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Saturday, March 26, 2011

ऑफसाइड के साथ छठें गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल का आगाज


आधी दुनिया के संघर्षो को समर्पित छठें गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल का शुभारंभ रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों के बीच बुधवार को हुआ। फेस्टिवल का उद्घाटन प्रसिद्ध इतिहासकार और नारीवादी चिंतक प्रो.उमा चक्रवर्ती ने किया। उन्होंने कहा कि महिला आंदोलनों को प्रतिरोधी संस्कृति कर्म को ताकतवर बनाना होगा। जुल्म के एकजुट प्रतिरोध से ही न्यायपूर्ण समाज बनेगा।गोरखपुर फिल्म सोसाइटी और जन संस्कृति मंच के इस आयोजन का शुभारंभ सिविल लाइन्स स्थित गोकुल अतिथि गृह के सभागार में लेखक व पत्रकार स्व.अनिल सिन्हा को श्रद्धांजलि से शुरू हुआ। इस अवसर पर स्व.सिन्हा की पत्‍‌नी आशा सिन्हा का संदेश पढ़ा गया। स्व. सिन्हा की एक कविता पर आधारित पोस्टर का लोकार्पण भी हुआ। आयोजन समिति के अध्यक्ष प्रो.रामकृष्ण मणि ने अतिथियों और दर्शकों का स्वागत करते हुए कहा कि हमारे फिल्म आंदोलन का मकसद नागरिकों की संवेदना और सामाजिक सरोकार को जागृत करना है।

अपने लम्बे उद्घाटन वक्तव्य में प्रो.उमा चक्रवर्ती ने कहा कि स्त्री का संघर्ष सिर्फ भौतिक जरूरतों के लिए ही नहीं बल्कि सोचने, अनुभव करने और अपने आत्म को हासिल करने का भी संघर्ष है। पितृसत्ता के मौजूदा ढांचे को उतार फेंके बिना स्त्री की आजादी संभव नहीं है। उन्होंने 19 वीं सदी के समाज सुधार आंदोलनों को स्त्री केन्द्रित बताया। पर उनके मुताबिक यह मध्यवर्गीय परिवारों के दायरे में सीमित था। इस अवसर पर प्रो.चक्रवर्ती ने फेस्टिवल की स्मारिका का लोकार्पण भी किया। इसके बाद उन्होंने स्त्री अधिकार आंदोलनों और लोकतांत्रिक आंदोलनों से संबंधित अपने निजी संग्रह में मौजूद पोस्टरों पर व्याख्यान दिया। फेस्टिवल की ओर से चित्रकार अशोक भौमिक ने स्मृति चिह्न देकर उन्हें सम्मानित भी किया। उद्घाटन सत्र का संचालन दिल्ली विश्वविद्यालय के उपाचार्य और जसम के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य आशुतोष कुमार ने किया। कार्यक्रम के अंतिम चरण में ईरानी फिल्मकार जफर पनाही की फिल्म आफसाइड का प्रदर्शन किया गया.
उभरा आधी दुनिया का दर्द

फिल्म फेस्टिवल के हर आयाम में आधी दुनिया का दर्द उभरकर सामने आया। फिल्म 'ऑफसाइड' ने स्त्री विरोधी व्यवस्था पर सवाल उठाया। ईरान में महिलाओं को मैदान में जाकर फुटबाल का खेल देखने की इजाजत नहीं है। फिल्म की कहानी में कुछ लड़कियां अपनी पहचान छिपाकर फुटबाल का मैच देखने की कोशिश करती हैं तो उन्हें बैरक में बंद कर दिया जाता है। यह फिल्म इन्हीं कैदी लड़कियों व सिपाहियों के बीच संवादों के जरिए आगे बढ़ती है और स्त्री की आजादी विरोधी व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है।
गीत गवनई, पोस्टर प्रदर्शनी

पटना की 'हिरावल' व बलिया 'संकल्प' सांस्कृतिक संस्थाओं ने फैज गोरख पाण्डेय व विजयेन्द्र अनिल रचनाओं को गाकर सुनाया। सभागार के बाहर युवा चित्रकार अनुपम राय और वरिष्ठ चित्रकार बी. मोहन नेगी के चित्र व कविता पोस्टर भी अपनी जुबान में बहुत कुछ कह रहे थे। इसके अलावा लेनिन पुस्तक केन्द्र व गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल ने महत्वपूर्ण वैचारिक पुस्तकों व पत्रिकाओं की प्रदर्शनी लगायी है।
गुरुवार को देश के आठ राज्यों से फिल्म सोसाइटियों का पहला राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित हुआ। शाम के सत्र की कवि बल्ली सिंह चीमा के काव्य पाठ से शुरूआत हुई। संकल्प द्वारा विदेशिया का गायन, नया मीडिया पर परिसंवाद तथा अनिल सिन्हा व्याख्यानमाला की पहली कड़ी के रूप में चित्त प्रसाद की पेंटिंग पर अशोक भौमिक का व्याख्यान था। कार्यक्रम के अंत में श्याम बेनेगल निर्देशित फिल्म 'भूमिका' का प्रदर्शन हुआ।

Wednesday, March 23, 2011

भगत सिंह का अंतिम पत्र



आज 23 मार्च है.इस दिन भगत सिंह,सुखदेव और राजगुरु को ब्रिटिश सरकार ने फांसी कि सजा सुनाई थी.

भगत सिंह का अंतिम पत्र
22 मार्च,1931

साथियो,
स्वाभाविक है कि जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए, मैं इसे छिपाना नहीं चाहता. लेकिन मैं एक शर्त पर जिंदा रह सकता हूँ, कि मैं क़ैद होकर या पाबंद होकर जीना नहीं चाहता.

