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Friday, November 16, 2007

जनवाद का 'दलाल स्ट्रीट'


जनमत पर जेएनयू के चुनावों का दिलीप मंडल ने एक विश्लेषण रखा। जिस पर जाहिर है कई प्रतिक्रियाएं होनी थी। लेकिन पहली प्रतिक्रिया आई किसी ‘खुश’का। एसएफआई की हार से तिलमिलाए ये सज्जन जा पहुंचे त्रिलोचन शास्त्री के लिए जारी जनमत की अपील तक। फिर उन्हे याद आया कि किन्ही अनिल रघुराज( ये किन्ही अनिल रघुराज उनके ब्लॉग के 'दोस्त लोग'में हैं..फिर ये किन्ही कैसे हुए!!?) ने भी लिबरेशन और कम्यूनिज्म के विरोध में कुछ लिखा है और उसके बाद ये अपनी समझ से इस राजनीति पर कई वार करते गए। उन्हे सबसे ज्यादा आपत्ति थी दुमछल्ले वामपंथ पर। चंद्रशेखर की मां को लेकर लिखे गए टिप्पणी से उलझते हुए वे सिर टकराने लगे। लेकिन जब इनके लेखन या ब्लॉग लीला का दौरा हुआ तो सामने आया कि ऐसे भ्रष्ट जनवाद के नुमाइंदे बाजार की समझ से त्रिलोचन और सही वामपंथ को तौलते हैं। टुकडे –टुकड़े में जन आंदोलनों की कमजोरियों और सचेत ढंग से प्रचारित अफवाहों के ये सौदागर मौका तलाशते हैं कि कैसे आम लोगों को सही मुद्दों और बातचीत से भटकाया जाय.. देखिए इस दुमछल्ले वामपंथी का लेखन...जैसा कि ये खुद दावा करते हैं ये कहीं नौकरी नहीं करते लिहाजा बाजार इनकी मजबूरी नहीं बल्कि पसंद है। ये पूरी तरह बाजार की बीमारी जानते हैं लेकिन त्रिलोचन की बीमारी जानने का इन्हे कोई रास्ता नजर नहीं आता। इस बाजार प्रेमी दुमछल्ला वाम की यही कहानी है यह अवसरवाद का सबसे घृणित प्रतिनिधि है। जब यह बाजार की बात कह रहा है तो नहीं लगता कि साथ में दुमछल्ले वाम का घोषणा पत्र लिख रहा है..

ये लिखते हैं...
"शेयर बाजार में करेक्शन का दौर है, बहाना चाहे जो हो। यह करेक्शन लंबे समय से अपेक्षित था। अलबत्ता, दिवाली पर पीटने के लिए लिवाली का अच्छा मौका बन रहा है। लेकिन बाजार में लघुअवधि में फायदा वही उठा पाते हैं जो हवा का रुख भांपने में सक्षम होते हैं। पूरा खेल यह है कि क्या आप इस बात का सटीक अनुमान लगा पाते हैं कि बाजार में बहुमत की धारणा क्या है। अगर हां, तो आप राजा हैं। दूसरा फैक्टर है डर और लालच। बाजार से फायदा उठाना है तो इऩ पर विजय पानी होगी।खैर, शेयर बाजार में इस समय आशंकाओं का राज है। यह कितना गहरा है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाइए कि रिलायंस इंडस्ट्रीज व विप्रो के नतीजे भी इऩ पर काबू न कर सके।

नोट- निवेश करने से पहले खुद पोढ़े हो लें। अपन की जिम्मेदारी नहीं है।"

मेरी बाई लिस्ट
1यूको बैंक (39 से नीचे खरीदें)
2 एचएफसीएल (22-23 पर लें)
3 टेलीडाटा (55 से नीचे)
4 कोठारी शुगर (12 पर लें)
5 बलरामपुर चीनी (50 पर आने का इंतजार कर लें)
6. केसीपी शुगर (18 के नीचे खरीदें)

अब आप ही तय करिए कि क्या ऐसे लालची व्यक्तित्व वाले ही तय करेंगे कि सही जनवाद और उसकी राजनीति क्या है और त्रिलोचन का कद कितना है?......

