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Friday, September 28, 2007

भगत सिंह का वर्तमान भारत

बंत सिंह पंजाब के मानसा जिले के एक दलित गायक और वामपंथी संघर्ष के साथी हैं। उनकी नाबालिग बेटी के साथ सन् 2000 में उनके गांव के जमींदार गुंडो ने बलात्कार किया। इसके खिलाफ जब उन्होने आवाज उठाई तो जमींदारों ने उनपर कई बार हमला किया। ऐसे ही एक हमले के बाद उन्होने हाथ और पैर खो दिया। इस प्रताड़ना के बावजूद बंत सिंह को संघर्ष की विचारधारा और प्रतिरोधी तेवर पर यकीन है....

Thursday, September 27, 2007

पिस्तौल और बम इंकलाब नहीं लाते


उद्देश्य को नजरअंदाज कर देने पर संसार के बड़े-बड़े सेनापति भी साधारण हत्यारे नजर आएंगे
-भगत सिंह
माई लॉर्ड, हम न वकील हैं, न अंग्रेजी विशेषज्ञ और न हमारे पास डिगरियां हैं। इसलिए हमसे शानदार भाषणों की आशा न की जाए। हमारी प्रार्थना है कि हमारे बयान की भाषा संबंधी त्रुटियों पर ध्यान न देते हुए, उसके वास्तवकि अर्थ को समझने का प्रयत्न किया जाए। दूसरे तमाम मुद्दों को अपने वकीलों पर छोड़ते हुए मैं स्वयं एक मुद्दे पर अपने विचार प्रकट करूंगा। यह मुद्दा इस मुकदमे में बहुत महत्वपूर्ण है। मुद्दा यह है कि हमारी नीयत क्या थी और हम किस हद तक अपराधी हैं।
विचारणीय यह है कि असेंबली में हमने जो दो बम फेंके, उनसे किसी व्यक्ति को शारीरिक या आर्थिक हानि नहीं हुई। इस दृष्टिकोण से हमें जो सजा दी गई है, वह कठोरतम ही नहीं, बदला लेने की भावना से भी दी गई है। यदि दूसरे दृष्टिकोण से देखा जाए, तो जब तक अभियुक्त की मनोभावना का पता न लगाया जाए, उसके असली उद्देश्य का पता ही नहीं चल सकता। यदि उद्देश्य को पूरी तरह भुला दिया जाए, तो किसी के साथ न्याय नहीं हो सकता, क्योंकि उद्देश्य को नजरों में न रखने पर संसार के बड़े-बड़े सेनापति भी साधारण हत्यारे नजर आएंगे। सरकारी कर वसूल करने वाले अधिकारी चोर, जालसाज दिखाई देंगे और न्यायाधीशों पर भी कत्ल करने का अभियोग लगेगा। इस तरह सामाजिक व्यवस्था और सभ्यता खून-खराबा, चोरी और जालसाजी बनकर रह जाएगी। यदि उद्देश्य की उपेक्षा की जाए, तो किसी हुकूमत को क्या अधिकार है कि समाज के व्यक्तियों से न्याय करने को कहे? यदि उद्देश्य की उपेक्षा की जाए, तो हर धर्म प्रचारक झूठ का प्रचारक दिखाई देगा और हरेक पैगंबर पर अभियोग लगेगा कि उसने करोड़ों भोले और अनजान लोगों को गुमराह किया । यदि उद्देश्य को भुला दिया जाए, तो हजरत ईसा मसीह गड़बड़ी फैलाने वाले, शांति भंग करने वाले और विद्रोह का प्रचार करने वाले दिखाई देंगे और कानून के शब्दों में वह खतरनाक व्यक्तित्व माने जाएंगे... अगर ऐसा हो, तो मानना पड़ेगा कि इनसानियत की कुरबानियां, शहीदों के प्रयत्न, सब बेकार रहे और आज भी हम उसी स्थान पर खड़े हैं, जहां आज से बीस शताब्दियों पहले थे। कानून की दृष्टि से उद्देश्य का प्रश्न खासा महत्व रखता है।
माई लॉर्ड, इस दशा में मुझे यह कहने की आज्ञा दी जाए कि जो हुकूमत इन कमीनी हरकतों में आश्रय खोजती है, जो हुकूमत व्यक्ति के कुदरती अधिकार छीनती है, उसे जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं। अगर यह कायम है, तो आरजी तौर पर और हजारों बेगुनाहों का खून इसकी गर्दन पर है। यदि कानून उद्देश्य नहीं देखता, तो न्याय नहीं हो सकता और न ही स्थायी शांति स्थापित हो सकती है। आटे में संखिया मिलाना जुर्म नहीं, यदि उसका उद्देश्य चूहों को मारना हो। लेकिन यदि इससे किसी आदमी को मार दिया जाए, तो कत्ल का अपराध बन जाता है। लिहाजा, ऐसे कानूनों को, जो युक्ति (दलील) पर आधारित नहीं और न्याय के सिद्धांत के विरुद्ध है, उन्हें समाप्त कर देना चाहिए। ऐसे ही न्याय विरोधी कानूनों के कारण बड़े-बड़े श्रेष्ठ बौद्धिक लोगों ने बगावत के कार्य किए हैं।
