समकालीन जनमत (पत्रिका) के लिए संपर्क करें-समकालीन जनमत,171, कर्नलगंज (स्वराज भवन के सामने), इलाहाबाद-211002, मो. नं.-09451845553 ईमेल का पता: janmatmonthly@gmail.com

Thursday, October 29, 2009

चौथा खंभा भी गया


-पी साईनाथ
सी राम पंडित अब अखबार का साप्ताहिक कॉलम लिख सकते हैं। डॉ पंडित (बदला हुआ नाम) अर्से से महाराष्ट्र से निकलने वाले भारतीय भाषा के प्रतिष्ठित अखबार में कॉलम लिखते आए हैं। लेकिन महाराष्ट्र चुनाव में नामांकन वापस लेने की अंतिम तारीख के बाद उनका कॉलम बंद कर दिया गया था। अखबार के संपादक ने उनसे माफी मांगते हुए कहा कि पंडी जी आपका कॉलम अब 13 अक्टूबर से ही छप पाएगा। ऐसा इसलिए कि तब तक के लिए हमारे अखबार का हर पन्ना बिक चुका है। अखबार का संपादक व्यक्तिगत तौर पर ईमानदार था सो उसने सच्चाई बयां कर दी।
महाराष्ट्र के चुनाव में पैसे का खेल जमकर खेला गया और थैलीशाही की परंपरा को मीडिया ने इस बार थोड़ा बढ़ चढ़कर निर्वाह किया। सभी भले न शामिल हो लेकिन कुछ ने तो हद ही कर दी। छुटभैये अखबारों को तो छोड़िए बड़े अखबारों और टीवी चैनल्स भी इस खेल में शामिल पाए गए। कई उम्मीदवारों ने ‘उगाही’ की शिकायत की, लेकिन पुरजोर तरीके से नहीं। वे सूचना उगलने वाले ड्रैगनों से डर गए। पता नहीं कब किस मौके पर आग बरसाना शुरू कर दें।
कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों को प्रबंधन के सामने शर्मसार होना पड़ा। एक ने तो गुस्से में यहां तक कह डाला कि “इस चुनाव का सबसे बड़ा विजेता मीडिया है”। दूसरे ने कहा “मीडिया इस चुनावी मौसम में मंदी से हुए नुकसान की भरपाई कर रही है”। माना जा रहा है कि न्यूज के नाम पर उम्मीदवारों के प्रचार से करोड़ों रूपए कमाए गए। विज्ञापन से इतना पैसा कमाना मुश्किल ही नहीं असंभव होता।
विधान सभा के चुनाव में “कवरेज पैकेजेज’ वाली संस्कृति पूरे महाराष्ट्र में दिखी। छोटे से छोटे कवरेज के लिए उम्मीदवारों को थैली खोलनी पड़ी। जो मुद्दा सामने आना चाहिए था वो बिल्कुल नहीं आया। पैसा नहीं तो खबर नहीं। लेकिन इसका सबसे बड़ा नुकसान उन छोटी पार्टियों और निर्दलीय उम्मीदवारों को उठाना पड़ा जिनके पास ‘खबरों’ के लिए पैसे नहीं थे। जमीनी मुद्दों को उठाने के बावजूद दर्शकों और पाठकों ने उन्हे नजरंदाज कर दिया। ‘हिंदु’ (7 अप्रैल 2009) ने ऐसी ही एक रिपोर्ट लोकसभा चुनावों पर भी छापी थी। जब कुछ मीडिया हाउस ने बकायदा 15 लाख से 20 लाख रु रेट वाला ‘कवरेज पैकेज’ बनाया था। हाई एंड उम्मीदवारों के लिए ये रेट थोड़ा और ज्यादा था।
कुछ संपादकों का कहना है कि ये नया नहीं है। बस इसका दायरा और बढ़ गया है। दोनों ओर से की जा रही थेथरई या सीनाजोरी अब एक खतरनाक रूप धारण कर रही है। गिने-चुने पत्रकारों के पैसे लेकर खबर बनाने की कला अब मीडिया हाउसेज ने पकड़ ली है। ‘खबरों’ का ये संगठित कारोबार कई सौ करोड़ रु तक पहुंच गया है। पश्चिम महाराष्ट्र के एक बागी उम्मीदवार ने एक स्थानीय मीडिया के संपादक पर 1 करोड़ रु खर्च किया और वह जीत गया जबकि उसकी पार्टी के आधिकारीक उम्मीदवार हार गए।
महाराष्ट्र चुनाव में ऐसी डील का रेंज काफी बड़ा था। इसमें कई अलग-अलग कटेग्री और रेट थे। उम्मीदवार का प्रोफाइल करना है या इंटरव्यू या फिर उसके एचिवमेंट गिनाने हैं। कॉलम और समय के हिसाब से रेट लगे। इसमें उम्मीदवारों का कुछ घंटे या दिन भर पिछा करने वाले टेलीविजन प्रोग्राम भी शामिल थे। जिसे कई बार ‘लाइव कवरेज’ या ‘स्पेशल फोकस’ जैसे कटेग्री के साथ परोसा गया। विरोधी उम्मीदवार की बुराई और पैसा देने वाले उम्मीदवार के आपराधिक रिकॉर्ड को छुपाने का रेट भी लगा। यानी हर संस्कृति की अलग कीमत। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि महाराष्ट्र के 50 परसेंट चुने गए उम्मीदवार के नाम किसी न किसी आपराधिक रिकॉर्ड में दर्ज हैं। लेकिन इनमें से जितने उम्मीदवारों की प्रोफाइल मीडिया में आई है उसमें शायद ही किसी के आपराधिक रिकॉर्ड का जिक्र किया गया।
अखबार के मुकुट पर विज्ञापन और भीतर उम्मीदवार के यशगान वाले ‘स्पेशल सप्लिमेंट’ तो रेट के मामले में सभी कटेग्री को पीछे छोड़ गया। ‘स्पेशल सप्लिमेंट’ रेट था डेढ़ करोड़ रु । केवल एक मीडिया प्रोडक्ट पर किया गया ये खर्च उम्मीदवारों के खर्च की तय सीमा से 15 गुना अधिक है।
महाराष्ट्र में जो सबसे सस्ता और कॉमन लो एंड पकैज का रेट था चार लाख रु । यह पेज के हिसाब से कम ज्यादा भी हुआ। इस पैकेज में उम्मीदवार की प्रोफाइल, उम्मीदवार के पसंद वाले चार न्यूज आईटम शामिल थे। (उम्मीदवार के दिए न्यूज आईटम को ढंग से ड्रॉफ्ट करने का रेट थोड़ा ज्यादा) था।
जारी....-

