इस वीडियो में चे के भाषण के अलावा कुछ दुर्लभ वीडियो भी देखे जा सकते हैं।
Monday, October 8, 2007
Saturday, October 6, 2007
फिदेल के नाम चे का विदाई पत्र

9 अक्टुबर,1967 को बोलिविया में अर्नेस्टो चे ग्वेरा की हत्या कर दी गई। इस काम को अमेरिकी ग्रीन बेरेट से प्रशिक्षण हासिल करने वाले बोलिविया के सैनिक और सीआईए एजेंटों ने अंजाम दिया। चे के सम्मान में हम चे की ओर से फिदेल कास्त्रो को लिखे मशहूर फेयरवेल लेटर को पब्लिश कर रहे हैं। इस पत्र को 3 अक्टुबर, 1965 को फिदेल कास्त्रो ने चे की पत्नी और बच्चों की उपस्थिति में टेलीविजन पर पढ़ा था।
फिदेल,
इस वक्त मुझे कई लम्हे याद आ रहे हैं। मारिया एंटोनिया के घर पर आपसे मिलना और फिर मुझे क्यूबा आने का आपका निमंत्रण.. उसके बाद तैयारियों से जुड़े तनाव के क्षण, आज वो सब मेरे स्मृति पटल पर नांच रहे हैं।
एक दिन पूछा गया था कि हमें मृत्यु के लिए किसे जिम्मेदार मानना चाहिए। इस सवाल के जवाब में जब हम तथ्यों के तह में गए तो वास्तविकता ने हम सबको प्रभावित किया। हमने अच्छी तरह समझा कि सच्चा क्रांतिकारी वही है जो मृत्यु को गले लगाता है, और क्रान्ति में वही जीतता है या मृत्यु को प्राप्त होता है, यदि वह वास्तविक है। कई साथी विजय-मार्ग पर वीर-गति को प्राप्त हुए।
आज प्रत्येक वस्तु कम नाटकीय लगती है क्योंकि अब हम पहले से ज्यादा परिपक्व हैं। लेकिन तथ्य दोहराए जा रहे हैं। मैं अनुभव करता हूं कि मैं अपने कर्तव्य के उस हिस्से को पूरा कर चुका हूं, जिसने मुझे क्यूबाई क्रांति से उसी के क्षेत्र में बांध रखा था और अब मैं आपसे, अपने साथियों से, अपने लोगों से जो कि मेरे भी अपने सगे हैं, सभी से विदा लेता हूं।
मैं पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व में अपनी स्थिति, मंत्री और मेजर का पद और अपनी क्यूबाई नागरिकता को त्यागने की घोषणा करता हूं। अब कोई विधि नियम मुझे क्यूबा से नहीं बांधता। अब केवल वे ही बंधन हैं जो दूसरी प्रकृति के हैं और जो तोड़े नहीं जा सकते है बाकी पदों को तो तोड़ा और छोडा जा सकता है।
अपने अतीत को याद करते हुए मेरा विश्वास है कि मैने जहां तक संभव हुआ गौरव और निष्ठा के साथ क्रांतिकारी विजयों को संगठति करने में भरपूर योगदान किया है। मेरी गंभीर असफलता यही थी कि सारी माइस्त्रा की शुरुआती मुलाकात में मैने आप पर विश्वास नहीं किया था। मै नेता तथा क्रांतिकारी के रुप में आपके गुणों को तत्काल नहीं समझ पाया।
मैंने एक शानदार जीवन बिताया है । आपके साथ उस गौरव का अनुभव किया है जो कैरीबियन संकट के समय हमारी जनता के उन शानदार लेकिन तनावपूर्ण दिनों से जुड़ी है। आप जैसे तेज बुद्धि वाले राजनीतिज्ञ बहुत कम हैं। मुझे इस बात पर नाज है कि मैं बेहिचक आपके पदचिन्हों पर चला। आपकी चिंतनपद्धति को अपनाया और खतरों तथा सिद्धान्तों के विषय में आपके दृष्टिकोण को वास्तविक रुप में समझा।
संसार के अन्य राष्ट्र भी मुझसे ऐसे ही नम्र प्रयत्नों की मांग कर रहे हैं । मैं उस कार्य को करना चाहता हुं,जो क्यूबा के प्रधान होने के उत्तरदायित्व के कारण आपके लिए निषिद्ध हैं। और अब समय आ गया है जब हमें एक दूसरे से विदा ले लेनी चाहिए।
मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि मैं यह सब प्रसन्नता और दुख के मिलेजुले भावों के साथ कर रहा हूं। मैं यहां अपने सृजक की पवित्रतम आशाओं और प्रियजनों को छोड़ रहा हूं। मैं उस जनता को छोड़ रहा हूं,जिसने अपने पुत्र की तरह मेरा स्वागत किया । इस बात से मुझे गहरी पीडा हो रही है। मैं संघर्ष के अग्रिम स्थलों में उस विश्वास को ले जा रहा हूं,जो मैनें आपसे सीखा। जहां कहीं भी हो—मैं साम्राज्यवाद के विरुद्ध लडने के लिए अपनी जनता के अदम्य क्रांतिकारी उत्साह और पवित्र कर्तव्य भावना को अपने साथ ले जा रहा हूं। यह सोचकर मुझे प्रसन्न्ता होती है और विछोह की गहरी पीडा को झेलने का साहस भी मिलता है।
मैं एक बार फिर से घोषित करता हूं कि मैने क्यूबा को अपने उत्तरदायित्व से मुक्त कर दिया है। केवल एक बात को छोडकर जो उसके उदाहरण से ही पैदा होती है। यदि मेरा अंतिम क्षण मुझे किसी और आकाश के नीचे पाता है तो अंतिम विचार इस जनता और खास तौर पर आपके संबंध में होगा। मैं आपकी शिक्षा और आपके उदाहरण के लिए कृतज्ञ हूं और अपने कार्यों के अंतिम परिणामों को लेकर विश्वासपात्र बनने का प्रयास करता रहूंगा।
मैं क्रातिं के लिए विदेशी नीति से जुड़ा माना जाता हूं। और मैं उसे जारी रखूंगा। मैं जहां भी रहूंगा एक क्यूबाई क्रांतिकारी के उत्तरदायित्व को अनुभव करता रहूंगा और उसी के मुताबिक व्यवहार करुंगा। मुझे इस बात का कोई मलाल नहीं है कि मैं अपने बच्चों और पत्नी के लिए कोई संपति नहीं छोड रहा हूं। मुझे खुशी है कि ऐसा हुआ। मैं उनके लिए कोई मांग नहीं करता,क्योंकि मैं जानता हूं कि उनके जरूरी खर्च और शिक्षा की व्यवस्था राज्य करेगा।
मैं आपसे और अपनी जनता से बहुत कुछ कहना चाहूंगा। लेकिन मुझे लगता है कि यह सब अनावश्यक है। मैं जो कुछ कहना चाहता हूं,शब्द उसे अभिव्यक्त करने में असमर्थ हैं और मैं नहीं सोचता कि बेकार की मुहावरेबाजी का कोई मूल्य है।
सदा विजय के मार्ग पर ! या तो देश या मौत!
पूरे क्रांतिकारी भावना के साथ मैं आपको गले लगाता हूं
-चे
अप्रैल,1965
इसी पत्र के जवाब में क्यूबा के कंपोजर कार्लोस प्यूबोला ने एक गीत लिखा Hasta Siempre।
Until Always [English]
We learned to love you
from the heights of history
with the sun of your bravery
you laid siege to death
Chorus:
The deep (or beloved) transparency of your presence
became clear here
Commandante Che Guevara
Your glorious and strong hand
fires at history
when all of Santa Clara
awakens to see you
Chorus
You come burning the winds
with spring suns
to plant the flag
with the light of your smile
Chorus
Your revolutionary love
leads you to a new undertaking
where they are awaiting the firmness
of your liberating arm
Chorus
We will carry on
as we did along with you
and with Fidel we say to you:
Until Always, Commandante!
Chorus
Wednesday, October 3, 2007
सम्राज्यवाद की विचारधारा

-पॉल एम स्वीजी
वित्तीय पूंजी की विचारधारा उदारवाद से बिल्कुल उलट होती है। वित्तीय पूंजी स्वतन्त्रता ही नहीं प्रभुत्व भी चाहती है। वैसे इसमें किसी पूंजीपति को व्यक्तिगत तौर पर तो आजादी का स्वाद नहीं मिलता लेकिन उसके संगठन की मांग हमेशा बनी रहती है। वित्तीय पूंजी की प्रतियोगिता की अराजकता से घृणा करती है और संगठन की इच्छा पर जोर देती है, ताकि प्रतियोगिता केवल ऊपरी स्तर पर ही संभव हो सके। इसे प्राप्त करने और ताकत बढ़ाने के लिए राज्य संरक्षित एक घरेलू बाजार की उसे गारंटी चाहिए। राज्य सत्ता की ऐसी ही कुछ जरूरत उसे विदेशी बाजारों पर कब्जे के लिए भी होती है। जाहिर है इसके लिए उसे राजनैतिक रूप से एक बेहद मजबूत राज्य भी चाहिए। जिसकी वाणिज्यिक नीतियों पर किसी और राज्य का दखल संभव न हो और उसके विरोधी के हितों को नजरंदाज किया जा सके।