हमारे मुकदमे के तथ्य बिल्कुल सादा हैं। 8 अप्रैल, 1929 को हमने सेंट्रल असेंबली में दो बम फेंके। उनके धमाके से चंद लोगों को मामूली खरोंचें आईं। चेंबर में हंगामा हुआ, सैकड़ों दर्शक और सदस्य बाहर निकल गए। कुछ देर बाद खामोशी छा गई। मैं और साथी बीके दत्त खामोशी के साथ दर्शक गैलरी में बैठे रहे और हमने स्वयं अपने को प्रस्तुत किया कि हमें गिरफ्तार कर लिया जाए। हमें गिरफ्तार कर लिया गया। अभियोग लगाए गए और हत्या करने के प्रयत्न के अपराध में हमें सजा दी गई। लेकिन बमों से 4-5 आदमियों को मामूली चोटें आईं और एक बेंच को मामूली नुकसान पहुंचा। जिन्होंने यह अपराध किया, उन्होंने बिना किसी किस्म के हस्तक्षेप के अपने आपको गिरफ्तारी के लिए पेश कर दिया। सेशन जज ने स्वीकार किया कि यदि हम भागना चाहते, तो भागने में सफल हो सकते थे। हमने अपना अपराध स्वीकार किया और अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए बयान दिया। हमें सजा का भय नहीं है। लेकिन हम यह नहीं चाहते कि हमें गलत समझा जाए। हमारे बयान से कुछ पैराग्राफ काट दिए गए हैं, यह वास्तविकता की दृष्टि से हानिकारक है।
समग्र रूप में हमारे वक्तव्य के अध्ययन से साफ होता है कि हमारे दृष्टिकोण से हमारा देश एक नाजुक दौर से गुजर रहा है। इस दशा में काफी ऊंची आवाज में चेतावनी देने की जरूरत थी और हमने अपने विचारानुसार चेतावनी दी है। संभव है कि हम गलती पर हों, हमारा सोचने का ढंग जज महोदय के सोचने के ढंग से भिन्न हो, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि हमें अपने विचार प्रकट करने की स्वीकृति न दी जाए और गलत बातें हमारे साथ जोडी जाएं।
'इंकलाब जिंदाबाद और साम्राज्यवाद मुर्दाबाद' के संबंध में हमने जो व्याख्या अपने बयान में दी, उसे उड़ा दिया गया है: हालांकि यह हमारे उद्देश्य का खास भाग है। इंकलाब जिंदाबाद से हमारा वह उद्देश्य नहीं था, जो आमतौर पर गलत अर्थ में समझा जाता है। पिस्तौल और बम इंकलाब नहीं लाते, बल्कि इंकलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है और यही चीज थी, जिसे हम प्रकट करना चाहते थे। हमारे इंकलाब का अर्थ पूंजीवादी युद्धों की मुसीबतों का अंत करना है। मुख्य उद्देश्य और उसे प्राप्त करने की प्रक्रिया समझे बिना किसी के संबंध में निर्णय देना उचित नहीं। गलत बातें हमारे साथ जोड्ना साफ अन्याय है।
इसकी चेतावनी देना बहुत आवश्यक था। बेचैनी रोज-रोज बढ़ रही है। यदि उचित इलाज न किया गया, तो रोग खतरनाक रूप ले लेगा। कोई भी मानवीय शक्ति इसकी रोकथाम न कर सकेगी। अब हमने इस तूफान का रुख बदलने के लिए यह कार्रवाई की। हम इतिहास के गंभीर अध्येता हैं। हमारा विश्वास है कि यदि सत्ताधारी शक्तियां ठीक समय पर सही कार्रवाई करतीं, तो फ्रांस और रूस की खूनी क्रांतियां न बरस पड़तीं। दुनिया की कई बड़ी-बड़ी हुकूमतें विचारों के तूफान को रोकते हुए खून-खराबे के वातावरण में डूब गइंर्। सत्ताधारी लोग परिस्थितियों के प्रवाह को बदल सकते हैं। हम पहले चेतावनी देना चाहते थे। यदि हम कुछ व्यक्तियों की हत्या करने के इच्छुक होते, तो हम अपने मुख्य उद्देश्य में विफल हो जाते। माई लॉर्ड, इस नीयत और उद्देश्य को दृष्टि में रखते हुए हमने कार्रवाई की और इस कार्रवाई के परिणाम हमारे बयान का समर्थन करते हैं। एक और नुक्ता स्पष्ट करना आवश्यक है। यदि हमें बमों की ताकत के संबंध में कतई ज्ञान न होता, तो हम पं. मोती लाल नेहरू, श्री केलकर, श्री जयकर और श्री जिन्ना जैसे सम्माननीय राष्ट्रीय व्यक्तियों की उपस्थिति में क्यों बम फेंकते? हम नेताओं के जीवन किस तरह खतरे में डाल सकते थे? हम पागल तो नहीं हैं? और अगर पागल होते, तो जेल में बंद करने के बजाय हमें पागलखाने में बंद किया जाता। बमों के संबंध में हमें निश्चित जानकारी थी। उसी कारण हमने ऐसा साहस किया। जिन बेंचों पर लोग बैठे थे, उन पर बम फेंकना कहीं आसान काम था, खाली जगह पर बमों को फेंकना निहायत मुश्किल था। अगर बम फेंकने वाले सही दिमागों के न होते या वे परेशान होते, तो बम खाली जगह के बजाय बेंचों पर गिरते। तो मैं कहूंगा कि खाली जगह के चुनाव के लिए जो हिम्मत हमने दिखाई, उसके लिए हमें इनाम मिलना चाहिए। इन हालात में, माई लार्ड, हम सोचते हैं कि हमें ठीक तरह समझा नहीं गया। आपकी सेवा में हम सजाओं में कमी कराने नहीं आए, बल्कि अपनी स्थिति स्पष्ट करने आए हैं। हम चाहते हैं कि न तो हमसे अनुचित व्यवहार किया जाए, न ही हमारे संबंध में अनुचित राय दी जाए। सजा का सवाल हमारे लिए गौण है।

