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Sunday, March 23, 2008

23 मार्च पर




भगत सिंह
एक पूरी-की-पूरी सदी विश्वासघात की गुजरी जाती है
मिट्टी से बंदूकें नहीं उगीं
लहू से सिंची फसलें मारी गईं
उठती गई हैं काराएं
साम्राज्यवाद के कारिन्दे फिरते हैं चारों ओर
तुम्हारे हत्यारों का ही जयगान है आज...

लाहौर के उस निर्जन में
गूंजी तुम्हारी आखिरी आवाज़
टकराकर लौट आती है
इस देश के
विरान खेतों, उजाड़ शहरों से

मैकाले हंसता है क्लिटन की बाहें थाम
ब्लेयर और बुश के अट्टाहास में डूबता है
सतलज के तट से उठता रूदन.......

वे कुछ दिन थे
सन 1931 की वसंत के
जब एक सपने के डैने फिरते थे
चनाब से गंगा के कछारों तक

मौत को पराजित करती एक हंसी थी
जो गूंजी थी हिंदूकुश से विंध्य तक
मक़तल को जाती
तुम्हारी वह धज सलामत है

गुज़रते गए हैं बरस दर बरस
जुल्म और तबाही के
इस मुल्क ने तुम्हारा कैलेंडर बना दिया,
और तो और
पूंजी के गुमाश्ते
और धर्म के सियासती भी
तुम्हारी जयकार में लगे
ठीक आयोध्या के बाद !

वह रंग जो उड़ा था फिजाओं में
बलिदान का वसंती रंग
देखो तो आज किनका झंडा है!.....

लोग तुम्हे भूले नहीं
पर यह याद रखना भी
क्या याद रखना है?
जानता हूं
तुमने लानत भेजी होती
इस तरह के याद रखने पर
शहादत की जयकार के इस शोर को
खामोश करने को
शायद तुमने धमाका किया होता.....

