समकालीन जनमत (पत्रिका) के लिए संपर्क करें-समकालीन जनमत,171, कर्नलगंज (स्वराज भवन के सामने), इलाहाबाद-211002, मो. नं.-09451845553 ईमेल का पता: janmatmonthly@gmail.com

Tuesday, January 29, 2008

मौलिक होने की ज़िद...!!

आइये, जनमत के साथियों की मांग पर एक नया सिलसिला शुरु किया जाये...
जन संस्क्रिति मंच की गीत नाट्य इकाई 'हिरावल',पटना के गीतों की रेकोर्डिंग आपको सुनाते हैं.
'हिरावल' के बारे में जो लोग जानते हैं, वे हिरावल द्वारा तैयार गीतों की ताजगी और तेवर के मुरीद हुए बिना नहीं रहते, और जो नहीं जानते उन लोगों में लगातार कमी लायी जाये इसी विचार से ये कडी़ शुरु की जा रही है...
'हिरावल' अपने नाटकों और गीतों के माध्यम से बिहार के क्रान्तिकारी संघर्षों में कन्धे से कन्धा मिला कर लड़ने के साथ-साथ नये प्रयोगों के लिये भी जाना जाता है... चलिये कुछ नया- सा सुना जाये...
# 'मुक्तिबोध' की लम्बी कविता 'अन्धेरे में' का एक हिस्सा :


# 'कबीर' की रचना ' हमन है इश्क मस्ताना' :


# 'इंतसाब' जिसे लिखा है 'फ़ैज़ अहमद 'फ़ैज़' ने और जिसे
पहले भी कई व में कई मशहूर कलाकारों ने अपनी आवाज़ दी:


# फ़ैज़ की एक और रचना ' कुत्ते' :


# 'निराला' की एक रचना ' गहन है यह अन्धकारा' :


# समकालीन कवि वीरेन डंगवाल की कविता ' हमारा समाज' :


सभी गीतों में संगीत दिया है संतोष झा ने और गाया है संतोष झा और हिरावल के अन्य साथियों सुमन, समता, राजन, रोहित, बन्टू, विस्मोय और अन्कुर ने.
आगे की पोस्ट में 'हिरावल' के बारे में और जानकारी के साथ आप सुन सकते हैं
** 1857 के गीतों की recordings!!
** हिरावल के नाटक ' दुनिया रोज़ बदलती है' का पूरा video!!
** 'हिरावल' के कई live performances!!
** 'हिरावल' के गाये गये कई पुराने गीत...!!.
** और भी बहुत कुछ... इन्तज़ार करें...!!

Monday, January 28, 2008

सट्टेबाजी को बढ़ावा देते केंद्रीय बैंक


दीपू राय
स्पेकुलेशन यानी सट्टेबाजी आर्थिक विकास की शर्त है। यह तर्क किसी अर्थशास्त्री का नहीं है बल्कि देश के वित्तीय चाल चलन को गवर्न करने वाले केंद्रीय बैंकों का है। दुनिया के केंद्रीय बैंक अब इस तर्क की उंगली थामकर अपनी नीतियां तय कर रहे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक कोई अलग नहीं है। पूंजी बाजार, वित्तीय बाजार का हिस्सा है । लेकिन केंद्रीय बैंकों की रणनीति अब किसी भी तरह इस पूंजी बाजार को ही लेकर चलने की है। हर बार मुंह की खाने के बाद स्टॉक मार्केट को ये उम्मीद होती है कि केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में कटौती करके उसे उबार लेगा। यानी कहा जाय तो पूंजी बाजार यानी कैपिटल मार्केट को सहारा देने के लिए केंद्रीय बैंक वित्तीय बाजार की वास्तविक जरूरतों को भी नजरंदाज कर सकते हैं। लेकिन इस नुस्खे का खामियाजा अमेरिकी अर्थव्यवस्था अब उठा रही है। फेड बैंक की प्रयोगधर्मिता ही अब उसे डुबोने लगी है। वहां अब संकट खुद वित्तीय बाजार को अपने चपेट में ले चुका है। किसी ब्याज कटौती से स्टॉक मार्केट संभाले नहीं संभल रहा है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या भारत में ब्याज कटौती की यह कृत्रिम नीति कारगर होगी? लेकिन रिजर्व बैंक या आखिर कोई भी केंद्रीय बैंक मुद्रा स्फीति या नौकरियों की छंटनी जैसे मुद्दों को पूंजी बाजार की सट्टेबाजी के लिए क्यों ताक पर रख देता है। जाहिर इसे समझने के लिए देश के केंद्रीय बैंक के सलाहकार बोर्ड पर नजर डालना होगा। यह केवल कुछ चुनिंदा व्यक्तियों की बात नहीं है बल्कि केंद्रीय बैंकों पर यह आरोप लगने लगा है कि वे अर्थव्यवस्था के आम चाल चलन को ताक पर रखकर स्पेकुलेशन को बढ़ावा देते हैं। सट्टा बाजार वस्तुओं के पीछे मुनाफा नहीं देखता बल्कि उनके आगे-आगे मुनाफे का खेल खेलता है। ऐसे में दोनों के बीच की दूरी बाकी सांधनों के असंतुलन से बिगड़ जाती है। जिससे लगता है कि बाजार बाउंस बैक हो रहा है लेकिन केवल पूंजी बाजार ही बाउंस बैक होता है। एक तरह से अर्थव्यवस्था को निश्चित अंतराल के बाद काफी तेज झटका झेलना होता है। लेकिन थोड़े समय बाद आने वाले ये झटके अर्थव्यवस्था को खोखला बना देते हैं।
दुनिया का आर्थिक इतिहास साफ दिखाता है कि पिछले दो दशक से बड़ी मंदी और ब्याज दरों में कटौती केंद्रीय बैंकों का आसान नुस्खा बन गया है। पहले गुपचुप तरीके से सहायता करने वाला लेकिन अब यह नुस्खा परोक्ष रुप से सट्टेबाजी को प्रोत्साहित कर रहा है। अचानक तरलता की मांग उठाने वाले लोग आखिर कितने प्यासे हैं इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। ये ठीक उस बच्चे की तरह जिद है कि आखिर सरकार नोट छापकर गरीबी क्यों नहीं दूर कर देती। ब्याज दर में कटौती की मांग अर्थव्यवस्था के ऐसे हिस्से के जरिए की जा रही है जिसे तत्काल मुनाफा बटोरना है। लेकिन सवाल तो यह है कि क्या केंद्रीय बैंक की भूमिका बड़े आर्थिक उद्देश्यों को दरकिनार करते हुए केवल सट्टेबाजी को प्रश्रय देना भर रह गया है?