Wednesday, October 28, 2009

लोकतंत्र का खतरा या खतरे में लोकतंत्र !


न्यूज चैनल CNNIBN पर प्रसारित करण थापर के साथ अरुंधती राय का साक्षात्कार कई मायनों में महत्वपूर्ण है।
ये साक्षात्कार महज सवाल और जवाब का सिलसिला भर नहीं है। इसमें साक्षात्कार देने और लेने वाले दोनों अपने 'अनकुल लोकतंत्र'के हिसाब से सवाल जवाब कर रहे हैं। एक 'लोक'को दरकिनार करने वाली नीतियों के जरिए लोकतंत्र चाहता है तो दूसरे मौजूदा लोकतंत्र के ढांचे पर ही आपत्ति है,उसका मानना है कि मौजूदा लोकतंत्र की बनावट ही ऐसी है कि इससे 'लोक' दूर होता जा रहा है।
साक्षात्कार पांच हिस्सों में है और खासतौर पर इन सवालों पर केंद्रित है कि-
-लोकतंत्र खतरे में है या फिर खतरनाक लोकतंत्र बेनकाब हो रहा है?
-क्या नक्सलवाद और राज्य के बीच संघर्ष धनी और गरीब लोगों की सेनाओं का संघर्ष है?
-अगर अभी तक शांतिपूर्ण आंदोलन की अनदेखी के बाद क्या हिंसक संघर्ष एकमात्र रास्ता होना चाहिए है?
-क्या नक्सलियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई जरूरी है?
--क्या सरकार को खनन कंपनियों के साथ हुए MoU को सार्वजनिक करना चाहिए?
-क्या राजनेता,उद्योगपतियों के लेफ्टिनेंट की भूमिका निभा रहे हैं?
पहला हिस्सा-