-आलोक श्रीवास्तव

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मैं नास्तिक क्यों हूं

भगत सिंह ने यह लेख 5-6 अक्टूबर, 1930 को लिखा था। यह पहली लाहौर से प्रकाशित अंग्रेजी पत्र 'द पीपुल'के 27 सितंबर 1931 के अंक में प्रकाशित हुआ था। अलौकिक सत्ता के अस्तित्व को लेकर यह अब तक सबसे सहज औऱ ओजपूर्ण लेख माना जाता है।
प्रत्येक मनुष्य को, जो विकास के लिए खड़ा है, रूढ़िगत विश्वासों के हर पहलू की आलोचना तथा उन पर अविश्वास करना होगा और उनको चुनौती देनी होगी. प्रत्येक प्रचलित मत की हर बात को हर कोने से तर्क की कसौटी पर कसना होगा. यदि काफ़ी तर्क के बाद भी वह किसी सिद्धांत या दर्शन के प्रति प्रेरित होता है, तो उसके विश्वास का स्वागत है. उसका तर्क असत्य, भ्रमित या छलावा और कभी-कभी मिथ्या हो सकता है. लेकिन उसको सुधारा जा सकता है क्योंकि विवेक उसके जीवन का दिशा-सूचक है.
लेकिन निरा विश्वास और अंधविश्वास ख़तरनाक है. यह मस्तिष्क को मूढ़ और मनुष्य को प्रतिक्रियावादी बना देता है. जो मनुष्य यथार्थवादी होने का दावा करता है उसे समस्त प्राचीन विश्वासों को चुनौती देनी होगी.
यदि वे तर्क का प्रहार न सह सके तो टुकड़े-टुकड़े होकर गिर पड़ेंगे. तब उस व्यक्ति का पहला काम होगा, तमाम पुराने विश्वासों को धराशायी करके नए दर्शन की स्थापना के लिए जगह साफ करना.
यह तो नकारात्मक पक्ष हुआ. इसके बाद सही कार्य शुरू होगा, जिसमें पुनर्निर्माण के लिए पुराने विश्वासों की कुछ बातों का प्रयोग किया जा सकता है.
जहाँ तक मेरा संबंध है, मैं शुरू से ही मानता हूँ कि इस दिशा में मैं अभी कोई विशेष अध्ययन नहीं कर पाया हूँ. एशियाई दर्शन को पढ़ने की मेरी बड़ी लालसा थी पर ऐसा करने का मुझे कोई संयोग या अवसर नहीं मिला. लेकिन जहाँ तक इस विवाद के नकारात्मक पक्ष की बात है, मैं प्राचीन विश्वासों के ठोसपन पर प्रश्न उठाने के संबंध में आश्वस्त हूँ. मुझे पूरा विश्वास है कि एक चेतन, परम-आत्मा का, जो कि प्रकृति की गति का दिग्दर्शन एवं संचालन करती है, कोई अस्तित्व नहीं है.
हम प्रकृति में विश्वास करते हैं और समस्त प्रगति का ध्येय मनुष्य द्वारा, अपनी सेवा के लिए, प्रकृति पर विजय पाना है. इसको दिशा देने के लिए पीछे कोई चेतन शक्ति नहीं है. यही हमारा दर्शन है.
जहाँ तक नकारात्मक पहलू की बात है, हम आस्तिकों से कुछ प्रश्न करना चाहते हैं-(i) यदि, जैसा कि आपका विश्वास है, एक सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक एवं सर्वज्ञानी ईश्वर है जिसने कि पृथ्वी या विश्व की रचना की, तो कृपा करके मुझे यह बताएं कि उसने यह रचना क्यों की?
कष्टों और आफतों से भरी इस दुनिया में असंख्य दुखों के शाश्वत और अनंत गठबंधनों से ग्रसित एक भी प्राणी पूरी तरह सुखी नहीं.
कृपया, यह न कहें कि यही उसका नियम है. यदि वह किसी नियम में बँधा है तो वह सर्वशक्तिमान नहीं. फिर तो वह भी हमारी ही तरह गुलाम है.
कृपा करके यह भी न कहें कि यह उसका शग़ल है.
नीरो ने सिर्फ एक रोम जलाकर राख किया था. उसने चंद लोगों की हत्या की थी. उसने तो बहुत थोड़ा दुख पैदा किया, अपने शौक और मनोरंजन के लिए.
और उसका इतिहास में क्या स्थान है? उसे इतिहासकार किस नाम से बुलाते हैं?
सभी विषैले विशेषण उस पर बरसाए जाते हैं. जालिम, निर्दयी, शैतान-जैसे शब्दों से नीरो की भर्त्सना में पृष्ठ-के पृष्ठ रंगे पड़े हैं. एक चंगेज़ खाँ ने अपने आनंद के लिए कुछ हजार ज़ानें ले लीं और आज हम उसके नाम से घृणा करते हैं. तब फिर तुम उस सर्वशक्तिमान अनंत नीरो को जो हर दिन, हर घंटे और हर मिनट असंख्य दुख देता रहा है और अभी भी दे रहा है, किस तरह न्यायोचित ठहराते हो? फिर तुम उसके उन दुष्कर्मों की हिमायत कैसे करोगे, जो हर पल चंगेज़ के दुष्कर्मों को भी मात दिए जा रहे हैं?
इसलिए मैं पूछता हूँ, ‘‘उस परम चेतन और सर्वोच्च सत्ता ने इस विश्व और उसमें मनुष्यों का सृजन क्यों किया? आनंद लुटने के लिए? तब उसमें और नीरो में क्या फर्क है"