Tuesday, September 25, 2007

खामोश हो गया मौन का महारथी


माइम शैली को दुनियाभर में लोकप्रिय बनानेवाले फ्रांस के कलाकार मार्सेल मार्सो नहीं रहे। 22 सितंबर को 84 साल के मार्सेल का निधन हो गया। मार्सेल ने पोस्ट-वॉर ऑडिएंस को अपने अभिनय के जरिए जिंदगी के तमाम रंग दिखाए और मौन की भाषा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। किसी आलोचक ने मार्सेल के बारे में कहा था-
वो दो मिनट में इतना असर पैदा कर देते हैं जितना कोई उपन्यासकार कई संस्करणों में नहीं कर सकता।
स्ट्रॉबर्ग के एक यहूदी कसाई परिवार में पैदा हुए मार्सेल का असली नाम था मार्सेल मैंगेल लेकिन 1940 में पूर्वी फ्रांस में जब नाजियों की घुसपैठ हुई तो वो अपने परिवार के साथ स्ट्रॉबर्ग छोड़कर साउथवेस्ट भाग गए। यहूदी मूल छुपाने के लिए उन्होने अपने नाम में मार्सो जोड़ लिया। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान मार्च 1944 में मार्सेल के पिता को गेस्टापो की ओर से गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद मार्सेल ने अपने पिता को कभी नहीं देखा। चार्ली चैप्लिन की नकल करते हुए वो अभिनय की दुनिया में आए और फिर चार्ल्स डलिन का ड्रामा स्कूल ज्वाइन किया।
1949 में मार्सेल ने Compagnie de Mime Marcel Marceau शुरू किया और बीस साल बाद उन्होने पेरिस में International School of Mime की नींव रखी। यहां वो छात्रों को माइम का प्रशिक्षण देते थे। मार्सेल ने कई फिल्मों में यादगार किरदार निभाए। Barbarella (1968) में वो पागल प्रोफेसर बने, Shanks (1974) में कठपुतलीवाला बने और फिल्म First Class (1970) में तो उन्होने सत्रह रोल निभाए। बीबीसी के लिए मार्सेल ने क्रिसमस कैरोल का माइम वर्जन तैयार किया। उन्होने तीन बार शादियां कीं और अपने पीछे वो दो बेटियों और दो बेटों को छोड़ गए हैं।
वीडियो यहां देखें...

Monday, September 24, 2007

बॉब डिलॉन-..ब्लोइंग इन द विंड

'ब्लोइंग इन द विंड' बॉब डिलॉन का लोकप्रिय और विवादित गीत है। युद्ध के खिलाफ गाया जाने वाला यह अब तक का सबसे पॉपुलर गीत है। लेकिन इसे सबसे ज्यादा लोकप्रियता वियतनाम वार के दौरान मिली। बॉब डिलॉन ने इसे पहली बार 16 अप्रैल 1962 को एक पब्लिक शो में गाया था।



How many roads must a man walk down
Before you call him a man?
Yes, 'n' how many seas must a white dove sail
Before she sleeps in the sand?
Yes, 'n' how many times must the cannon balls fly
Before they're forever banned?
The answer, my friend, is blowin' in the wind,
The answer is blowin' in the wind.

How many times must a man look up
Before he can see the sky?
Yes, 'n' how many ears must one man have
Before he can hear people cry?
Yes, 'n' how many deaths will it take till he knows
That too many people have died?
The answer, my friend, is blowin' in the wind,
The answer is blowin' in the wind.

How many years can a mountain exist
Before it's washed to the sea?
Yes, 'n' how many years can some people exist
Before they're allowed to be free?
Yes, 'n' how many times can a man turn his head,
Pretending he just doesn't see?
The answer, my friend, is blowin' in the wind,
The answer is blowin' in the wind.

Sunday, September 23, 2007

कितनी मौतों के बाद जागेगा आदर्शवादी मन


“मै 10 साल का इराकी लड़का हूं । मेरे पिता बगदाद के किसी अनजान जेल में बंद हैं। बड़ा भाई गायब है और मां के पास पैसे नहीं है। छोटी बहन और मां की हालत ऐसी नहीं कि उन्हे घर में अकेला छोड़ा जा सके। आसपास पड़ोस की ज्यादातर महिलाएं अब गुमसुम रहती हैं क्योंकि उनमें से ज्यादातर के पति या भाई या तो मारे जा चुके हैं या फिर गायब हैं। मन में अजीब सा सन्नाटा है जिसे मनहूस धमाके और आग अक्सर तोड़ते रहते हैं। मेरा प्यारा कुत्ता गायब है..स्कूल कई साल से बंद हैं मेरे ज्यादातर दोस्त अपने परिवार के साथ इराक छोड़कर जा चुके हैं, मेरे पास बस अब पिता और भाई की तलाश की जिम्मेदारी है”-असमाद, इराकी बालक