दूसरा हिस्सा

तीसरा हिस्सा

चौथा हिस्सा



पांचवां हिस्सा

साभार-आईबीएनलाइव

Monday, October 26, 2009

गुणाकर मुळे को श्रद्धांजली


हिन्दी और अंग्रेजी में विज्ञान लेखन को लोकप्रिय बनाने वाले गुणाकर मुळे का 13 अक्टूबर को निधन हो गया। 1935 में विदर्भ के अमरावती जिले के सिंदी बुजरूक गांव में जन्म लेने वाले मुले की शुरुआती पढ़ाई गांव के मराठी माध्यम वाले स्कूल में हुई। उन्होने स्नातक और स्नातकोत्तर(गणित)की शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अर्जित की।आरंभ से ही स्वतंत्र लेखन कनरे वाले गुणाकर मुळे सन 1958 से विज्ञान,विज्ञान का इतिहास,पुरातत्व,पुरालिपिशास्त्र,मुद्राशास्त्र और भारतीय इतिहास और संस्कृति से संबंधित विषयों पर लेखन किया है। गुणाकर मुळे ने 35 पुस्तकों के अलावा हिंदी में 3000 से ऊपर लेख लिखा है जबकि अग्रेजी में 250 लेख प्रकाशित हो चुके हैं। राहुल सांकृत्यायन से प्रभावित गुणाकर मुळे की लेखनी सही मायने में वैज्ञानिक विचारधारा प्रचारित करने वाली रही है। गुणाकर मुळे की पहचान विज्ञान के जटिल रहस्यों को सरलता से पहुंचाने के साथ जटिलता के बहाने पनप रहे अंधविश्वासों को दूर करने में रही है।
पढ़िए'ब्रह्मांड परिचय' किताब का ये अंश।


आदिम मानव के लिए भी काल-ज्ञान व दिशा-ज्ञान भौतिक आवश्यकताएं थीं, और यह ज्ञान आकाश के पिंडों की गतियों का सतत अवलोकन करने से ही प्राप्त हो सकता था। सहस्राब्दियों के संचित अनुभव से प्राचीन मानव ने जान लिया था कि शिकार, फल-मूल या अनाज-जैसी उसकी भोजन सामग्री का संबंध ऋतुओं से है और ऋतुचक्र का ज्ञान सूर्य तथा नक्षत्रों की गतियों का अवलोकन करने से होता है।

प्राचीन मानव ने सोचा : अवश्य ही उसकी भोजन- सामग्री–वन्य पशु व वनस्पति–आकाशस्थ पिंडों की गति स्थिति से ‘प्रभावित’ है। उसने आकाश के इस ‘प्रभाव’ को अपने ऊपर भी ओढ़ लिया। इस तरह, फलित-ज्योतिष का व्यवसाय अस्तित्व में आया।
ताम्रयुगीन सभ्यताओं में पुरोहित की ज्योतिषी थे और मंदिर वेधशालाएं। ये पुरोहित-ज्योतिषी अज्ञेय प्राकृतिक घटनाओं के प्रतीक देवी-देवताओं को प्रतिनिधित्व करते थे और राजा एवं प्रजा को समय की सूचनाएं भी देते थे, इसलिए तत्कालीन समाज में इनका बड़ा सम्मान था। सूर्य और चन्द्र की गतियों का निरंतर अध्ययन करते रहने से आगे चलकर जब ये

पुरोहित-ज्योतिषी ग्रहणों के बारे में भी भविष्यवाणी करने में समर्थ हुए, तो इनका सम्मान व सामर्थ्य और भी अधिक बढ़ा। लोगों ने सोचा–ये पुरोहित-ज्योतिषी कालज्ञान तथा शुभ मुहूर्तों के प्रवक्ता हैं, ग्रहणों-जैसी भयावह घटनाओं के भविष्यवक्ता हैं, इसलिए ये मानव-जीवन की अगामी घटनाओं के बारे में भी भविष्यवाणी कर सकते हैं।