मैं पूछता हूँ कि उसने यह दुनिया बनाई ही क्यों थी-ऐसी दुनिया जो सचमुच का नर्क है, अनंत और गहन वेदना का घर है? सर्वशक्तिमान ने मनुष्य का सृजन क्यों किया जबकि उसके पास मनुष्य का सृजन न करने की ताक़त थी? इन सब बातों का तुम्हारे पास क्या जवाब है? तुम यह कहोगे कि यह सब अगले जन्म में, इन निर्दोष कष्ट सहने वालों को पुरस्कार और ग़लती करने वालों को दंड देने के लिए हो रहा है. ठीक है, ठीक है. तुम कब तक उस व्यक्ति को उचित ठहराते रहोगे जो हमारे शरीर को जख्मी करने का साहस इसलिए करता है कि बाद में इस पर बहुत कोमल तथा आरामदायक मलहम लगाएगा?
ग्लैडिएटर संस्था के व्यवस्थापकों तथा सहायकों का यह काम कहाँ तक उचित था कि एक भूखे-खूँख्वार शेर के सामने मनुष्य को फेंक दो कि यदि वह उस जंगली जानवर से बचकर अपनी जान बचा लेता है तो उसकी खूब देख-भाल की जाएगी?
इसलिए मैं पूछता हूँ, ‘‘उस परम चेतन और सर्वोच्च सत्ता ने इस विश्व और उसमें मनुष्यों का सृजन क्यों किया? आनंद लुटने के लिए? तब उसमें और नीरो में क्या फर्क है?’’ मुसलमानों और ईसाइयों. हिंदू-दर्शन के पास अभी और भी तर्क हो सकते हैं. मैं पूछता हूँ कि तुम्हारे पास ऊपर पूछे गए प्रश्नों का क्या उत्तर है?
तुम तो पूर्व जन्म में विश्वास नहीं करते. तुम तो हिन्दुओं की तरह यह तर्क पेश नहीं कर सकते कि प्रत्यक्षतः निर्दोष व्यक्तियों के कष्ट उनके पूर्व जन्मों के कुकर्मों का फल है. मैं तुमसे पूछता हूँ कि उस सर्वशक्तिशाली ने विश्व की उत्पत्ति के लिए छः दिन मेहनत क्यों की और यह क्यों कहा था कि सब ठीक है. उसे आज ही बुलाओ, उसे पिछला इतिहास दिखाओ. उसे मौजूदा परिस्थितियों का अध्ययन करने दो. फिर हम देखेंगे कि क्या वह आज भी यह कहने का साहस करता है- सब ठीक है.
कारावास की काल-कोठरियों से लेकर, झोपड़ियों और बस्तियों में भूख से तड़पते लाखों-लाख इंसानों के समुदाय से लेकर, उन शोषित मजदूरों से लेकर जो पूँजीवादी पिशाच द्वारा खून चूसने की क्रिया को धैर्यपूर्वक या कहना चाहिए, निरुत्साहित होकर देख रहे हैं.
और उस मानव-शक्ति की बर्बादी देख रहे हैं जिसे देखकर कोई भी व्यक्ति, जिसे तनिक भी सहज ज्ञान है, भय से सिहर उठेगा; और अधिक उत्पादन को जरूरतमंद लोगों में बाँटने के बजाय समुद्र में फेंक देने को बेहतर समझने से लेकर राजाओं के उन महलों तक-जिनकी नींव मानव की हड्डियों पर पड़ी है...उसको यह सब देखने दो और फिर कहे-‘‘सबकुछ ठीक है.’’ क्यों और किसलिए?
यही मेरा प्रश्न है. तुम चुप हो? ठीक है, तो मैं अपनी बात आगे बढ़ाता हूँ.
और तुम हिंदुओ, तुम कहते हो कि आज जो लोग कष्ट भोग रहे हैं, ये पूर्वजन्म के पापी हैं. ठीक है.
तुम कहते हो आज के उत्पीड़क पिछले जन्मों में साधु पुरुष थे, अतः वे सत्ता का आनंद लूट रहे हैं.
मुझे यह मानना पड़ता है कि आपके पूर्वज बहुत चालाक व्यक्ति थे. उन्होंने ऐसे सिद्धांत गढ़े जिनमें तर्क और अविश्वास के सभी प्रयासों को विफल करने की काफी ताकत है. लेकिन हमें यह विश्लेषण करना है कि ये बातें कहाँ तक टिकती हैं.
न्यायशास्त्र के सर्वाधिक प्रसिद्ध विद्वानों के अनुसार, दंड को अपराधी पर पड़नेवाले असर के आधार पर, केवल तीन-चार कारणों से उचित ठहराया जा सकता है. वे हैं प्रतिकार, भय तथा सुधार.
आज सभी प्रगतिशील विचारकों द्वारा प्रतिकार के सिद्धांत की निंदा की जाती है. भयभीत करने के सिद्धांत का भी अंत वही है.
केवल सुधार करने का सिद्धांत ही आवश्यक है और मानवता की प्रगति का अटूट अंग है. इसका उद्देश्य अपराधी को एक अत्यंत योग्य तथा शांतिप्रिय नागरिक के रूप में समाज को लौटाना है.
लेकिन यदि हम यह बात मान भी लें कि कुछ मनुष्यों ने (पूर्व जन्म में) पाप किए हैं तो ईश्वर द्वारा उन्हें दिए गए दंड की प्रकृति क्या है? तुम कहते हो कि वह उन्हें गाय, बिल्ली, पेड़, जड़ी-बूटी या जानवर बनाकर पैदा करता है. तुम ऐसे 84 लाख दंडों को गिनाते हो.
मैं पूछता हूँ कि मनुष्य पर सुधारक के रूप में इनका क्या असर है? तुम ऐसे कितने व्यक्तियों से मिले हो जो यह कहते हैं कि वे किसी पाप के कारण पूर्वजन्म में गदहा के रूप में पैदा हुए थे? एक भी नहीं? अपने पुराणों से उदाहरण मत दो. मेरे पास तुम्हारी पौराणिक कथाओं के लिए कोई स्थान नहीं है. और फिर, क्या तुम्हें पता है कि दुनिया में सबसे बड़ा पाप गरीब होना है? गरीबी एक अभिशाप है, वह एक दंड है.
मैं पूछता हूँ कि अपराध-विज्ञान, न्यायशास्त्र या विधिशास्त्र के एक ऐसे विद्वान की आप कहाँ तक प्रशंसा करेंगे जो किसी ऐसी दंड-प्रक्रिया की व्यवस्था करे जो कि अनिवार्यतः मनुष्य को और अधिक अपराध करने को बाध्य करे?