मेरा नाम हिंदुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है और क्रांतिकारी दल के आदर्शों और कुर्बानियों ने मुझे बहुत ऊँचा उठा दिया है - इतना ऊँचा कि जीवित रहने की स्थिति में इससे ऊँचा मैं हर्गिज़ नहीं हो सकता.

आज मेरी कमज़ोरियाँ जनता के सामने नहीं हैं. अगर मैं फाँसी से बच गया तो वो ज़ाहिर हो जाएँगी और क्रांति का प्रतीक-चिन्ह मद्धिम पड़ जाएगा या संभवतः मिट ही जाए. लेकिन दिलेराना ढंग से हँसते-हँसते मेरे फाँसी चढ़ने की सूरत में हिंदुस्तानी माताएँ अपने बच्चों के भगत सिंह बनने की आरज़ू किया करेंगी और देश की आज़ादी के लिए कुर्बानी देनेवालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि क्रांति को रोकना साम्राज्यवाद या तमाम शैतानी शक्तियों के बूते की बात नहीं रहेगी.

हाँ, एक विचार आज भी मेरे मन में आता है कि देश और मानवता के लिए जो कुछ करने की हसरतें मेरे दिल में थी, उनका हजारवाँ भाग भी पूरा नहीं कर सका. अगर स्वतंत्र, ज़िंदा रह सकता तब शायद इन्हें पूरा करने का अवसर मिलता और मैं अपनी हसरतें पूरी कर सकता.

इसके सिवाय मेरे मन में कभी कोई लालच फाँसी से बचे रहने का नहीं आया. मुझसे अधिक सौभाग्यशाली कौन होगा? आजकल मुझे ख़ुद पर बहुत गर्व है. अब तो बड़ी बेताबी से अंतिम परीक्षा का इंतज़ार है. कामना है कि यह और नज़दीक हो जाए.

आपका साथी,
भगत सिंह

Friday, February 25, 2011

अनिल सिन्हा नहीं रहे

प्रिय साथियो,

अबतक आप सबको साथी अनिल सिन्हा के असमय गुज़र जाने का अत्यंत दुखद समाचार मिल चुका होगा. अनिल जी जैसा सादा और उंचा इंसान , उनके जैसा संघर्ष से तपा निर्मल व्यक्तित्व, क्रांतिकारी वाम राजनीति और संस्कृति -कर्म का अथक योदधा अपने पीछे कितना बड़ा सूनापन छोड़ गया है, अभी इसका अहसास भी पूरी तरह नहीं हो पा रहा. यह भारी दुःख जितना आशा जी, शाश्वत, ऋतु,निधि,अनुराग, अरशद और अन्य परिजन तथा मित्रों का है उतना ही जन संस्कृति के सभी सह-कर्मियों का भी. हमने एक ऐसा साथी खोया है जिससे नयी पीढी को बहुत कुछ सीखना था, कृतित्व से भी और व्यक्तित्व से भी. हमारे सांस्कृतिक आन्दोलन के हर पड़ाव के वे साक्षी ही नहीं, निर्माताओं में थे. कलाओं के अंतर्संबंध पर जनवादी-प्रगतिशील नज़रिए से गहन विचार और समझ विकसित करनेवाले विरले समीक्षक, मूल्यनिष्ठ पत्रकारिता के मानक व्यक्तित्व के रूप में वे प्रगतिशील संस्कृति कर्म के बाहर के भी दायरे में अत्यंत समादृत रहे. उनके रचनाकार पर तो अलग से ही विचार की ज़रुरत है. जन संस्कृति मंच अपने आन्दोलन के इस प्रकाश स्तम्भ की विरासत को आगे बढाने का संकल्प लेते हुए कामरेड अनिल सिन्हा को श्रद्धांजलि व्यक्त करता है. हम साथी कौशल किशोर द्वारा अनिल जी के जीवन और व्यक्तित्व पर प्रकाश डालने वाली संक्षिप्त टिप्पणी नीचे दे रहे हैं. यह टिप्पणी और अनिल जी की तस्वीर अटैचमेंट के रूप में भी आपको संप्रेषित कर रहा हूँ.

प्रणय कृष्ण,
महासचिव,
जन संस्कृति मंच

जाने - माने लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा नहीं रहे

लखनऊ, 25 फरवरी। जाने माने लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा नहीं रहे। आज 25 फरवरी को दिन के 12 बजे पटना के मगध अस्पताल में उनका निधन हुआ। 22 फरवरी को जब वे दिल्ली से पटना आ रहे थे, ट्रेन में ही उन्हें ब्रेन स्ट्रोक हुआ। उन्हें पटना के मगध अस्पताल में अचेतावस्था में भर्ती कराया गया। तीन दिनों तक जीवन और मौत से जूझते हुए अखिरकार आज उन्होंने अन्तिम सांस ली। उनका अन्तिम संस्कार पटना में ही होगा। उनके निधन की खबर से पटना, लखनऊ, दिल्ली, इलाहाबाद आदि सहित जमाम जगहों में लेखको, संस्कृतिकर्मियों के बीच दुख की लहर फैल गई। जन संस्कृति मंच ने उनके निधन पर गहरा दुख प्रकट किया है। उनके निधन को जन सांस्कृतिक आंदोलन के लिए एक बड़ी क्षति बताया है।