जेएनयू में दुमछल्ला वामपंथ की हार


सीपीएम और सीपीआई के लिए युवाओं के बीच अपनी राजनीति का बचाव करना मुश्किल हो रहा है। जेएनयू के छात्र संगठन चुनाव का इस मायने में राष्ट्रीय महत्व है। गुलाबी वामपंथ के समझौता परस्त नीतियों की शिकस्त वामपंथ की एक नई धारा की ओर इशारा है।
-दिलीप मंडल

अरावली पहाड़ियों की तलहटी पर घने पेड़ों के बीच बने जेएनयू यानी जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में एक नई हलचल है। जेएनयू को भारत में युवाओं के मूड का आईना कभी नहीं माना जाता है। और ये ठीक भी है। पूरे देश के छात्रों का प्रतिनिधित्व जेएनयू नहीं करता। दिल्ली के ही दूसरे विश्वविद्यालयों का मिजाज यहां से अलग है। लेकिन देश के बौद्धिक समाज में जेएनयू की घटनाओं को हमेशा गं�¤­ीरता से लिया जाता रहा है। जेएनयू आखिर देश के बौद्धिकों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है और इसकी पहचान आईएएस और आईपीएस अफसर बनाने वाली फैक्ट्री के अलावा , सोचने समझने वाले युवाओं के केंद्र के तौर पर ही रही है। यहां के छात्रसंघ चुनाव दूसरे कई विश्वविद्यालयों से अलग, व्यक्तित्व की जगह मुद्दों के आधार पर लड़े जाते हैं। जेएनयू दरअसल भारतीय राजनीति में विरोध और प्रतिरोध की ताकतों का केंद्र रहा है , इसलिए कांग्रेस के छात्र संगठन न एनएसयूआई को यहां कोई नहीं पूछता। केंद्र में जब बीजीपी की सरकार थी तब भी यहां एबीवीपी आम तौर पर हाशिए पर ही रही।
जेएनयू में छात्र संघ चुनाव नतीजों में कुछ ऐसा हुआ, जो पहले कभी नहीं हुआ था। चुनाव में ऑल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन यानी आईसा के प्रतिनिधि अध्यक्ष, उपाध्यक्ष , महासचिव और संयुक्त सचिव यानी सभी चार पदों पर जीत गए। आईसा एक वामपंथी छात्र संगठन है जो वैचारिक रूप से सीपीआई (एमएल) लिबरेशन से जुड़ा है। लिबरेशन को अतिवामपंथी यानी नक्सली संगठन कहा जाता है , लेकिन हाल के वर्षों में इसने चुनाव में भी हिस्सेदारी की है।
इस चुनाव में दूसरी अभूतपूर्व बात ये हुई कि सीपीएम-सीपीआई से जुड़े छात्र संगटनों एसएफआई-एआईएसएफ के प्रतिनिधि न सिर्फ चारों पदों पर हार गए, बल्कि अध्यक्ष और महामंत्री के महत्वपूर्ण पदों पर वो तीसरे नंबर पर चले गए। जेएनयू में अलग अलग समय में अलग अलग विचारों, और बिना विचारों वाले छात्र संगठन प्रभावशाली रहे हैं- कभी समाजवादी, तो कभी फ्री थिंकर्स का वहां असर रहा। लेकिन अध्यक्ष और महासचिव के मुकाबले में एसएफआई न हो, ये पहले कभी नहीं हुआ। इन चुनावों की तीसरी महचत्वपूर्ण बात रही - आरक्षण विरोधी छात्रों के समूह यूथ फॉर इक्वालिटी की मजबूत उपस्थित। आईसा को दरअसल टक्कर यूथ फॉर इक्वालिटी से ही मिली।
इन चुनाव नतीजों का मतलब खासकर वामपंथी राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। जेएनयू के चुनावों के मुद्दों को देखें तो इस बार यूपीए सरकार की आर्थिक नीति, स्पेशल इकॉनॉमिक जोन और सिंगुर -नंदीग्राम की घटनाएं, देश की विदेश नीति, खासकर अमेरिकी-भारत संबंध और परमाणु समझौता, शिक्षा के निजीकरण की कोशिश , शिक्षा संस्थानों में आरक्षण जैसे मुद्दे छाए रहे। इन मुद्दों पर हुए चुनाव में एसएफआई-एआईएसएफ की हार को आप इन मुद्दों पर सीपीएम-सीपीआई की उलझन और उसकी कमजोरी के नतीजे के तौर पर देख सकते हैं। दरअसल इन पार्टियों के संग�¤ नों के लिए छात्रों के बीच अब खुद को विरोध या प्रतिरोध की शक्ति के रूप में पेश कर पाना मुश्किल हो रहा है। इस मायने में जेएनयू भारतीय राजनीति का ही आईना साबित हो रहा है। राष्ट्रीय राजनीति में विरोध का पक्ष बनने की कोशिश में जिस तरह वाममोर्चा के पांव उलझ रहे हैं , वैसा ही जेनयू में ही हुआ।
