ययन किया गया है, आज भी होता है।

इस फिल्म में दिखाया गया है कि उस युद्ध में किस तरह स्पार्टा की 300 सैनिकों की एक छोटी सी सेना ने तत्कालीन पर्सिया (आधुनिक ईरान)को नेस्तनाबुत किया था

आपका पता नहीं पर मैंने यह फिल्म भी देखी है और 45 वर्ष पूर्व आई 300 Spartans भी देखी है और दोनों में से किसी फिल्म में यह नहीं दिखाया कि स्पार्टा के ३०० सैनिकों ने पर्शिया को नेस्तेनाबूद किया। दोनों में सिर्फ़ स्पार्टा के ३०० बहादुरों और थेस्पिआ के ७०० रणबांकुरों(यह 300 में नहीं वरन्‌ 300 Spartans में दिखाया है और इतिहास के अनुसार सत्यता के निकट है) की वीरता दिखाई है कि वे ज़र्कसीस की सागर जैसी सेना के सामने डटे रहे और लड़ते हुए प्राण त्यागे। और यह इतिहास में दर्ज है कि थरमाप्ली की भीषण लड़ाई के बाद प्लैटेया पर ज़र्कसीस की बाकी सेना का मुकाबला अन्य यूनानी राज्यों की सेनाओं से हुआ था और ज़र्कसीस की सेना की इतनी मारकाट हुई थी कि वह आखिरकार अपनी सेना छोड़ के वापस पर्शिया भाग गया था।

अब जो इतिहास है सो है, उससे किसी की संस्कृति कैसे नष्ट होती है यह मेरे को समझ नहीं आता। कल को कोई फिल्म बनाता है जिसमें दिखाता है कि डेढ़ सौ वर्ष भारत अंग्रेज़ों का गुलाम रहा और कैसे अंग्रेज़ों ने भारतीयों का शोषण किया तो क्या उससे भारत की संस्कृति नष्ट हो जाएगी? या कोई यह फिल्म बनाता है कि कैसे बाबर ने दिल्ली का तख्त हासिल किया और मुग़ल सल्तनत की नींव रखी तो उससे भारत की संस्कृति नष्ट हो जाएगी?

Sunday, December 30, 2007

फिल्म ३०० के खिलाफ


मध्य एशिया पर लगाई गई गिद्ध दृष्टि में अगला संभावित शिकार है ईरान। जिसकी नींव सांस्कृतिक स्तर पर रखी जा चुकी है। यकीन न हो तो हालीवुड़ की फिल्म '300' देख लें। अचानक हालीवुड को 480 ईसा पूर्व थर्मोपिलई के युद्ध की याद क्यो आई इसे आप बखूबी समझ सकते हैं। फ्रैंक मिलर के उपन्यास पर आधारित इस फिल्म में 480 ईसा पूर्व हुए थर्मोपिलई के युद्ध का वर्णन है। निर्माता वार्नर ब्रदर्स की इस फिल्म में दिखाया गया है कि उस युद्ध में किस तरह स्पार्टा की 300 सैनिकों की एक छोटी सी सेना ने तत्कालीन पर्सिया (आधुनिक ईरान)को नेस्तनाबुत किया था।
दुनिया भर में जनमत बनाने की कमान सभ्यता के ऐसे ही लुटेरों और दंभियों के जिम्मे है। लेकिन इस सांस्कृतिक हमले का विरोध शुरू हो चुका है। इस फिल्म के प्रतिरोध में ईरानी संगीतकार और लेखक यास ने एक बेहतरीन गीत लिखा है...



अग्रेजी अनुवाद
Listen. I want to tell you my intent
They want to erase my identity
The history of the land of the Aryans
Is screaming until we come to it
So now is the time for you to hear
Iran is my land the
The country which after 7000 years
Is still standing
And the hearts of Iranians – still like the sea
Hear this, my fellow Iranian, from YAS
I too for my land stand like a soldier
Hold Iran like a gem in your hand and say
My complaint will burst out like a shot
Let's stand together and sing our anthem
My sisters, my brothers, my fellow Iranians
Iran's civilization is in danger
All of us are soldiers beneath our flag
We won't let anyone spread lies about us
For us Iranians it is our calling
That we wear the symbol of 'Farvahar' around our necks
Our unity against an enemy is the cause of their distress
Iran's name for us is an honor
And our respect for her is like a thorn in eye for those
Who want to injure her

CHORUS:

- Like the thirst of a seed [wheat] for water
- Like the dampness of rain, the smell of earth
- Like you, pure eyes, like the feeling of its earth, for you
- My land. Singing for you is in my heart
- Singing of my land, is my feeling
- My love - the earth of this land – Iraaaan.

You want to say that we came from generations of Barbarians?
So take a look then to Takht Jamshid!
You're showing Iran's name in vein
So yours could be written big on a cover of a CD [DVD}?
I'm writing down your intentions in my book
I know why you wrote this film "300"
I know that your heart is made of stone and lead
Instead of using your art to make a culture of peace
In this sensitive air and bad atmosphere
You want to start fishing in murky waters [profiting]
But this I tell you in its original language
Iran will never be spoiled and surrendered
God has given you two eyes to see
Take a look and read the books written by
Saadi and Ibn-e-Sina, Ferdosi, Khayam or Molana Rumi
Always throughout history we were the start [on top]
But now YAS can't sit down quietly
Let Iran's name be marred by a few tricksters
I'll shred your intentions with the "razor of hope"
Who are YOU to speak of the history of Iran?