अमेरिकी अर्थव्यवस्था फिर से एक भीषण संकट का सामना कर रही है। यह संकट हाउसिंग मार्केट से शुरू हुआ है जो आज तकरीबन हर सेक्टर को अपनी चपेट में ले लिया है। लेकिन इस संकट ने फेडरल बैंक की नीतियों को भी सवालों के घेरे में डाल दिया है। ब्याज कटौती जैसे प्रयोग के अगुवा रहे फेडरल बैंक के भूतपूर्व चेयरमैन एलन ग्रीन स्पान अपनी किताब द एज ऑफ टर्बूलेंस:एडवेंचर्स इन न्यू वर्ल्ड में मौजूदा संकट का जिक्र करते हुए कहते हैं कि यह विपरित परिस्थितियों वाला वक्त है और काफी दुखदायी है लेकिन इस संकट को तो आना ही था। खासतौर से तब जब हम ऐसे उपाय चुनते हैं जिसमें लोगों को ज्यादा से ज्यादा जोखिम उठाने की आजादी दी जाय तो इस तरह के संकट को कोई टाल नहीं सकता। 1929 में स्टॉक मार्केट के संकट और 1930 की महामंदी ने उस समय के आर्थिक नीतियों को विवाद के घेरे में डाल दिया। कुछ दशक बाद यह तर्क फिर मजबूती पकड़ा कि सट्टेबाजी अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद है। लेकिन 1960 की आर्थिक मंदी और 1970 में स्टॉक मार्केट की गिरावट ने सट्टेबाजी और उससे पैदा होने वाले आर्थिक मुश्किलों के बीच संबंध चिन्हित किए जाने लगे। कुछ लोगों ने इस संकट की वजह अरब जगत के प्रतिबंधों और तेल संकट से जोड़कर देखा।
एक दूसरे बूम के बाद 19 अक्टूबर 1987 को अमेरिका का शेयर बाजार 23 परसेंट की दर से औंधे मूंह गिरा। जिसे आर्थिक जगत 1929 की मंदी से जोड़कर चर्चा करने लगा। लेकिन बाजार ने फिर से पहले जैसी तेजी पकड़ी। तेजी के इस सिलसिले को 2000-2002 के इंटरनेट और टेक्नोलॉजी सेक्टर की तबाही ने तोड़ दिया। ग्रीन स्पान के लिए हर तीन साल के बाद आने वाला यह संकट संभावी था।
1987 से लेकर 2006 तक ग्रीन स्पान का कार्यकाल था और हर बड़े संकट के बाद उन्होने फेड रेट में कटौती की। केंद्रीय बैंक ने वित्तीय संस्थानों को कड़ा रुख अपनाने की जगह बाजार में ज्यादा तरलता लाने को बाध्य किया। जिससे सट्टेबाजी की प्रक्रिया ढीली न पड़े।
आज इतिहास एक बार फिर दोहरा रहा है। फेड ने रेट कम तो किए हैं । लेकिन अब यह सट्टेबाजी में भी जान नहीं डाल पा रहा है। क्योंकि अब संकट खुद लोन देने वाली वित्तीय संस्थाओं पर है। इन संस्थाओं को नवंबर 2007 में 20 अरब डॉलर के चपत का अंदाजा लगाया जा चुका है। बैंकों के अरबों डॉलर के घाटे की सूचना अभी भी लगतार मिल रही है। ज्यादातर बैंक ऐसे कर्ज देकर फंस चुके हैं जिनकी वापसी संभव नहीं है।
भारत स्थितियां ऊपर से भले देखने में अलग लगती है लेकिन वित्तीय कंपनियों की हालत बहुत अच्छी नहीं है। जमकर कर्ज बांटने की होड़ का असर तत्काल नहीं दिख रहा है लेकिन अमेरिकी अनुभवों से सबक लिया जाय तो 2008 के अंत तक वित्तीय संस्थान को गहरे संकट से जूझना पड़ सकता है।
रिजर्व बैंक के लिए कुछ दिनों पहले तक रियल एस्टेट और बाकी सेक्टर में इस संकट के लक्षण मिले थे। लेकिन पूंजी बाजार की लॉबी काफी मजबूती से काम की और केंद्रीय बैंक को थोड़ी नरमी दिखानी पड़ी। रिजर्व बैंक पिछले साल बढ़ते कर्ज से बैंको को आगाह किया था। केंद्रीय बैंक ने कर्ज देने वाली संस्थाओं का ब्यौरा दिखाते हुए कहा कि अक्टूबर 2006 में रिटेल और सेवा क्षेत्र के लिए सालाना उधारी की दर करीब 33.4 परसेंट रही। जिसमें कि रिटेल सेक्टर के भीतर हाउसिंग लोन की ग्रोथ रेट करीब 32.3 परसेंट है। जबकि कमर्शियल प्रॉपर्टी में 83.9 परसेंट का रिकॉर्ड तोड़ ग्रोथ रेट दर्ज किया गया है। इस तर्क के सहारे आरबीआई ने रियल एस्टेट के लिए जरूरी जोखिम धारिता को 1 परसेंट से बढ़ाकर 2 परसेंट कर दिया गया। फिलहाल क्रेडिट ग्रोथ रेट पर नजर डाली जाय तो यह नवंबर 2007 के मुकाबले 30 परसेंट से घटकर 20 परसेंट रह गया है।