इस प्रकार पुरोहित-ज्योतिषी के अंतर्गत ही फलित-ज्योतिषी ने जन्म लिया। वैदिक काल में अत्रि कुल के पुरोहति-ज्योतिष ग्रहणों का लेखा-जोखा रखते थे और इनके बारे में भविष्यवाणी करते थे। उधर हम्मुराबी-कालीन (ईसा-पूर्व अठारहवीं सदी) बेबीलोन के पुरोहित-ज्योतिषी, न केवल ग्रहणों के भविष्यवक्ता थे, बल्कि राजा और राज्य का भी भविष्य बताने लग गए थे। सम्मान व सम्पत्ति के लोभ वश इन पुरोहित-ज्योतिषियों ने ज्योतिष-ज्ञान को रहस्य का जामा पहनाया और इसे सदियों तक अपने ही वर्ग तक सीमित रखा।

बदलती सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार काल्पनिक देवी-देवताओं के कृत्रिम स्वरूपों में रद्दोबदल करते जाने में कोई कठिनाई नहीं थी। हुआ भी ऐसा ही है। किंतु आकाश में पिंडों की नियमित गतियों में परिवर्तन करना आदमी के बस की बात नहीं था। मुख्यतः इसी भेद के कारण, बाद में, भारत के संदर्भ में ईसा की पहली सदी के आसपास से, पुरोहित-ज्योतिष का पेशा दो वर्गों में बंट गया–पुरोहित और ज्योतिषी। लेकिन अभी गणित-ज्योतिषी ही फलित-ज्योतिषी भी था। यह भी देखने को मिलता है कि कुछ गणितज्ञों का झुकाव गणित-ज्योतिष की ओर अधिक होता था और कुछ का फलित-ज्योतिष की ओर। आर्यभट (जन्म 476 ई.) को हम एक महान गणितज्ञ ज्योतिषी मानते हैं, तो वराहमिहिर (ईसा की छठी सदी) के ग्रंथ आज भी फलित-ज्योतिषियों के लिए शुभ-अशुभ विद्या के अक्षय भण्डार हैं।

खगोल-विज्ञान या ज्योतिर्विज्ञान के विकासक्रम का अध्ययन करने से स्पष्ट होता है कि जब तक आकाश के पिंडों का अवलोकन उनकी प्रत्यक्ष गतियों एवं स्थितियों तक सीमित रहा, तभी तक गणित-ज्योतिष जैसे-तैसे फलित-ज्योतिष का भी भार वहन करता रहा। परंतु जब भौतिक-विज्ञान ने जन्म लिया, ग्रह-नक्षत्रों के भौतिक गुणधर्मों की खोजबीन शुरू हुई, खगोल भौतिकी की नींव पड़ी, तब अज्ञान तथा अंधविश्वास पर आधारित फलित-ज्योतिष के सामने दो ही रास्ते थे–अपने को मिटा दे या अपना पेशा अलग कर ले। फलित-ज्योतिष मिटा नहीं। यूरोप में 1600 ई. के आसपास से ज्योतिर्विज्ञान ने अपने साथ चिपके हुए सदियों पुराने इस अंधविश्वास को त्याग दिया और स्वयं तेजी से आगे बढ़ने लगा। ग्रहगतियों के तीन प्रसिद्ध नियमों की खोज करने वाले योहानेस केपलर (1571-1630 ई.) जन्म-कुंडलियां बनाने के लिए विवश थे परंतु 1609-10 ई. में दूरबीन से पहली बार आकाश का अवलोकन करने वाले महान गैलीलियों (1564-1642 ई.) ने ऐसी किसी विवशता के सामने आत्मसमर्पण नहीं किया। जिस साल गैलीलियो की मृत्यु हुई, उसी साल आइजेक न्यूटन (1642-1727 ई.) का जन्म हुआ। न्यूटन ने हमें नया गणित दिया, नए किस्म की दूरबीन दी और दिया गुरुत्वाकर्षण का महान सिद्धांत।