यूपीए सरकार का दो-तिहाई कार्यकाल खत्म होने के बाद सीपीएम-सीपीआई को अब केंद्र सरकार में कई खामियां दिखने लगी हैं। विदेश नीति पर कदम दर कदम चलते हुए हमारी सरकार अमेरिका के बेहद करीब पहुंच चुकी है। अमेरिका के साथ भारतीय सेना के तीन दर्जन से ज्यादा साझा अभ्यास हो चुके हैं। अमेरिकी सरकार भारत को एशिया में अपने सबसे भरोसेमंद सहयोगी के तौर पर देखती है। अमेरिका को खुश करने के लिए भारत सरकार अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी में दो बार ईरान के खिलाफ वोट डाल चुकी है। इराक में अमेरिकी हमले की भारत ने इसी वजह से निंदा भी नहीं की। हम इजराएली सैनिक साजो-सामान के बड़े खरीददार बन चुके हैं। ये सब उस सरकार ने किया, जो वाममोर्चा के समर्थन के बगैर चल ही नहीं सकती। अब परमाणु समझौते पर विपक्ष की भूमिका अपनाकर वाममोर्चा अगर उस अतीत से छुटकारा पाना चाहती है तो ये संभव नहीं है। जेएनयू चुनाव के दौरान हुई बहस में एसएफआई -एआईएसएफ के प्रतिनिधि इस विषय पर अपना बचाव नहीं कर पाए।
आर्थिक नीतियों के सवाल पर भी एसएफआई-एआईएसएफ बचाव की मुद्रा में रहे। आर्थिक नीतियों पर अमल के मामले में कांग्रेस और वाममोर्चा के बीच दूरी मिट चुकी है। बल्कि सिंगुर और नंदीग्राम का अनुभव बताता है कि आर्थिक नीतियों के सवाल पर वाममोर्चा कांग्रेस से कहीं अधिक आक्रामक है। स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा के निजीकरण से लेकर जनवितरण प्रणाली को कमजोर और फिर खत्म कर देने में कांग्रेस और वाममोर्चा की सरकारों में लोगों का अनुभव अलग अलग नहीं है। ऐसे में छात्र सिर्फ इसलिए किसी संगठन को वोट नहीं डाल देंगे,कि वो खुद को वामपंथी कहते हैं। जेएनयू में भी ठीक यही हुआ है। वहां के चुनाव में प्रतिरोध का पक्ष आईसा ने रखा और परंपरा के मुताबिक प्रतिरोध की सबसे मजबूत दिख रही आवाज के साथ जेएनयू के छात्रों ने अपना सुर मिलाया।
कुछ ऐसा ही यूथ फॉर इक्वालिटी और एबीवीपी के मामले में भी हुआ। शिक्षा संस्थानों में आरक्षण के विरोध में सामने आई सवर्ण प्रतिक्रिया से जन्मी यूथ फॉर इक्वालिटी जेएनयू कैंपस में एक मजबूत ताकत बनकर उभरी है। खासकर साइंस के छात्रों में इसका अच्छा प्रभाव है। आरक्षण विरोधी बातें तो एबीवीपी भी घुमाफिराकर करती है। लेकिन जिन छात्रों को आरक्षण से एतराज है उन्होंने घुमाफिरा कर बातें करने वालों के मुकाबले आरक्षण का खुलकर विरोध करने वाले संगठन यूथ फॉर इक्वालिटी को अपना माना। ये बात भी महत्वपूर्ण है कि आर्थिक मुद्दों पर यूथ फॉर इक्वालिटी एबीवीपी, एनएसयूआई आदि में कोई फर्क नहीं रहा। साथ ही, एवीबीपी का कैंपस में घटता असर इस ओर भी संकेत कर रहा है कि पढ़े लिखे युवाओं में सांप्रदायिकता की राजनीति को चाहने वाले कम हैं। किसी सांप्रदायिक मुद्दे पर सामाज में ध्रुवीकरण न हो तो ऐसी राजनीति कैंपस में भी नहीं चलती।
कुल मिलाकर जेएनयू में एक ओर यूथ फॉर इक्वालिटी के नेतृत्व में आर्थिक उदारीकरण, वैश्वीकरण की समर्थक और सामाजिक न्याय का विरोध करने वाली ताकतें थी और दूसरी ओर आईसा था जो आर्थिक मुद्दे और विदेश नीति के सवाल पर देश की स्वतंत्र हैसियत की बात कर रहा था और सामाजिक न्याय के पक्ष में मजबूती से डटा था। जेएनयू में ये लड़ाई इस साल आईसा ने जीत ली है। और इन सबके बीच एसएफआई -एआईएसएफ, एबीवीपी और एनएसयूआई जैसे संग�¤ न निरर्थक हो गए।