बाजार में तरलता की मांग पूंजी बाजार को भले ही राहत देती हो लेकिन बड़े स्तर पर इसके भयानक परिणाम निकलते हैं। तात्कालिक तौर पर तो हम वस्तु बाजार में जरूरी चीजों की कीमतों को बढ़ते हुए देखते है। लेकिन लंबे समय के बाद यहां खरीदार ढूंढना मुश्किल हो जाता है क्योंकि लोगों की इनकम इस कदर नहीं रहती की इन्हे वो खरीद सकें। आसान लोन देकर अर्थव्यवस्था चलाना समझदारी नहीं है। क्योंकि इस तरीके को अपनाकर आप उसे चुकाने की ताकत को कमजोर कर रहे होते हैं। इसका सीधा संबंध बैंकों के दिवालिएपन की ओर ले जाता है। अर्थव्यवस्था की ताकत सट्टेबाजी से तय नहीं होती इसे केंद्रीय बैंक को समझना होगा। इस लिहाज से भारतीय रिजर्व बैंक को उन समष्टिगत कारणों पर गौर करते हुए फैसला लेना चाहिए। हालांकि इसकी बहुत कम उम्मीद है। ब्याज दरों को बढ़ाने की वकालत करने वाले लोग काफी मजबूत हैं । ऐसे लोगों ने मनोवैज्ञानिक साधनों को प्रभावित करने वाले प्रचार माध्यों का का सहारा लेते हुए आम लोगों में ब्याज दर की कटौती को जरूरी बना दिया है। लेकिन लोगों को नहीं पता कि वे शुरुआती कालीदास की भूमिका में है।

Friday, January 25, 2008

ब्लैक लिस्ट होने का डर...


शिक्षा जगत में मौजूद धांधली के ऊपर उंगली उठाने की कोशिश बहुत कम लोग करते हैं। हालांकि शिक्षा जगत से जुड़े माफिया किसी भी मायने में बाकी सेक्टर से अलग नहीं है। जब बात हिंदी की हो तब तो कहना क्या। बात केवल नियुक्तियों तक सीमित नहीं है। इस भाषा के खिलाफ एक सांस्कृतिक पिछड़ेपन की अवधारणा को भी जोड़ने का सचेत प्रयास होता है। कई बार लगता है कि इसे संस्थान केवल मजबूरी में पढ़ाते हैं। नियुक्तियों की यह प्रक्रिया यही साबित करती है कि इस भाषा को समर्थ भाषा की पटरी से उतार दिया जाय। इसके दांवपेंच के बीच बेहतर जीवन जीने की शर्त को समझाते हुए एक अनाम पत्र मिला है। जिसने सुधीर सुमन के अनुभवों की तथ्यात्मक पुष्टि की है। साथ ही उन्हे इस समस्या से निपटने के लिए सलाह भी दी गई है।
सुधीर भाई, मेरे परिवार में साहित्य को एक विषय के रूप में तो कभी किसी ने नही पढा लेकिन हिन्दी साहित्य में पाठक नाम की यदि कोई जाति है तो आप उसमें मेरा नाम खानदानी पाठक के रूप में जोड़ सकते हैं. जहाँ तक मुझे हिन्दी साहित्य की पठन-पाठन परम्परा का ज्ञान है, आप को पता होगा की हजारी प्रसाद जी और नामवर जी जैसे लोगों को अपनी योग्यता से नौकरी नही मिल पाई और वो भी अपनी सिफारिश के लिए सुमन जी जैसे कम talented लोगों का मुंह देखने को अभिशप्त रहे. डॉ नागेंद्र ने अनगिनत लोगों की नियुक्तियां करवाईं.मेरी जानकारी में हिन्दी साहित्य में कोई नही है जिसने बिना सिफारिश नौकरी पाई हो.ये शाप हर प्रतिभा को ढोना है चाहे अप का कद जो भी हो,उससे कोई फर्क नही पड़ता.
मुक्तिबोध आजीवन बीड़ी पीते रहे और मास्टरी करते रहे, उनपर रिसर्च कराने वाले वीसी बन गए. किसी खुद्दार और प्रतिभाशाली साहित्यकार ने नौकरी को तवज्जो नही दी. राजेंद्र यादव,उदय प्रकाश,रवींद्र कालिया आदि की लम्बी सूची हमारे सामने है, पछले साल बीएचयू में पंकज चतुर्वेदी थे, इस साल झारखंड में आप हैं अगले साल कहीं कोई और होगा. जिन संजीव पर आप ने पीएचडी की है वो ख़ुद नौकरियों की तलाश में अनिश्चित जीवन जी रहे हैं. हिन्दी साहित्य की मेरी जानकारी ये कहती है की आप की युए पोस्ट आप को higher education में ब्लैक लिस्ट करवा देगी शर्तिया फ़िर भी अगर कोई संभावना शेष है तो मेरे मित्र चुपचाप अपनी बारी का इंतजार करो जब तुम्हारा कोई श्रधेय बोर्ड में बैठेगा और तुम्हें उपकृत करेगा दूसरा रास्ता ये है की कोर्ट में कफ़न बाँध कर उतर जाओ... तुम किस समाज के सुधारने की आस लगाए हो,जो हजारीजी, नामवर जी और एक चोरी की थीसिस से डिग्री कराने वाले में फर्क नही कर सकता...........................