इसके लिए एक ऐसा राज्य चाहिए जो देश के बाहर के वित्तीय पूंजी के महत्व को बखूबी पहचानता हो और साथ ही छोटे राज्यों से अनुकूल समझौते कराने में राजनैतिक ताकत का भी प्रयोग करता हो। यानी वह पूरी दुनिया को निवेश के लिए तैयार कर सके। कुल मिलाकर वित्तीय पूंजी को ऐसे राज्य की जरूरत होती है जो विस्तार की नीति पर चलने और नए उपनिवेश तैयार करने में सक्षम हो। जबकि उदारवाद को देखें तो वह राज्य शक्ति के ऐसे इस्तेमाल राजनीति का विरोधी था और वह अभिजात तन्त्र और अधिकारीतन्त्र की पुरानी ताकत के खिलाफ केवल अपने प्रभुत्व को सुनिश्चित करने की इच्छा तक ही सीमित था। राज्य की शक्ति के इस उपकरण का दायरा उदारवाद ने बहुत छोटा कर दिया था, जबकि वित्तीय पूंजी के लिए राजनीतिक ताकत के इस्तेमाल की कोई सीमा नही है। कई बार तो यह देखने को भी मिला है कि थलसेना और जलसेना की बड़ी लागत वाले मुहिम में भी शक्तिशाली पूंजीपति समूहों को बडे एकाधिकारिक लाभों के साथ किसी एक महत्वपूर्ण बाजार के लिए सीधेतौर पर कभी आश्वस्त नही किया।
विस्तार की नीति की मांग बुर्जुआ के सम्पूर्ण विश्वदृष्टि की कायापलट कर देती है। बुर्जुआ अब शान्त और मानवीय नहीं रह जाता। पुराने स्वतन्त्र व्यापारी केवल बेहतर आर्थिक नीति के तर्ज पर मुक्त व्यापार में विश्वास नहीं करते थे, बल्कि इसे शान्ति के एक युग की शुरुआत मानते थे। वित्तीय पूंजी शुरुआत से ही ऐसी किसी धारणा को नहीं मानती। यह पूंजीपति के हितों के सौहार्द में विश्वास नहीं करती। उसे पता है कि प्रतिस्पर्द्धात्मक संघर्ष सत्ता के लिए लड़ी जाने वाली राजनैतिक लडाई के ज्यादा नजदीक ले जाता है। यहां शान्ति का आदर्श को लकवा मार जाता है। मानवीय आदर्श की जगह राज्य की सत्ता और शक्ति आ जाती है। हालांकि कई बार यह आधुनिक राज्य की उत्पत्ति के क्रम में राष्ट्रों के बीच प्रतिस्पर्धात्मक एकता की ओर भी ले गई। इस राष्ट्रीय आकांक्षा ने राज्य के भौगोलिक सीमा की तरह राष्ट्र के निर्माण में भी इस्तेमाल किया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि इसने प्रत्येक राष्ट्र के अधिकार को स्वयं अपने राज्य के ढांचे के दायरे में मान्यता दी। राज्य की सीमाओं को राष्ट्र की प्राकृतिक सीमाओं के रूप में देखा गया। यही से एक राष्ट्र ने दूसरे पर प्रभुत्व स्थापित करने की ओर कदम बढ़ाना शुरू कर दिया। दुनिया पर अधिपत्य की ख्वाहिश का सपना कुछ राष्ट्रों के लिए आदर्श रूप ले लिया और इसे लेकर तगड़ी प्रतिस्पर्धा जन्म लेने लगी। इस प्रतिस्पर्धा ने असीमित रूप धारण किया और यह पूंजी लाभ के लिए होने वाली प्रतिस्पर्द्धा में तब्दील होती गई। पूंजी विश्व विजेता बन जाती है और प्रत्येक नयी विजित भूमि के साथ कुछ नयी सीमाओं को तय करती रही है। ये और बात है कि उसी वक्त उनके अतिक्रमण की योजना भी तय हो जाती है।