ज्ञात हो कि अनिल सिन्हा एक जुझारू व प्रतिबद्ध लेखक व पत्रकार रहे हैं। उनका जन्म 11 जनवरी 1942 को जहानाबाद, गया, बिहार में हुआ। उन्होंने पटना विशविद्दालय से 1962 में एम. ए. हिन्दी में उतीर्ण किया। विश्वविद्दालय की राजनीति और चाटुकारिता के विरोध में उन्होंने अपना पी एच डी बीच में ही छोड़ दिया। उन्होंने कई तरह के काम किये। प्रूफ रीडिंग, प्राध्यापिकी, विभिन्न सामाजिक विषयों पर शोध जैसे कार्य किये। 70 के दशक में उन्होंने पटना से ‘विनिमय’ साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया जो उस दौर की अत्यन्त चर्चित पत्रिका थी। आर्यवर्त, आज, ज्योत्स्ना, जन, दिनमान से वे जुड़े रहे। 1980 में जब लखनऊ से अमृत प्रभात निकलना शुरू हुआ उन्होंने इस अखबार में काम किया। अमृत प्रभात लखनऊ में बन्द होने के बाद में वे नवभारत टाइम्स में आ गये। दैनिक जागरण, रीवाँ के भी वे स्थानीय संपादक रहे। लेकिन वैचारिक मतभेद की वजह से उन्होंने वह अखबार छोड़ दिया।

अनिल सिन्हा बेहतर, मानवोचित दुनिया की उम्मीद के लिए निरन्तर संघर्ष में अटूट विश्वास रखने वाले रचनाकार रहे हैं। वे मानते रहे हैं कि एक रचनाकार का काम हमेशा एक बेहतर समाज का निर्माण करना है, उसके लिए संघर्ष करना है। उनका लेखन इस ध्येय को समर्पित है। वे जन संस्कृति मंच के संस्थापकों में थे। वे उसकी राष्ट्रीय परिषद के सदस्य थे। वे जन संस्कृति मंच उत्तर प्रदेश के पहले सचिव थे। वे क्रान्तिकारी वामपंथ की धारा तथा भाकपा (माले) से भी जुड़े थे। इंडियन पीपुल्स फ्रंट जेसे क्रान्तिकारी संगठन के गठन में भी उनकी भूमिका थी। इस राजनीति जुड़ाव ने उनकी वैचारिकी का निर्माण किया था।

कहानी, समीक्षा, अलोचना, कला समीक्षा, भेंट वार्ता, संस्मरण आदि कई क्षेत्रों में उन्होंने काम किया। ‘मठ’ नम से उनका कहानी संग्रह पिछले दिनों 2005 में भावना प्रकाशन से आया। पत्रकारिता पर उनकी महत्वपूर्ण पुस्तक ‘हिन्दी पत्रकारिता: इतिहास, स्वरूप एवं संभावनाएँ’ प्रकाशित हुई। पिछले दिनों उनके द्वारा अनुदित पुस्तक ‘सामा्राज्यवाद का विरोध और जतियों का उन्मूलन’ छपकर आया थ। उनकी सैकड़ों रचनाएँ पत्र पत्रिकाओं में छपती रही है। उनका रचना संसार बहुत बड़ा है , उससे भी बड़ी है उनको चाहने वालों की दुनिया। मृत्यु के अन्तिम दिनों तक वे अत्यन्त सक्रिय थे तथा 27 फरवरी को लखनऊ में आयोजित शमशेर, नागार्जुन व केदार जन्तशती आयोजन के वे मुख्य कर्ताधर्ता थे।

नके निधन पर शोक प्रकट करने वालों में मैनेजर पाण्डेय, मंगलेश डबराल, वीरेन डंगवाल, आलोक धन्वा, प्रणय कृष्ण, रामजी राय, अशोक भौमिक, अजय सिंह, सुभाष चन्द्र कुशवाहा, राजेन्द्र कुमार, भगवान स्वरूप् कटियार, राजेश कुमार, कौशल किशोर, गिरीष चन्द्र श्रीवास्तव, चन्द्रेश्वर, वीरेन्द्र यादव, दयाशंक राय, वंदना मिश्र, राणा प्रताप, समकालीन लोकयुद्ध के संपादक बृजबिहारी पाण्डेय आदि रचनाकार प्रमुख हैं। अपनी संवेदना प्रकट करते हुए जारी वक्तव्य में रचनाकारों ने कहा कि अनिल सिन्हा आत्मप्रचार से दूर ऐसे रचनाकार रहे हैं जो संघर्ष में यकीन करते थे। इनकी आलोचना में सृजनात्मकता और शालीनता दिखती है। ऐसे रचनाकार आज विरले मिलेंगे जिनमे इतनी वैचारिक प्रतिबद्धता और सृजनात्मकता हो। इनके निधन से लेखन और विचार की दुनिया ने एक अपना सच्चा व ईमानदार साथी खो दिया है।

