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Saturday, September 22, 2007

क्योंकि चुप रहना अपराध है!

-दिलीप मंडल

बोलने की आजादी खतरे में है। बोलने की आजादी भारतीय संदर्भ में हमेशा से सीमित रही है। लेकिन वो सीमित आजादी भी खतरे में हैं। इस बार भी बोलने की आजादी पर खतरा सिस्टम की तरफ से ही आया है। और सिस्टम के खास अंग की बात करें तो खतरा फिलहाल न्यायपालिका की ओर से आता दिख रहा है। वो लोग भोले हैं जो न्यायपालिका को व्यवस्था से अलग करके देखते हैं। आज की भारतीय व्यवस्था ज्यादातर अलोकप्रिय कदम न्यायपालिका के जरिए ही उठा रही है।



1974 में पत्रकारों और लेखकों के बड़े हिस्से ने एक गलती की थी। उसका कलंक एक पूरी पीढ़ी ढो रही है। इमरजेंसी की पत्रकारिता के बारे में जब भी चर्चा होती है तो एक जुमला हर बार दोहराया जाता है - पत्रकारों को घुटनों के बल बैठने को कहा गया और वो रेंगने लगे। इंडियन एक्सप्रेस जैसे अपवाद उस समय कम थे, जिन्होंने अपना संपादकीय खाली छोड़ने का दम दिखाया था। क्या 2007 में हम वैसा ही किस्सा दोहराने जा रहा हैं?
बात मिडडे में छपी कुछ खबरों से शुरू हुई। जिसके बारे में खुद ही संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने मिड डे के चार पत्रकारों को अदालत की अवमानना का दोषी करार देते हुए उन्हें चार-चार महीने की कैद की सजा सुनाई है। इन पत्रकारों में एडीटर एम के तयाल , रेजिडेंट एडीटर वितुशा ओबेरॉय, कार्टूनिस्ट इरफान और तत्कालीन प्रकाशक ए के अख्तर हैं। अदालत में इस बात पर कोई जिरह नहीं हुई कि उन्होंने जो लिखा वो सही था या गलत। अदालत को लगा कि ये अदालत की अवमानना है इसलिए जेल की सजा सुना दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले की सुनवाई रोकने की अपील ठुकरा दी है। कार्टूनिस्ट इरफान ने कहा है कि चालीस साल कैद की सजा सुनाई जाए तो भी वो भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्टून बनाते रहेंगे।

मिड डे ने भारत के माननीय मुख्य न्याधीश के बारे में एक के बाद एक कई रिपोर्ट छापी। रिपोर्ट तीन चार स्थापनाओं पर आधारित थी।

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पूर्व मुख्य न्यायाधीश के सरकारी निवास के पते से उनके बेटों ने कंपनी चलाई।
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उनके बेटों का एक ऐसे बिल्डर से संबंध है, जिसे दिल्ली में सीलिंग के बारे में सब्बरवाल के समय सुप्रीम कोर्ट के दिए गए आदेशों से फायदा मिला। सीलिंग से उजड़े कुछ स्टोर्स को उस मॉल में जाना पड़ा जो उस बिल्डर ने बनाया था।
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सब्बरवाल के बेटों को उत्तर प्रदेश सरकार ने नोएडा में सस्ती दर पर प्लॉट दिए। ऐसा तब किया गया जबकि मुलायम सिंह यादव और अमर सिंह के मुकदमे सुप्रीम कोर्ट में चल रहे थे।
ये सारी खबरें मिड-डे की इन लिंक्स पर कुछ समय पहले तक थी। लेकिन अब नहीं हैं। आपको कहीं मिले तो बताइएगा।


http://mid-day.com/News/City/2007/June/159164.htm

http://mid-day.com/News/City/2007/June/159165.htm

http://mid-day.com/News/City/2007/June/159169.htm

http://mid-day.com/News/City/2007/June/159168.htm

http://mid-day.com/News/City/2007/June/159163.htm

http://mid-day.com/News/City/2007/June/159172.htm

अदालत के फैसले से पहले मिड-डे ने एक साहसिक टिप्पणी अपने अखबार में छापी है। उसके अंश आप नीचे पढ़ सकते हैं।

-हमें आज सजा सुनाई जाएगी। इसलिए नहीं कि हमने चोरी की, या डाका डाला, या झूठ बोला। बल्कि इसलिए कि हमने सच बोला। हमने जो कुछ लिखा उसके दस्तावेजी सबूत साथ में छापे गए।

हमने छापा कि जिस समय दिल्ली में सब्बरवाल के नेतृत्व वाले सुप्रीम कोर्ट के बेंच के फैसले से सीलिंग चल रही थी, तब कुछ मॉल डेवलपर्स पैसे कमा रहे थे। ऐसे ही मॉल डेवलपर्स के साथ सब्बरवाल के बेटों के संबंध हैँ। सुप्रीम कोर्ट आदेश दे रहा था कि रेसिडेंशियल इलाकों में दफ्तर और दुकानें नहीं चल सकतीं। लेकिन खुद सब्बरवाल के घर से उनके बेटों की कंपनियों के दफ्तर चल रहे थे।

लेकिन हाईकोर्ट ने सब्बरवाल के बारे में मिडडे की खबर पर कुछ भी नहीं कहा है।

मिड डे ने लिखा है कि हम अदालत के आदेश को स्वीकार करेंगे लेकिन सजा मिलने से हमारा सिर शर्म से नहीं झुकेगा।

अदालत आज एक ऐसी पत्रकारिता के खिलाफ खड़ी है, जो उस पर उंगली उठाने का साहस कर रही है। लेकिन पिछले कई साल से अदालतें लगातार मजदूरों, कमजोर तबकों के खिलाफ यथास्थिति के पक्ष में फैसले दे रही है। आज हालत ये है कि जो सक्षम नहीं है, वो अदालत से न्याय पाने की उम्मीद भी नहीं कर रहा है। पिछले कुछ साल में अदालतों ने खुद को देश की तमाम संस्थाओं के ऊपर स्थापित कर लिया है। 1993 के बाद से हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति में सरकार की भूमिका खत्म हो चुकी है। माननीय न्यायाधीश ही अब माननीय न्यायाधीशों की नियुक्ति के बारे में अंतिम फैसला करते हैँ। बड़ी अदालतों के जज को हटाने की प्रक्रिया लंगभग असंभव है। जस्टिस रामास्वामी के केस में इस बात को पूरे देश ने देखा है।

और सरकार को इस पर एतराज भी नहीं है। सरकार और पूरे पॉलिटिकल क्लास को इस बात पर भी एतराज नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने संविधान में जोडी़ गई नवीं अनुसूचि को न्यायिक समीक्षा के दायरे में शामिल कर दिया है। ये अनुसूचि संविधान में इसलिए जोड़ी गई थी ताकि लोक कल्याण के कानूनों को न्यायिक समीक्षा से बचाया जा सके। आज आप देश की बड़ी अदालतों से सामाजिक न्याय के पक्ष में किसी आदेश की उम्मीद नहीं कर सकते। सरकार को इसपर एतराज नहीं है क्योंकि सरकार खुद भी यथास्थिति की रक्षक है और अदालतें देश में ठीक यही काम कर रही हैँ।