क्या तुम्हारे ईश्वर ने यह नहीं सोचा था? या उसको भी ये सारी बातें-मानवता द्वारा अकथनीय कष्टों के झेलने की कीमत पर-अनुभव से सीखनी थीं? तुम क्या सोचते हो.
किसी गरीब तथा अनपढ़ परिवार, जैसे एक चमार या मेहतर के यहाँ पैदा होने पर इन्सान का भाग्य क्या होगा? चूँकि वह गरीब हैं, इसलिए पढ़ाई नहीं कर सकता.
वह अपने उन साथियों से तिरस्कृत और त्यक्त रहता है जो ऊँची जाति में पैदा होने की वजह से अपने को उससे ऊँचा समझते हैं.
उसका अज्ञान, उसकी गरीबी तथा उससे किया गया व्यवहार उसके हृदय को समाज के प्रति निष्ठुर बना देते हैं. मान लो यदि वह कोई पाप करता है तो उसका फल कौन भोगेगा? ईश्वर, वह स्वयं या समाज के मनीषी? और उन लोगों के दंड के बारे में तुम क्या कहोगे जिन्हें दंभी और घमंडी ब्राह्मणों ने जान-बूझकर अज्ञानी बनाए रखा तथा जिन्हें तुम्हारी ज्ञान की पवित्र पुस्तकों-वेदों के कुछ वाक्य सुन लेने के कारण कान में पिघले सीसे की धारा को सहने की सज़ा भुगतनी पड़ती थी? यदि वे कोई अपराध करते हैं तो उसके लिए कौन ज़िम्मेदार होगा और उसका प्रहार कौन सहेगा?
मेरे प्रिय दोस्तो. ये सारे सिद्धांत विशेषाधिकार युक्त लोगों के आविष्कार हैं. ये अपनी हथियाई हुई शक्ति, पूँजी तथा उच्चता को इन सिद्धान्तों के आधार पर सही ठहराते हैं.
जी हाँ, शायद वह अपटन सिंक्लेयर ही था, जिसने किसी जगह लिखा था कि मनुष्य को बस (आत्मा की) अमरता में विश्वास दिला दो और उसके बाद उसका सारा धन-संपत्ति लूट लो.
वह बगैर बड़बड़ाए इस कार्य में तुम्हारी सहायता करेगा. धर्म के उपदेशकों तथा सत्ता के स्वामियों के गठबंधन से ही जेल, फाँसीघर, कोड़े और ये सिद्धांत उपजते हैं.
मैं पूछता हूँ कि तुम्हारा सर्वशक्तिशाली ईश्वर हर व्यक्ति को उस समय क्यों नहीं रोकता है जब वह कोई पाप या अपराध कर रहा होता है? ये तो वह बहुत आसानी से कर सकता है. उसने क्यों नहीं लड़ाकू राजाओं को या उनके अंदर लड़ने के उन्माद को समाप्त किया और इस प्रकार विश्वयुद्ध द्वारा मानवता पर पड़ने वाली विपत्तियों से उसे क्यों नहीं बचाया?
मैं पूछता हूँ कि तुम्हारा सर्वशक्तिशाली ईश्वर हर व्यक्ति को उस समय क्यों नहीं रोकता है जब वह कोई पाप या अपराध कर रहा होता है?
ये तो वह बहुत आसानी से कर सकता है. उसने क्यों नहीं लड़ाकू राजाओं को या उनके अंदर लड़ने के उन्माद को समाप्त किया और इस प्रकार विश्वयुद्ध द्वारा मानवता पर पड़ने वाली विपत्तियों से उसे क्यों नहीं बचाया?
उसने अंग्रेज़ों के मस्तिष्क में भारत को मुक्त कर देने हेतु भावना क्यों नहीं पैदा की?
वह क्यों नहीं पूँजीपतियों के हृदय में यह परोपकारी उत्साह भर देता कि वे उत्पादन के साधनों पर व्यक्तिगत संपत्ति का अपना अधिकार त्याग दें और इस प्रकार न केवल सम्पूर्ण श्रमिक समुदाय, वरन समस्त मानव-समाज को पूँजीवाद की बेड़ियों से मुक्त करें.
आप समाजवाद की व्यावहारिकता पर तर्क करना चाहते हैं. मैं इसे आपके सर्वशक्तिमान पर छोड़ देता हूँ कि वह इसे लागू करे.
चलो, आपका परमात्मा आए और वह हर चीज़ को सही तरीके से कर दें.
अब घुमा-फिराकर तर्क करने का प्रयास न करें, वह बेकार की बातें हैं. मैं आपको यह बता दूँ कि अंग्रेज़ों की हुकूमत यहाँ इसलिए नहीं है कि ईश्वर चाहता है, बल्कि इसलिए कि उनके पास ताक़त है और हम में उनका विरोध करने की हिम्मत नहीं. वे हमें अपने प्रभुत्व में ईश्वर की सहायता से नहीं रखे हुए हैं बल्कि बंदूकों, राइफलों, बम और गोलियों, पुलिस और सेना के सहारे रखे हुए हैं. यह हमारी ही उदासीनता है कि वे समाज के विरुद्ध सबसे निंदनीय अपराध-एक राष्ट्र का दूसरे राष्ट्र द्वारा अत्याचारपूर्ण शोषण-सफलतापूर्वक कर रहे हैं.
कहाँ है ईश्वर? वह क्या कर रहा है? क्या वह मनुष्य जाति के इन कष्टों का मज़ा ले रहा है? वह नीरो है, चंगेज़ है, तो उसका नाश हो.
क्या तुम मुझसे पूछते हो कि मैं इस विश्व की उत्पत्ति और मानव की उत्पत्ति की व्याख्या कैसे करता हूँ? ठीक है, मैं तुम्हें बतलाता हूँ. चार्ल्स डारविन ने इस विषय पर कुछ प्रकाश डालने की कोशिश की है. उसको पढ़ो. सोहन स्वामी की ‘सहज ज्ञान’ पढ़ो. तुम्हें इस सवाल का कुछ सीमा तक उत्तर मिल जाएगा. यह (विश्व-सृष्टि) एक प्राकृतिक घटना है. विभिन्न पदार्थों के, निहारिका के आकार में, आकस्मिक मिश्रण से पृथ्वी बनी. कब? इतिहास देखो. इसी प्रकार की घटना का जंतु पैदा हुए और एक लंबे दौर के बाद मानव. डारविन की ‘जीव की उत्पत्ति’ पढ़ो. और तदुपरांत सारा विकास मनुष्य द्वारा प्रकृति से लगातार संघर्ष और उस पर विजय पाने की चेष्टा से हुआ. यह इस घटना की संभवतः सबसे संक्षिप्त व्याख्या है.