जन संस्कृति मंच की अपील

नंदीग्राम में राज्य प्रायोजित हिंसा के खिलाफ कोलकाता में विरोध प्रदर्शन कर रहे फिल्मकारों और कलाकारों पर लाठीचार्ज और उनकी गिरफ्तारी की देश भर के प्रमुख साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों ने कठोर शब्दों में निंदा की है और राष्ट्रपति से ऐसी घटनाओं पर रोक लगाने की अपील की है।

साहित्यकार-कलाकार-बुद्धिजीवियों द्वारा जारी बयान के अनुसार पश्चिम बंगाल सरकार ने नंदीग्राम में बेशर्मी की सारी हदें पार कर चुकी है और खूनी आतंक के बल पर मरघट की शांति कायम करना चाहती है। उसने अपनी ही जनता के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया है और उसके कत्लेआम पर उतर आई है। 'जो हमारे साथ नहीं है वह हमारा दुश्मन है` जैसे तर्क के जरिए वह नंदीग्राम में शासकीय दमन का विरोध करने वाली हर आवाज को जिस तरह से कुचल रही है, वह बर्दाश्त करने लायक नहीं है। इसी तर्क के आधार पर उसने कोलकाता में फिल्म फेस्टिवल के दौरान विरोध प्रदर्शन कर रहे फिल्मकारों, कलाकारों, चित्रकारों, साहित्यकारों और अन्य संस्कृतिकर्मियों पर बर्बर लाठी चार्ज किया और पचास से ऊपर लोगों को गिरफ्तार किया। यह प्रतिरोध और विरोध के मौलिक लोकतांत्रिक अधिकार का तो हनन है ही, इससे वामपंथ की छवि भी कलंकित हो रही है।

हम लेखक, बुद्धिजीवी, कलाकार, रंगकर्मी, चित्रकार पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा जारी सरकारी दमन की कठोर शब्दों में निंदा करते हैं और राष्ट्रपति महोदया से अनुरोध करते हैं कि मूकदर्शक रहने के बजाए इस कृत्य को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाएं।

बयान जारी करने वालों में प्रसिद्ध आलोचक और जसम के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. मैनेजर पांडेय, कवि नवारुण भट्टाचार्य, फिल्मकार लाडली मुखर्जी, फिल्मकार संजय जोशी, फिल्मकार नितिन के., चित्रकार सनातन डिंडा, चित्रकार अशोक भौमिक, जसम के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रामजी राय और अजय कुमार, कवि विष्णु खरे, कवि मंगलेश डबराल, कवि वीरेन डंगवाल, जसम के पूर्व महासचिव अजय सिंह, अर्थशास्त्री डॉ. नवल किशोर चौधरी, जसम के राष्ट्रीय महासचिव प्रणय कृष्ण, कथाकार मधुकर सिंह, कथाकार सुरेश कांटक, आलोचक राम निहाल गुंजन, आलोचक सियाराम शर्मा, आलोचक रवींद्रनाथ राय, कहानीकार-आलोचक अरविंद कुमार, समयांतर के सपांदक पंकज विष्ट, प्रसंग के संपादक शंभु बादल, फिलहाल की संपादिका प्रीति सिन्हा, बया के संपादक गौरीनाथ, जनमत के संपादक सुधीर सुमन, प्रो. बलराज पांडेय, कवि बलभद्र, कवि सुरेंद्र प्रसाद, रंगकर्मी जावेद अख्तर, रंगकर्मी संतोष झा, रंगकर्मी दीपक सिन्हा, रंगकर्मी अरुण प्रसाद, चित्रकार राकेश दिवाकर, कवि सुमन कुमार सिंह, कवि अरुण शाद्वल, कवि राजेश कमल आदि प्रमुख हैं।

सीपीएम की गुंडागर्दी का नमूना

Thursday, November 15, 2007

कहां गए नंदीग्राम के लोग




समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध,
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।



नंदीग्राम को फतह कर लिया गया है. 11 नवंबर को बंगाल और भारतीय वामपंथी राजनीति के इतिहास में एक और रक्त दिवस के रूप में याद किया जाएगा. लाल रंग सीपीएम का रंग है और बांग्ला में लाल को रोक्तो ही कहा जाता है. सीपीएम के राज्य नेता और मंत्री श्यामलाल चक्रवर्ती ने कहा है कि अब वहां शांति स्थापित हो चुकी है और लोग वहां की ताजा हवा में सांस ले सकते हैं. खून की गंध से भरी नंदीग्राम की हवा बहुत दिनों तक उनका पता पूछती रहेगी जो सीपीएम के इस क्रांतिकारी कब्जा अभियान में मारे गए. यहां बताना नामुमकिन है कि कितने कत्ल हुए और कितनी औरतों के साथ बलात्कार हुआ.