- CHORUS -

It was Cyrus The Great that started the peace
Freeing the Jewish from the grip of Babylon
Cyrus The Great wrote the first bill of human rights
That is why I carry my esteem and great pride
For my Iran. The history of my land
For the earth of this land which my body is from
Whatever part of the world you live my fellow Iranian
And till your blood flows through you
Don't allow yourself to be satisfied
That anyone can fool around with your heritage
The history of Iran is my identity
Iran – protecting your name is my good intent

Wednesday, December 26, 2007

शासक बनने की इच्छा


वहाँ एक पेड़ था

उस पर कुछ परिंदे रहते थे

पेड़ उनकी आदत बन चुका था

फिर एक दिन जब परिंदे आसमान नापकर लौटे

तो पेड़ वहाँ नहीं था

फिर एक दिन परिंदों को एक दरवाजा दिखा

परिंदे उस दरवाजे से आने-जाने लगे

फिर एक दिन परिंदों को एक मेज दिखी

परिंदे उस मेज पर बैठकर सुस्ताने लगे

फिर परिंदों को एक दिन एक कुर्सी दिखी

परिंदे कुर्सी पर बैठे

तो उन्हें तरह-तरह के दिवास्वप्न दिखने लगे

और एक दिन उनमें

शासक बनने की इच्छा जगने लगी !
-राजेश जोशी

Sunday, December 23, 2007

दांये हांथ की नैतिकता


-धुमिल

सहमति...
नहीं यह समकालीन शब्द नहीं है
इसे बालिगों के बीच चालू मत करो
जंगल से जिरह करने के बाद
उसके साथियों ने उसे समझाया कि भूख
का इलाज सिर्फ नींद के पास है!
मगर इस बात से वह सहमत नहीं था
विरोध के लिये सही शब्द पटोलते हुए
उसनें पाया कि वह अपनी जुबान
सहुवाइन की जांघ पर भूल आया है
फिर भी हकलाते हुए उसने कहा-
मुझे अपनी कविताओं के लिये
दूसरे प्रजातंत्र की तलाश है
सहसा तुम कहोगे और फिर एक दिन-
पेट के इसारे पर
प्रजातंत्र से बहर आकर
वाजिब गुस्से के साथ अपनें चेहरे से
कूदोगे
और अपने ही घूँसे पर
गिर पड़ोगे|
क्या मैनें गलत कहा? अखिरकार
इस खाली पेट के सिवा
तुम्हारे पास वह कौन सी सुरक्षित
जगह है,जहाँ खड़े होकर
तुम अपने दाहिने हाँथ की
शाजिस के खिलाफ लड़ोगे?
यह एक खुला हुआ सच है कि आदमी-
दांये हांथ की नैतिकता से
इस कदर मजबूर होता है
कि तमाम उम्र गुज़र जाती है मगर गाँड़
सिर्फ बांया हाथ धोता है
और अब तो हवा भी बुझ चुकी है
और सारे इश्तिहार उतार लिये गये है
जिनमें कल आदमी-
अकाल था! वक्त के
फालतू हिस्सों में
छोड़ी गयी फालतू कहांनियाँ
देश प्रेम के हिज्जे भूल चुकी है
और वह सड़क
समझौता बन गयी है
जिस पर खड़े होकर
कल तुमने संसद को
बाहर आने के लिये आवाज़ दी थी
नहीं,अब वहाँ कोई नहीं है
मतलब की इबारत से होकर
सब के सब व्यवस्था के पक्ष में
चले गये है|लेखपाल की
भाषा के लंबे सुनसान में
जहाँ पालों और बंजरों का फर्क
मिट चुका है चंद खेत
हथकड़ी पहनें खड़े है|

और विपक्ष में-
सिर्फ कविता है|
सिर्फ हज्जाम की खुली हुई किस्मत में एक उस्तूरा- चमक रहा है
सिर्फ भंगी का एक झाड़ू हिल रहा है
नागरिकता का हक हलाल करती हुई
गंदगी के खिलाफ

और तुम हो, विपक्ष में
बेकारी और नीद से परेशान!

और एक जंगल है-
मतदान के बाद खून में अंधेरा
पछीटता हुआ
(जंगल मुखबिर है)
उसकी आंखों में
चमकता हुआ भाईचारा
किसी भी रोज तुम्हारे चेहरे की हरियाली को बेमुरव्वत चाट सकता है

खबरदार!
उसनें तुम्हारे परिवार को
नफ़रत के उस मुकाम पर ला खड़ा किया है
कि कल तुम्हारा सबसे छोटा लड़का भी
तुम्हारे पड़ोसी का गला
अचानक
अपनीं स्लेट से काट सकता है|
क्या मैनें गलत कहा?
आखिरकार..... आखिरकार.....