तुम्हारा दूसरा तर्क यह हो सकता है कि क्यों एक बच्चा अंधा या लँगड़ा पैदा होता है, यदि यह उसके पूर्वजन्म में किए कार्यों का फल नहीं है तो?
जीवविज्ञान-वेत्ताओं ने इस समस्या का वैज्ञानिक समाधान निकाला है. उनके अनुसार इसका सारा दायित्व माता-पिता के कंधों पर है जो अपने उन कार्यों के प्रति लापरवाह अथवा अनभिज्ञ रहते हैं जो बच्चे के जन्म के पूर्व ही उसे विकलांग बना देते हैं. स्वभावतः तुम एक और प्रश्न पूछ सकते हो-यद्यपि यह निरा बचकाना है. वह सवाल यह कि यदि ईश्वर कहीं नहीं है तो लोग उसमें विश्वास क्यों करने लगे? मेरा उत्तर संक्षिप्त तथा स्पष्ट होगा-जिस प्रकार लोग भूत-प्रेतों तथा दुष्ट-आत्माओं में विश्वास करने लगे, उसी प्रकार ईश्वर को मानने लगे. अंतर केवल इतना है कि ईश्वर में विश्वास विश्वव्यापी है और उसका दर्शन अत्यंत विकसित.
ईश्वर की उत्पत्ति के बारे में मेरा अपना विचार यह है कि मनुष्य ने अपनी सीमाओं, दुर्बलताओं व कमियों को समझने के बाद, परीक्षा की घड़ियों का बहादुरी से सामना करने स्वयं को उत्साहित करने, सभी खतरों को मर्दानगी के साथ झेलने तथा संपन्नता एवं ऐश्वर्य में उसके विस्फोट को बाँधने के लिए-ईश्वर के काल्पनिक अस्तित्व की रचना की
कुछ उग्र परिवर्तनकारियों (रेडिकल्स) के विपरीत मैं इसकी उत्पत्ति का श्रेय उन शोषकों की प्रतिभा को नहीं देता जो परमात्मा के अस्तित्व का उपदेश देकर लोगों को अपने प्रभुत्व में रखना चाहते थे और उनसे अपनी विशिष्ट स्थिति का अधिकार एवं अनुमोदन चाहते थे.
यद्यपि मूल बिंदु पर मेरा उनसे विरोध नहीं है कि सभी धर्म, सम्प्रदाय, पंथ और ऐसी अन्य संस्थाएँ अन्त में निर्दयी और शोषक संस्थाओं, व्यक्तियों तथा वर्गों की समर्थक हो जाती हैं. राजा के विरुद्ध विद्रोह हर धर्म में सदैव ही पाप रहा है. अपने व्यक्तिगत नियमों और अविभावकीय उदारता से पूर्ण ईश्वर की बढ़ा-चढ़ाकर कल्पना एवं चित्रण किया गया. जब उसकी उग्रता तथा व्यक्तिगत नियमों की चर्चा होती है तो उसका उपयोग एक डरानेवाले के रूप में किया जाता है, ताकि मनुष्य समाज के लिए एक खतरा न बन जाए. जब उसके अविभावकीय गुणों की व्याख्या होती है तो उसका उपयोग एक पिता, माता, भाई, बहन, दोस्त तथा सहायक की तरह किया जाता है.
इस प्रकार जब मनुष्य अपने सभी दोस्तों के विश्वासघात और उनके द्वारा त्याग देने से अत्यंत दुखी हो तो उसे इस विचार से सांत्वना मिल सकती है कि एक सच्चा दोस्त उसकी सहायता करने को है, उसे सहारा देगा, जो कि सर्वशक्तिमान है और कुछ भी कर सकता है. वास्तव में आदिम काल में यह समाज के लिए उपयोगी था. विपदा में पड़े मनुष्य के लिए ईश्वर की कल्पना सहायक होती है.
समाज को इस ईश्वरीय विश्वास के विरूद्ध उसी तरह लड़ना होगा जैसे कि मूर्ति-पूजा तथा धर्म-संबंधी क्षुद्र विचारों के विरूद्ध लड़ना पड़ा था.
मेरी स्थिति आज यही है. यह मेरा अहंकार नहीं है. मेरे दोस्तों, यह मेरे सोचने का ही तरीका है जिसने मुझे नास्तिक बनाया है. मैं नहीं जानता कि ईश्वर में विश्वास और रोज़-बरोज़ की प्रार्थना-जिसे मैं मनुष्य का सबसे अधिक स्वार्थी और गिरा हुआ काम मानता हूँ-मेरे लिए सहायक सिद्घ होगी या मेरी स्थिति को और चौपट कर देगी.
मैंने उन नास्तिकों के बारे में पढ़ा है, जिन्होंने सभी विपदाओं का बहादुरी से सामना किया, अतः मैं भी एक मर्द की तरह फाँसी के फंदे की अंतिम घड़ी तक सिर ऊँचा किए खड़ा रहना चाहता हूँ.
देखना है कि मैं इस पर कितना खरा उतर पाता हूँ. मेरे एक दोस्त ने मुझे प्रार्थना करने को कहा.
जब मैंने उसे अपने नास्तिक होने की बात बतलाई तो उसने कहा, ‘देख लेना, अपने अंतिम दिनों में तुम ईश्वर को मानने लगोगे.’ मैंने कहा, ‘नहीं प्रिय महोदय, ऐसा नहीं होगा. ऐसा करना मेरे लिए अपमानजनक तथा पराजय की बात होगी.
स्वार्थ के लिए मैं प्रार्थना नहीं करूँगा.’ पाठकों और दोस्तो, क्या यह अहंकार है? अगर है, तो मैं इसे स्वीकार करता हूँ.