इराकी नागरिकों की मौत की बढ़ती संख्या को लेकर उदासीनता बढ़ती जा रही है। कोई नहीं जानता कि अब तक अमेरिकी कब्जे के बाद कितने इराकी मारे गए। फरवरी में एपी पोल के मुताबिक आम अमेरिकी मानता है कि कि करीब 9,990 इराकियों की मौत हुई है। लेकिन ताजा साक्ष्य इस बात के गवाह हैं कि यह संख्या इसका डेढ़ सौ गुना है। समाचार रिपोर्ट्स की टोल कार्ड से अंदाजा लगाया गया है कि अमेरिकी हमले के बाद 75 हजार इराकी लोग मारे जा चुके हैं।
लेकिन चौंकाने वाली खबर रही है युद्ध पर केंद्रित हाल की हार्वर्ड कॉनफ्रेंस। इसमें युद्ध की विभिषिका झेल रहे हैं 13 देशों के ऊपर चर्चा की गई। जिसमें कहा गया कि युद्धरत देश की 80 % हत्याओं की खबर किसी माध्यम के जरिए सामने नहीं आ पाती। भरोसा न हो तो इराकी शहर नजफ के इस अधिकारी के बयान पर गौर करिए। मिडिल इस्ट ऑन लाइन पर छपे बयान में कहा गया है कि शहर में करीब 40 हजार ऐसी लाशें है जिनकी अभी तक पहचान नहीं हो पाई है। इसी तर्ज पर 5 सितंबर को सी स्पॉन पर दिए अपने ताजा भाषण में अमेरिका में इराकी राजदूत समीर सुमैदा बताते हैं कि उनके देश में 5 लाख युवतियां विधवा बन चुकी हैं। पिछले दिनों ब्रिटेन की जानी मानी सर्वे एजेंसी ORB ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि इराक के 22% परिवार के सदस्य गायब हैं।
लेकिन पथराई आंखों से खबर देखने वाले के इतर इराकी लोगों ने अपनी लड़ाई को अलग रंग देना शुरू कर दिया है। इराक को सांप्रदायिक हिंसा से ग्रस्त देश बताने वाले लोगों को इराकी नेशनल रेजिस्टेंश फोरम नाम का एक धर्मनिरपेक्ष संगठन चुनौती देने लगा है। शिया- सुन्नी मिलीशिया ने अमेरिकी कब्जे के खिलाफ अब एक होकर युद्ध लड़ने का फैसला किया है। यह एकता ऐसे समय में बनी है जब अमेरिकी नीति निर्माताओं ने बगदाद को बीच से बांटने के लिए दीवार उठाने की सलाह दी थी। उसका तर्क था कि शिया-सुन्नी के बीच तनाव दूर करने में यह दीवार मदद करेगी। हालांकी सीएनएन या बाकी पश्चिम परस्त मीडिया इस ज्वाइंट रेजिस्टेंश फोरम की खबर को ब्लैक आउट किया है। क्योंकि उसके फंड सोर्स के लिए यह एक बुरी खबर है। इराक नेशनल रेजिस्टेंश फोरम के सदस्य अबु मुहम्मद के मुताबिक अभी तक वे अमेरिकी सेना और उसके सहयोगियों से लड़ने पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहे थे लेकिन उन्हे लगा कि इराक आपसी लड़ाई के चलते इस युद्ध को नहीं जीत सकता। इस फोरम ने अपना उद्देश्य पूर्ण स्वतंत्रता और मुक्ति घोषित कर दिया है।

Saturday, September 22, 2007

क्योंकि चुप रहना अपराध है!

-दिलीप मंडल

बोलने की आजादी खतरे में है। बोलने की आजादी भारतीय संदर्भ में हमेशा से सीमित रही है। लेकिन वो सीमित आजादी भी खतरे में हैं। इस बार भी बोलने की आजादी पर खतरा सिस्टम की तरफ से ही आया है। और सिस्टम के खास अंग की बात करें तो खतरा फिलहाल न्यायपालिका की ओर से आता दिख रहा है। वो लोग भोले हैं जो न्यायपालिका को व्यवस्था से अलग करके देखते हैं। आज की भारतीय व्यवस्था ज्यादातर अलोकप्रिय कदम न्यायपालिका के जरिए ही उठा रही है।



1974 में पत्रकारों और लेखकों के बड़े हिस्से ने एक गलती की थी। उसका कलंक एक पूरी पीढ़ी ढो रही है। इमरजेंसी की पत्रकारिता के बारे में जब भी चर्चा होती है तो एक जुमला हर बार दोहराया जाता है - पत्रकारों को घुटनों के बल बैठने को कहा गया और वो रेंगने लगे। इंडियन एक्सप्रेस जैसे अपवाद उस समय कम थे, जिन्होंने अपना संपादकीय खाली छोड़ने का दम दिखाया था। क्या 2007 में हम वैसा ही किस्सा दोहराने जा रहा हैं?
बात मिडडे में छपी कुछ खबरों से शुरू हुई। जिसके बारे में खुद ही संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने मिड डे के चार पत्रकारों को अदालत की अवमानना का दोषी करार देते हुए उन्हें चार-चार महीने की कैद की सजा सुनाई है। इन पत्रकारों में एडीटर एम के तयाल , रेजिडेंट एडीटर वितुशा ओबेरॉय, कार्टूनिस्ट इरफान और तत्कालीन प्रकाशक ए के अख्तर हैं। अदालत में इस बात पर कोई जिरह नहीं हुई कि उन्होंने जो लिखा वो सही था या गलत। अदालत को लगा कि ये अदालत की अवमानना है इसलिए जेल की सजा सुना दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले की सुनवाई रोकने की अपील ठुकरा दी है। कार्टूनिस्ट इरफान ने कहा है कि चालीस साल कैद की सजा सुनाई जाए तो भी वो भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्टून बनाते रहेंगे।