नंदीग्राम पर सीपीएम की घेराबंदी इतनी जबर्दस्त थी कि सीआरपीएफ को भी 11 नवंबर को लौट जाना पड़ा. पुलिस नंदीग्राम पहुंच नहीं पा रही है या उसे मना कर दिया गया है. आखिर इतने सालों से राज्य पुलिस सीपीएम की अनुचरी बनी रही है और यह भूल चुकी है कि उसका स्वतंत्र कर्तव्य क्या है. पत्रकारों का नंदीग्राम के भीतर जाना कठिन था और उनकी गाड़ियों पर सीपीएम के लोगों ने हमला किया और उन्हें लौटने पर मजबूर कर दिया. नंदीग्राम में सीपीएम के हमलों में घायल ग्रामवासियों में से अनेक का अपहरण कर लिया गया है. कई लापता हैं. उनका पता कैसे चले यह एक बड़ी समस्या है. ज्योति बसु पहले से कहते चले आ रहे हैं कि नंदीग्राम में अब शांति आने ही वाली है और अब शांति से उनका तात्पर्य बिल्कुल स्पष्ट हो चुका है.
लेकिन सीपीएम के इस खूनी कब्जे के बाद नंदीग्राम से भगा दिए गए प्रतिरोधी गांववालों के पुनर्वास का प्रश्न उठ खड़ा हुआ है. सीपीएम के लोग यह कह रहे हैं कि किसी पर कोई जुल्म नहीं होगा. सभी साथ-साथ रह सकते हैं और अपने राजनीतिक विचारों का पालन कर सकते हैं. लेकिन बंगाल को जानने वाला कोई भी अच्छी तरह यह जानता है कि यह दूसरी किसी जगह भले संभव हो, बंगाल में तो असंभव है. अगर बंगाल की राजनीतिक संस्कृति ऐसी होती तो नंदीग्राम की यह परिणति नहीं होती. सीपीएम जनता का पूरा समर्पण चाहती रही है. हमें ऐसे किस्से मालूम हैं कि शादी ब्याह जैसे नितांत निजी प्रसंगों में भी पार्टी की रजामंदी के बिना कोई कदम उठाना खतरनाक हो सकता है. विरोधी दल वालों के गांवों में रिश्ते नहीं किए जा सकते और ऐसा न होने देने के लिए सड़कें काट दी जाती हैं और गड्ढे खोद दिए जाते हैं. जमीन खरीद-बिक्री आदि में तो पार्टी का फैसला निहायत जरूरी है. बंगाल में लोकतांत्रिक स्वभाव का खात्मा हो चुका है इसलिए राजनीतिक विरोधियों की सह पाने की क्षमता भी जाती रही है. इस व्याधि के शिकार सीपीएम के अलावा और दल भी हैं. (अपुर्वानंद)