Friday, March 21, 2008

मौलिकता के बदलते प्रतिमान



कभी-कभी बचकानी बहस बड़ी बहस में बदल जाती है। हिंदी ब्लॉग के लेखन या टिप्पणी से कई बने बनाए विचारों और विचारकों की इमेज बन बिगड़ रही है। नए सवाल चाहे जिस मजबूरी में अपने दौर में नहीं उठाए गए हों या उन पर सुनवाई नही हुई हो वह फिर से उठाए जा रहे हैं। हालांकि कई बार लग सकता है कि ये तो नए अनुभवों और विकास क्रम से कटकर बात चलाई जा रही है। मानने या न मानने की जिद फिर भी चलेगी। कुछ लोग सही संदर्भ में समझने की मांग उठा सकते हैं। यहां जिन सही संदर्भ की मांग होगी वो हिंदी ब्लॉग या किसी दस्तावेजी माध्यम के बजाय आचार-व्यवहार वाली जगहों पर ही ढूंढना बेहतर होगा।
जो भी हो आचार-व्यवहार को दर्शन से अलग करके देखने की धारा से लेकर टॉफ्लर के विचार के जरिए मौलिकता के छटपटाते हाथ ने एक बेहतरीन बहस को जन्म दिया है। हमारी कोशिश होगी कि बहस स्वस्थ रहे, लेकिन गलत या सही होने की प्रवृत्ति पर खुलकर बातें होंगी। यहां दार्शनिक से लेकर सामाजिक विचलन की सीमाओं को गाढ़े रंगों के साथ दिखाया जाएगा। हम व्यक्ति विशेष की हरकतों को ताक पर रखने की कोशिश करेंगे। इसी उम्मीद के साथ हम बहस में हस्तक्षेप कर रहे हैं।
-प्रसून
मौलिकता पर बहस शुरू हुई। जिसमें आरोप लगा कि एक विचारधारा विशेष लोगों को टाइप्ड बनाती हैं। अनुभवजनित बात को बहुत बड़े स्तर पर उठाया गया है। हालांकि यह सवाल, मनचाहे जवाब के आग्रह के साथ उठाया गया, लेकिन इस सवाल और जवाब के सिलसिले ने अर्थ, दर्शन, समाज विज्ञान की भूमिका पर भी सवाल खड़ा करना शुरू किया। इसमें एक विचारधारा को केंद्र में करके कही गई बात कुछ खास विचारों के समर्थन में कही गई है। अब इस पर लौटते हैं कि बात क्या है।
अनुभव के आधार पर टाइप्ड किस्म के लोगों की संख्या का हवाला देते हुए यह बताना कि मौजूद व्यवस्था किसी भी चीज को रेडिमेड बनाती है। वस्तुओं से पहले यह प्रक्रिया इंसानों में विकसित करने का दोष एक विचारधारा विशेष पर मढ़ा गया है(हम ज्ञान की संचयी अवधारणा को अगर बरकार रखें तो पाठकों को आसानी होगी और लेखक की इमानदारी और बढ़ेगी)। लेकिन थर्ड वेब के मशहूर लेखक अल्विन टॉफ्लर को जिसने भी पढ़ा होगा उसे छटपटाती मौलिकता की अपील थोड़े ठीक ढंग से समझ में आएगी। टॉफ्लर का अंतिम प्रायोजन संस्कृति के बायोलॉजिकल मॉडल के आधुनिक संस्करण तक जाना रहा है। बायोलॉजिकल मॉडल संस्कृति को बहुत स्थिर चीज मानकर चलता है। इस विचार के अनुसार संस्कृति का जो भी मॉडल है उसमें भाषा प्राथमिक महत्व की चीज है। इसी विचार से यह बात निकली कि हर भाषा बोलने वालों की अपनी एक अलग संस्कृति है। जिसे टॉफ्लर के टाइप्ड नुमा चश्मे ने सांस्कृतिक एकरूपता जैसी चीज को जन्म दे दिया। बाकी लेखकों ने भी कम्यूनिज्म के मामले में इस तर्क का पूरा प्रयोग किया है। खासकर नोबेल पुरस्कार वाले लेखकों ने। लेकिन अब यह साफ हो चुका है कि सास्कृति व्यवहार के अध्ययन का ये मॉडल नस्लवाद का घनघोर समर्थक है। जो कि विचारधारा विशेष को एक ठहराव में देखने की आदि हो जाती है वह बताना शुरू कर देती है कि फलां विचारधारा में मौलिकता नष्ट हो रही है।
आखिर ये नजरिया पैदा किस तरह से होता है। सबसे पहले रूप के स्तर पर बात शुरू होती है। लेकिन बायलॉजिकल मॉडल का सबसे असरदार हथियार भाषा रहा है। नए दौर का मॉडल भी भाषाई स्थिरता से ही अपनी बात शुरू करता है। क्योंकि यहां आलोचना एक विचारधारा को स्थापित होने से रोकने के एवज में शुरू की जाती है। रूपवादी विचारधारा का आधुनिक संस्करण तो थोड़ा और आगे बढ़ जाता है वह मानता ही नहीं कि कोई कला भी किसी विचार विशेष की वाहक हो सकती है।
इस बहस में एक बात ये उठ रही है व्यक्तिवाद को कम्यूनिस्ट विचारधारा ने खलनायक मान लिया है इसलिए मौलिकता का टोंटा पड़ गया। हालांकि जिन देशों में व्यक्तिवाद का आधुनिक रूप मौजूद है वह अपने सौदर्यबोध तक में विविधता नहीं ला पाए। विचारों की बात तो छोड़ दीजिए। लेकिन यहां बात केवल मौलिकता के बहस पर आकर नहीं टिकती। जैसा कि यह विचार मान रहा है कि कला और विज्ञान के विकास के लिए व्यक्तिवाद जरूरी है। यहां तक तो ठीक है लेकिन ये मांग दर्शन के खास दायरे में रहते हुए बहस की गुंजाइश ढूंढता है। ऐसा दर्शन जो आचार-व्यवहार से परे हो। आचार-व्यवहार से परे जाने की कोशिश का अर्थ हुआ कि दर्शन पर उस नजरिए से बहस करना जहां व्यक्तिवाद को पूजा जाता हो। ऐसे में फिर ज्ञानमीमांशीय स्वतंत्रता की मांग करनी होगी। इस कोशिश से यह बात सामने आती है कि कला और विज्ञान को भी परोक्ष तरीके से रूपवादी नजरिए से देखने की मांग कर बैठते हैं।
जॉन क्रो रैंन्सम की पुस्तक द न्यू क्रिटिसिज्म, जिसे दुनिया नई आलोचना वाले आंदोलन के स्रोत के रूप में देखती है, उसका खास जोर विचारधाराओं के आतंक से कला को मुक्त करने का रहा है। यह मौलिक बनाने की ऐसी मांग कर बैठती है जिसमें केवल रूप पर बहस के लिए जगह बचती है। इस स्कूल ने नारा तक दे दिया कि रिटर्न टू रेटरिक यानी अलंकार की ओर लौट चलो। अंतर्वस्तु से नहीं रुप से कला मौलिक बनती है।
हालांकि अपनी कविताओ पर विचार करते समय कुछ लेखक इसे नकार रहे है। वे कविता के निरपेक्ष स्वायत्तता की अपील को खारिज कर देते है। थोड़ा आगे बढ़कर कहें तो उन्हे अपनी कविता के मामले में मौलिकता की समस्या नहीं लगती।
लेकिन दूसरे पहलू से साहित्य, कला और विज्ञान के बारे में खलनायक व्यक्तिवाद की जरूरत क्यों पड़ रही है। हम साफ करते चलें कि व्यक्तिवाद ही अपने अंतिम निष्कर्षों में रूपवाद तक पहुंचता है। कला दर्शन में इस रूपवाद को पूरे साहित्य पर लागू कराने वाले मार्क शोरर के जरिए हम इसके लक्ष्य को ठीक से बता पाएं शोरर लिखते हैं कि (हडसन रिव्यू के मशहूर लेख टेक्निक एज डिस्कवरी के लेखक) “आधुनिक समीक्षा ने यह दिखा दिया है कि वस्तु की चर्चा करना कला की जरूरत नहीं बल्कि अनुभव की बात करना है..” अनुभव यानी आचार व्यवहार पर कला या साहित्य को तौलना कला की जरूरत नही हैं।
विज्ञान के विकास में व्यक्तिवाद की भूमिका पर भी बात उठी है। विज्ञान का विकास अनायास तो होता नहीं है। जरूरत के मुताबिक ही यह विकसित होता है। विज्ञान अपने मूल स्वरूप में समाजवादी इस नजरिए से होता है कि यह संचित ज्ञान पर आधारित होता है। जे डी बर्नाल के शब्दों में कहें तो “विज्ञान के अभिप्राय और मूल्य की अंतिम निर्णायक जनता होती है। लेकिन जहां विज्ञान को मुट्ठीभर लोगों के हाथों में रहस्य बनाकर रखा जाता है, वहां वह अनिवार्य रुप से शासक वर्ग के हितों से जुड़ जाता है। वह उस समझदारी और प्रेरणा से कट जाता है, जो जनता की आवश्यकताओं और क्षमताओं से पैदा होती है”।
शायद यही वजह है कि विज्ञान का विकास सबसे ज्यादा तब हुआ जब व्यक्तिवाद का केंद्र टूट रहा था।
कुल मिलाकर मौलिकता के आग्रह पर बात आकर टिकती है कि वह किस नजरिए से मौलिक होने का आग्रह लिए हुए विकसित होती है। उसकी मौलिकता हितों के संघर्ष में व्यक्ति के साथ खड़ा होता है या फिर समाज के साथ। (जारी..)