कई दर्जन मामलों में मजदूरों और कर्मचारियों के लिए नो वर्क-नो पे का आदेश जारी करने वाली अदालत, आरक्षण के खिलाफ हड़ताल करके मरीजों को वार्ड से बाहर जाने को मजबूर करने वाले डॉक्टरों को नो वर्क का पेमेंट करने को कहती है। और जब स्वास्थ्य मंत्रालय कहता है कि अदालत इसके लिए आदेश दे तो सुप्रीम कोर्ट कहता है कि इन डॉक्टरों को वेतन दिया जाए,लेकिन हमारे इस आदेश को अपवाद माना जाए। यानी इस आदेश का हवाला देकर कोई और हड़ताली अपने लिए वेतन की मांग नहीं कर सकता है। ये आदेश एक ऐसी संस्था देती है जिस पर ये देखने की जिम्मेदारी है कि देश कायदे-कानून से चल रहा है।

अदालतों में भ्रष्टाचार के मामले आम है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशन की इस बारे में पूरी रिपोर्ट है। लगातार ऐसे किस्से सामने आ रहे हैं। लेकिन उसकी रिपोर्टिंग मुश्किल है।

तो ऐसे में निरंकुश होती न्यापालिका के खिलाफ आप क्या कर सकते हैँ। तेलुगू कवि और राजनीतिक कार्यकर्ता वरवर राव ने हमें एक कार्यक्रम में बताया था कि इराक पर जब अमेरिका हमला करने वाला था तो वहां के युद्ध विरोधियों ने एक दिन खास समय पर अपने अपने स्थान पर खड़े होकर आसमान की ओर हाथ करके कहा था- ठहरो। ऐसा करने वाले लोगों की संख्या कई लाख बताई जाती है। इससे अमेरिकी हमला नहीं रुका। लेकिन ऐसा करने वाले बुद्धिजीवियों के कारण आज कोई ये नहीं कह सकता कि जब अमेरिका कुछ गलत करने जा रहा था तो वहां के सारे लोग बुश के साथ थे। क्या हममे है वो दम ?

Thursday, September 20, 2007

फैज..आज बाजार में...

फैज की शायरी का वीडियो.. ...साथ में आप फैज, नायरा नूर की आवाज में भी ....

Monday, September 17, 2007

आदिवासी स्त्रियां और विद्रोह




"तुम हमारा जिक्र इतिहास में नहीं पाओगे

क्योंकि हमने अपने को इतिहास के विरूद्ध दे दिया है

छूटी हुई जगह दिखे जहां-तहां

या दबी हुई चीख का अहसास हो

समझना हम वहीं मौजूद थे.


दरअसल कवि विजय देवनारायण साही की ये पंक्तियां विद्रोह हैं, गैर बराबरी वाले समाज से, सड़ चुकीं सांस्कृतिक मान्यताओं से, लड़ती गिरती और गिर-गिर कर लड़ने को आतुर आधी दुनिया का। जिसमें आदिवासी महिलाएं सबसे आगे हैं, इसलिए जाहिर है ये इतिहास और इतिहासकारों के द्वारा आदिवासी महिलाओं के मुक्तकामी विद्रोहों को दबाने की तमाम कोशिशों के खिलाफ भी हैं। ऐसा नहीं है कि इतिहासकारों और मानवशास्त्रियों ने अंग्रेजों और सामंतों के विरूद्ध आदिवासी विद्रोहों का वर्णन नहीं किया है, परंतु इन विद्रोहों में पुरुषों के साथ कन्धे से कन्धा मिला कर चलने वाली आदिवासी महिलाओं का जिक्र तक नहीं है (और ये बात परंपरागत इतिहास कारों को तो छोड़िए, मार्क्सवादी इतिहासकारों के लेखन में भी मौजूद है)। ऐसा लगता है कि आदिवासी महिलाएं इन विद्रोहों से पूर्णतः अछूती रहीं हैं। दरअसल, लोकतांत्रिक सामाजिक सरोकारों में तो उन्हें हाशिए पर रखा गया है, जबकि सामंती सरोकारों को पूरा करने के मामले में वो धूरी बनी रही हैं। इसका असर इतिहास लेखन में माहिलाओं की स्थिति में भी देखने को मिलता है। इतिहास लेखन में वो सांस्कृतिक नजरिए से ही देखी गई हैं, उसमें भी उनकी परपंरा निर्वाहनी की ही भूमिका अधिक नजर आती है। वे गीतों में तो हैं, लेकिन शोक गीतों में। सामाजिक विद्रोह के ताने-बाने में वे हैं भी, तो धूमिल छवि के साथ। उन्हें याद करना भी गवांरा नहीं समझा जाता । और समझा भी जाता है, तो महज रिसर्च और कुछ उद्देश्यहीन एनजीओ लेखन में वे देखने को मिलती हैं, जहां उनके विद्रोह को हवा नहीं दी जाती, उलटी दिशा दी जाती है । यानी कुल मिला कर उनका विद्गोह पुरुष सहभागिता में स्त्री की अनिवार्य सेवा बन कर रह जाता है, लेकिन ये हकीकत नहीं है। किसी भी समाज में विद्रोह की भूमिका में स्त्री की भूमिका बराबरी की होती है।
अब यह जरूर है कि बहुत से लोगों को स्त्री की भूमिका किसी भी आंदोलन या विद्रोह में कमतर ही लगती है। इसकी कई वजहें हैं। इसमें सबसे खास है स्त्री के विद्रोह को मुखर अभिव्यक्ति का नहीं मिलना। दरअसल उसका विद्रोह इतना आम है कि उस पर किसी की नजर नहीं पड़ती, क्योंकी उसका यह विद्रोह समूची सत्ता और व्यवस्था के खिलाफ होता है। फिर चाहे वह आदिवासी समाज हो या फिर सामंती समाज। हां, इतिहास में उनकी चर्चा जरूर होती है, लेकिन उन्हीं महिलाओं की, जिन्होंने सत्ता या विद्रोही पुरुष नेता की मनचाही स्थिति पाने के लिए कदमताल किया हो। सफल मार्क्सवादी विद्रोह भी इसी मामले में असफल रहे हैं कि वे कोई ऐसी व्यवस्था नहीं गढ़ पाए जहां स्त्री मुक्त हो अपनी तमाम मानसिक, जैविक और आर्थिक जरूरतों के मुताबिक। ऐसे में आदिवासी स्त्रियों का विद्रोह और अध्ययन की दरकार रखता है।