मिड डे ने भारत के माननीय मुख्य न्याधीश के बारे में एक के बाद एक कई रिपोर्ट छापी। रिपोर्ट तीन चार स्थापनाओं पर आधारित थी।

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पूर्व मुख्य न्यायाधीश के सरकारी निवास के पते से उनके बेटों ने कंपनी चलाई।
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उनके बेटों का एक ऐसे बिल्डर से संबंध है, जिसे दिल्ली में सीलिंग के बारे में सब्बरवाल के समय सुप्रीम कोर्ट के दिए गए आदेशों से फायदा मिला। सीलिंग से उजड़े कुछ स्टोर्स को उस मॉल में जाना पड़ा जो उस बिल्डर ने बनाया था।
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सब्बरवाल के बेटों को उत्तर प्रदेश सरकार ने नोएडा में सस्ती दर पर प्लॉट दिए। ऐसा तब किया गया जबकि मुलायम सिंह यादव और अमर सिंह के मुकदमे सुप्रीम कोर्ट में चल रहे थे।
ये सारी खबरें मिड-डे की इन लिंक्स पर कुछ समय पहले तक थी। लेकिन अब नहीं हैं। आपको कहीं मिले तो बताइएगा।


http://mid-day.com/News/City/2007/June/159164.htm

http://mid-day.com/News/City/2007/June/159165.htm

http://mid-day.com/News/City/2007/June/159169.htm

http://mid-day.com/News/City/2007/June/159168.htm

http://mid-day.com/News/City/2007/June/159163.htm

http://mid-day.com/News/City/2007/June/159172.htm

अदालत के फैसले से पहले मिड-डे ने एक साहसिक टिप्पणी अपने अखबार में छापी है। उसके अंश आप नीचे पढ़ सकते हैं।

-हमें आज सजा सुनाई जाएगी। इसलिए नहीं कि हमने चोरी की, या डाका डाला, या झूठ बोला। बल्कि इसलिए कि हमने सच बोला। हमने जो कुछ लिखा उसके दस्तावेजी सबूत साथ में छापे गए।

हमने छापा कि जिस समय दिल्ली में सब्बरवाल के नेतृत्व वाले सुप्रीम कोर्ट के बेंच के फैसले से सीलिंग चल रही थी, तब कुछ मॉल डेवलपर्स पैसे कमा रहे थे। ऐसे ही मॉल डेवलपर्स के साथ सब्बरवाल के बेटों के संबंध हैँ। सुप्रीम कोर्ट आदेश दे रहा था कि रेसिडेंशियल इलाकों में दफ्तर और दुकानें नहीं चल सकतीं। लेकिन खुद सब्बरवाल के घर से उनके बेटों की कंपनियों के दफ्तर चल रहे थे।

लेकिन हाईकोर्ट ने सब्बरवाल के बारे में मिडडे की खबर पर कुछ भी नहीं कहा है।

मिड डे ने लिखा है कि हम अदालत के आदेश को स्वीकार करेंगे लेकिन सजा मिलने से हमारा सिर शर्म से नहीं झुकेगा।

अदालत आज एक ऐसी पत्रकारिता के खिलाफ खड़ी है, जो उस पर उंगली उठाने का साहस कर रही है। लेकिन पिछले कई साल से अदालतें लगातार मजदूरों, कमजोर तबकों के खिलाफ यथास्थिति के पक्ष में फैसले दे रही है। आज हालत ये है कि जो सक्षम नहीं है, वो अदालत से न्याय पाने की उम्मीद भी नहीं कर रहा है। पिछले कुछ साल में अदालतों ने खुद को देश की तमाम संस्थाओं के ऊपर स्थापित कर लिया है। 1993 के बाद से हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति में सरकार की भूमिका खत्म हो चुकी है। माननीय न्यायाधीश ही अब माननीय न्यायाधीशों की नियुक्ति के बारे में अंतिम फैसला करते हैँ। बड़ी अदालतों के जज को हटाने की प्रक्रिया लंगभग असंभव है। जस्टिस रामास्वामी के केस में इस बात को पूरे देश ने देखा है।

और सरकार को इस पर एतराज भी नहीं है। सरकार और पूरे पॉलिटिकल क्लास को इस बात पर भी एतराज नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने संविधान में जोडी़ गई नवीं अनुसूचि को न्यायिक समीक्षा के दायरे में शामिल कर दिया है। ये अनुसूचि संविधान में इसलिए जोड़ी गई थी ताकि लोक कल्याण के कानूनों को न्यायिक समीक्षा से बचाया जा सके। आज आप देश की बड़ी अदालतों से सामाजिक न्याय के पक्ष में किसी आदेश की उम्मीद नहीं कर सकते। सरकार को इसपर एतराज नहीं है क्योंकि सरकार खुद भी यथास्थिति की रक्षक है और अदालतें देश में ठीक यही काम कर रही हैँ।

कई दर्जन मामलों में मजदूरों और कर्मचारियों के लिए नो वर्क-नो पे का आदेश जारी करने वाली अदालत, आरक्षण के खिलाफ हड़ताल करके मरीजों को वार्ड से बाहर जाने को मजबूर करने वाले डॉक्टरों को नो वर्क का पेमेंट करने को कहती है। और जब स्वास्थ्य मंत्रालय कहता है कि अदालत इसके लिए आदेश दे तो सुप्रीम कोर्ट कहता है कि इन डॉक्टरों को वेतन दिया जाए,लेकिन हमारे इस आदेश को अपवाद माना जाए। यानी इस आदेश का हवाला देकर कोई और हड़ताली अपने लिए वेतन की मांग नहीं कर सकता है। ये आदेश एक ऐसी संस्था देती है जिस पर ये देखने की जिम्मेदारी है कि देश कायदे-कानून से चल रहा है।