Tuesday, January 22, 2008

मार्टिन लुथर का ऐतिहासिक भाषण

21 फरवरी को मार्टिन लुथर किंग का दिन था। मार्टिन लुथर किंग ने अपनी मौत से ठीक एक साल पहले अपना ऐतिहासिक वियतनाम युद्ध विरोधी भाषण दिया था। आपको नहीं लगता कि आज भी ये भाषण उतना ही प्रासंगिक है।

जेपीएससी की धांधली पर कौन सी उपमा पेश करूं?


-सुधीर सुमन
आशंका तो थी कि झारखंड में व्याख्याताओं के लिए जो इंटरव्यू हुए उसके परिणाम में गड़बिड़यां होंगी,लेकिन धांधली और बेईमानी इस हद तक होगी, यह मैंने किसी दु:स्वप्न में भी नहीं सोचा था।
कोर्ट के निर्देष पर हुए इस इंटरव्यू में क़ानून, न्याय, नैतिकता सबकी धज्जियां उड़ाकर रख दी गई हैं। क्या कोर्ट इसके परिणामों की निष्पक्ष जांच करवाएगा? मेरा दावा है कि चयनित उम्मीदवारों की जांच उनके विषयों से संबंधित कोई निष्पक्ष कमेटी करे, तो भारी संख्या में लोग अयोग्य क़रार दिए जाएंगे। मेरा चुनाव नहीं हुआ इस कारण किसी प्रतिक्रिया में मैं यह नहीं कह रहा। मेरे पास इसके उदाहरण हैं। रोज़ नए-नए तथ्य सामने आ रहे हैं, जो मुझे एहसास करा रहे हैं कि उच्च शिक्षा की दुनिया में भ्रष्टाचार का ज़हर किस हद तक फैल चुका है। एमण्एण् में मेरी सहपाठी रह चुकी जिस लड़की का चुनाव हुआ है, उसकी एकमात्र योग्यता यह है कि उसका बाप प्रोफेसर है। हिंदी साहित्य में उसने ऑनर्स भी नहीं किया था, जो कि व्याख्याता के लिए अनिवार्य योग्यता है। मुझे जिन लोगों ने पढ़ाया और जितने सहपाठी थे, वे लोग इस चमत्कार पर हैरान हैं। उक्त प्रोफेसर की बेटी हिंदी साहित्य के किसी विषय पर ठीक से अपने विचार व्यक्त नहीं कर सकती। ठीक से बीस पच्चीस पंक्तियां भी लिख पाना उसके लिए संभव नहीं है। शायद इसे ही कहा जाता होगा कि ईश्वर चाहे तो अंधा देख सकता है, गूंगा बोल सकता है और लंगड़ा पहाड़ लांघ सकता है। यहां तो ईश्वर झारखंड पब्लिक सर्विस कमिशन के कर्ता-धर्ता ही हैं। सिर्फ़ यही एक घटना नहीं है, दूसरे विषयों में भी ऐसे उम्मीदवारों के चयन की सूचनाएं लगातार मुझे मिल रही हैं, जिनका एकेडमिक रिकॉर्ड और जिनकी योग्यता ऐसी है कि किसी हालत में उनका चयन नहीं होना चाहिए था।
कौन नहीं जानता कि धनवानों के फिसड्डी बेटे-बेटियों को बिहार-झारखंड के महाविद्यालयों में अच्छे अंक दिलवाए जाते रहे हैं। अगर यही लोग कॉलेज-यूनिवर्सिटियों की नौकरियों में जाएंगे, तो पढ़ाएंगे या सिर्फ़ वेतन उठाएंगे? इसका समाज के भीतर जो संदेश जा रहा है वह बेहद ख़तरनाक है कि किसी तरह धन जुटाओ, उसके बल पर कुछ भी ख़रीदा जा सकता है। क्या समाज में धन की होड़ में जो भ्रष्टाचार और अपराध बढ़ रहा है उसके लिए इस तरह की घटनाएं भी ज़िम्मेदार नहीं हैं?
मैं बहुत प्रतिभावान होने का दंभ नहीं रखता, लेकिन मुझे इसका भारी स्वाभिमान है कि मैंने पढ़ाई के दौरान किसी परीक्षा में ग़लत तरीक़े का सहारा नहीं लिया। अगर व्याख्याताओं के चयन में ईमानदारी बरती गई होती और मुझसे ज़्यादा योग्य लोग चुने गए होते, तो मुझे ज़रा भी दुख नहीं होता। लेकिन मुझे गहरी पीड़ा है कि जिस पैरवी, पहुंच, रिश्वत और जोड़तोड़ की प्रवृत्ति के िख़लाफ़ एक चुनौती की तरह छात्र जीवन में मैंने ख़ुद को खड़ा रखा और प्राय: मुझे जीत भी मिलती रही, आज उसने मुझे फिलहाल पराजित कर दिया है।
मैं हिंदी साहित्य का विद्यार्थी इसलिए नहीं बना था कि मुझे किसी दूसरे विषय में दािख़ला नहीं मिल रहा था। अपने समय और समाज की जो विडंबनाएं, विद्रूपताएं थीं, जो चुनौतियां थीं, उसने मुझे हिंदी साहित्य से जोड़ा था। पिछले बीस वषोंंZ में हिंदी साहित्य मेरे जीवन में घुलमिल गया है। इसके बग़ैर मेरे जीवन का कोई अर्थ नहीं हो सकता। मगर जेपीएससी की नज़र में मेरा हिंदी शिक्षक बनना ही कोई अर्थ नहीं रखता।
मेरा छोटा भाई लगातार मुझसे कह रहा था कि वहां पांच-पांच, सात-सात लाख रुपए की बोली चल रही है, आपका चुनाव नहीं होगा। मगर मित्रों और घरवालों की बहुत शिकायत थी कि मैं नौकरी पाने की कोशिश नहीं करता, इसलिए धांधली की आशंका होते हुए भी मैंने इंटरव्यू के लिए आवेदन दे दिया था।मेरे प्रिय शिक्षकों ने भी भोला भरोसा दिलाया था कि कुछ चयन तो गुणवत्ता के आधार पर होगा ही। अब जब परिणाम आया है तो सब आश्चर्यचकित और दुखी हैं। शैक्षणिक योग्यता के आधार पर इस चयन के लिए साठ अंक निर्धारित थे। तय मानकों के अनुसार मेरे सत्तावन अंक होते थे। इंटरव्यू के लिए चालीस अंक तय था। सवाल यह है कि इस चालीस में योग्यता के ठेकेदारों ने मुझे कितने अंक दिए?
इंटरव्यू के लिए माओवादियों के बंद और भारी बारिश को झेलते हुए हमलोग रांची पहुंचे थे। मेरे सहपाठी सुमन कुमार सिंह भी मेरे साथ थे। उनका क्रमांक ठीक मुझसे पहले था। हम नियत समय पर 10 बजे जेपीएससी कैंपस पहुंच गए। इंटरव्यू एक-डेढ़ घंटे बाद शुरू हुआ। हिंदी के लिए दो बोर्ड थे और हर रोज़ की तरह 40-40 उम्मीदवारों का इंटरव्यू होना था। हमारा इंटरव्यू गोपाल नारायण सिंह के बोर्ड में था। हमें बाहर जाने की इजाज़त नहीं थी। लगातार बारिश हो रही थी। हम भूखे-प्यासे अपनी बारी का इंतज़ार करते रहे। इस बीच इंटरव्यू लेने वालों ने उत्तम भोजन ग्रहण किया। हमलोगों की बारी आते-आते अपरान्ह के साढ़े चार बज गए। पहले सुमन कुमार सिंह अंदर गए और पांच-सात मिनट बाद ही काफी संतुष्ट भाव से निकले। मात्र पांच-सात मिनट के इंटरव्यू पर हमें थोड़ा आश्चर्य भी हो रहा था। ख़ैर, मैं भी अंदर पहुंचा।