वैसे भी हमारे यहां स्त्री विद्रोह लेखन काफी कम हुआ है और जो उपलब्ध भी हैं, उसमें मुख्यत मध्यवर्ग और ऊँची जाति की स्त्रियों का ही जिक्र ज्यादा मिलता है। ऐसे में आदिवासी स्त्री विद्रोह पर लिखना या लिखा हुआ पढ़ना किसी सौभाग्य से कम नहीं लगता। यह बात भी ध्यान देने की है कि आदिवासी समाज पर लिखने वाले लेखकों, मानवशास्त्रियों, समाजशास्त्रियों व इतिहासकारों ने आदिवासी विद्रोहों की कड़ी में विद्रोही महिलाओं मसलन सिनगी दई, कइली दई, देवमनी और माकी जैसी स्त्री विद्रोही चरित्रों की चर्चा तक नहीं की है। उन्होंने सिद्धो कान्हू या बिरसा मुन्डा या धरती आबा की तरह उन्हें स्थापित करना तो दूर, इनकी सहभागिता का उल्लेख भी नहीं किया है। लगता है जैसे कि वो आदिवासी समाज की इन स्त्री चरित्रों से लगभग अंजान ही रहे हैं, लेकिन तमाम बुद्धिजीवियों की इस अनदेखी के बाद भी ये विद्रोही महिलाऐं आदिवासी समाज की ऐतिहासिक धरोहर —लोकगीतों और दन्त-कथाओं— में इतिहास को चुनौती देती नज़र आ ही जाती हैं। यही नहीं, उन्होंने इन विद्रोहों के दौरान अपने लिए और अपने संघर्षों को जिंदा रखने के लिए अपने ही तरह के प्रतीक गढ़े हैं। उनके लिए भाल लगी बिंदी किसी सुलज्जा स्त्री का श्रृंगार नहीं है, बल्कि अपनी ताकत से हासिल की गई (जनी शिकार) निशानी है। यानी सदियों से औरत के लिए तय किए गए प्रतीक कैसे उसके विद्रोहों के चलते उसकी मुक्ति का प्रतीक बन गए, इसे देखने के लिए आदिवासी विद्रोहों को समझना एक बेहतर माध्यम हो सकता है और ये आदिवासी विद्रोह और उनमें महिलाओं की भूमिका महज किसी तात्कालिक कारणों का हल तलाशना नहीं थी, बल्कि इसमें सामूहिक जीवन पद्धति, जंगल-जमीन, संस्कृति के साथ-साथ अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई ज्यादा थी। झारखंड की उरांव आदिवासी औरतों ने लगभग चार सौ साल पहले सिनगी दई और कइली दई के नेतृत्व में रोहतासगढ़ के दुर्ग पर तुर्क सेना के दांत खट्टे कर दिए थे। किवदन्ती यह है कि सरहुल पर्व में जब पुरुष मादक पेय हडिया पीकर नशे में डूबे थे(यह भी कहा जाता है कि पुरुष जंगल गये हुए थे)। उस दौरान रोहतासगढ़ किले पर फतह करने के लिए तीन बार तुर्क सेना का हमला हुआ। तीनों बार स्त्रियों ने सैनिक वेश धारण किए और तुर्क सेना को परास्त किया। इस विजय की खुशी में आज भी आदिवासी औरतें बराबरी का सपना बांटती जनी शिकार करती हैं और ऐतिहासिक विजय की याद दिलाती हैं। बारह सालों में एक बार जनी शिकार का पर्व झारखंड के उरांव जनजाति में मनाया जाता है और स्त्रियाँ दुश्मन के प्रतीक स्वरूप जंगली जानवरों का शिकार करती हैं। उनके द्वारा माथे पर तीन लकीरों का गोदना भी इसी विजय की याद में गुदवाया जाता है।

इतिहासकारों का दावा है कि माहात्मा गांधी को सत्याग्रह और असहयोग का रास्ता टाना भगतों ने दिखाया, लैकिन हकीकत ये है कि इसमें देवमनी उर्फ बंधनी के योगदान को नकारा नहीं जा सकता.. वह टाना भगत आंदोलन की एक स्तंभ रही है। जब बाहरी लोगों और अंग्रेजों ने आदिवासियों को उनकी भूमि से बेदखल कर दिया और हजारों एकड़ जमीन छीन ली तब विशुनपुर के चिंगरी गांव में पैदा हुए जतरा उरांव ने टाना आंदोलन चलाया। जतरा भगत ने उरांव समाज से कहा कि असहयोग करो। ड ा. सुदेशना बसु ने अपनी किताब पीजेंट रसिस्टेंट इन बिहार में लिखा है कि चिंगरी में टाना भगत आंदोलन का परचम लहराने वाले जतरा भगत को 1914 में गिरफ्तार किया गया और उन्हे लगभग डेढ़ साल कैद की सजा हुई, लेकिन टाना भगतों का असहयोग आंदोलन बिखरा नहीं। बटकुरी गांव के जतरा भगत की पत्नी देवमनी-बंधनी ने आंदोलन की बागडोर अपने हाथ में ले ली। देवमनी के नेतृत्व में टाना भगत आंदोलन अपनी ऊंचाई पर पहुंचा। इस दौरान इस आंदोलन का विस्तार आज के बिहार और झारखंड के पूरे क्षेत्र पर हुआ। देवमनी के नेतृत्व में हजारों आदिवासी टाना पंथी हुए। देवमनी की बहादुरी और समर्पण से अंग्रेजों तथा जमींदारों में खौफ पैदा हुआ। जंगल-जमीन के लिए गोलबंदी बढ़ी। और आदिवासी लोग बड़ी संख्या में जल-जंगल और जमीन के लिए संघर्ष के लिए एकजुट हुए। बिरसा विद्रोह के कदम-दर-कदम संघर्ष में स्त्रियों की व्यापक भागीदारी पाई गई। विद्रोह के नायक बिरसा मुंडा का साथ स्त्रियों ने कभी नही छोड़ा, खासकर चम्पी और साली ने। चम्पी और साली नामक विद्रोही स्त्रियाँ हर समय बिरसा की मदद के लिए साथ रहीं। इसी प्रकार बिरसा विद्रोह के महान सह-नायक गया मुंडा और उनकी पत्नी माकी के साथ पूरे परिवार के बलिदान को कैसे भुलाया जा सकता है जिन्होने आदिवासी समाज की अस्मिता की रक्षा के लिए अंग्रेजों से लोहा लिया अंग्रेजों से जुझते हुए गया मुंडा शहीद हुए और उनका पूरा परिवार जिनमें उनकी बेटियां और बहुएं भी थीं को अंग्रेजों ने जेल में कैद किया।
जब अंग्रेजों ने आदिवासी क्षेत्रों में पावं पसारना शुरू किया तो पहाड़-जंगल, नदी, गांव में बसा जीवन बाहरी लोगों के हस्तक्षेप से अशांत होने लगा तब विरोध की शुरुआत हुई। विद्रोहों की इस कड़ी में 1855-56 का संताल हूल आदिवासी संघर्ष का ऐसा उदाहरण है, जिसमें आत्मगौरव और आत्मसम्मान के लिए दस हजार से ज्यादा लोगों ने बलिदान दिया। संथाल औरतों का अपहरण और कुकर्म के बाद उनकी हत्या, अंग्रेजों, महाजनों तथा जमींदारों के अत्याचारों से आदिवासी त्रस्त हो उठे, तो औरत-मर्द सभी ने हथियार उठा लिया। संथाल हूल के नायक सिद्धो, कानू, चांद, भैरव के साथ उनकी दो बहनें फूलो और झानो ने योद्धा की भांति अंग्रेजों से मुकाबला किया। रात को तलवार लेकर निकली फूलो और झानो ने अंग्रेजों के शिविर में जाकर 21 सिपाहियों की हत्या कर दी। संथाल लोकगीतों मे आज भी इन बहादुर औरतों को याद किया जाता है।
ये वे आंदोलन हैं जिन्हें लोग किसी न किसी रूप में जानते हैं और हमारी सरकारें भी किसी न किसी रूप में इन आंदोलनों पर अपनी उत्सवधर्मिता दिखलाती रही हैं, लेकिन दुखद यह है कि ये आंदोलन पुरुष आंदोलनकारियों के सन्दर्भ में ही याद किए जाते हैं। नींव की ईंट की तरह स्त्री आदिवासी विद्रोही इसमें सिरे से गायब नजर आती हैं। बावजूद इसके प्रकृति से साक्षात् संवाद करने वाली इन वनपुत्रियों के विद्रोहों की और कई मिसाले हैं, जिनको याद किया जाना बेहद जरूरी है। केरल के कुरुचिया आदिवासी महिला नीली ने अंग्रेजी फौज से संघर्ष के लिए अलग महिला सेना का गठन किया था। उड़ीसा की आदिवासी महिलाओं ने यह निश्चय किया कि जिस रूप के पीछे ये गोरे लुटेरे हमारा अपहरण करते है, हम उस रूप को ही नष्ट कर देगें और उन्होने अपने चेहरे पर आड़ी तिरछी रेखाऐं गुदवा लीं। ऐसे ही भील आदिवासी आंदोलनों में भी स्त्रियों ने बढ़कर-चढ़कर हिस्सा लिया । फूलो, झानो, माकी, थीगी, नागी, लेंबू, साली, चंपी, देवमनी,सिनगी,कइली दई जैसे आदिवासी स्त्रियों की एक लंबी फेहरिश्त है, जिनके नाम गुमनामी में ही सही, आदिवासी लोकगीतों, कथाओं और प्रतीकों में किसी न किसी रूप में जिंदा हैं।
आदिवासी समाजों में महिलाएं हमारे सभ्य कहे जाने वाले समाज से ज्यादा स्वतंत्र रही हैं,इसका कारण उत्पादन प्रक्रिया में उनकी सीधी भागीदारी का होना है।यही कारण भी रहा कि उन्होने बाहरी विपत्तियों का सामना अपने पुरुष साथियों के साथ कन्धे से कन्धा मिला कर किया।चाहे मामला जंगल का हो या जमीन का,अस्मिता का हो या रोटी का,वे हर विद्रोह में उपस्थित रहीं हैं।यह बात और है कि उन्हे इतिहास में जगह नही दी गई। पर यह भी सच्चाई है कि इतिहास उनके बिना अधूरा रहा है और रहेगा।
# नूतन मौर्या