अदालतों में भ्रष्टाचार के मामले आम है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशन की इस बारे में पूरी रिपोर्ट है। लगातार ऐसे किस्से सामने आ रहे हैं। लेकिन उसकी रिपोर्टिंग मुश्किल है।

तो ऐसे में निरंकुश होती न्यापालिका के खिलाफ आप क्या कर सकते हैँ। तेलुगू कवि और राजनीतिक कार्यकर्ता वरवर राव ने हमें एक कार्यक्रम में बताया था कि इराक पर जब अमेरिका हमला करने वाला था तो वहां के युद्ध विरोधियों ने एक दिन खास समय पर अपने अपने स्थान पर खड़े होकर आसमान की ओर हाथ करके कहा था- ठहरो। ऐसा करने वाले लोगों की संख्या कई लाख बताई जाती है। इससे अमेरिकी हमला नहीं रुका। लेकिन ऐसा करने वाले बुद्धिजीवियों के कारण आज कोई ये नहीं कह सकता कि जब अमेरिका कुछ गलत करने जा रहा था तो वहां के सारे लोग बुश के साथ थे। क्या हममे है वो दम ?

Thursday, September 20, 2007

फैज..आज बाजार में...

फैज की शायरी का वीडियो.. ...साथ में आप फैज, नायरा नूर की आवाज में भी ....

Monday, September 17, 2007

आदिवासी स्त्रियां और विद्रोह




"तुम हमारा जिक्र इतिहास में नहीं पाओगे

क्योंकि हमने अपने को इतिहास के विरूद्ध दे दिया है

छूटी हुई जगह दिखे जहां-तहां

या दबी हुई चीख का अहसास हो

समझना हम वहीं मौजूद थे.


दरअसल कवि विजय देवनारायण साही की ये पंक्तियां विद्रोह हैं, गैर बराबरी वाले समाज से, सड़ चुकीं सांस्कृतिक मान्यताओं से, लड़ती गिरती और गिर-गिर कर लड़ने को आतुर आधी दुनिया का। जिसमें आदिवासी महिलाएं सबसे आगे हैं, इसलिए जाहिर है ये इतिहास और इतिहासकारों के द्वारा आदिवासी महिलाओं के मुक्तकामी विद्रोहों को दबाने की तमाम कोशिशों के खिलाफ भी हैं। ऐसा नहीं है कि इतिहासकारों और मानवशास्त्रियों ने अंग्रेजों और सामंतों के विरूद्ध आदिवासी विद्रोहों का वर्णन नहीं किया है, परंतु इन विद्रोहों में पुरुषों के साथ कन्धे से कन्धा मिला कर चलने वाली आदिवासी महिलाओं का जिक्र तक नहीं है (और ये बात परंपरागत इतिहास कारों को तो छोड़िए, मार्क्सवादी इतिहासकारों के लेखन में भी मौजूद है)। ऐसा लगता है कि आदिवासी महिलाएं इन विद्रोहों से पूर्णतः अछूती रहीं हैं। दरअसल, लोकतांत्रिक सामाजिक सरोकारों में तो उन्हें हाशिए पर रखा गया है, जबकि सामंती सरोकारों को पूरा करने के मामले में वो धूरी बनी रही हैं। इसका असर इतिहास लेखन में माहिलाओं की स्थिति में भी देखने को मिलता है। इतिहास लेखन में वो सांस्कृतिक नजरिए से ही देखी गई हैं, उसमें भी उनकी परपंरा निर्वाहनी की ही भूमिका अधिक नजर आती है। वे गीतों में तो हैं, लेकिन शोक गीतों में। सामाजिक विद्रोह के ताने-बाने में वे हैं भी, तो धूमिल छवि के साथ। उन्हें याद करना भी गवांरा नहीं समझा जाता । और समझा भी जाता है, तो महज रिसर्च और कुछ उद्देश्यहीन एनजीओ लेखन में वे देखने को मिलती हैं, जहां उनके विद्रोह को हवा नहीं दी जाती, उलटी दिशा दी जाती है । यानी कुल मिला कर उनका विद्गोह पुरुष सहभागिता में स्त्री की अनिवार्य सेवा बन कर रह जाता है, लेकिन ये हकीकत नहीं है। किसी भी समाज में विद्रोह की भूमिका में स्त्री की भूमिका बराबरी की होती है।
अब यह जरूर है कि बहुत से लोगों को स्त्री की भूमिका किसी भी आंदोलन या विद्रोह में कमतर ही लगती है। इसकी कई वजहें हैं। इसमें सबसे खास है स्त्री के विद्रोह को मुखर अभिव्यक्ति का नहीं मिलना। दरअसल उसका विद्रोह इतना आम है कि उस पर किसी की नजर नहीं पड़ती, क्योंकी उसका यह विद्रोह समूची सत्ता और व्यवस्था के खिलाफ होता है। फिर चाहे वह आदिवासी समाज हो या फिर सामंती समाज। हां, इतिहास में उनकी चर्चा जरूर होती है, लेकिन उन्हीं महिलाओं की, जिन्होंने सत्ता या विद्रोही पुरुष नेता की मनचाही स्थिति पाने के लिए कदमताल किया हो। सफल मार्क्सवादी विद्रोह भी इसी मामले में असफल रहे हैं कि वे कोई ऐसी व्यवस्था नहीं गढ़ पाए जहां स्त्री मुक्त हो अपनी तमाम मानसिक, जैविक और आर्थिक जरूरतों के मुताबिक। ऐसे में आदिवासी स्त्रियों का विद्रोह और अध्ययन की दरकार रखता है।