Friday, November 2, 2007

भद्रलोक कम्युनिस्ट राज में रिजवान की मौत का मतलब


-दिलीप मंडल

रिजवान-उर-रहमान की मौत /हत्या के बाद के घटनाक्रम से पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री और सीपीएम पोलिट ब्यूरो के सदस्य ज्योति बसु चिंतित हैं। ज्योति बसु सरकार में शामिल नहीं हैं , इसलिए अपनी चिंता इतने साफ शब्दों में जाहिर कर पाते हैं। उनका बयान है कि रिजवान केस में जिन पुलिस अफसरों के नाम आए हैं उनके तबादले का आदेश देर से आया है। इससे सीपीएम पर बुरा असर पड़ सकता है।
रिजवान जैसी दर्जनों हत्याओं को पचा जाने में अब तक सक्षम रही पश्चिम बंगाल के वामपंथी शासन के सबसे वरिष्ठ सदस्य की ये चिंता खुद में गहरे राजनीतिक अर्थ समेटे हुए है। रिजवान कोलकाता में रहने वाला 30 साल का कंप्यूटर ग्राफिक्स इंजीनियर था, जिसकी लाश 21 सितंबर को रेलवे ट्रैक के किनारे मिली। इस घटना से एक महीने पहले रिजवान ने कोलकाता के एक बड़े उद्योगपति अशोक तोदी की बेटी प्रियंका तोदी से शादी की थी। शादी के बाद से ही रिजवान पर इस बात के लिए दबाव डाला जा रहा था कि वो प्रियंका को उसके पिता के घर पहुंचा आए। लेकिन इसके लिए जब प्रियंका और रिजवान राजी नहीं हुए तो पुलिस के डीसीपी रेंक के दो अफसरों ज्ञानवंत सिंह और अजय कुमार ने पुलिस हेडक्वार्टर बुलाकर रिजवान को धमकाया। आखिर रिजवान को इस बात पर राजी होना पड़ा कि प्रियंका एक हफ्ते के लिए अपने पिता के घर जाएगी। जब प्रियंका को रिजवान के पास नहीं लौटने दिया गया तो रिजवान मानवाधिकार संगठन की मदद लेने की कोशिश कर रहा था। उसी दौरान एक दिन उसकी लाश मिली।
रिजवान की हत्या के मामले में पश्चिम बंगाल सरकार और सीपीएम ने शुरुआत में काफी ढिलाई बरती। पुलिस के जिन अफसरों पर रजवान को धमकाने के आरोप थे, उन्हें बचाने की कोशिश की गई। पूरा प्रशासन ये साबित करने में लगा रहा कि रिजवान ने आत्महत्या की है। राज्य सरकार ने मामले की सीआईडी जांच बिठा दी और एक न्यायिक जांच आयोग का भी गठन कर दिया गया। इन आयोगों और जांच को रिजवान के परिवार वालों ने लीपापोती की कोशिश कह कर नकार दिया। आखिरकार कोलकाता हाईकोर्ट के आदेश के बाद राज्य सरकार को सीबीआई जांच के लिए तैयार होना पड़ा। कोलकाता के पुलिस कमिश्नर और दो डीसीपी को उनके मौजूदा पदों से हटा दिया गया और आखिरकार मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य खुद रिजवान के परिवारवालों से मिलने पहुंचे , क्योंकि रिजवान की मां उनसे मिलने के लिए नहीं आई। राज्य सरकार ने परिवार वालों की मांग के आगे झुकते हुए न्यायिक जांच भी वापस ले ली है।
सवाल ये उठता है कि इस विवाद से राज्य सरकार इस तरह हिल क्यों गई है। दरअसल ये घटना ऐसे समय में हुई है जब पश्चिम बंगाल के मुसलमानों में वाममोर्चा के खिलाफ व्यापक स्तर पर मोहभंग शुरू हो गया है। पश्चिम बंगाल देश के उन राज्यों में है , जहां मुसलमानों की आबादी चुनाव नतीजों को प्रभावित करती है। 25 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले इस राज्य में मुसलमानों की हालत देश में सबसे बुरी है। ये बात काफी समय से कही जाती थी , लेकिन प्रधानमंत्री द्वारा गठित सच्चर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में इस बात का प्रमाण जगजाहिर कर दिया है। राज्य सरकार से मिले आंकड़ों के आधार पर सच्चर कमेटी ने बताया है कि पश्चिम बंगाल में राज्य सरकार की नौकरयों में सिर्फ 2 फीसदी मुसलमान हैं। जबक केरल में मुस्लिम आबादी का प्रतिशत लगभग बराबर है पर वहां राज्य सरकार की नौकरियों में साढ़े दस फीसदी मुसलमान हैं। पश्चिम बंगाल में मुसलमानों का पिछड़ापन सिर्फ नौकरियों और न्यायिक सेवा में नहीं बल्कि शिक्षा , बैंकों में जमा रकम, बैंकों से मिलने वाले कर्ज जैसे तमाम क्षेत्रों में है।
साथ ही पश्चिम बंगाल देश के उन राज्यों में है, जहां सबसे कम रिजर्वेशन दिया जाता है। पश्चिम बंगाल में दलित, आदिवासी और ओबीसी को मिलाकर 35 प्रतिशत आरक्षण है। वहां ओबीसी के लिए सिर्फ सात फीसदी आरक्षण है। मौजूदा कानूनों के मुताबिक, मुसलमानों को आरक्षण इसी ओबीसी कोटे के तहत मिलता है।
सच्चर कमेटी की रिपोर्ट आने के बाद से ही पश्चिम बंगाल के मुस्लिम बौद्धिक जगत में हलचल मची हुई है। इस हलचल से सीपीएम नावाकिफ नहीं है। कांग्रेस का तो यहां तक दावा है कि 30 साल पहले जब कांग्रेस का शासन था तो सरकारी नौकरियों में इससे दोगुना मुसलमान हुआ करते थे। सेकुलरवाद के नाम पर अब तक मुसलमानों का वोट लेती रही सीपीएम के लिए ये विचित्र स्थिति है। उसके लिए ये समझाना भारी पड़ रहा है कि राज्य सरकार की नौकरियों में मुसलमान गायब क्यों हैं।
अक्टूबर महीने में ही राज्य के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने प्रदेश के सचिवालय में मुस्लिम संगठनों की एक बैठक बुलाई। बैठक में मिल्ली काउंसिल, जमीयत उलेमा -ए-बांग्ला, जमीयत उलेमा-ए-हिंद, पश्चिम बंगाल सरकार के दो मुस्लिम मंत्री और एक मुस्लिम सांसद शामिल हुए। बैठक की जो रिपोर्टिंग सीपीएम की पत्रिका पीपुल्स डेमोक्रेसी के 21 अक्टूबर के अंक में छपी है उसके मुताबिक मुख्यमंत्री ने कहा कि सच्चर कमेटी ने राज्य में भूमि सुधार की चर्चा नहीं की। उनका ये कहना आश्चर्यजनक है क्योंकि सच्चर कमेटी भूमि सुधारों का अध्ययन नहीं कर रही थी। उसे तो देश में अल्पसंख्यकों की नौकरियों और शिक्षा और बैंकिग में हिस्सेदारी का अध्ययन करना था। बुद्धदेव भट्टाचार्य ने आगे कहा -
" ये तो मानना होगा कि सरकारी और प्राइवेट नौकरियों में उतने मुसलमान नहीं हैं, जितने होने चाहिए। इसका ध्यान रखा जा रहा है और आने वाले वर्षों में हालात बेहतर होंगे। " अपने भाषण के अंत में बुद्धदेव भट्टाचार्य ने मुसलमानों को शांति और सुऱक्षा का भरोसा दिलाया। दरअसल वाममोर्चा सरकार पिछले तीस साल में मुसलमानों को विकास की कीमत पर सुरक्षा का भरोसा ही दे रही है।
रिजवान के मामले में सुरक्षा का भरोसा भी टूटा है। इस वजह से मुसलमान नाराज न हो जाएं, इसलिए सीपीएम चिंतित है। सीपीएम की मजबूरी बन गई है कि इस केस में वो न्याय के पक्ष में दिखने की कोशिश करे। रिजवान पश्चिम बंगाल में एक प्रतीक बन गया है और प्रतीकों की राजनीति में सीपीएम की महारत है। अगर पूरा मुस्लिम समुदाय ये मांग करता कि राज्य की नौकरियों में हमारा हिस्सा कहां गया तो ये सीपीएम के लिए ज्यादा मुश्किल स्थिति होती। लेकिन रिजवान की मौत से जुड़ी मांगों को पूरा करना सरकार के लिए मुश्किल नहीं है। आने वाले कुछ दिनों में आपको पश्चिम बंगाल में प्रतीकवाद का ही खेल नजर आएगा।