Monday, September 10, 2007

11सितंबर पर देरिदा के विचार

9/11 की घटना महज एक आतंकवादी घटना नहीं है। यह राज्य के बदलते चरित्र की भी निशानी है। चुंकि इस तरह के आतंकवाद का किसी किस्म के मुक्ति आंदोलन से कोई रिश्ता नहीं होता और नही यह व्यवस्था के बदलाव की लड़ाई है। लिहाजा नवउदारवादी राज्य परोक्ष रुप से ऐसे आतंकवाद के पोषक भी होते हैं। दिखने में आतंकवाद के खिलाफ युद्ध लगता है। पता ही नहीं चलेगा कि किस मोड़ पर राज्य और आतंकवाद एक हो गए जनता अकेले छूटती चली जाती है। मुक्तकामी विचार हास्यास्पद लगने लगते हैं। कई बार तो सत्ता दखल के आंदोलन भी आतंकवादी ठहरा दिए जाते हैं। अब इतिहास की करवट लगने लगी है। राज्य के इस घिनौने चरित्र को अब देरिदा वैचारिक शुन्यता करार रहे हैं । 9/11 के बाद नई करवट लिए दिखते हैं। आतंकवाद की दार्शनिक समझ को आगे बढ़ाने के लिए हम अपने समय के प्रसिद्ध दार्शनिक देरिदा के साक्षात्कार का अंश दे रहे हैं।
आतंकवाद और दर्शन
- देरिदा
बुश युद्ध की बात करते हैं पर वह शत्रु की पहचान करने में असमर्थ हैं। बिना जाने समझे युद्ध की घोषणाएं की गई है। बार-बार कहा जाता है कि अफगानिस्तान की जनता और उसकी सेनाएं अमेरिका की शत्रु नहीं है। मानलिया की बिन लादेन वही हैं लेकिन सबको पता है कि वह अफगान नहीं है और यह भी कि उसके अपने देश ने उसे अस्वीकार कर दिया है। यह भी की उसकी अधिकांश ट्रेनिंग अमेरिका में हुई है। वह अकेला नहीं है जो राज्य परोक्ष रूप से उसकी मदद करते हैं वे अफगानिस्तान राज्य की तरह नहीं करते। जो राज्य आतंकवादी नेटवर्क को शरण देते हैं उनकी पहचान मुश्किल है। अमेरिका, यूरोप, लंदन, बर्लिन ये भी सारी दुनिया के आतंकवादियों की ट्रेनिंग और निर्माण के पोषण स्थल हैं। इसलिए कोई भूगोल कोई क्षेत्रीय सिमांकन इस संदर्भ में प्रासंगिक नही रहा है।
अब तो आतंकवादी हमले के लिए जहाजों और बमों आदि की भी जरूरत नही है रणनीतिक रूप से किसी कंप्यूटर सिस्टम में वायरस या कोई अन्य विध्वंसात्मक तत्व घुसाकर पूरे देश या महाद्वीप के आर्थिक, सैनिक और राजनीतिक संसाधनों को पंगु किया जा सकता है। धरती और आतंक के बीच के संबंधो का रुपांतरण हो गया है। इस बात की जानकारी लेना आवश्यक है ऐसा ज्ञान अर्थात टेक्नो साइंस के कारण संभव हुआ है। विध्वंस के संभावनाओं के मुकाबले 11 सितंबर का काम पिछड़ा माना जाएगा। कल चुपचाप, जल्दबाजी और बिना खुन बहाए बहुत बड़े विध्वंस किए जा सकते हैं। जिसमें किसी महान देश का जीवन खतरे में पड़ सकता है। हो सकता है तब कहा जाय कि 9/11 तो विगत युद्ध के अच्छे दिनों का प्रमाण है। उस समय चीजें बड़ी दिखाई देती थीं पर अब तो उससे ज्यादा बूरी हालत है। हर तरह की नैनोटेक्नोलॉजी पहले से ज्यादा शक्तिशाली, अदृश्य अनियंत्रित है और कहीं भी घुस सकती है। वह माइक्रोवेब और बैक्टरिया की माइक्रोलॉजिकल प्रतिद्वंदी है। हमारे अचेतन को इसका पता है औऱ यही वह अधिक भयावह है।

सुनिए अमेरिका...अमेरिका...