कौशल किशोर
संयोजक
जन संस्कृति मंच, लखनऊ

Tuesday, December 28, 2010

लोकतंत्र को उम्रकैद


ये मातम की भी घडी है और इंसाफ की एक बडी लडाई छेडने की भी. मातम इस देश में बचे-खुचे लोकतंत्र का गला घोंटने पर और लडाई - न पाए गए इंसाफ के लिए जो यहां के हर नागरिक का अधिकार है. छत्तीसगढ की निचली अदालत ने विख्यात मानवाधिकारवादी, जन-चिकित्सक और एक खूबसूरत इंसान डा. बिनायक सेन को भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी और धारा 124-ए, छत्तीसगढ विशेष जन सुरक्षा कानून की धारा 8(1),(2),(3) और (5) तथा गैर-कानूनी गतिविधि निरोधक कानून की धारा 39(2) के तहत राजद्रोह और राज्य के खिलाफ युद्ध छेडने की साज़िश करने के आरोप में 24 दिसम्बर के दिन उम्रकैद की सज़ा सुना दी. यहां कहने का अवकाश नहीं कि कैसे ये सारे कानून ही कानून की बुनियाद के खिलाफ हैं. डा. सेन को इन आरोपों में 24 मई, 2007 को गिरफ्तार किया गया और सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से पूरे दो साल साधारण कैदियों से भी कुछ मामलों में बदतर स्थितिओं में जेल में रहने के बाद, उन्हें ज़मानत दी गई. मुकादमा उनपर सितम्बर 2008 से चलना शुरु हुआ. सर्वोच्च न्यायालय ने यदि उन्हें ज़मानत देते हुए यह न कहा होता कि इस मुकदमे का निपटारा जनवरी 2011 तक कर दिया जाए, तो छत्तीसगढ सरकार की योजना थी कि मुकदमा दसियों साल चलता रहे और जेल में ही बिनायक सेन बगैर किसी सज़ा के दसियों साल काट दें. बहरहाल जब यह सज़िश नाकाम हुई और मजबूरन मुकदमें की जल्दी-जल्दी सुनवाई में सरकार को पेश होना पडा, तो उसने पूरा दम लगाकर उनके खिलाफ फर्ज़ी साक्ष्य जुटाने शुरु किए. डा. बिनायक पर आरोप था कि वे माओंवादी नेता नारायण सान्याल से जेल में 33 बार 26 मई से 30 जून, 2007 के बीच मिले. सुनवाई के दौरान साफ हुआ कि नारायण सान्याल के इलाज के सिलसिले में ये मुलाकातें जेल अधिकारियों की अनुमति से , जेलर की उपस्थिति में हुईं. डा. सेन पर मुख्य आरोप यह था कि उन्होंने नारायण सान्याल से चिट्ठियां लेकर उनके माओंवादी साथियों तक उन्हें पहुंचाने में मदद की. पुलिस ने कहा कि ये चिट्ठियां उसे पीयुष गुहा नामक एक कलकत्ता के व्यापारी से मिलीं जिसतक उसे डा. सेन ने पहुंचाया था. गुहा को पुलिस ने 6 मई,2007 को रायपुर में गिरफ्तार किया. गुहा ने अदालत में बताया कि वह 1 मई को गिरफ्तार हुए. बहरहाल ये पत्र कथित रूप से गुहा से ही मिले, इसकी तस्दीक महज एक आदमी अ़निल सिंह ने की जो कि एक कपडा व्यापारी है और पुलिस के गवाह के बतौर उसने कहा कि गुहा की गिरफ्तरी के समय वह मौजूद था. इन चिट्ठियों पर न कोई नाम है, न तारीख, न हस्ताक्षर , न ही इनमें लिखी किसी बात से डा. सेन से इनके सम्बंधों पर कोई प्रकाश पडता है. पुलिस आजतक भी गुहा और डा़ सेन के बीच किसी पत्र-व्यवहार, किसी फ़ोन-काल,किसी मुलाकात का कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर पाई. एक के बाद एक पुलिस के गवाह जिरह के दौरान टूटते गए. पुलिस ने डा.सेन के घर से मार्क्सवादी साहित्य और तमाम कम्यूनिस्ट पार्टियों के दस्तावेज़ , मानवाधिकार रिपोर्टें, सी.डी़ तथा उनके कम्प्यूटर से तमाम फाइलें बरामद कीं. इनमें से कोई चीज़ ऐसी न थी जो किसी भी सामान्य पढे लिखे, जागरूक आदमी को प्राप्त नहीं हो सकतीं. घबराहट में पुलिस ने भाकपा (माओंवादी) की केंद्रीय कमेटी का एक पत्र पेश किया जो उसके अनुसार डा. सेन के घर से मिला था. मज़े की बात है कि इस पत्र पर भी भेजने वाले के दस्तखत नहीं हैं. दूसरे, पुलिस ने इस पत्र का ज़िक्र उनके घर से प्राप्त वस्तुओं की लिस्ट में न तो चार्जशीट में किया था, न ”सर्च मेमों” में. घर से प्राप्त हर चीज़ पर पुलिस द्वारा डा. बिनायक के हस्ताक्षर लिए गए थे. लेकिन इस पत्र पर उनके दस्तखत भी नहीं हैं. ज़ाहिर है कि यह पत्र फर्ज़ी है. साक्ष्य के अभाव में पुलिस की बौखलाहट तब और हास्यास्पद हो उठी जब उसने पिछली 19 तारीख को डा.सेन की पत्नी इलिना सेन द्वारा वाल्टर फर्नांडीज़, पूर्व निदेशक, इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट ( आई.एस. आई.),को लिखे एक ई-मेल को पकिस्तानी आई.एस. आई. से जोडकर खुद को हंसी का पात्र बनाया. मुनव्वर राना का शेर याद आता है-
“बस इतनी बात पर उसने हमें बलवाई लिक्खा है
हमारे घर के बरतन पे आई.एस.आई लिक्खा है”
इस ई-मेल में लिखे एक जुमले ”चिम्पांज़ी इन द वाइटहाउस” की पुलिसिया व्याख्या में उसे कोडवर्ड बताया गया.( आखिर मेरे सहित तमाम लोग इतने दिनॉं से मानते ही रहे हैं कि ओंबामा से पहले वाइट हाउस में एक बडा चिंम्पांज़ी ही रहा करता था.) पुलिस की दयनीयता इस बात से भी ज़ाहिर है कि डा.सेन के घर से मिले एक दस्तावेज़ के आधार पर उन्हें शहरों में माओंवादी नेटवर्क फैलाने वाला बताया गया. यह दस्तावेज़ सर्वसुलभ है. यह दस्तावेज़ सुदीप चक्रवर्ती की पुस्तक, ”रेड सन- ट्रैवेल्स इन नक्सलाइट कंट्री” में परिशिष्ट के रूप में मौजूद है. कोई भी चाहे इसे देख सकता है. कुल मिलाकर अदालत में और बाहर भी पुलिस के एक एक झूठ का पर्दाफाश होता गया. लेकिन नतीजा क्या हुआ? अदालत में नतीजा वही हुआ जो आजकल आम बात है. भोपाल गैस कांड् पर अदालती फैसले को याद कीजिए. याद कीजिए अयोध्या पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को .क्या कारण हे कि बहुतेरे लोगों को तब बिलकुल आश्चर्य नहीं होता जब इस देश के सारे भ्रश्टाचारी, गुंडे, बदमाश , बलात्कारी टी.वी. पर यह कहते पाए जाते हैं कि वे न्यायपालिका का बहुत सम्मान करते हैं?
याद ये भी करना चाहिए कि भारतीय दंड संहिता में राजद्रोह की धाराएं कब की हैं. राजद्रोह की धारा 124 -ए जिसमें डा. सेन को दोषी करार दिया गया है 1870 में लाई गई जिसके तहत सरकार के खिलाफ ”घृणा फैलाना”, ” अवमानना करना” और ” असंतोष पैदा”करना राजद्रोह है. क्या ऐसी सरकारें घृणित नहीं है जिनके अधीन 80 फीसदी हिंदुस्तानी 20 रुपए रोज़ पर गुज़ारा करते हैं? क्या ऐसी सरकारें अवमानना के काबिल नहीं जिनके मंत्रिमंडल राडिया, टाटा, अम्बानी, वीर संघवी, बर्खा दत्त और प्रभु चावला की बातचीत से निर्धारित होते हैं ? क्या ऐसी सरकारों के प्रति हम और आप असंतोष नहीं रखते जो आदिवसियों के खिलाफ ”सलवा जुडूम” चलाती हैं, बहुराश्ट्रीय कम्पनियों और अमरीका के हाथ इस देश की सम्पदा को दुहे जाने का रास्ता प्रशस्त करती हैं. अगर यही राजद्रोह की परिभाशा है जिसे गोरे अंग्रेजों ने बनाया था और काले अंग्रेजों ने कायम रखा, तो हममे से कम ही ऐसे बचेंगे जो राजद्रोही न हों . याद रहे कि इसी धारा के तहत अंग्रेजों ने लम्बे समय तक बाल गंगाधर तिलक को कैद रखा.
डा. बिनायक और उनकी शरीके-हयात इलीना सेन देश के उच्चतम शिक्षा संस्थानॉं से पढकर आज के छत्तीसगढ में आदिवसियों के जीवन में रच बस गए. बिनायक ने पी.यू.सी.एल के सचिव के बतौर छत्तीसगढ सरकार को फर्ज़ी मुठभेड़ों पर बेनकाब किया, सलवा-जुडूम की ज़्यादतियों पर घेरा, उन्होंने सवाल उठाया कि जो इलाके नक्सल प्रभावित नहीं हैं, वहां क्यों इतनी गरीबी,बेकारी, कुपोषण और भुखमरी है?. एक बच्चों के डाक्टर को इससे बडी तक्लीफ क्या हो सकती है कि वह अपने सामने नौनिहालों को तडपकर मरते देखे?
इस तक्लीफकुन बात के बीच एक रोचक बात यह है कि साक्ष्य न मिलने की हताशा में पुलिस ने डा.सेन के घर से कथित रूप से बरामद माओंवादियों की चिट्ठी में उन्हें ”कामरेड” संबोधित किए जाने पर कहा कि ”कामरेड उसी को कहा जाता है, जो माओंवादी होता है ”. तो आप में से जो भी कामरेड संबोधित किए जाते हों ( हों भले ही न), सावधान रहिए. कभी गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने कबीर के सौ पदों का अनुवाद किया था. कबीर की पंक्ति थी, ”निसिदिन खेलत रही सखियन संग”. गुरुदेव ने अनुवाद किया, ”Day and night, I played with my comrades' मुझे इंतज़ार है कि कामरेड शब्द के इस्तेमाल के लिए गुरुदेव या कबीर पर कब मुकदमा चलाया जाएगा?
अकारण नहीं है कि जिस छत्तीसगढ में कामरेड शंकर गुहा नियोगी के हत्यारे कानून के दायरे से महफूज़ रहे, उसी छत्तीसगढ में नियोगी के ही एक देशभक्त, मानवतावादी, प्यारे और निर्दोष चिकित्सक शिष्य को उम्र कैद दी गई है. 1948 में शंकर शैलेंद्र ने लिखा था,