Thursday, November 1, 2007

इतने भले नहीं बन जाना


- वीरेन डंगवाल
इतने भले नहीं बन जाना साथी
जितने भले हुआ करते हैं सरकस के हाथी
गदहा बनने में लगा दी अपनी सारी कुव्वत सारी प्रतिभा
किसी से कुछ लिया नहीं न किसी को कुछ दिया
ऐसा भी जिया जीवन तो क्या जिया?

इतने दुर्गम मत बन जाना
सम्भव ही रह जाय न तुम तक कोई राह बनाना
अपने ऊंचे सन्नाटे में सर धुनते रह गए
लेकिन किंचित भी जीवन का मर्म नहीं जाना

इतने चालू मत हो जाना
सुन-सुन कर हरक़ते तुम्हारी पड़े हमें शरमाना
बग़ल दबी हो बोतल मुँह में जनता का अफसाना
ऐसे घाघ नहीं हो जाना

ऐसे कठमुल्ले मत बनना
बात नहीं हो मन की तो बस तन जाना
दुनिया देख चुके हो यारो
एक नज़र थोड़ा-सा अपने जीवन पर भी मारो
पोथी-पतरा-ज्ञान-कपट से बहुत बड़ा है मानव
कठमुल्लापन छोड़ो
उस पर भी तो तनिक विचारो