Sunday, September 9, 2007

नए एल्बम 'तन्हाई : लोनली हर्ट्स' की समीक्षा


एल्बम 'तन्हाई : लोनली हर्ट्स'
कलाकार- हरिहरन, भूपिंदर, सुरेश वाडकर , रूप कुमार राठौड़, शान
लेबल- यूनिवर्सल
कीमत- सीडी 150 रु
कवर से लगता है कि हिंदी पॉप का ये अलबम उस जनरेशन के लिए बनाया गया है जो एमटीवी कल्चर और ग़ज़ल-सूफ़ी दोनों के कहीं बीच में आती है , या कहें कि थोड़ा-थोड़ा दोनों से जुड़ी है। नाम भी 'दाग : द फायर' मार्का है, लेकिन गानेवालों में हरिहरन , सुरेश वाडकर, भूपिंदर और शुभा मुद्गल के नाम आकर्षित करते हैं। बकौल प्रोड्यूसर्स, इस सीडी में 10 soulful love songs हैं। देखते हैं क्या निकलता है।
पहला ट्रैक है हरिहरन का गाया
- 'कुछ देर तक, कुछ दूर तक तो साथ चलो '। लिखा है गीतकार अंजान के सुपुत्र और जाने-माने बॉलीवुडिया गीतकार समीर ने। हरिहन बड़ी रेंज वाले गायक है लेकिन शमीर टंडन की इस कंपोज़िशन में दिखाने लायक बहुत कुछ है नहीं। औसत सा गीत है। रिदम है 16 बीट्स। ड्रम्स का इस्तेमाल। सॉफ्ट सा पॉप। बीच में दक्षिण भारतीय शैली में रुद्र वीणा जैसा कुछ बजा है- वो अच्छा लगा है।
दूसरा ट्रैक है किसी संगीत साहब का गाया
- I am so lonely. समीर ने ये गाना हिंग्लिश में लिखा है। रिदम का बेस 16 बीट्स ही है, लेकिन थोड़ा वेस्टर्न टच देने की कोशिश की गई है। संगीत ने ठीक-ठाक गाया है। सुनते हुए दृश्य ऐसा बनता है जैसे किसी क्लब में कोई फुल -टाइमर किस्म का प्रेमी कोने में टेबल पर बैठी हसीना के लिए गिटार टाइप्स बजाते हुए मोहब्बत का इज़हार कर रह है।
तीसरा ट्रैक है शान का गाया
- आओ इस तरह जिया जाए। राग शिवरंजनी पर आधारित है। वही शिवरंजनी जिसमें मेरे नैना सावन भादों, जाने कहां गए वो दिन, दिल के झरोखे में तुझको बिठाकर और ग़म दिए मुस्तकिल जैसे पॉपुलर गाने बने हैं। यही वजह से कि इस गाने की धुन बड़ी सुनी -सी लगती है। शिवरंजनी दरअसल दर्द या Pathos पैदा करने में बड़ी असरदार साबित होती है। भूपाली के सा रे ग प ध सां में सिर्फ ग को कोमल कर दीजिए - देखिए कैसे पूरी तासीर बदल जाती है। बहरहाल- ये भी एक औसत सा गीत है जो अच्छा लगता है तो इसलिए कि जिन सुरों पर ये आधारित है वो राग ही हिट है।
चौथा ट्रैक है रूप कुमार राठौड़ का गाया
- जहां तेरा चेहरा दिखाई न दे। शुरू में ऊंचे सुरों में आलाप है। सुर राग भूपकली ( अज़ीज़ नाज़ां का- चढ़ता सूरज धीरे-धीरे, मेहदी हसन का - अबके हम बिछड़े) के आस-पास घूमते हैं। बैरागी भैरव और अहीर भैरव की भी याद आती है। सुनते हुए फिल्म 'एक दूजे के लिए' का हिट गीत 'बाली उमर को सलाम ' के शुरू में अनूप जलोटा का गाया- कोशिश करके देख ले.. भी याद आता है। रूप कुमार राठौड़ काफी क्षमतावान गायक हैं। गाने में कई बार ऊंचे सुरों में काफी डूबा हुआ आलाप लिया है जो सुनने में अच्छा लगता है। कई अवॉर्ड जीत चुके जाने- माने गीतकार समीर इस गाने में एक जगह लिखते हैं- सिवा तेरे ज़िंदगी, है एक सेहरा। सही लाइन होती - बिना तेरे ज़िंदगी, है एक सेहरा। एक सवाल- मीडियॉकर ही अक्सर पॉपुलर क्यों होता है ? बहरहाल.. रूप कुमार राठौड़ ने अपनी गायकी से ये गाना सुनने लायक बना दिया है।
इसके बाद है सुरेश वाडकर की आवाज़ में
- तुमसे पहले मेरी जिंदगी में। समीर ने एक घटिया गाना लिखा है, और शमीर टंडन से उतना ही घटिया कंपोज़ किया है। सुरेश वाडकर जैसे उम्दा सिंगर ये गाना गाने को क्यों राजी हुए- पता नहीं।
छठवां ट्रैक है भूपिंदर का गाया
- गुज़रता नहीं चैन से एक पल। गाना शुरू होता है फीमेल वॉएस में राग पूरिया धनाश्री ( मेरी सांसों को जो महका रही है, हाय रामा ये क्या हुआ..) में खूबसूरत आलाप के साथ। भूपिंदर की आवाज़ इस गाने में अच्छी लगी है। फिलर म्यूजिक में सितार बहुत अच्छा बजा है। बीच -बीच में महिला का आलाप जारी रहता है। गाना अच्छा बना है।
सोनी पर जब पहली बार इंडियन आइडल शुरू हुआ था तो जवाब में स्टार प्लस ने वसुपर सिंगर कंपटिशन कराया था। इसमें अव्वल रहे थे रवींद्र उपाध्याय। अगला गीत
- वो रात दिन के किस्से , रवींद्र की आवाज़ में है। साथ में गा रहे हैं कोई शबाब साबरी। फॉरवर्ड कर देने लायक गाना है।
अगला गाना है शान के पुराने अलबम तन्हा दिल का टाइटिल ट्रैक
- तन्हा दिल। शान का ये गाना ठीक-ठाक चल गया था।
नौवां ट्रैक है शुभा मुद्गल का
- जग सूना सूना लागे। ये भी पुराने अलबम 'नाचूं सारी -सारी रात' से उधार लिया गया है। ये अलबम कब आया, कब गया पता नहीं। गाने में गिटार की लीड के साथ देर -देर तक फिलर म्यूजिक बजता रहता है। मुखड़े के बाद स्थाई का इंतज़ार लंबा लगता है। शुभा मुद्गल की अपनी अलग आवाज़ है, गायकी का अपना स्टाइल है। सो, गाना ठीक ठाक सा बन गया है। लेकिन इसका म्यूज़िक बोर करता है।
अंत में है सारंगी के उस्ताद सुल्तान खान का गाया
- कटे नाहीं रात मोरी, पिया तोरे कारन -कारन। पुराने अलबम 'भूमि' से लिया गया है। इस गीत को लिखा भी है सुल्तान खान ने और कंपोज़ भी उन्होने ही किया है। गाने में सारंगी का अच्छा इस्तेमाल है , ज़ाहिर है..। आपने शायद ध्यान दिया हो- सुल्तान खां साहब की उच्चारण की अपनी अदा है। कायदे से इसे दोष बोलना चाहिए। रात को 'राति' बोलते हैं, मनवा को 'मनिवा', चैन को 'चैने'.. .। बहरहाल, ये गीत बहुत मधुर बना है। आपने सुना भी हो शायद।
कुल मिलाकर ये अलबम 'तन्हाई' पैसा वसूल तो नहीं है, लेकिन लेकर पछतावा भी नहीं होगा।
#गिरिजेश

Friday, September 7, 2007

लूसियानो पावरोती कौन थे ?

इतालवी ओपेरा के मशहूर सितारे लूसियानो पावरोती का, जो ओपेरा को 20वीं सदी के महानतम गायकों में से एक के तौर पर आम जनता तक लाए थे, उत्तरी इटली में उनके घर में निधन हो गया, वह 71 वर्ष के थे ।
14 महीने पहले उनके पैनक्रियाज में कैंसर हो गया था । ओपेरा की दुनिया में प्रसिद्ध होने के बाद पावरोती को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति तब मिली, जब उन्होंने और डोमिंगो ने जोस कारीरास के साथ मिलकर 1990 में इटली में फुटबॉल वर्ल्ड कप के दौरान "द थ्री टैनर्स" का प्रदर्शन किया ।
पावरोती का जन्म 1935 में मोडेना में हुआ था । वर्षों के रियाज और प्रशिक्षण के बाद उन्होंने 1961 में एक गायन प्रतियोगिता में सफलता प्राप्त की और उन्हें प्यूसिनी के ओपेरा "ला बोहीम" में एक भूमिका दी गई । ओपेरा में उनका पहला बड़ा प्रदर्शन 1963 में लंदन में हुआ और 5 साल बाद उन्होंने न्यूयॉर्क के मेट्रोपोलिटन ओपेरा में भाग लिया ।

पावरोती ने एक बार खुद को अपनी शानदार आवाज का गुलाम बताया था । उन्होंने कहा था कि गायक होना एक एथलीट होने की तरह है, जिसे लगातार प्रशिक्षण की जरूरत पड़ती है ।

और जानने के लिए पढ़ें-
# माई ओन स्टोरी (1981)
# माई वर्ल्ड ( 1995)


अलविदा पावरोती...