अब खगोलविद शहरों के कोलाहल तथा विद्युत-प्रकाश की जगमगाहट से दूर चले गए हैं। स्वच्छ वायुमंडल से व्याप्त पर्वत-शिखरों पर स्थापित आधुनिक यंत्र-उपकरणों से युक्त वेधशालाएं उनकी कर्मभूमि है। आज के ज्योतिर्विद करोड़ों-अरबों प्रकाश-वर्ष दूर की ज्योतियों के विकिरण-प्रकाश-किरणें, रेडियों-तरंगें, एक्स-किरणें, गामा-किरणें, इत्यादि-को यंत्रोपकरणों से ग्रहण करते हैं, नए ज्ञान के आधार पर नए-नए सिद्धांतों का स्थापनाएं करते हैं। अतिविशाल-जगत का अध्ययन अतिसूक्ष्म-जगत को समझने में सहायक हो रहा है और अतिसूक्ष्म-जगत का अध्ययन अतिविशाल-जगत को समझने में। आज के वैज्ञानिक इन दोनों जगतों की अतल गहराइयों की खोजबीन में जुटे हुए हैं, वे इन दोनों में संगति खोजने में प्रयत्नशील हैं।
और, फलित-ज्योतिषी ? वह तो अब भी पुरानी आधी-अधूरी और अवैज्ञानिक जानकारी से ही चिपका हुआ है। अब तो फलित-ज्योतिषी टी.वी. चैनलों पर भी छा गए हैं। यह अंधविश्वास अनेक पत्र-पत्रिकाओं के पृष्ठों पर नियमित रूप से छपता है। हमारे देश में आज भी शासन के अनेक सूत्रधार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से फलित-ज्योतिष के प्रश्रयदाता हैं।

लेकिन अब इस स्थिति का बदलना अवश्यंभावी है। हमारे देखते-देखते खगोल-विज्ञान के विकास को एक नई दिशा मिली है और एक नये युग की शुरूआत हुई है। अब तक आकाश में पिंडों के भौतिक गुणधर्मों की हमारी जानकारी पृथ्वी पर पहुंचने वाले अनेक विकिरण विश्लेषण पर आधारित थी। लेकिन अब स्वयं मानव या उसके द्वारा निर्मित यंत्रोपकरण आकाश के पिंडों तक पहुंचने में प्रयत्नशील हैं। जब से अंतरिक्षयात्रा के युग का उद्घाटन हुआ है, तब से जनमानस में आकाश के पिंडों के बारे में अधिक कुतूहल पैदा हो गया है। आम जनता ग्रह-नक्षत्रों के बारे में अधिकाधिक वैज्ञानिक बातें जानने के लिए उत्सुक है।
इस ग्रंथ में मैंने आकाशगंगा, सूर्य, सौरमंडल के ग्रह-उपग्रह-क्षुद्रग्रह, बौने ग्रह, धूमकेतु, उल्कापिंड और आकाश के प्रमुख तारों के बारे में अद्यतन जानकारी प्रस्तुत की है- भरपूर चित्रों सहित। अंतिम दो प्रकरणों के ब्रह्मांड आदि-अंत और ब्रह्मांड में जीवन की तलाश का विवेचन है। परिशिष्ठों में खगोल-विज्ञान का संक्षिप्त विकासक्रम, खगोल-विज्ञान से संबंधित आंकड़े एवं स्थिरांक, तारा-मानचित्र, खगोल-विज्ञान की विशिष्ट शब्दावली तथा पारिभाषिक शब्दावली का समावेश है।

24 अगस्त, 2006 को प्राग में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय खगोल-विज्ञान संघ के अधिवेशन में ‘ग्रह’ की एक नई परिभाषा प्रस्तुत की गई। इसके अनुसार, अब सौर मंडल में ‘प्रधान ग्रहों’ (major planets) की संख्या नौ से घटकर आठ रह गई है; प्लूटो और उसके परे नए खोजे गए पिंड एरीस को ‘बौना ग्रह’ (dwarf planet) का दर्जा दिया गया है। सौर मंडल की इस नई व्यवस्था का पुस्तक में समावेश है।

गुणाकर मुळे की प्रमुख किताबें
• ब्रह्माण्ड परिचय
• आकाश दर्शन
• अंतरिक्ष यात्रा
• नक्षत्रलोक
• सूर्य
• कम्प्यूटर क्या है?
• भारतीय अंकपद्धति की कहानी
• भारतीय विज्ञान की कहानी
• आपेक्षिकता सिद्धान्त क्या है?
• संसार के महान गणितज्ञ
• महान वैज्ञानिक
• केपलर
• अक्षरों की कहानी
• आंखों की कहानी
• गणित की पहेलियाँ
• ज्यामिति की कहानी
• लिपियों की कहानी

Thursday, October 22, 2009

पेड़ों को दु:ख है


पेड़ों को दु:ख है कि

उस कवि ने भी कभी अपनी कविताओं में

उसका ज़िक्र नहीं किया

जो रोज़ उसकी छाया में बैठ

लिखता रहा देश-दुनियां पर कविताएं..