“भगतसिंह ! इस बार न लेना काया भारतवासी की,
देशभक्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फाँसी की !

यदि जनता की बात करोगे, तुम गद्दार कहाओगे--
बंब संब की छोड़ो, भाशण दिया कि पकड़े जाओगे !
निकला है कानून नया, चुटकी बजते बँध जाओगे,
न्याय अदालत की मत पूछो, सीधे मुक्ति पाओगे,
कांग्रेस का हुक्म; जरूरत क्या वारंट तलाशी की ! “

ऊपर की पंक्तियों में ब़स कांग्रेस के साथ भाजपा और जोड़ लीजिए.
आश्चर्य है कि साक्ष्य होने पर भी कश्मीर में शोंपिया बलात्कार और हत्याकांड के दोषी, निर्दोष नौजवानॉं को आतंकवादी बताकर मार देने के दोषी सैनिक अधिकारी खुले घूम रहे हैं और अदालत उनका कुछ नहीं कर सकती क्योंकि वे ए.एफ.एस. पी.ए. नामक कानून से संरक्षित हैं, जबकि साक्ष्य न होने पर भी डा. बिनायक को उम्र कैद मिलती है.
- मित्रों मैं यही चाहता हूं कि जहां जिस किस्म से हो , जितनी दूर तक हो हम डा. बिनायक सेन जैसे मानवरत्न के लिए आवाज़ उठाएं ताकि इस देश में लोग उस दूसरी गुलामी से सचेत हों जिसके खिलाफ नई आज़ादी के एक योद्धा हैं डा. बिनायक सेन.