इटैलियन...............................अंग्रेजी
Nessun dorma, nessun dorma............No one sleeps, no one sleeps
Tu pure, o Principessa,...............Even you, o Princess,
Nella tua fredda stanza,..............In your cold room,
Guardi le stelle......................Watch the stars,
Che tremano d'amore...................That tremble with love
E di speranza.........................And with hope
Ma il mio mistero è chiuso in me,...But my secret is hidden within me;
Il nome mio nessun saprà, no, no,...My name no one shall know, no, no,
Sulla tua bocca lo dirò..............*On your mouth I will speak it
Quando la luce splenderà,.............When the light shines,
Ed il mio bacio scioglierà il silenzio.And my kiss will dissolve the silence
Che ti fa mia.......................That makes you mine.
(Chorus)
Il nome suo nessun saprà..............No one will know his name
E noi dovrem, ahimè, morir............And we must, alas, die.
Dilegua, o notte!.....................Vanish, o night!
Tramontate, stelle!...................Set**, stars!
All'alba vincerò!.....................At daybreak, I shall conquer!

* "Dire sulla bocca", literally "to say on the mouth", is a poetic Italian way of saying "to kiss." (Or so I've been told, but perhaps a native speaker can confirm or deny this.) I've also been told that a line from a Marx Brothers movie -- "I wasn't kissing her, I was whispering in her mouth" -- is a conscious imitation of the Italian phrase.

** "Tramontate" literally means "go behind the mountains", but it's the word Italians use for sunset and the like. It's also a word Turandot uses after Calaf kisses her: "E l'alba! Turandot tramonta!" ("It's dawn, Turandot descends!") This suggests yet another mythopoetic theme which pervades the Turandot libretto -- the sun god's defeat of the moon goddess -- but I won't get into that....