यह प्रतिस्पर्द्धा एक आर्थिक अनिवार्यता बन जाती है,क्योकि इसमें कोई भी रुकावट वित्तीय पूंजी के लाभ को घटाती है। वह प्रतियोगिता की योग्यता को कम करती है और अन्ततः यह महज बड़े आर्थिक क्षेत्र का पिछलग्गू बनकर उभरता है। आर्थिक रुप से स्थापित राष्ट्रों के लिहाज से विचारों का यह खाका न्याय संगत है। यह प्रत्येक राष्ट्र के राजनैतिक स्व-निर्धारण और स्वतन्त्रता के अधिकार को अब मान्यता नहीं देता। यह राष्ट्रीयताओं की समानता के लोकतान्त्रिक विश्वास की अभिव्यक्ति भी नहीं रह जाता उसकी जगह यह एकाधिकार के आर्थिक लाभ के लिए अनुकूल जगह के रूप में प्रचारित किया जाता है। इस बात को किसी न किसी राष्ट्र को अपने पर आरोपित करना होता है। चूंकि विदेशी राष्ट्रों की अधीनता का स्रोत ताकत है लिहाजा नैसर्गिक रुप में प्रभुत्वशाली राष्ट्र को यह लगने लगता है कि वह अपने विशेष प्राकृतिक गुणों पर या कहें तो अपने नस्लीय विशिष्टता पर अपने आधिपत्य स्वामी का ऋणी बन चुका है और यहीं से नस्लीय विचारधारा का वित्तीय पूंजी से गठजोड़ होता है। जो सत्ता वासना के लिए एक वैज्ञानिक आवरण के साथ दिखाई पड़ता है। यह अपने इस क्रियाकलाप को बुहत ही जरूरी और उसकी अनिवार्यता को बढ़चढ़कर प्रदर्शित करता है। समानता के लोकतान्त्रिक आदर्श को हटाकर आधिपत्य का कुलीनतंत्र वाला आदर्श बैठ जाता है। जहां विदेश नीति के मुद्दे पर यही आदर्श पूरे राष्ट्र को समाहित करता हुआ प्रतीत होता है,वहीं आन्तरिक मामलों में श्रमिक वर्ग के विरोधी के रूप में आधिपत्य के विचारों को सहयोग और बल प्रदान करता है।
कुल मिलाकर सम्राज्यवाद की विचारधारा पुराने उदार आदर्शों की कब्र पर पैदा होती है। यह उदारवाद की निष्कपटता का उपहास करते हुए आ धमकती है। यह माया नहीं तो और क्या है कि हितों के सौहार्द और पूंजीवादी संघर्ष के संसार में हथियारों की श्रेष्ठता ही अकेले निर्णय करती है। यहां शाश्वत शान्ति के लिए तो राज्य की ओर देखना होता है लेकिन हर वक्त एक अन्तर्राष्ट्रीय कानून का उपदेश भी गुंजता रहता है। यह सब उस वक्त चल रहा होता है जब लोगों के भाग्य का निर्णय केवल एक खास ताकत कर रही होती है। इसे अव्वल दर्जे की मुर्खता नहीं तो और क्या कहेंगे कि एक राज्य में मौजूद वैधानिक संबधों को उसकी सीमाओं से कही आगे बढ़ाने की इच्छा व्यक्त की जा रही हो। यह गैर जिम्मेदाराना व्यापारिक रुकावट एक मानवीय मुखौटे के भीतर से पेश की जा रही थी और उसने मजदूरों के बीच एक भ्रम पैदा किया। सामाजिक सुधारों की खोज घरों से शुरू हुई और शोषण के तरीके ने एक तार्किक जामा ओढ़ लिया। उपनिवेशों के मौजूदा अनुबंधित दासता को हटाने के नाम पर इसने चोर दरवाजे से अनिवार्य दासता स्थापित कर दी। वैसे भी शास्वत न्याय तो एक प्यारा सपना है!हम दुनिया को कैसे जीत सकते हैं जब तक हम धर्म को हासिल करने के लिए प्रतियोगिता का इन्तजार करना चाहते हैं?
अनु-दीपू राय
Friday, September 28, 2007
भगत सिंह का वर्तमान भारत
बंत सिंह पंजाब के मानसा जिले के एक दलित गायक और वामपंथी संघर्ष के साथी हैं। उनकी नाबालिग बेटी के साथ सन् 2000 में उनके गांव के जमींदार गुंडो ने बलात्कार किया। इसके खिलाफ जब उन्होने आवाज उठाई तो जमींदारों ने उनपर कई बार हमला किया। ऐसे ही एक हमले के बाद उन्होने हाथ और पैर खो दिया। इस प्रताड़ना के बावजूद बंत सिंह को संघर्ष की विचारधारा और प्रतिरोधी तेवर पर यकीन है....