Tuesday, March 18, 2008

Tibet-The Story Of A Tragedy

तिब्बत पर प्रसून के लेख ने तिब्बत के इतिहास को जिस नजरिए से देखा उसका कुछ लोगों ने समर्थन किया तो कुछ ने चीनी दूतावास का पर्चा बताया। अब हम आपको तिब्बत पर एक ऐसी फिल्म दिखाने जा रहे हैं जो तिब्बत के इतिहास पर बहुत सटीक नजरिया पेश करती है। थोड़ा ध्यान से देखें तो पता चलेगा कि सांस्कृतिक स्वायत्ता की मांग में आखिर सीआईए और ब्रिटिश राजाओं की भूमिका किस तरह की थी। तथ्य और तकनीक के लिहाज से यह अब तक की सबसे प्रमाणिक फिल्म मानी गई है। हो सकता है जिस तरह प्रसून के लेख को कुछ लोगों ने चीनी पर्चा बताया उसी तरह यह फिल्म धर्मशाला की प्रोपेगैंडा फिल्म लगे। पिछले लेख में जिस तरह के विचार आए उस पर बातचीत आगे की जाएगी, लेकिन फिलहाल देखते हैं
Tibet The Story Of A Tragedy


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Sunday, March 16, 2008

तिब्बती विरोध के मायने

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तिब्बत में हिंसक प्रदर्शन के दौरान कई लोग मारे गए हैं। जिसकी घोर निंदा की जानी चाहिए। लेकिन यह जानना बहुत जरूरी है कि तिब्बत के इस विद्रोह का कोई राजनैतिक स्वरूप है या केवल यह एक धार्मिक विद्रोह है। क्योंकि जो समूह इस विद्रोह की वकालत कर रहा है उसका इतिहास राजनीतिक कम और धार्मिक ज्यादा है। इस बारे में कोई भी राय बनाने से पहले हमें चीन और तिब्बत के संबंधों को उनके अब तक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखना जरूरी है। लेकिन यह सवाल हमेशा और हर देश के संदर्भ में उठना चाहिए क्या हमें धार्मिक विद्रोह के राजनीतिक इस्तेमाल को अपना समर्थन देना चाहिए या नहीं। प्रसून का कहना है कि चूंकि यह विद्रोह धार्मिक चरित्र लिए हुए हैं इसलिए इसके पीछे महज बौद्ध साधुओं की राजनीतिक इच्छा है लिहाजा उसे समर्थन बिल्कुल नहीं मिलना चाहिए।
-प्रसून
20वीं सदी के शुरुआत में ही तिब्बत ने खुद को चीन से स्वतंत्र घोषित कर दिया था। लेकिन 1950 तक पूर्वी तिब्बत पर चीन ने आक्रमण के जरिए अपने अधिकार का दावा करता रहा है। एक साल बाद चीन और तिब्बती भिक्षुओं ने ‘सत्रह सूत्रीय सहमति’ पर हस्ताक्षर किया। जिसके बाद तिब्बत को बौद्ध धर्म मानने की स्वतंत्रता और स्वायत्ता की गारंटी मिली। चीन ने इस भिक्षुओँ से नागरिक औऱ सैन्य मुख्यालयों की ल्हासा में स्थापना की गारंटी ले ली। हालांकि तिब्बतियों के एक समूह ने इसका विरोध जारी रखा। जिसके परिणाम स्वरूप 1959 में एक विद्रोह होता है जिसमें कई लोग मारे जाते हैं दलाई लामा तिब्बत छोड़कर भारत में शरण लेते हैं। पिछले दिनों की घटनाएं उस विद्रोह की वर्षगांठ के मौके पर भड़क उठी। वैसे तो चीनी सरकार ने 1965 में ही तिब्बत को स्वशाषित क्षेत्र घोषित कर दिया था फिर भी तिब्बती बौद्ध भिक्षुओं का एक तबका यह आरोप लगाता रहा कि चीन ने अपने सात सूत्रीय सहमति को पूरा नहीं किया है। इस समूह ने वहां बार-बार विद्रोह को जन्म दिया। जिसमें सबसे भयानक विद्रोह 1988 में हुआ और हालत की गंभीरता को देखते हुए चीन सरकार ने तिब्बत की कमान कुच दिनों के लिए सैना के हवाले कर दी।
तिब्बत पर चीन के दावे का इतिहास को जानना जरूरी है। 1950 तक चेयरमैन माओ की सेना ने वास्तव में तिब्बत पर अधिकार नहीं किया था फिर भी चीन तिब्बत को 700 साल पुराने मंगोल शासन के समय से ही अपना हिस्सा मानता रहा। जो कि 18वीं और 19वीं शताब्दी में औपचारिक रूप से चीन संरक्षित राज्य का हिस्सा बन गया। तिब्बत की स्वायत्तता 1913 के एक पक्षीय स्वतंत्रता की घोषणा करने के बाद मिला।
चीन का तिब्बत पर शासन को लेकर पक्ष-विपक्ष में कई तर्क दिए जाते हैं। 1950 के चीनी सरकार के हस्तक्षेप के बाद वहां चीनी हान जनता को बडत़े पैमाने पर बसाने का काम किया गया। जिसके बाद 60 और 70 के दशक में चीन की सांस्कृतिक क्रांति तिब्बत में भी संपन्न हुई। भिक्षु वर्ग का आरोप है कि उस दौरान उनके धार्मिक मठों को तोड़ दिया गया। हालांकि 80के दशक में चीनी सरकार ने तिब्बत में “ओपेन डोर” सुधार कार्यक्रम लागू किया। जिसका उद्देश्य निवेश बढ़ाना था। तिब्बती भिक्षु इस कदम को भी चीनी सरकार की मजबूती से जोड़कर देखते रहे। पिछले दो सालों से चीन ने ल्हासा और चीनी शहर गोलमड के बीच रेल सेवा शुरू की है। जिसपर तिब्बत भिक्षुओं की कड़ी प्रतिक्रिया रही। और वे इसे भी चीनी सरकार की मजबूत पकड़ बनाने की नीति से जोड़कर देखते हैं। वे मानते हैं कि इससे हान जनता की संख्या तिब्बत में और बढ़ेगी।
इस पूरे मसले पर दलाई लामा की भूमिका दिलचस्प है। जिस साल चीन ने पूर्वी तिब्बत पर अधिकार किया उसी साल 15साल की उम्र में दलाई लामा राज्य के प्रमुख बनाए गए। एक साल के भीतर ही वे सत्रह सूत्रीय सहमति पर चीन सरकार के साथ बातचीत करने लगे। वे चार साल बाद तिब्बत में चीन के दखल को कम करने के लिए बीजिंग में चेयरमैन माओ के साथ दलाई लामा ने एक असफल बातचीत भी की। 1959 में इस बातचीत के बाद तिब्बत में एक बड़ा विद्रोह हुआ और दलाई लामा को भारत के धर्मशाला शहर में शरण लेनी पड़ी।
धर्मशाला से दलाई लामा ने लगातार तिब्बत की निर्वासित सरकार के जरिए शांति प्रयास चलाते रहे। इस काम के लिए उन्हे 1989 में नोबेल शांति पुरस्कार भी दिया गया। यद्दपि की दलाई लामा की बातचीत का सिलसिला 1993 में रुक गया था लेकिन इसे 2002 में दोबारा शुरू किया गया। इस बातचीत पर दलाई लामा कहते हैं कि उन्होने तिब्बत के वास्तविक स्वतंत्रता का विचार तो त्याग दिया है लेकिन सांस्कृतिक स्वायत्तता दिए जाने की उम्मीद है। तो क्या यह माना जाय कि पिछले दो दिनों से शुरू हुआ हिंसक विद्रोह केवल सांस्कृतिक स्वायत्तता की मांग है।
दलाई लामा के पूरे उद्धरण से क्या यह नहीं लगता है कि तिब्बत की स्वतंत्रता कुछ धार्मिक समूहों के द्वारा उठाई जा रही है। अगर इसका कोई राजनैतिक नेतृत्व सामने आता है तो हमें जरूर समर्थन करना चाहिए। क्योंकि हम फिलिस्तीनी मुक्त संगठन का तो समर्थन कर सकते हैं लेकिन तालिबान का नहीं।

Monday, March 10, 2008

कार्टूनिस्ट की नजर में गाजा

ब्राजील के कार्टुनिस्ट कार्लुस लतीफ ने गाजा को कुछ इस नजर से देखा..