प्रणय कृष्ण , महासचिव, जन संस्कृति मंच

Monday, August 30, 2010

तेभागा आन्दोलन और सोमनाथ होड़ का कलाकर्म


सोमनाथ होड़ का कलाकर्म कलाकारों को जनान्दोलनों से जुड़ने के लिए प्रेरित करता है :अशोक भौमिक

29 अगस्त 2010 कौस्तुभ सभागार, ललित कला अकादमी, नई दिल्ली में जसम के फिल्म समूह द ग्रुप की ओर से `तेभागा आन्दोलन और सोमनाथ होड़ का कलाकर्म´ विषय पर चर्चित चित्रकार व साहित्यकार अशोक भौमिक का व्याख्यान-प्रदर्शन (लेक्चर डेमनस्ट्रेशन) आयोजित किया गया। यह आयोजन हिन्दी के मशहूर कवि शमशेर बहादुर सिंह, जो कि एक चित्रकार भी थे, की याद को समर्पित था। ज्ञात हो कि यह वर्ष शमशेर का जन्मशताब्दी वर्ष भी है।

अशोक भौमिक ने बताया कि 1946 में भारत की अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी ने 23 साल के युवा कला छात्र सोमनाथ होड़ को तेभागा आन्दोलन को दर्ज करने का कार्य सौंपा था। सोमनाथ होड़ ने किसानों के उस जबर्दस्त राजनैतिक उभार और उनकी लड़ाकू चेतना को अपने चित्रों और रेखांकनों में तो अभिव्यक्ति दी ही, साथ-साथ अपने अनुभवों को अपनी निजी डायरी में भी दर्ज किया। उनकी डायरी और रेखाचित्र एक जन प्रतिबद्ध कलाकार द्वारा दर्ज किया गया किसान आन्दोलन का अद्भुत ऐतिहासिक दस्तावेज है।
अशोक भौमिक ने सोमनाथ होड़ के रेखाचित्रों के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए और बीच-बीच में उनकी डायरी के अंशों का जिक्र करते हुए कहा कि 1942 से लेकर 1946 तक सोमनाथ होड़ की कला का सफर, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा जनान्दोलनों को संगठित करने के समानान्तर विकसित होते दिखता है। यही वह दौर था जब सांप्रदायिक शक्तियां भी मजबूती से सर उठा रही थीं। तेभागा आन्दोलन में किसानों ने भूस्वामियों की सांप्रदायिक रणनीति का भी जोरदार जवाब दिया। किसान परिवार की महिलाओं ने भी इस संघर्ष में शानदार भूमिका निभाई।



इस आन्दोलन के प्रत्यक्ष अनुभव सोमनाथ होड़ के लिए आजीवन प्रेरणा का स्रोत बने रहे। उनका उस आन्दोलन के केन्द्र रंगपुर में जाना, एक रचनाकार का राजनीतिक गतिविधियोें और सक्रिय आन्दोलनों के करीब जाने की जरूरत को आज भी रेखांकित करता है। सोमनाथ होड़ द्वारा डायरी में एक बेहद गरीब किसान द्वारा एक जोतदार के प्रलोभन को ठुकरा दिए जाने की घटना की तुलना नेहरू के कथनी और करनी के फर्क से जिस तरह की गई है, वह एक तीखा राजनैतिक व्यंग्य है।
सोमनाथ होड़ को मूल्यों के मामले में किसान एक प्रधानमन्त्री से बेहतर लगता है, क्योंकि उसे घूस लेना नहीं आता- वह अपना हक लड़ कर लेना चाहता है।
कार्यक्रम का संचालन युवा मार्क्सवादी विचारक पथिक घोष ने किया।
अध्यक्षता कर रहे सुप्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक प्रो. मैनेजर पाण्डेय ने कहा कि इस व्याख्यान-प्रदर्शन के जरिए एक तरह से तेभागा के क्रान्तिकारी किसान आन्दोलन का इतिहास जीवन्त हो उठा। प्रो. पाण्डेय ने तेभागा आन्दोलन में सन्थाल आदिवासियों और महिलाओं की जबर्दस्त भूमिका की याद दिलाई। उन्होंने कहा कि आज कला की दुनिया पर बाजार का जिस तरह कब्जा हो गया है उसने चित्रकारों की राजनीतिक भूमिका को कमजोर किया है। ऐसा नहीं है कि आज चित्रकला का राजनीतिक प्रभाव कम हो गया है, बल्कि हुआ यह है कि राजनीतिक चित्रकार कम हो गए हैं। प्रो. पाण्डेय ने कहा कि आज इस देश में जब सरकार की कारपोरेटपरस्त अर्थनीति के कारण लाखों किसान आत्महत्या कर चुके हैं और जब जमीन और जंगल से किसानों और आदिवासियों को बेदखल करने के लिए सरकार जनसंहार कर रही है, तब कलाकारों का यह दायित्व है कि वे उसके प्रतिरोध में खड़े हों, उन सच्चाइयों को अपने कलाकर्म के जरिए दर्शाएं, जिनपर पर्दा डाला जा रहा है। आखिर में विचार-विमर्श के सत्र में वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल ने कहा कि सोमनाथ होड़ ने आगे चलकर किस तरह का सृजन किया व्याख्यान में इसकी झलक भी होनी चाहिए थी। कवि रोहित प्रकाश ने तेभागा और आजादी के बाद के जनान्दोलनों का जिक्र करते हुए उनके चित्रकला पर प्रभाव को लेकर सवाल किया। संस्कृतिकर्मी सुधीर सुमन ने उस दौर के साहित्यकारों और कलाकारों के सौन्दर्यबोध को निर्मित करने में राजनीति और संस्कृति के गहन रिश्ते की जो भूमिका थी, उसे चिहि्नत किया।
इस आयोजन के अन्त में दो मिनट का मौन रखकर उत्तराखण्ड के आन्दोलनकारी जनकवि गिरीश तिवारी गिर्दा के असामयिक निधन पर शोक प्रकट किया गया। इस मौके पर मुरली मनोहर प्रसाद, अशोक वाजपेयी, प्रयाग शुक्ल, इब्बार रबी, रेखा अवस्थी, कान्ति मोहन, अनिल सिन्हा, नीलाभ, मदन कश्यप, प्रणय कृष्ण, आशुतोष कुमार, वैभव सिंह, स्वाति भौमिक, मधु अग्रवाल, राधिका, नन्दिनी चन्द्रा, भाषा सिंह, उमा, वन्दना, प्रदीप दास, अनुपम राय, अजय भारद्वाज, मोहन जोशी, गौरीनाथ, कुमार मुकुल, पंकज श्रीवास्तव, रोहित कौशिक, अवधेश आदि कई जाने माने साहित्यकार-संस्कृतिकर्मी और टेकानिया कला विद्यालय के छात्रा-छात्राएं मौजूद थे।
संयोजक
संजय जोशी