Thursday, September 27, 2007
पिस्तौल और बम इंकलाब नहीं लाते

उद्देश्य को नजरअंदाज कर देने पर संसार के बड़े-बड़े सेनापति भी साधारण हत्यारे नजर आएंगे
-भगत सिंह
माई लॉर्ड, हम न वकील हैं, न अंग्रेजी विशेषज्ञ और न हमारे पास डिगरियां हैं। इसलिए हमसे शानदार भाषणों की आशा न की जाए। हमारी प्रार्थना है कि हमारे बयान की भाषा संबंधी त्रुटियों पर ध्यान न देते हुए, उसके वास्तवकि अर्थ को समझने का प्रयत्न किया जाए। दूसरे तमाम मुद्दों को अपने वकीलों पर छोड़ते हुए मैं स्वयं एक मुद्दे पर अपने विचार प्रकट करूंगा। यह मुद्दा इस मुकदमे में बहुत महत्वपूर्ण है। मुद्दा यह है कि हमारी नीयत क्या थी और हम किस हद तक अपराधी हैं।
विचारणीय यह है कि असेंबली में हमने जो दो बम फेंके, उनसे किसी व्यक्ति को शारीरिक या आर्थिक हानि नहीं हुई। इस दृष्टिकोण से हमें जो सजा दी गई है, वह कठोरतम ही नहीं, बदला लेने की भावना से भी दी गई है। यदि दूसरे दृष्टिकोण से देखा जाए, तो जब तक अभियुक्त की मनोभावना का पता न लगाया जाए, उसके असली उद्देश्य का पता ही नहीं चल सकता। यदि उद्देश्य को पूरी तरह भुला दिया जाए, तो किसी के साथ न्याय नहीं हो सकता, क्योंकि उद्देश्य को नजरों में न रखने पर संसार के बड़े-बड़े सेनापति भी साधारण हत्यारे नजर आएंगे। सरकारी कर वसूल करने वाले अधिकारी चोर, जालसाज दिखाई देंगे और न्यायाधीशों पर भी कत्ल करने का अभियोग लगेगा। इस तरह सामाजिक व्यवस्था और सभ्यता खून-खराबा, चोरी और जालसाजी बनकर रह जाएगी। यदि उद्देश्य की उपेक्षा की जाए, तो किसी हुकूमत को क्या अधिकार है कि समाज के व्यक्तियों से न्याय करने को कहे? यदि उद्देश्य की उपेक्षा की जाए, तो हर धर्म प्रचारक झूठ का प्रचारक दिखाई देगा और हरेक पैगंबर पर अभियोग लगेगा कि उसने करोड़ों भोले और अनजान लोगों को गुमराह किया । यदि उद्देश्य को भुला दिया जाए, तो हजरत ईसा मसीह गड़बड़ी फैलाने वाले, शांति भंग करने वाले और विद्रोह का प्रचार करने वाले दिखाई देंगे और कानून के शब्दों में वह खतरनाक व्यक्तित्व माने जाएंगे... अगर ऐसा हो, तो मानना पड़ेगा कि इनसानियत की कुरबानियां, शहीदों के प्रयत्न, सब बेकार रहे और आज भी हम उसी स्थान पर खड़े हैं, जहां आज से बीस शताब्दियों पहले थे। कानून की दृष्टि से उद्देश्य का प्रश्न खासा महत्व रखता है।
माई लॉर्ड, इस दशा में मुझे यह कहने की आज्ञा दी जाए कि जो हुकूमत इन कमीनी हरकतों में आश्रय खोजती है, जो हुकूमत व्यक्ति के कुदरती अधिकार छीनती है, उसे जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं। अगर यह कायम है, तो आरजी तौर पर और हजारों बेगुनाहों का खून इसकी गर्दन पर है। यदि कानून उद्देश्य नहीं देखता, तो न्याय नहीं हो सकता और न ही स्थायी शांति स्थापित हो सकती है। आटे में संखिया मिलाना जुर्म नहीं, यदि उसका उद्देश्य चूहों को मारना हो। लेकिन यदि इससे किसी आदमी को मार दिया जाए, तो कत्ल का अपराध बन जाता है। लिहाजा, ऐसे कानूनों को, जो युक्ति (दलील) पर आधारित नहीं और न्याय के सिद्धांत के विरुद्ध है, उन्हें समाप्त कर देना चाहिए। ऐसे ही न्याय विरोधी कानूनों के कारण बड़े-बड़े श्रेष्ठ बौद्धिक लोगों ने बगावत के कार्य किए हैं।
हमारे मुकदमे के तथ्य बिल्कुल सादा हैं। 8 अप्रैल, 1929 को हमने सेंट्रल असेंबली में दो बम फेंके। उनके धमाके से चंद लोगों को मामूली खरोंचें आईं। चेंबर में हंगामा हुआ, सैकड़ों दर्शक और सदस्य बाहर निकल गए। कुछ देर बाद खामोशी छा गई। मैं और साथी बीके दत्त खामोशी के साथ दर्शक गैलरी में बैठे रहे और हमने स्वयं अपने को प्रस्तुत किया कि हमें गिरफ्तार कर लिया जाए। हमें गिरफ्तार कर लिया गया। अभियोग लगाए गए और हत्या करने के प्रयत्न के अपराध में हमें सजा दी गई। लेकिन बमों से 4-5 आदमियों को मामूली चोटें आईं और एक बेंच को मामूली नुकसान पहुंचा। जिन्होंने यह अपराध किया, उन्होंने बिना किसी किस्म के हस्तक्षेप के अपने आपको गिरफ्तारी के लिए पेश कर दिया। सेशन जज ने स्वीकार किया कि यदि हम भागना चाहते, तो भागने में सफल हो सकते थे। हमने अपना अपराध स्वीकार किया और अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए बयान दिया। हमें सजा का भय नहीं है। लेकिन हम यह नहीं चाहते कि हमें गलत समझा जाए। हमारे बयान से कुछ पैराग्राफ काट दिए गए हैं, यह वास्तविकता की दृष्टि से हानिकारक है।