काफ़ी बुरा समय है साथी
गरज रहे हैं घन घमण्ड के नभ की फटती है छाती
अंधकार की सत्ता चिल-बिल चिल-बिल मानव-जीवन
जिस पर बिजली रह-रह अपना चाबुक चमकाती
संस्कृति के दर्पण में ये जो शक्लें हैं मुस्काती
इनकी असल समझना साथी
अपनी समझ बदलना साथी

Tuesday, October 30, 2007

समझदारों का गीत



-गोरख पांडेय
हवा का रुख कैसा है,हम समझते हैं
हम उसे पीठ क्यों दे देते हैं,हम समझते हैं
हम समझते हैं ख़ून का मतलब
पैसे की कीमत हम समझते हैं
क्या है पक्ष में विपक्ष में क्या है,हम समझते हैं
हम इतना समझते हैं
कि समझने से डरते हैं और चुप रहते हैं।

चुप्पी का मतलब भी हम समझते हैं
बोलते हैं तो सोच-समझकर बोलते हैं हम
हम बोलने की आजादी का
मतलब समझते हैं
टुटपुंजिया नौकरी के लिये
आज़ादी बेचने का मतलब हम समझते हैं
मगर हम क्या कर सकते हैं
अगर बेरोज़गारी अन्याय से
तेज़ दर से बढ़ रही है
हम आज़ादी और बेरोज़गारी दोनों के
ख़तरे समझते हैं
हम ख़तरों से बाल-बाल बच जाते हैं
हम समझते हैं
हम क्योंबच जाते हैं,यह भी हम समझते हैं।

हम ईश्वर से दुखी रहते हैं अगर वह
सिर्फ़ कल्पना नहीं है
हम सरकार से दुखी रहते हैं
कि समझती क्यों नहीं
हम जनता से दुखी रहते हैं
कि भेड़ियाधसान होती है।

हम सारी दुनिया के दुख से दुखी रहते हैं
हम समझते हैं
मगर हम कितना दुखी रहते हैं यह भी
हम समझते हैं
यहां विरोध ही बाजिब क़दम है
हम समझते हैं
हम क़दम-क़दम पर समझौते करते हैं
हम समझते हैं
हम समझौते के लिये तर्क गढ़ते हैं
हर तर्क गोल-मटोल भाषा में
पेश करते हैं,हम समझते हैं
हम इस गोल-मटोल भाषा का तर्क भी
समझते हैं।

वैसे हम अपने को किसी से कम
नहीं समझते हैं
हर स्याह को सफेद और
सफ़ेद को स्याह कर सकते हैं
हम चाय की प्यालियों में
तूफ़ान खड़ा कर सकते हैं
करने को तो हम क्रांति भी कर सकते हैं
अगर सरकार कमज़ोर हो
और जनता समझदार
लेकिन हम समझते हैं
कि हम कुछ नहीं कर सकते हैं
हम क्यों कुछ नहीं कर सकते हैं
यह भी हम समझते हैं।

Sunday, October 28, 2007

समग्रता को अंश में देखता है अवसरवाद


कंम्यूनिस्ट पार्टियों से जुड़े अनुभवों को बाजार के सामने बांटने की अदा लारेन डेसिंग को नोबल पुरस्कार तक ले गई। ऐसे पुरस्कारों के लिए विचारों की पेंशन घूस में देनी पड़ती है। इस तरह की कोशिश बहुत पहले से होती रही है और अभी भी जारी है। ऐसे लोगों के झोले में दोनों तरह का माल होता है मार्क्सवाद भी और उदारवाद भी, जहां जरूरत पड़े बस वहीं उसे लगा दो। लेकिन राजनीति से कट जाने के कारण उनका बौद्धिक जामा महज बिसुरन कला में ही आश्रय ढूंढता है। यह 1990 के बाद और तेजी से देखने को मिला। बाजारवादी विचार वाले किसी टेबल पर मक्खी बन कर बैठने के इंतजार में बौद्धिकता कुंद होती जाती है। पूरी की पूरी रचना प्रक्रिया ही ठहर जाती है। क्योंकि रचनात्मकता केवल व्यक्तिगत पहल से नहीं बल्कि संघर्षों की ताप महसूस करने से आती है। शायद इसलिए वैचारिक पलायन करने वाले ज्यादातर रचनाकर्मियों की कला में पहले जैसी तेजी नहीं रहती और वह भोथरी होती जाती है। यह वैचारिक बदलाव में भी दिखने लगता है। किसी भी ट्रेंड को बहुत सीमित नजरिए से देखने की आदत पड़ती जाती है। यही तरीका धीरे-धीरे अवसरवादी व्यवहार करने लगता है और समग्रता को अंश में देखने लगता है।