वैसे भी हमारे यहां स्त्री विद्रोह लेखन काफी कम हुआ है और जो उपलब्ध भी हैं, उसमें मुख्यत मध्यवर्ग और ऊँची जाति की स्त्रियों का ही जिक्र ज्यादा मिलता है। ऐसे में आदिवासी स्त्री विद्रोह पर लिखना या लिखा हुआ पढ़ना किसी सौभाग्य से कम नहीं लगता। यह बात भी ध्यान देने की है कि आदिवासी समाज पर लिखने वाले लेखकों, मानवशास्त्रियों, समाजशास्त्रियों व इतिहासकारों ने आदिवासी विद्रोहों की कड़ी में विद्रोही महिलाओं मसलन सिनगी दई, कइली दई, देवमनी और माकी जैसी स्त्री विद्रोही चरित्रों की चर्चा तक नहीं की है। उन्होंने सिद्धो कान्हू या बिरसा मुन्डा या धरती आबा की तरह उन्हें स्थापित करना तो दूर, इनकी सहभागिता का उल्लेख भी नहीं किया है। लगता है जैसे कि वो आदिवासी समाज की इन स्त्री चरित्रों से लगभग अंजान ही रहे हैं, लेकिन तमाम बुद्धिजीवियों की इस अनदेखी के बाद भी ये विद्रोही महिलाऐं आदिवासी समाज की ऐतिहासिक धरोहर —लोकगीतों और दन्त-कथाओं— में इतिहास को चुनौती देती नज़र आ ही जाती हैं। यही नहीं, उन्होंने इन विद्रोहों के दौरान अपने लिए और अपने संघर्षों को जिंदा रखने के लिए अपने ही तरह के प्रतीक गढ़े हैं। उनके लिए भाल लगी बिंदी किसी सुलज्जा स्त्री का श्रृंगार नहीं है, बल्कि अपनी ताकत से हासिल की गई (जनी शिकार) निशानी है। यानी सदियों से औरत के लिए तय किए गए प्रतीक कैसे उसके विद्रोहों के चलते उसकी मुक्ति का प्रतीक बन गए, इसे देखने के लिए आदिवासी विद्रोहों को समझना एक बेहतर माध्यम हो सकता है और ये आदिवासी विद्रोह और उनमें महिलाओं की भूमिका महज किसी तात्कालिक कारणों का हल तलाशना नहीं थी, बल्कि इसमें सामूहिक जीवन पद्धति, जंगल-जमीन, संस्कृति के साथ-साथ अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई ज्यादा थी। झारखंड की उरांव आदिवासी औरतों ने लगभग चार सौ साल पहले सिनगी दई और कइली दई के नेतृत्व में रोहतासगढ़ के दुर्ग पर तुर्क सेना के दांत खट्टे कर दिए थे। किवदन्ती यह है कि सरहुल पर्व में जब पुरुष मादक पेय हडिया पीकर नशे में डूबे थे(यह भी कहा जाता है कि पुरुष जंगल गये हुए थे)। उस दौरान रोहतासगढ़ किले पर फतह करने के लिए तीन बार तुर्क सेना का हमला हुआ। तीनों बार स्त्रियों ने सैनिक वेश धारण किए और तुर्क सेना को परास्त किया। इस विजय की खुशी में आज भी आदिवासी औरतें बराबरी का सपना बांटती जनी शिकार करती हैं और ऐतिहासिक विजय की याद दिलाती हैं। बारह सालों में एक बार जनी शिकार का पर्व झारखंड के उरांव जनजाति में मनाया जाता है और स्त्रियाँ दुश्मन के प्रतीक स्वरूप जंगली जानवरों का शिकार करती हैं। उनके द्वारा माथे पर तीन लकीरों का गोदना भी इसी विजय की याद में गुदवाया जाता है।