समग्र रूप में हमारे वक्तव्य के अध्ययन से साफ होता है कि हमारे दृष्टिकोण से हमारा देश एक नाजुक दौर से गुजर रहा है। इस दशा में काफी ऊंची आवाज में चेतावनी देने की जरूरत थी और हमने अपने विचारानुसार चेतावनी दी है। संभव है कि हम गलती पर हों, हमारा सोचने का ढंग जज महोदय के सोचने के ढंग से भिन्न हो, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि हमें अपने विचार प्रकट करने की स्वीकृति न दी जाए और गलत बातें हमारे साथ जोडी जाएं।
'इंकलाब जिंदाबाद और साम्राज्यवाद मुर्दाबाद' के संबंध में हमने जो व्याख्या अपने बयान में दी, उसे उड़ा दिया गया है: हालांकि यह हमारे उद्देश्य का खास भाग है। इंकलाब जिंदाबाद से हमारा वह उद्देश्य नहीं था, जो आमतौर पर गलत अर्थ में समझा जाता है। पिस्तौल और बम इंकलाब नहीं लाते, बल्कि इंकलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है और यही चीज थी, जिसे हम प्रकट करना चाहते थे। हमारे इंकलाब का अर्थ पूंजीवादी युद्धों की मुसीबतों का अंत करना है। मुख्य उद्देश्य और उसे प्राप्त करने की प्रक्रिया समझे बिना किसी के संबंध में निर्णय देना उचित नहीं। गलत बातें हमारे साथ जोड्ना साफ अन्याय है।
इसकी चेतावनी देना बहुत आवश्यक था। बेचैनी रोज-रोज बढ़ रही है। यदि उचित इलाज न किया गया, तो रोग खतरनाक रूप ले लेगा। कोई भी मानवीय शक्ति इसकी रोकथाम न कर सकेगी। अब हमने इस तूफान का रुख बदलने के लिए यह कार्रवाई की। हम इतिहास के गंभीर अध्येता हैं। हमारा विश्वास है कि यदि सत्ताधारी शक्तियां ठीक समय पर सही कार्रवाई करतीं, तो फ्रांस और रूस की खूनी क्रांतियां न बरस पड़तीं। दुनिया की कई बड़ी-बड़ी हुकूमतें विचारों के तूफान को रोकते हुए खून-खराबे के वातावरण में डूब गइंर्। सत्ताधारी लोग परिस्थितियों के प्रवाह को बदल सकते हैं। हम पहले चेतावनी देना चाहते थे। यदि हम कुछ व्यक्तियों की हत्या करने के इच्छुक होते, तो हम अपने मुख्य उद्देश्य में विफल हो जाते। माई लॉर्ड, इस नीयत और उद्देश्य को दृष्टि में रखते हुए हमने कार्रवाई की और इस कार्रवाई के परिणाम हमारे बयान का समर्थन करते हैं। एक और नुक्ता स्पष्ट करना आवश्यक है। यदि हमें बमों की ताकत के संबंध में कतई ज्ञान न होता, तो हम पं. मोती लाल नेहरू, श्री केलकर, श्री जयकर और श्री जिन्ना जैसे सम्माननीय राष्ट्रीय व्यक्तियों की उपस्थिति में क्यों बम फेंकते? हम नेताओं के जीवन किस तरह खतरे में डाल सकते थे? हम पागल तो नहीं हैं? और अगर पागल होते, तो जेल में बंद करने के बजाय हमें पागलखाने में बंद किया जाता। बमों के संबंध में हमें निश्चित जानकारी थी। उसी कारण हमने ऐसा साहस किया। जिन बेंचों पर लोग बैठे थे, उन पर बम फेंकना कहीं आसान काम था, खाली जगह पर बमों को फेंकना निहायत मुश्किल था। अगर बम फेंकने वाले सही दिमागों के न होते या वे परेशान होते, तो बम खाली जगह के बजाय बेंचों पर गिरते। तो मैं कहूंगा कि खाली जगह के चुनाव के लिए जो हिम्मत हमने दिखाई, उसके लिए हमें इनाम मिलना चाहिए। इन हालात में, माई लार्ड, हम सोचते हैं कि हमें ठीक तरह समझा नहीं गया। आपकी सेवा में हम सजाओं में कमी कराने नहीं आए, बल्कि अपनी स्थिति स्पष्ट करने आए हैं। हम चाहते हैं कि न तो हमसे अनुचित व्यवहार किया जाए, न ही हमारे संबंध में अनुचित राय दी जाए। सजा का सवाल हमारे लिए गौण है।
Tuesday, September 25, 2007
खामोश हो गया मौन का महारथी