Thursday, September 6, 2007

हिन्दी उपन्यासों में नार्थईस्ट


-गोपाल प्रधान
आज जिसे हम उत्तर पूर्व कहतें हैं वह स्वतंत्रता और विभाजन से निर्मित भौतिक और मानसिक भूभाग है। स्वतंत्रता से पहले `नार्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी'नेफा अर्थात वर्तमान अरूणाचल प्रदेश वैसे ही था जैसे पश्चिमी सीमा पर पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत। वर्तमान पूर्वोत्तर भारत के शेष क्षेत्र पहले तो बंगाल के अधीन बाद में असम की कमिश्नरी के अधीन रहे। स्वतंत्रता से पहले हिन्दी क्षेत्र से जो लोग इस क्षेत्र में आये उनकी सामाजिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि हिन्दी साहित्य के भीतर उनका जीवन वर्णन का विषय बनता । यहां आने वाले लोगों ने भी कोई अलग भाषिक समुदाय बनाने के बजाय द्विभाषिक होना ही बेहतर समझा। अपने भीतर जहां से आये थे वहां की बोलियां और कार्यस्थल अथवा बाजार में स्थानीय भाषा। स्वतंत्रता के बाद हिंदी भाषी क्षेत्रों से अनेक बौद्धिक लोग आये। इनके अतिरिक्त पर्यटन हेतु कुछ घूमंतू साहित्यकार इस क्षेत्र में आए। राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी की स्वीकृति के फलस्वरूप भी कालेजों और विश्वविद्यालयों में हिन्दी बैद्धिकों का आना जाना जारी रहा। इस परिवेश मे हिंदी में पूर्वोत्तर भारत पर केंद्रित साहित्य लिखा जाना शुरू हुआ। सिल्चर विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाले गोपाल प्रधान का लेखन यात्रा वृतांत और उपन्यासों के रूप में सामने आया है। प्रस्तुत है इस लेख का पहला भाग-
इस आलेख मे मेरा उदेश्य मूलत: पूर्वोत्तर भारत के विभिन्न प्रांतो पर लिखे गये उपन्यासों का विश्लेषण करना है। साथ ही मेरा उदेश्य इन उपन्यासों के लेखकों की सामाजिक स्थिति का इन उपन्यासों में प्रस्तुत यथार्थ पर पडे प्रभाव की खोजबीन करना भी है क्योंकि पूर्वोत्तर भारत के जीवन की प्रस्तुति इन लेखकों के नजरिये से प्रभावित हुई है। वर्जीनिया वुल्फ ने उपन्यास को साहित्यिक विधाओं मे नवीनतम और सर्वाधिक लचीला बताया है। रामचंद्र शुक्ल ने अपने लेख `उपन्यास'में लिखा "बहुत लोग उपन्यास का आधार कल्पना बतलाते हैं। पर उत्कृष्ट उपन्यासों का आधार अनुमान शक्ति है न कि केवल कल्पना।''आगे अनुमान के साथ यथार्थ का संबन्ध स्पष्ट करते हुए लिखा ``ऐतिहासिक उपन्यास अनुमानमूलक और सत्य हैं। उच्च श्रेणी के उपन्यासों में वर्णित छोटी छोटी घटनाओं पर यदि विचार किया जाय तो जान पडेगा कि वे यथार्थ में सृष्टि के असंख्य और अपरिमित व्यापारों से छांटे हुए नमूने हैं।'' 3शुक्ल जी यह बात ऐतिहासिक उपन्यासों के प्रसंग में कह रहे थे। पूर्वोत्तर भारत के बारे में लिखे गये सभी विचारणीय सभी हिन्दी उपन्यास कमोबेश ऐतिहासिक हैं।रामचंद्र शुक्ल ऐतिहासिक उपन्यासों का आधार जिस अनुमानशक्ति को बता रहे थे। स्पष्ट है कि वह लेखक की सामाजिक स्थिति से उत्पन्न उसकी मान्यताओं का उदघाटन करती चलती है। सौभाग्य से ये लेखक आधुनिक काल के हैं इसलिये उनके जीवन के बारे में प्रमाणिक जानकारी संभव है। इन उपन्यासों के प्रकासन क्रम ही इन पर विचार करना उचित होगा।
इन उपन्यासों मे पहला उपन्यास देवेन्द्र सत्यार्थी का `ब्रह्मपुत्र'है। इस उपन्यास की भूमिका काका कालेलकर ने `लोक युग का नदी पुराण' शीर्षक से 1956 में लिखी। उपन्यास के प्रारंभ में स्वयं लेखक ने`ब्रह्मपुत्र की भाषा' शीर्षक से दस पृष्ठों की पूर्वपीठिका भी लिखी है। गोपाल राय ने `हिन्दी उपन्यास का इतिहास'में इसकी प्रकाशन तिथि 1956 ही बताई है। फिलहाल बाजार में इसका जो संस्करण उपलब्ध है वह ज्ञानगंगा प्रकाशन दिल्ली द्वारा पहली बार 1932 में प्रकाशित हुआ था।
स्पष्ट है कि उपन्यास के लेखन और प्रकाशन का समय हिन्दी उपन्यास में`आंचलिक पन्यासों'की लोकप्रियता का दौर था। देवेन्द्र सत्यार्थी के बारे में ही काका कालेलकर ने सूचना दी है `श्री देवेन्द्र सत्यार्थी भारत के लोकगीतों के अनन्य उपासक हैं।''आंचलिकता के प्रति वैचारिक निष्ठा और लोकजीवन से अनुराग ने इस उपन्यास को अनुठी साहित्यिक कृति बना दिया है। उपन्यास मे स्वतंत्रता आंदोलन का समय है और भूभाग ब्रह्मपुत्र में माजुली द्वीप तथा माजुली का भूभाग। ब्रह्मपुत्र दोनों भूक्षेत्रों के बीच बहता है और उपन्यास के चरित्रों की तरह ही सशक्त चरित्र है।
शुरू मे उपन्यास दिसांगमुख के लोगों के जनजीवन का मंथर गति से चित्रण करता है। इन पात्रों के मानस के निर्माण में ब्रह्मपुत्र का निर्णायक योगदान है। पूर्वपीठिका में ही इस मानस को पहचानने के क्रम में देवेन्द्र सत्यार्थी ने लिखा है असमिया यथासंभव मर्यादा को नहीं छोडता है पर यदि कहीं उसके आत्मसम्मान को ठेस लगा दी तो वह बाढ के समय का ब्रह्मपुत्र बन जाता है।आतिथ्य में उसका जवाब नहीं। आज काम चल रहा है तो कल की चिंता क्यों की जाय और आने वाली विपत्ति आएगी तो देख लेंगे। पुरानी कहावत है कि बाघ की सवारी करने वाले को बाघ से उतरने का गुर नहीं आता। पग पग पर यह अनुभव हुआ कि असमिया यह गुर भी जानता है।
ब्रह्मपुत्र गरा काटता हुआ और इधर को आयेगा तो दिसांगमुख और पीछे हट जाएगा।यह बोल मेरे हृदय को छू गया। थोडा मौन रहकर मार्गदर्शक ने देखा `बड डिकडारी'।फिर उसने बताया कि दिक्कदारी का असमिया पर्यायवाची है डिकडारी। बड डिकादारी अर्थात बडी मुसीबत है। मै समझ गया कि यही वह मूलमंत्र है जिसे एक बार होठों पर लाकर कोई भी असमिया बडी से बडी मुसीबत पर सवार हो सकता है और मानो एक बार बड डिकडारी कहकर वह झट बाघ के उपर से नीचे छलांग लगा सकता है।'' कहावतों की भरमार इस उपन्यास की विशेषता है। तकरीबन ये सभी कहावतें पानी नदी सापरी और मछली से सम्बन्धित इस विसद पृष्ठभूमि पर कथा प्रवाह जब शुरू होता है तो स्वतंत्रता आंदोलन मे इस क्षेत्र के अवदान का गरिमापूर्ण आख्यान शुरू होता है। दिसांगमुख का एक युवक कलक़त़्ते में पढता है और वहां के किसी क्रांतिकारी गुट का सदस्य है। गुट पर अंग्रजी सरकार का दमन शुरू होने पर भागकर दिसांगमुख आता है और वह वहांसे माजुली पहुंचता है। इधर
दिसांगमुख मे उसकी खोज करने वाला दरोगा स्थानीय जनता पर बेतरह जुल्म ढाता है। इसके कारण भारत के इस सुदुर
अंचल मे पहली बार जुलूस प्रदर्शन जैसी चीजों की शुरूआत होती है। इसी क्रम में स्थानीय पात्रों का कायान्तरण शुरू होता
है। सीधे सादे लोग स्वतंत्रता के सिपाही बनने लगते हैं। दिसांगमुख में मिरी समुदाय के लोग भी रहते हैं। उनके भीतर गॉवबूढा के प्रश्न पर अस्मिताबोध जागता है। मिरी लोग देवुर पूजा करते हैं जिसमे बाहरी लोगों के प्रवेश की मनाही है। उपन्यास दिसांगमुख मे रहने वाले मिरी लोगों के वर्णन के जरिए असमिया पहचान के तनावों को भी रेखांकित करता है।