सामने की चेयर पर एक तिलकधारी महानुभाव बैठे थे। उन्होंने बड़ा चमकीला कुर्ता पहन रखा था। अंदाज़ा लगाया कि यही गोपाल नारायण सिंह होंगे। दो और लोग मेरे बाएं-दाएं मौजूद थे। बाद में इंटरव्यू में आए एक उम्मीदवार ने बताया कि बाएं वाले विजय बहादुर सिंह थे, जो बनारस के हैं और दाएं वाले अलीगढ़ के, जिनका नाम मुझे आज तक नहीं पता । इनके अतिरिक्त एक सज्जन और थे, जो निश्चित तौर पर झारखंड के ही होंगे। मैंने ख़ास तौर पर लक्ष्य किया कि मेरे अंदर प्रवेश करते ही वे मुंह बनाते हुए बाहर निकल गए। इसकी वजह ऊब थी या कुछ और, मैं समझ नहीं पाया। जब तक इंटरव्यू चला वे बाहर ही रहे। वैसे भी इंटरव्यू चला ही पांच-सात मिनट। पता नहीं बाहर गए सज्जन ने मुझे कितना अंक दिया। शायद अपनी ग़ैरमौजूदगी के कारण शून्य दे दिया हो। वैसे वहां सर्वेसर्वा गोपालजी ही लग रहे थे, जिन्होंने मुझसे नाम, पता, शिक्षण संस्था और पीएचडी के गाइड के बारे में पूछा। गो कि यह सब कुछ मेरे आवेदन में लिखा हुआ था। उन्होंने मेरे मौजूदा कामकाज के बारे में पूछा। मैंने अपनी पत्रिका के संपादन के बारे में जानकारी दे दी।
इंटरव्यू के दौरान ही गोपाल नारायण सिंह की शालीन, किंतु दबंग मौजूदगी से मुझे महसूस हुआ कि यह शख़्स जो चाहेगा वही होगा। इंटरव्यू में जो मुझसे पूछा गया उसके आधार पर मुझे भरोसा था कि चालीस में कम-से-कम तीस अंक तो मिलना ही चाहिए। सिर्फ एक सवाल का जवाब मैं नहीं दे पाया था, जो प्राचीन काव्य के छंद से संबंधित था। पूछनेवाले वृद्ध सज्जन के बोलने का लहज़ा ऐसा था कि काव्यपंक्तियों को सुना पाना दुरूह था। उनके बोलने के लहज़े की ख़ासियत के बारे में उस बोर्ड के गुज़रे सारे उम्मीदवार बता सकते हैं। विजय बहादुर सिंह ने मुझसे पूछा कि आपने संजीव पर रिसर्च क्यों किया? इसका जवाब मैं बिल्कुल सहजता से दिया। उन्होंने कहा कि संजीव पर तो कई रिसर्च हो रहे हैं, आपने अपने शोध में किन विशेषताओं को चििन्हत किया है? मैंने उनकी विशेषताएं बतानी शुरू कीं। अभी एक पहलू पर बोला ही था कि सवालों का ट्रैक बदल गया। वृद्ध सज्जन, जो संभवत: अलीगढ़ के थे, उन्होंने मुझसे उपमा अलंकार के बारे में पूछा। मैंने बता दिया। उदाहरण पूछा तो एक प्रचलित उदाहरण दिया- `मुख चांद-सा सुंदर´। गोपालजी ने चुटकी ली कि तपते लोहे जैसा क्यों नहीं! उसके बाद उन्होंने यह कहते हुए इंटरव्यू ख़त्म किया कि ``ठीक है, जाइए। आप तो साहित्य में रमे हुए हैं।´´ बाद में जब मैंने इंटरव्यू का हाल अपने प्रबंध संपादक केण्केण् पांडेय को सुनाया तो उन्होंने मज़ा लेते हुए कहा कि ``तो रमे रहिए, इसका मतलब है आपका नहीं होगा।´´ अब मैं सोचता हूं कि जेपीएससी के उस इंटरव्यू बोर्ड के प्रति किस उपमा का प्रयोग करूं?
परिणाम आने से पहले ही मेरे छोटे भाई का दोस्त बता रहा था कि उसके चाचा का मनोविज्ञान में चयन तय है, सात लाख रुपए लग रहे हैं। परिणाम आने के बाद उसने बताया कि उनका चयन हो गया। उसके पास पांच-छह अन्य लोगों के बारे में भी जानकारी थी, जिनका पैसे के बल पर चयन हुआ था। उसने यह भी बताया कि झारखंड के स्थानीय पता वाले उम्मीदवारों को प्राथमिकता दी गई है, कि उसके चाचा ने भी वहीं का पता दिया था। रांची से एक साहित्यकार मित्र ने बताया कि जिनका पता बिहार का था, उन्हें कुछ नज़रअंदाज़ किया गया है। मुझे समझ में नहीं आता कि यह चयन का आधार कैसे हो सकता है। मेरी जिस अयोग्य सहपाठी का चयन हुआ है, उसका पता तो बिहार का ही होगा!
एक ज़बरदस्त चर्चा यह भी है कि झारखंड पब्लिक सर्विस कमिशन में आरएसएस के पदाधिकारी भरे हुए हैं, जिन्होंने राजनीतिक नज़रिए से चुनाव किया है। यह तो आरएसएस में ज़रा भी आस्था रखने वाले उम्मीदवार ही जानें कि उनका संघी होना काम आया या उनमें भी बहुतेरे धन की ताक़त से पछा़ड़ दिए गए। मेरा चयन न करने में अगर संघी दृष्टि काम आई है तो कम-से-कम फिर एक बार यह साबित होगा कि संघ के लोग कितने संकीर्ण, चालबाज़, भ्रष्ट और पतित होते हैं।
मालूम नहीं विजय बहादुर सिंह इसकी गवाही देंगे या नहीं। इंटरव्यू के बाद संयोगवश बनारस में एक साहिित्यक बंधु ने मेरे रिसर्च का हवाला देते हुए उनसे जब जानकारी चाही तो उन्होंने बताया कि संजीव पर जिसका रिसर्च था, उसका इंटरव्यू तो अच्छा हुआ था। अगर अंतिम लिस्ट में कोई गड़बड़ी नहीं होगी तो उसका हो जाना चाहिए। मेरा विजय बहादुर सिंह से कोई परिचय नहीं रहा कभी। इंटरव्यू के बाद ही उनके बारे में पता चला। बाद में जब मेरे साहिित्यक मित्र को मालूम हुआ तो उसने कहा कि पहले बताना चाहिए था। मगर किसको पता था कि कौन इंटरव्यू लेने आ रहा है? और अगर आ भी रहा है तो यह तो मालूम नहीं था कि उसी के बोर्ड में इंटरव्यू होगा। पता भी रहता तो शायद मेरे जैसा आदमी इसका सहारा नहीं लेता।
रोज़ धांधली की सूचनाएं मिल रही हैं। मेरे कवि मित्र सुनील के साले ने बताया कि बीएचयू में दर्शनशास्त्र के तीन छात्रों ने पांच-पांच लाख रुपए देकर व्याख्याता की नौकरी हासिल की है। उनलोगों ने एक दिन होटल में दलालों को मुग़ाZ और शराब की पार्टी भी दी। भोजपुरी के एक युवा लेखक ने बताया कि हिंदी में रिक्तियां ज़्यादा थीं इसलिए रेट कुछ कम था। एबीवीपी के लोगों ने उससे संपर्क करके कहा था कि तीन लाख रुपए में नौकरी मिल जाएगी। उसने यह भी बताया कि इंटरव्यू लेने वालों को यह निर्देश था कि वे उम्मीदवारों का अंक पेंसिल से लिखें। इसकी और तीन लाख रेट की पुष्टि ख़ुद बाहर से इंटरव्यू लेने आए एक सज्जन ने क्षोभ के साथ उससे की। अगर यह सच है तो बेहद शर्मनाक है।
इसलिए मुझे लगता है इस नियुक्ति प्रक्रिया को अविलंब रोका जाना चाहिए और चुने गए उम्मीदवारों की योग्यता की जांच किसी निष्पक्ष कमेटी द्वारा करवानी चाहिए। वरना विश्वविद्यालयों को खाने और बबाZद करने का खेल इसी तरह जारी रहेगा और छात्रों के भविष्य को अंधेरे में ढकेला जाता रहेगा।