माइम शैली को दुनियाभर में लोकप्रिय बनानेवाले फ्रांस के कलाकार मार्सेल मार्सो नहीं रहे। 22 सितंबर को 84 साल के मार्सेल का निधन हो गया। मार्सेल ने पोस्ट-वॉर ऑडिएंस को अपने अभिनय के जरिए जिंदगी के तमाम रंग दिखाए और मौन की भाषा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। किसी आलोचक ने मार्सेल के बारे में कहा था-
वो दो मिनट में इतना असर पैदा कर देते हैं जितना कोई उपन्यासकार कई संस्करणों में नहीं कर सकता।
स्ट्रॉबर्ग के एक यहूदी कसाई परिवार में पैदा हुए मार्सेल का असली नाम था मार्सेल मैंगेल लेकिन 1940 में पूर्वी फ्रांस में जब नाजियों की घुसपैठ हुई तो वो अपने परिवार के साथ स्ट्रॉबर्ग छोड़कर साउथवेस्ट भाग गए। यहूदी मूल छुपाने के लिए उन्होने अपने नाम में मार्सो जोड़ लिया। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान मार्च 1944 में मार्सेल के पिता को गेस्टापो की ओर से गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद मार्सेल ने अपने पिता को कभी नहीं देखा। चार्ली चैप्लिन की नकल करते हुए वो अभिनय की दुनिया में आए और फिर चार्ल्स डलिन का ड्रामा स्कूल ज्वाइन किया।
1949 में मार्सेल ने Compagnie de Mime Marcel Marceau शुरू किया और बीस साल बाद उन्होने पेरिस में International School of Mime की नींव रखी। यहां वो छात्रों को माइम का प्रशिक्षण देते थे। मार्सेल ने कई फिल्मों में यादगार किरदार निभाए। Barbarella (1968) में वो पागल प्रोफेसर बने, Shanks (1974) में कठपुतलीवाला बने और फिल्म First Class (1970) में तो उन्होने सत्रह रोल निभाए। बीबीसी के लिए मार्सेल ने क्रिसमस कैरोल का माइम वर्जन तैयार किया। उन्होने तीन बार शादियां कीं और अपने पीछे वो दो बेटियों और दो बेटों को छोड़ गए हैं।
वीडियो यहां देखें...
Monday, September 24, 2007
बॉब डिलॉन-..ब्लोइंग इन द विंड
'ब्लोइंग इन द विंड' बॉब डिलॉन का लोकप्रिय और विवादित गीत है। युद्ध के खिलाफ गाया जाने वाला यह अब तक का सबसे पॉपुलर गीत है। लेकिन इसे सबसे ज्यादा लोकप्रियता वियतनाम वार के दौरान मिली। बॉब डिलॉन ने इसे पहली बार 16 अप्रैल 1962 को एक पब्लिक शो में गाया था।
How many roads must a man walk down
Before you call him a man?
Yes, 'n' how many seas must a white dove sail
Before she sleeps in the sand?
Yes, 'n' how many times must the cannon balls fly
Before they're forever banned?
The answer, my friend, is blowin' in the wind,
The answer is blowin' in the wind.
How many times must a man look up
Before he can see the sky?
Yes, 'n' how many ears must one man have
Before he can hear people cry?
Yes, 'n' how many deaths will it take till he knows
That too many people have died?
The answer, my friend, is blowin' in the wind,
The answer is blowin' in the wind.
How many years can a mountain exist
Before it's washed to the sea?
Yes, 'n' how many years can some people exist
Before they're allowed to be free?
Yes, 'n' how many times can a man turn his head,
Pretending he just doesn't see?
The answer, my friend, is blowin' in the wind,
The answer is blowin' in the wind.
How many roads must a man walk down
Before you call him a man?
Yes, 'n' how many seas must a white dove sail
Before she sleeps in the sand?
Yes, 'n' how many times must the cannon balls fly
Before they're forever banned?
The answer, my friend, is blowin' in the wind,
The answer is blowin' in the wind.
How many times must a man look up
Before he can see the sky?
Yes, 'n' how many ears must one man have
Before he can hear people cry?
Yes, 'n' how many deaths will it take till he knows
That too many people have died?
The answer, my friend, is blowin' in the wind,
The answer is blowin' in the wind.
How many years can a mountain exist
Before it's washed to the sea?
Yes, 'n' how many years can some people exist
Before they're allowed to be free?