इतिहासकारों का दावा है कि माहात्मा गांधी को सत्याग्रह और असहयोग का रास्ता टाना भगतों ने दिखाया, लैकिन हकीकत ये है कि इसमें देवमनी उर्फ बंधनी के योगदान को नकारा नहीं जा सकता.. वह टाना भगत आंदोलन की एक स्तंभ रही है। जब बाहरी लोगों और अंग्रेजों ने आदिवासियों को उनकी भूमि से बेदखल कर दिया और हजारों एकड़ जमीन छीन ली तब विशुनपुर के चिंगरी गांव में पैदा हुए जतरा उरांव ने टाना आंदोलन चलाया। जतरा भगत ने उरांव समाज से कहा कि असहयोग करो। ड ा. सुदेशना बसु ने अपनी किताब पीजेंट रसिस्टेंट इन बिहार में लिखा है कि चिंगरी में टाना भगत आंदोलन का परचम लहराने वाले जतरा भगत को 1914 में गिरफ्तार किया गया और उन्हे लगभग डेढ़ साल कैद की सजा हुई, लेकिन टाना भगतों का असहयोग आंदोलन बिखरा नहीं। बटकुरी गांव के जतरा भगत की पत्नी देवमनी-बंधनी ने आंदोलन की बागडोर अपने हाथ में ले ली। देवमनी के नेतृत्व में टाना भगत आंदोलन अपनी ऊंचाई पर पहुंचा। इस दौरान इस आंदोलन का विस्तार आज के बिहार और झारखंड के पूरे क्षेत्र पर हुआ। देवमनी के नेतृत्व में हजारों आदिवासी टाना पंथी हुए। देवमनी की बहादुरी और समर्पण से अंग्रेजों तथा जमींदारों में खौफ पैदा हुआ। जंगल-जमीन के लिए गोलबंदी बढ़ी। और आदिवासी लोग बड़ी संख्या में जल-जंगल और जमीन के लिए संघर्ष के लिए एकजुट हुए। बिरसा विद्रोह के कदम-दर-कदम संघर्ष में स्त्रियों की व्यापक भागीदारी पाई गई। विद्रोह के नायक बिरसा मुंडा का साथ स्त्रियों ने कभी नही छोड़ा, खासकर चम्पी और साली ने। चम्पी और साली नामक विद्रोही स्त्रियाँ हर समय बिरसा की मदद के लिए साथ रहीं। इसी प्रकार बिरसा विद्रोह के महान सह-नायक गया मुंडा और उनकी पत्नी माकी के साथ पूरे परिवार के बलिदान को कैसे भुलाया जा सकता है जिन्होने आदिवासी समाज की अस्मिता की रक्षा के लिए अंग्रेजों से लोहा लिया अंग्रेजों से जुझते हुए गया मुंडा शहीद हुए और उनका पूरा परिवार जिनमें उनकी बेटियां और बहुएं भी थीं को अंग्रेजों ने जेल में कैद किया।
जब अंग्रेजों ने आदिवासी क्षेत्रों में पावं पसारना शुरू किया तो पहाड़-जंगल, नदी, गांव में बसा जीवन बाहरी लोगों के हस्तक्षेप से अशांत होने लगा तब विरोध की शुरुआत हुई। विद्रोहों की इस कड़ी में 1855-56 का संताल हूल आदिवासी संघर्ष का ऐसा उदाहरण है, जिसमें आत्मगौरव और आत्मसम्मान के लिए दस हजार से ज्यादा लोगों ने बलिदान दिया। संथाल औरतों का अपहरण और कुकर्म के बाद उनकी हत्या, अंग्रेजों, महाजनों तथा जमींदारों के अत्याचारों से आदिवासी त्रस्त हो उठे, तो औरत-मर्द सभी ने हथियार उठा लिया। संथाल हूल के नायक सिद्धो, कानू, चांद, भैरव के साथ उनकी दो बहनें फूलो और झानो ने योद्धा की भांति अंग्रेजों से मुकाबला किया। रात को तलवार लेकर निकली फूलो और झानो ने अंग्रेजों के शिविर में जाकर 21 सिपाहियों की हत्या कर दी। संथाल लोकगीतों मे आज भी इन बहादुर औरतों को याद किया जाता है।
ये वे आंदोलन हैं जिन्हें लोग किसी न किसी रूप में जानते हैं और हमारी सरकारें भी किसी न किसी रूप में इन आंदोलनों पर अपनी उत्सवधर्मिता दिखलाती रही हैं, लेकिन दुखद यह है कि ये आंदोलन पुरुष आंदोलनकारियों के सन्दर्भ में ही याद किए जाते हैं। नींव की ईंट की तरह स्त्री आदिवासी विद्रोही इसमें सिरे से गायब नजर आती हैं। बावजूद इसके प्रकृति से साक्षात् संवाद करने वाली इन वनपुत्रियों के विद्रोहों की और कई मिसाले हैं, जिनको याद किया जाना बेहद जरूरी है। केरल के कुरुचिया आदिवासी महिला नीली ने अंग्रेजी फौज से संघर्ष के लिए अलग महिला सेना का गठन किया था। उड़ीसा की आदिवासी महिलाओं ने यह निश्चय किया कि जिस रूप के पीछे ये गोरे लुटेरे हमारा अपहरण करते है, हम उस रूप को ही नष्ट कर देगें और उन्होने अपने चेहरे पर आड़ी तिरछी रेखाऐं गुदवा लीं। ऐसे ही भील आदिवासी आंदोलनों में भी स्त्रियों ने बढ़कर-चढ़कर हिस्सा लिया । फूलो, झानो, माकी, थीगी, नागी, लेंबू, साली, चंपी, देवमनी,सिनगी,कइली दई जैसे आदिवासी स्त्रियों की एक लंबी फेहरिश्त है, जिनके नाम गुमनामी में ही सही, आदिवासी लोकगीतों, कथाओं और प्रतीकों में किसी न किसी रूप में जिंदा हैं।
आदिवासी समाजों में महिलाएं हमारे सभ्य कहे जाने वाले समाज से ज्यादा स्वतंत्र रही हैं,इसका कारण उत्पादन प्रक्रिया में उनकी सीधी भागीदारी का होना है।यही कारण भी रहा कि उन्होने बाहरी विपत्तियों का सामना अपने पुरुष साथियों के साथ कन्धे से कन्धा मिला कर किया।चाहे मामला जंगल का हो या जमीन का,अस्मिता का हो या रोटी का,वे हर विद्रोह में उपस्थित रहीं हैं।यह बात और है कि उन्हे इतिहास में जगह नही दी गई। पर यह भी सच्चाई है कि इतिहास उनके बिना अधूरा रहा है और रहेगा।
# नूतन मौर्या