उधर माजुली मे रहने वाले लोगों मे भी उस क्रांतिकारी को पकडने के लिये जो उत्पीडन किया जाता है उसके कारण विरोध भाव बढने लगता है। अंतत:उस क्रांतिकारी के दो साथियों को पकडकर जब माजुली का दरोगा ब्रह्मपुत्र नाव से पार करने लगता है तो नाव डूब जाने से तीनों की मृत्यु हो जाती है। प्राकृतिक आपदाओं की विभीषिका और उनके बावजुद मनुष्य की जिजीविषा के बीच होने वाला संघर्ष ही उपन्यास की मुख्य कथावस्तु है और लेखक ने अत्यंत कौशल के साथ इसका चित्रण किया है। उपन्यास में स्वतंत्रता की प्राप्ति के बाद दिसांगमुख में नागालैण्ड की रानी गिडालू आती है। रानी गिडालू स्वतंत्र भारत मे पूर्वोत्तर बारत के लोगों के सम्मान की गारंटी के बतौर उभरती हैं। विस्तार भय से उस उपन्यास के बारे में मैं इतना ही कहना चाहता हूं कि पूर्वोत्तर भारत पर लिखे हिंदी उपन्यासोंमें यह उपन्यास जनजीवन गहरी समझ के कारण सर्वोत्तमह हैं।
इसी क्रम में दूसरा उपन्यास `जहां बांस फूलते हैं' आया। इस उपन्यास का प्रकाशन 1956 में अहमदाबाद के पार्श्व प्रकाशन से हुआ। इसके लेखक श्रीप्रकाश मिश्र है। लेखक वर्षों तक मिजोरम में खुफिया विभाग के प्रमुख के रूप में रहे थे और उसी अनुभव के आधार पर यह उपन्यास लिखा गया है। उपन्यास का कथा समय 1968 का लालडेंगा का प्रसिद्ध विद्रोह है। हालांकि कथायुक्ति के बतौर लेखक ने प्राक्कथन में लिखा है `यह उपन्यास ऐतिहासिक नहीं है। अगर किसी के जीवन के टुकडे से कोई अंश इत्तेफाक रखता है तो सिर्फ इसलिए कि कल्पना की दीवार कहीं न कहीं यथार्थ की बुनियाद पर ही बनती है। फिर भी यह उपन्यास आम पाठक को पूर्वोत्तर भारत की समस्या समझने की खासी सामग्री देगा।'ब्रह्मपुत्र ने पूर्वोत्तर भारत की समस्या को जिस समय छोडा था वह स्वतंत्र भारत में आश्वासन का बिन्दु था। स्वतंत्र भारत में उस कथा को श्री प्रकाश मिश्र ने आगे बढाया है।काफी लम्बे समय तक प्रशासनिक हलकों में रहने के कारण श्री प्रकाश मिश्र को प्रशासनिक मशीनरी की गहरी जानकारी थी और दीर्घावथि के कारण मिजो समाज से निकट का परिचय भी। इसलिये उपन्यास में शासन तंत्र के प्रत्येक अंग की कारगुजारियों का विस्तृत वर्णन है। मिजो भाषा के शब्द भी प्रचुरता से प्रयुक्त हुए हैं। मिजो भाषा का एक शब्द है वाई। इसका अर्थ है बाहरी। केन्द्रीय शासन प्रशासन से जुडा प्रत्येक व्यक्ति मिजो समाज के लिए बाहरी है। मिजो लोग भीख मांगना सबसे निकृष्ट काम समझते है। बाहरी लोगों अर्थात केंद्रीय सरकार के कार्यालयों से चीजें उठा लाएंगे कभी- कभी जबर्दस्ती भी पर भीख नहीं मांगेगे। कथा-भूमि डोपा नामक गांव है। इसी गांव को केन्द्र में रखते हुए कथाकार ने मिजो समाज की अंदरूनी हलचल को पकडने की कोशिश की है।बांस फूलने की परिघटना वैसे तो सार्वभौमिक है और इसके साथ अपशकुन भी जुडा हुआ है लेकिन चूंकि मिजोरम का मुख्य उत्पाद बांस ही है इसलिए बांस फूलने के साथ वहां विशेष भय जुड जाता है। इसके लिए मिजो भाषा में `माउटम' नामक शब्द ही है। मिजोरम के बहाने समूचे पूर्वोत्तर भारत की समस्या को प्रस्तुत करने का लेखक का दावा अनुचित नहीं लगता जब हम देखते हैं कि संगठित धर्मों से बाहर रह गयी जनजातियां अपनी अस्मिता की तलाश में तरह -तरह से अपने आदि मूल खोजती हैं। उपन्यास का मूल पात्र रूआलखूमा एक जगह कहता है `सवाल उठता है कि वह यहुदी दाउद की बारहवीं कौम गयी कहां। उसकी खोज में मूसा आए और कश्मीर अफगानिस्तान सीमा पर दफन हो गए। क्यों
क्योंकि यह बारहवीं कौम कबकी काश्मीर पार कर लाख तिब्बत चीन से होती हुयी शान देश में पहुंच गयी थी। हमारे पूर्वज
उस कौम की अगली पीढी बन उस पराम् खुदा `माह येव' को प्यारे होते जाते थे और अगली पीढी कुछ और पूरब
खिसक जाती थी। इस तरह जो मिश्री फराओं की गुलामी से बचकर निकले थे उनकी सन्तान निरंतर आजाद रहती हिमालय
की वादियों जंगलों में घूमती आज भी आजाद हैं। वे ही लुशेई राल्ते पाइते प़ोईल़ाखेर मनिपुर के मेतेई कछार हिल्स की मिकिर कछारी रांगकुल इसीलिए हमारे पुरूषों ने कभी सभ्यता के सिद्धांतो नहीं अपनाया बल्कि अपनी जिन परंपराओं पूजा पद्धतियों को भूल गए थे उसे पुनर्जीवित करते गये, हमें भी करनी है।'7अपनी इसी संकल्पना के कारण उपन्यास मिजो जीवन की विशेषताओं को भरपूर प्रस्तुत करता है। पहनने के लिए पुआन पीने के लिए थिंगपुईशेन सामाजिक कार्यकलाप के लिए जालबुक़ मिजो समाज का खुलापन जो उनकी मौके बेमौके की हंसी में व्यक्त होता है। यह सब मिजोरम की प्राकृतिक समृद्धि के साथ घुलमिलकर पूरे उपन्यास में छिटका हुआ है। दुखद तथ्य के बतौर लालडेंगा के विद्रोह के बाद समूचे मिजोरम में मौजूद सेना की बर्बरता बार बार टीस की तरह उठती रहती है। हवा सिंह नाम का एक पात्र है,जो झूम के लिए गये पांच नौजवानों को मेडल पाने के लिए `मुठभेंड' में मार डालता है। फिर एक स्थानीय पादरी का लिंग चिरवाकर उसमें नमक भरवा देता है। इसी हवा सिंह को जब नौजवानो ने मार डाला तब कर्नल ने उसका `शहीद स्मारक' बनवाया।
एक जगह विस्तार से उपन्यासकार ने अपने अनुभव के आधार पर पूर्वोत्तर भारत की समस्या जिसे निहित स्वार्थ के चलते बनाया गया गया का भंडाफोड किया है। 68 के `माउटम' में ``वर्षों से सोई केन्द्र सरकार को जाने कैसे किसी ललछऊ चींटी ने काट खाया कि उसका एक पंजा फड़का और एक अंगुली पूर्वोत्तर भारत की ओर चल पडी। उसका एक पोर गुवाहाटी की सडकों पर जांचकर पाया कि समस्या इतनी गंभीर नहीं है, जितनी महंती ने बना दी है। वास्तव में विभिन्न विभागों के छोटे कर्मचारी अपनी तनख्वाह व भत्ते नागालैण्ड में तैनात अपने समकक्षियों के बराबर पाने के लिए `मिजो हिल्स' को डिस्टर्ब एरिया घोषित कराने पर तुले हुए है''8 उपन्यास के अन्त में रूआलखूमा की डायरी मिलती है जिसमें उसकी आठ कविताऍं हैं
मिजोरम के दुर्भाग्य और लहुलुहान यथार्थ पर ऑंसू बहाती।9
इस क्रम मे तीसरा उपन्यास `मुक्ति' । 1999 में वाणी प्रकाशन से प्रकासित हुआ। इसके लेखक डॉ महेन्द्र नाथ दुबे हैं। डॉ दुबे का परिवार आजमगढ से असम आया था और यहीं कछार जिले के पैलापुल में बस गया। डॉ दुबे ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी में एम ए करने के बाद कुछ दिनों तक वहीं अध्यापन किया फिर पं विद्यानिवास मिश्र के बुलाने पर आगरा हिंदी संस्थान चले गये और वहां से निदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुए। उपन्यास के ब्लर्ब से सूचना मिलती है कि``१४ अगस्त १९४७ की अर्धरात्रि को स्वतंत्रता की उदघोषणा से लेकर १९६२ में चीन के आक्रमण की पूर्वबेला तक के कालखण्ड में यह पूरा क्षेत्र किस प्रकार संघर्षरत रहा इसी का एक दस्तावेज है यह उपन्यास मुक्ति।'' कथाक्षेत्र दक्षिण असम के कछार जिले का मुख्यालय सिलचर है। इसी कारण उसमें स्वतंत्रता के बजाय विभाजन की व्यथा गहरी है। विभाजन की त्रासदी का उल्लेख करते हुए ब्लर्ब में ही अंकित किया गया है ``डॉ दुबे ने लक्ष्य किया कि राजनितिज्ञों ने देश के भूगोल के साथ जो खिळावाड किया हैउससे साधारण जनता के कष्टों का बोझ निरंतर बढता रहा है। इनका अपना गांव असम के कछार जिले में स्थित है किंतु असम प्रदेश की राजधानी गुवाहाटी उससे बहुत दूर है जबकि बंगलादेश का सिलहट बिल्कुल पडोस में है। पूरब में मणिपुर की इम्फाल दक्षिण में मिजोरम की आइजोल दक्षिण पश्चिम में त्रिपुरा की अगरतला राजधानियां बहुत पास हैं। बंटवारे ने हालात ऐसे कर दिए कि एक छोटे से गलियारे के अलावा शेष भारत की अपेक्षा असम की इन सात प्रदेशों की सीमाऍ चारो ओर से भूटान तिब्बत च़ीन म़ायन्मार और बंगलादेश से ही मिलती हैं।'' 10 जारी