Thursday, January 17, 2008

फिल्म को फिल्म की तरह देखें.. मतलब !

हमने सोचा कि फिल्म 300 पर कोई बहस आगे नहीं बढ़ेगी। लेकिन बहस धीरे-धीरे ही सही बहस आगे बढ़ी । हालांकि लिखने वालों ने नाम नही दिया। आप भी जानिए फिल्म पर दी जाने वाली प्रतिक्रियाओं के बारे में।
Anonymous said...
सदी की बेहतरीन और जिम्मेदार सुझावों में से एक सुझाव। मैं इन महाशय से कहना चाहुंगा कि अगर आपको मैं दो पैरों पर चलने वाले बंदर की तरह देखा जाय या फिर अभिव्यक्ति की बेहतरीन क्षमता और अपने आसपास घटित घटनाओं की कारणता जानने वाले सजग मानव के रूप में। इतिहास थोड़ा पढ़े और किताब पढ़े( किताब लेकर घुमें नहीं) केवल इंटरनेट पढ़ेंगे तो साधु और ओझा की तरह ज्ञान का हवन कर डालेंगे। कम्युनिस्ट कभी बाप के द्वारा की गई हत्या की सजा बेटे को देने की वकालत नहीं करता। इसमें आप यकीन करते होंगे। हम हत्यारों और दलालों की दुनिया से वाकिफ हैं और उसे जड़ से काटने में ज्यादा यकीन रखते हैं। माफ करिएगा हम बहुत सीधा जवाब देना जानते हैं। हम मानव और मानवनुमा दिखने वालों के बीच फर्क करते हैं।

Anonymous said...