Yes, 'n' how many times can a man turn his head,
Pretending he just doesn't see?
The answer, my friend, is blowin' in the wind,
The answer is blowin' in the wind.
Sunday, September 23, 2007
कितनी मौतों के बाद जागेगा आदर्शवादी मन

“मै 10 साल का इराकी लड़का हूं । मेरे पिता बगदाद के किसी अनजान जेल में बंद हैं। बड़ा भाई गायब है और मां के पास पैसे नहीं है। छोटी बहन और मां की हालत ऐसी नहीं कि उन्हे घर में अकेला छोड़ा जा सके। आसपास पड़ोस की ज्यादातर महिलाएं अब गुमसुम रहती हैं क्योंकि उनमें से ज्यादातर के पति या भाई या तो मारे जा चुके हैं या फिर गायब हैं। मन में अजीब सा सन्नाटा है जिसे मनहूस धमाके और आग अक्सर तोड़ते रहते हैं। मेरा प्यारा कुत्ता गायब है..स्कूल कई साल से बंद हैं मेरे ज्यादातर दोस्त अपने परिवार के साथ इराक छोड़कर जा चुके हैं, मेरे पास बस अब पिता और भाई की तलाश की जिम्मेदारी है”-असमाद, इराकी बालक
इराकी नागरिकों की मौत की बढ़ती संख्या को लेकर उदासीनता बढ़ती जा रही है। कोई नहीं जानता कि अब तक अमेरिकी कब्जे के बाद कितने इराकी मारे गए। फरवरी में एपी पोल के मुताबिक आम अमेरिकी मानता है कि कि करीब 9,990 इराकियों की मौत हुई है। लेकिन ताजा साक्ष्य इस बात के गवाह हैं कि यह संख्या इसका डेढ़ सौ गुना है। समाचार रिपोर्ट्स की टोल कार्ड से अंदाजा लगाया गया है कि अमेरिकी हमले के बाद 75 हजार इराकी लोग मारे जा चुके हैं।
लेकिन चौंकाने वाली खबर रही है युद्ध पर केंद्रित हाल की हार्वर्ड कॉनफ्रेंस। इसमें युद्ध की विभिषिका झेल रहे हैं 13 देशों के ऊपर चर्चा की गई। जिसमें कहा गया कि युद्धरत देश की 80 % हत्याओं की खबर किसी माध्यम के जरिए सामने नहीं आ पाती। भरोसा न हो तो इराकी शहर नजफ के इस अधिकारी के बयान पर गौर करिए। मिडिल इस्ट ऑन लाइन पर छपे बयान में कहा गया है कि शहर में करीब 40 हजार ऐसी लाशें है जिनकी अभी तक पहचान नहीं हो पाई है। इसी तर्ज पर 5 सितंबर को सी स्पॉन पर दिए अपने ताजा भाषण में अमेरिका में इराकी राजदूत समीर सुमैदा बताते हैं कि उनके देश में 5 लाख युवतियां विधवा बन चुकी हैं। पिछले दिनों ब्रिटेन की जानी मानी सर्वे एजेंसी ORB ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि इराक के 22% परिवार के सदस्य गायब हैं।
लेकिन पथराई आंखों से खबर देखने वाले के इतर इराकी लोगों ने अपनी लड़ाई को अलग रंग देना शुरू कर दिया है। इराक को सांप्रदायिक हिंसा से ग्रस्त देश बताने वाले लोगों को इराकी नेशनल रेजिस्टेंश फोरम नाम का एक धर्मनिरपेक्ष संगठन चुनौती देने लगा है। शिया- सुन्नी मिलीशिया ने अमेरिकी कब्जे के खिलाफ अब एक होकर युद्ध लड़ने का फैसला किया है। यह एकता ऐसे समय में बनी है जब अमेरिकी नीति निर्माताओं ने बगदाद को बीच से बांटने के लिए दीवार उठाने की सलाह दी थी। उसका तर्क था कि शिया-सुन्नी के बीच तनाव दूर करने में यह दीवार मदद करेगी। हालांकी सीएनएन या बाकी पश्चिम परस्त मीडिया इस ज्वाइंट रेजिस्टेंश फोरम की खबर को ब्लैक आउट किया है। क्योंकि उसके फंड सोर्स के लिए यह एक बुरी खबर है। इराक नेशनल रेजिस्टेंश फोरम के सदस्य अबु मुहम्मद के मुताबिक अभी तक वे अमेरिकी सेना और उसके सहयोगियों से लड़ने पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहे थे लेकिन उन्हे लगा कि इराक आपसी लड़ाई के चलते इस युद्ध को नहीं जीत सकता। इस फोरम ने अपना उद्देश्य पूर्ण स्वतंत्रता और मुक्ति घोषित कर दिया है।
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