शर्म करो धनपशुओँ

रविवार को भारतीय हाकी टीम ओलंपिक से बाहर हो गई है। क्वालिफायर मुक़ाबले में भारतीय टीम ब्रिटेन की टीम से 0-2 से हार गई है। यह पिछले 80 साल में पहली बार ऐसा हुआ है कि भारतीय टीम ओलंपिक क्वालिफायर से ही बाहर हो गई है।
किसी देश के विकास का एक पैमाना खेल भी होता है। क्योंकि इसमें राज्यों की भूमिका साफतौर पर रंग लाती है। लेकिन क्या ये महज हाकी के खिलाड़ियों की दुर्गति कही जाएगी या हमारी खेल नीति की कमी मानी जाय?
दो से तीन देशों के बीच हुई प्रतियोंगिता को विश्वकप मानते हुए प्रसार माध्यम और खेल मंत्रालय पागलों की तरह तीन दिन बाजा बजाते रहे। मैच के लाइव प्रसारण के बावजूद पूरा दिन सर पीटते रहे। अपने समय में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाला खिलाड़ी उनका गेस्ट हो जाता है और शुरू हो जाता अजीबोगरिब सांख्यकी का प्रयोग।
हाकी की हार महज खेल नीति पर सवाल नहीं खड़ा करता। यह उस परिवेश की दिशा और दशा दोनों बताता है जिसमें क्रिकेट के अलावा सारे खेल दम तोड़ देंगे।

Sunday, March 9, 2008

पश्चिम रच रहा है नया होलोकॉस्ट




'sohah'को हिब्रु में होलोकॉस्ट कहते हैं। फिलिस्तिनियों को इजरायली रक्षा मंत्री इसी बात से डरा रहे हैं। 29 फरवरी को आर्मी रेडियो पर प्रसारित अपनी घोषणा में उन्होने कहा है कि गाजापट्टी से रॉकेटों से लगातार हमले हो रहे हैं जिसके मद्देनजर गाजा के लोगों को नए होलोकॉस्ट के लिए तैयार रहना होगा। इसके बाद 4 और 5 मार्च को अमेरिकी विदेश मंत्री कोडेलिजा राइस इजराइल की यात्रा पर थीं। उनकी यात्रा तथाकथित पीस प्रोसेस में गर्मी लाने के लिए थी। उसी वक्त इजरायली सैनिक ऑपरेशन पिन प्वाइंट के जरिए गाजा पट्टी के खान यूनूस में बंदूके ताने घुम रहे थे। इस दौरान तीन साल की अमिरा अबू असर को गोलियों से उड़ाते हुए इन सैनिकों ने 27 फरवरी से शुरू हुए हमले में 27 बच्चों को मारने का रिकॉर्ड कायम किया। इस इजारयली हमले में कुल 125 फिलिस्तीनी मारे गए जिसमें ज्यादातर नागरिक थे।
सबसे खतरनाक बात है इन हत्याओं की खबरों पर रोक लगाना। Electronic Intifada website पर छपी एक रिपोर्ट मे कहा गया है कि एपी जैसी न्यूज संस्थाओं ने बच्चों की हत्या से जुड़ी 85 परसेंट खबरों को लोगों तक पहुंचने नहीं दिया है। हालांकि ऐसे आपराधिक दिमाग हिंदुस्तान के मीडिया के साथ-साथ ब्लॉग की दुनिया में भी हैं। जो यह तर्क दे रहे हैं कि देश में ही इतनी समस्याएँ हैं तो गाजा के बारे में क्या सोचना! यह एक वैचारिक नस्ल है जो हर धरती पर मौजूद होती है। यहं संस्कृतनुमा हिंदी और अमेरिकीनुमा अंग्रेजी बोलती है। हमारी आप से अपील है कि इन हत्याओं की खबर को ज्यादा से ज्यादा लोगो तक पहुंचाई जाय और फिलिस्तीन के संघर्ष को खुलकर समर्थन दिया जाय।

Friday, March 7, 2008

रसेल कोरी की याद में....

महिला दिवस ऐतिहासिक स्वरूप से आजादी और सच्चे लोकतंत्र की ओर उठाए गए कदमों महत्वपूर्ण कड़ी है। लेकिन जितना इसके नजदीक जाने के ढोल पिटते रहे यह उतना ही अपने मूल उद्देश्य से पीछे हटती गई। हमें याद रखना चाहिए कि हमें आजादी किसी सरकार से नहीं बल्कि लड़कर हासिल करने से मिली है। यदि हम अपनी आजादियों का इस्तेमाल नहीं करते, समय-समय पर उनको नहीं आजमाते तो वे हमसे वापस ले ली जाएंगी। यदि हमने अधिकतम आजादी की मांग नहीं की तो हमारे पास यह न्यूनतम रह जाएगी। पूरी दुनिया में आज आजादी की सुरक्षा के नाम पर आजादी के पंख कतरे जा रहे हैं। अभी भी दुनिया का बड़ा हिस्सा अपने वजूद को लेकर संघर्षरत है। आजादी की चाह रखने वाले दुनिया को भी आजाद देखना चाहते हैं और रसेल कोरी उनमें से एक थी। समकालीन जनमत ने जब महिला दिवस को रसेल कोरी के बहाने याद करने निर्णय लिया तो कई बार ये सवाल उठा कि रसेल कोरी ही क्यों...फिर लगा कि हमें महिला दिवस पर आजादी के किसी ऐसे प्रतीक को लेना चाहिए जो प्रासंगिक होने के साथ उसके संघर्ष अभी भी लोगों को हौसला देते हों....फिलिस्तीन में शहीद हुई अमेरिकी युवती रसेल कोरी से बेहतर कोई नहीं मिला..

रसेल कोरी की एक साथी ने उनकी शहादत के बाद एक फिल्म बनाई थी...रसेल की याद में आप भी देखिए