अमेरिका में जो हो रहा है वह पाप है और ईरान चूंकि प्रतिरोध करता है वह पवित्र है, यह दृष्टि ठीक नहीं. फ़िल्म को फ़िल्म की तरह भी देख लीजिए. यह इतिहास बताएगा की ईरान की महान सरकार प्रगतिशील थी या अमेरिका की तानाशाही व्यवस्था सड़ी-गली थी. अलबत्ता यह याद रखना चाहिए की खुमैनी की क्रांति के बाद सबसे पहले ईरान में मार्क्सवादियों को खड़ा करके गोलिओं से उडाया गया था. उसके लिए कुछ हज़ार साल पीछे नहीं ३८ साल पीछे जाना है.

Saturday, January 12, 2008

जरूरी है परमाणु समझौते को रद्द करना


-नॉंम चौमस्की
प्रजातियों का जीवन दांव पर लगा है। इस स्वीकारोक्ति के साथ आगे बढ़ने का एक बेहतर तरीका है सार्वभौमिक परमाणु निरस्त्रीकरण की जरूरत की ओर कदम बढ़ाया जाय।

नाभिकीय शस्त्र रखने और बनाने वाले राज्य अपराधिक राज्य हैं। हालांकि वो परमाणु हथियारं को नष्ट करने वाली परमाणु अप्रसार संधि के धारा 6 को भी मानते हैं। इस कानून पर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का भी ठप्पा है। यह न्यायालय परमाणु हथियारों को पूरी तरह नाश करने के लिए अच्छी नियत के साथ बातचीत चलाने की अपील करता है। लेकिन किसी भी परमाणु हथियार संपन्न राज्य ने इसे नहीं माना है। संयुक्त राज्य अमेरिका इसे नकारने वालों का मुखिया है। खासकर बुश प्रशासन जो ये मानता है कि यह धारा 6 का विषय ही नहीं है।