Monday, August 2, 2010

विभूति नारायण राय और रवीन्द्र कालिया लेखिकाओं से माफी मांगे : जसम

जन संस्कृति मंच पिछले दिनों म.गा.हि.वि.वि. के कुलपति श्री विभूति नारायण राय द्वारा एक साक्षात्कार के दौरान हिन्दी स्त्री लेखन और लेखिकाओं के बारे में दिए गए असम्मानजनक वक्तव्य की घोर निन्दा करता है। यह साक्षात्कार उन्होंने `नया ज्ञानोदय´पत्रिका को दिया था। हमारी समझ से यह बयान न केवल हिन्दी लेखिकाओं की गरिमा के खिलाफ है,बल्कि उसमें प्रयुक्त शब्द स्त्रीमात्र के लिए भी अपमानजनक है। इतना ही नहीं बल्कि यह वक्तव्य हिन्दी के स्त्री लेखन की एक सतही समझ को भी प्रदर्शित करता है। आश्चर्य यह है कि पूरे साक्षात्कार में यह वक्तव्य पैबन्द की तरह अलग से दीखता है, क्योंकि बाकी कही गई बातों से उसका कोई सम्बंध भी नहीं है। अच्छा हो कि श्री राय अपने वक्तव्य पर सफाई देने के बजाय उसे वापस लें और लेखिकाओं से मापफी मांगे।
`नया ज्ञानोदय´ के संपादक रवीन्द्र कालिया अगर चाहते तो इस वक्तव्य को अपने संपादकीय अधिकार का प्रयोग कर छपने से रोक सकते थे, लेकिन उन्होंने तो इसे पत्रिका के प्रमोशन और चर्चा के लिए उपयोगी समझा। आज के बाजारवादी, उपभोक्तावादी दौर में साहित्य के हलकों में भी सनसनी की तलाश में कई संपादक, लेखक बेचैन हैं। इस सनसनी-खोजी साहित्यिक पत्राकारिता का मुख्य निशाना स्त्री लेखिकाएं हैं और व्यापक स्तर पर पूरा स्त्री अस्तित्व। रवीन्द्र कालिया को भी इसके लिए माफी मांगनी चाहिए।
जिन्हें स्त्री लेखन के व्यापक सरोकारों और स्त्री मुक्ति की चिन्ता है वे इस भाषा में बात नहीं किया करते। साठोत्तरी पीढ़ी के कुछ कहानीकारों ने जिस स्त्री विरोधी अराजक भाषा ईजाद की, उस भाषा में न कोई मूल्यांकन सम्भव है और न विमर्श। जसम हिन्दी की उन तमाम लेखिकाओं व प्रबुद्धजनों के साथ है जिन्होंने इस बयान पर अपना रोष व्यक्त किया है।

प्रणय कृष्ण
महासचिव, जसम


केन्द्रीय कार्यालय : टी-10, पंचपुष्प अपार्टमेंट, अशोक नगर, इलाहाबाद मोबाइल-09415637908



नया ज्ञानोदय में प्रकाशित विभूति नारायण राय की विवादित टिप्पणी और साक्षात्कार का अंश


Monday, July 26, 2010

अंधेरे की तड़प और उजाले का ख्वाब

-चंद्रभूषण का कविता पाठ

जिस ट्रेन का इन्तजार आप कर रहे हैं/ वह रास्ता बदलकर कहीं और जा चुकी है......./ सोच कर देखिए जरा/ ज्यादा दुखदायी यह रतजगा है/ या कई रात जगाने वाली पांच मिनट की/ वह नींद/ और वह भी छोड़िए/ इसका क्या करें कि ट्रेनें ही ट्रेनें, वक्त ही वक्त/ मगर न जाने को कोई जगह है न रुकने की कोई वजह (स्टेशन पर रात)