27 जुलाई को वांशिंगटन ने भारत के साथ एक समझौता किया। यह समझौता एनपीटी मुख्य हिस्से को ही खा गया। इसका दोनों ही देशों में पुरजोर विरोध हुआ है। इज़रायल और पाकिस्तान की तरह (लेकिन इरान से अलग) भारत भी एनपीटी का हस्ताक्षरकर्ता देश नहीं हैं। संधि को धत्ता बताते हुए इसने नाभिकीय हथियारों को विकसित कर लिया है। हाल के समझौते से बुश प्रशासन इस अलग किस्म (कानून से बाहर) के व्यवहार को प्रभावी रूप से समर्थन और सुविधा प्रदान करता है। यह समझौता संयुक्त राज्य के कानून का भी उल्लघंन करता है और परमाणु हथियारों की आपूर्ति करने वाले ग्रुप को अनदेखा करता है। ऐसे 45 देश हैं जिन्होने परमाणु हथियार प्रसार के खतरे को कम करने के लिए कड़े नियमों को स्थापित किया है।
आर्म्स कट्रोल एसोसिएशन के कार्यकारी निदेशक डेरिल किम्बॉल कहते हैं कि "यह समझौता भारत की ओर से भविष्य में किए जाने वाले नाभिकीय परिक्षण को नहीं रोकता है। यह समझौता आश्चर्यजनक रुप से भारत के परमाणु परीक्षण करने पर वाशिंगटन, नई दिल्ली को दूसरे देशों से ईधन हासिल करने के लिए प्रतिबद्ध करता है। " यह भारत को "बम बनाने के लिए सीमित घरेलु सप्लाई को भी मुक्त करने" की छूट देता है। ये सभी कदम अंतर्राष्ट्रीय अप्रसार संधियों का सीधा-सीधा उल्लघंन करते हैं।
भारत-अमेरिका परमाणु समझौता दूसरों को भी इस तरह के नियमों को तोडने के लिए संभावित रुप से उकसाता है। ऐसी चर्चा है कि पाकिस्तान नाभिकीय हथियारों के लिए एक प्लुटोनियम उत्पादक रिऐक्टर बनाने जा रहा है। ऐसा लगता है कि हथियारों के रुपों की एक ज्यादा उन्नत अवस्था की शुरुआत हो रही है। क्षेत्रीय नाभिकीय महाशक्ति इजराइल भारत की तरह विशेषाधिकार के लिए कांग्रेस के साथ गुटबाजी करता आ रहा है। उसने नियमों से छूट पाने के निवेदन के साथ परमाणु आपूर्ति समूह से भी संपर्क साधा है। अब फ्रासं रुस और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने भारत के साथ परमाणु समझौता करने की तरफ कदम बढ़ा चुके हैं। चीन का पाकिस्तान के साथ है और यह चौंकाने वाली बात है कि किसी समय के सार्वभौमिक महाशक्ति नें दरवाजे खोल दिये हैं।
भारत-अमेरिका समझौता सैन्य और वाणिज्यिक दोनों उद्देश्यों को एक कर देता है। परमाणु हथियारों के विशेषज्ञ गैरी मिल्होलीन ने सेक्रेटरी ऑफ स्टेट कोन्डोलिजा राइस के द्वारा कांग्रेस को दी गयी सफाई को उल्लेखित करते हैं कि समझौता "निजी क्षेत्र को दृढतापूर्वक ध्यान में रख कर बनाया" गया था, खासकर हवाईजहाज और रिऐक्टर्स बनाने वाली कंपनियों के। मिल्होलिन जोर देते हुए कहते हैं कि उसमें सैन्य ऐयरक्राफ्ट शामिल है। इसके अलावा वो आगे कहते हैं कि परमाणु युद्ध के खिलाफ खड़ी रुकावटों को कम आंकने से समझौता न केवल क्षेत्रीय तनाव बढाता है बल्कि "उस दिन की तरफ भी शीघ्रता से बढ़ता है जब एक परमाणु विस्फोट एक अमेरिकी शहर को नष्ट कर देगा"। वाशिगंटन का संदेश हैं कि "संयुक्त राज्य के लिए पैसे की तुलना में आपात नियंत्रण कम महत्वपूर्ण हैं"—अर्थात्, संयुक्त राज्य के व्यापरिक मण्डल के लिए लाभ जरूरी है—चाहे संभावित खतरे कुछ भी हों। किम्बॉल कहते हैं कि संयुक्त राज्य भारत को "एनपीटी पर करार करने वाले देशों के मुकाबले परमाणु व्यापार की ज्यादा सुविधाजनक शर्तें" प्रदान कर रहा है। दुनिया में बहुत कम लोग होंगे जो जो इस कुटिलता को देखने में असफल हैं। वाशिंगटन उन सहयोगियों और ग्राहकों को पुरस्कृत करता है जिन्होने एनपीटी नियमों को पूरी तरह अनदेखा किया है। जबकि इरान के विरुद्ध युद्ध की धमकी दे रहा है जो चरम उकसाव के बाद भी एनपीटी के उल्लघंन के लिए नहीं जाना जाता। अमेरिका ने इरान के दो पड़ोसियों पर कब्जा किया है।1979 में अमेरिकी नियंत्रण से मुक्त होने के बाद से वह खुले तौर पर इरानी राज्य को उखाड फैकने का प्रयास करता रहा है।
पिछले कुछ सालों से भारत और पाकिस्तान ने अपने बीच तनावों को कम करने की दिशा में प्रगति की है। लोगों के बीच संपर्क बढ़ा है और सरकारें दोनों राज्यों को अलग करने वाले कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार-विमर्श कर रहीं है। लेकिन उम्मीद जगाने वाली यह प्रगति भारत-अमेरिकी परमाणु समझौते से उलट भी सकती है। इस पूरे क्षेत्र में विश्वास पैदा करने वाले माध्यमों में से एक था इरान से लेकर पाकिस्तान से होकर भारत में प्राकृतिक गैस पाइपलाइन का निर्माण था। "शान्ति पाइपलाइन" क्षेत्र को एक सूत्र में बांध दी होती और आगे भी शान्तिपूर्ण एकीकरण की संभावनाओं का द्वार खोलती। पाइपलाइन के जरिए जो उम्मीद लग रही है वह भारत-अमेरिकी समझौते की बलि चढ सकती है। वाशिंगटन भारत को इरानी गैस के बदले में नाभिकीय शक्ति को प्रस्तावित करने की रणनीति को दुश्मन को अलग-थलग करने के एक उपाय की तरह देखता है।
भारत-अमेरिका परमाणु समझौता वाशिगंटन के ईरान को अलग-थलग करने की रणनीति का ही हिस्सा है। 2006 में अमेरिकी कांग्रेस ने हाईड एक्ट पारित किया । यह एक्ट विशेषरुप से मांग करता है कि अमेरिकी सरकार " इरान के सामूहिक विनाश वाले हथियारों को हासिल करने के प्रयास के लिए हतोत्साहित करने, अलग-थलग करने और अगर जरुरी हो तो प्रतिबन्ध लगाने और रुकावट डालने के प्रयासों में भारत की पूरी और सक्रीय भागीदारी सुनिश्चित करे" ।
यह गौर करने वाली बात है कि बड़ी संख्या में अमेरिकी और इरानी जनता इजरायल और इरान को शामिल करते हुए इस पूरे क्षेत्र को ही नाभिकीय हथियार मुक्त क्षेत्र में बदलने के पक्ष में है। 3 अप्रैल, 1991 के संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का प्रस्ताव 687 तो बहुत से लोगों को याद होगा । जो कि मांग करता है कि " मध्य पूर्व में सामूहिक विनाश वाले हथियारों और उनको संचालित करने वाली सभी मिशाइलों से मुक्त क्षेत्र की स्थापना की जाय।" अमेरिका ने इराक पर अपने आक्रमण की सफाई के दौरान नियमित रुप से इस अपील का सहारा लेता रहा है।
अनुवाद-नूतन मौर्या

Wednesday, January 2, 2008

दंभी लोगों की गूंज है फिल्म 300


-विनिता
३०० की ऎतिहासिक पृष्ठभूमि एक बात है लेकिन उसका फिल्मी रुपान्तरण सिर्फ तथ्यों को नही रखता। इरानी सेना को दैत्यों, जादूगरों और पशुवत लोगों से भरा दिखाकर यह फिल्म जो कह रही है उसको समझने में किसी भी न्यूनतम राजनैतिक समझदारी रखने वाले को दिक्कत नहीं होनी चाहिए। फिल्म में लियोनायडस के जरिये कही गई बात कि दुनिया में सभ्यता और स्वतंत्रता कि आखरी उम्मीद स्पार्टा है,में निश्चित तौर से आज के पश्चिमी महाबलियों कि भाषा की दंभी गूंज सुनी जा सकती है। इतिहास कि इस तरह कि तोड़-मरोड़ का हर तरह से प्रतिरोध होना चाहिए, निश्चित तौरपर सांस्कृतिक रुपों में भी, जिसका ईरानी संगीतकार यास एक अच्छा उदाहरण पेश करते हैं।