आखिर सुविधाओं की होड़ वाले इस दौर में ऐसा क्या है जिसके छूट जाने की पीड़ा कभी पीछा नहीं छोड़ती और आदमी अकेला होता चला जाता है, निरर्थकता उस पर हावी होती चली जाती है। कविता में ट्रेन तो एक ऐसा रूपक था जो अपने सारे श्रोताओं में एक-समान कसक का अहसास छोड़ता चला गया। श्रोताओं की ओर से इन पंक्तियों को सुनाने की दुबारा फरमाइश हुई।

सी-10, नोएडा सेक्टर 15 में 11 जुलाई (रविवार) को आयोजित एक अनौपचारिक अन्तरंग गोष्ठी में कवि-पत्राकार चन्द्रभूषण की कविताओं को सुनना एक तरह से विडंबनाओं, घटियापन, पाखण्ड, मौकापरस्ती से भरे मध्यवर्गीय समाज में किसी संवेदनशील और ईमानदार मनुष्य के दु:स्वप्न, उदासी, अकेलापन, व्यथा, व्यंग्य और क्षोभ को सुनना था। एक बेहतर समाज और दुनिया चाहने वाले की चेतना पर बदतर दुनिया से होने वाले सायास-अनायास मुठभेड़ों और टकरावों से कैसे-कैसे विचारों की छाप निर्मित होती है, चन्द्रभूषण की कविताओं में यह सब कुछ महसूस हुआ।
कहीं कोई बनावट नहीं और न ही कोई नकली उम्मीद। उनकी कविता में जहां इस दौर की विसंगतियों की पहचान नज़र आई वहीं उसके बीच `दुविधा´ में फंसे उस आत्मा के सूरज का सच्चा हाल भी मिला जो क्षितिज पर अटका है, न उगता है, न डूबता है। इसलिए कि वह जहां है वहां `अपनी-अपनी नींदों में खोए/ सभी नाच रहे हैं/ बहुत बुरा है यहां खुली आंख रहना।´ लेकिन मुश्किल है कि अपने पांव भी थिरक रहे हैं, उन्हें न रोकना सम्भव हो पा रहा और न ही `चहार सू व्यापी एकरस लय´ में शामिल हो पाना। इसी दुविधा से तो अपने पास थोड़ा-बहुत आत्मा का सूरज रखने वाला हर व्यक्ति गुजर रहा है, खासकर मध्यवर्गीय व्यक्ति! अब यह एक ऐसा बिंदु है जहां से अपनी विवशता को ग्लैमराइज करते हुए आदमी आत्मा के सूरज से मुक्ति पाकर चौतरफा मौजूद नंगई के नाच में शामिल भी हो सकता है या फिर उसमें रहने की विवशता को झेलते हुए भी इस परिदृश्य पर व्यंग्य कर सकता है, हालांकि यह अपर्याप्त है यह वह भी जानता है और उसकी कामना है कि नंगई को महिमामण्डित करने वालों को खदेड़ा जाए, पर ऐसा हो नहीं रहा और कविता के लिए भी जैसे यह कोई बड़ी फिक्र नहीं है, कवि को लगता है कि जब किसी वक्त नंगई के खिलाफ बैरिकेड लगेगा, तब आज की कविता
के बारे में शोधकर्ता यही कहेंगे कि घटिया जमाने के कवि भी घटिया थे। और उसके लिए यह `सबसे बड़ा अफसोस´ है।
बेशक जमाना तो घटिया है और इस घटियापन से कवि को अलग रखने का कोई घेरा है नहीं, ऐसे में श्रोताओं के लिए यह महसूस करना दिलचस्प था कि चन्द्रभूषण के कवि ने अपने लिए कौन-सा रास्ता चुना है। इस `दुविधा´ वाली राह से आगे बढ़ते हुए, कवि ने `पैसे का क्या है´ कविता के जरिए स्पष्ट रूप से जैसे अपने जमाने की नियति को तय कर दिया-
जब यार-दोस्त होते हैं, पैसा नहीं होता
जब दिल लगता है तो पैसा नहीं होता
जब खुद में खोए रहो तो भी वो नहीं होता
फिर पीछे पड़ो उसके
तो उठ-उठ कर सब जाने लगते हैं
पहले दृश्य, फिर रिश्ते, फिर एहसास
फिर थक कर तुम खुद भी चले जाते हो
दूर तक कहीं जब कुछ नहीं होता
तो पैसा होता है
पैसे का क्या है
वो तो....

जिस वक्त व्यावहारिक दुनिया में पैसे को ही मुक्तिदाता समझा जा रहा हो, व्यक्ति-स्वातन्त्रय के तर्क उसी के भीतर से निकलते हों और उसी के द्वारा बख्सी गई आजादी और सुख के भ्रम में लोग डूब-उतरा रहे हों और अपने अकेलपन और असुरक्षा की असली वजह उन्हें समझ में न आ रही हो, उस वक्त इस कविता को सुनना मानो अत्यन्त सहज अन्दाज़ में एक गम्भीर चेतावनी को सुनना था। इसी पैसे और पैसे के बल पर हासिल सुविधाओं और श्रेष्ठता के मिथ्या होड़ में गले तक डूबी- दंभ, समझौतों, मौकापरस्ती, पाखण्ड, बेईमानी से लैस नितान्त स्वार्थी और वैचारिक तौर पर उच्छृखंल आवाजें जहां परिदृश्य पर छाई हुई हों, वहां गहरी संवेदना से युक्त और हर छोटे-बड़े अहसास को आलोचनात्मक दृष्टि से देखते हुए बड़े कन्वसिंग अन्दाज में किसी वैचारिक सूत्रा या निष्कर्ष तक ले जाने वाली चन्द्रभूषण की कविताएं पाठकों और श्रोताओं के मन पर गहरा असर छोड़ गईं।
(जारी..)--सुधीर सुमन