पेड़` कविता से : अशोक सिंह

Tuesday, October 20, 2009

मैने उससे ये कहा...

पाकिस्तान के वामपंथी कवि हबीब जालिब की ये नज्म मुशीर यानी सलाहकार के नाम से मशहूर है। जालिब ने ये नज्म अयुब खान के सलाहकार हाफिज जालंधरी से बातचीत के बाद लिखी थी। ये नज्म आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। लाल बैंड का गाया एक और गीत-

Sunday, October 18, 2009

पाकिस्तान का 'लाल बैंड'

‘लाल बैंड’ पाकिस्तान की प्रगतिशील गायन टीम है। आज ये बैंड फैज अहमद फैज,हबीब जालिब और अहमद फराज की रचनाओं को आम आदमी तक पहुंचा रहा है। लाल बैंड अपने को पाकिस्तान की प्रगतिशील परंपरा के हिस्से के बतौर देखता है। इस ग्रुप में चार सदस्य हैं, जिसमें तैमूर रहमान जो पाकिस्तान के मशहूर एकेडमिक सेंटर LUMS में प्रोफेसर हैं। लाल बैंड के लीड सिंगर शहराम अजहर है। इस्लामाबाद के इक्रा यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र पढ़ाने वाले शहराम उत्तर-भारतीय संगीत में खासी दिलचस्पी है। ग्रुप के ये दोनों सदस्य पाकिस्तान की कम्यूनिस्ट किसान पार्टी के सक्रिय सदस्य भी हैं। महवास वकार ग्रुप की बैकअप वोकल हैं और हैदर रहमान बांसुरी वादक हैं।
पाकिस्तान के जियो नेटवर्क ने ग्रुप के गीतों की लोकप्रियता को देखते हुए 'उम्मीद ए सहर' के नाम से एक अल्बम जारी किया है।
ग्रुप के इतने पॉपुलर हो चुके हैं कि इसे पाकिस्तान का जियो टीवी नेटवर्क एक अल्बम के रूप में लाने को राजी हो
सुनिए 'उम्मीद ए सहर' अल्बम का पहला गीत



लाल बैंड के गीत और इसके सदस्यों के बारे में और जानकारी के लिए आप तीन हिस्सों वाली डॉक्यूमेंट्री देख सकते हैं। लाल बैंड पार्ट 1


लाल बैंड पार्ट 2

लाल बैंड पार्ट 3

Friday, October 16, 2009

संगमन के बहाने कथा-साहित्य की जनपक्षधरता पर विमर्श


हिन्दी साहित्य में गंभीर पहचान बना चुके ´संगमन´ का 15वां आयोजन उदयपुर में 2 से 4 अक्टूबर 2009 को हुआ। नगर के समीप गांव बेदला स्थित आस्था प्रशिक्षण केन्द्र में आयोजित इस समारोह के सहयोगी जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ (डीम्ड विश्वविद्यालय) के जन शिक्षण व विस्तार कार्यक्रम निदेशालय, आस्था व राजस्थान साहित्य अकादमी थे। तीन दिन के इस जमावड़े में बाहर से आये लगभग 40 कथाकारों और साहित्यकारों के अलावा नगर के साहित्यकार, पाठक व युवा छात्र-छात्राअों की सक्रिय भागीदारी रही। नगर के आस-पास के शहरों कस्बों के साहित्यकारों-पाठकों की आवाजाही ने आयोजन को जीवंत बनाया।
कथाकारों में सर्जनात्मक संवाद को सघन बनाने, युवा कथाकारों को मंच उपलब्ध करवाने व जन आन्दोलनों में साहित्यकारों की भागीदारी जैसे मुद्दों पर केिन्द्रत इस राष्ट्रीय संगोष्ठी ने साहित्य और सामाजिक सरोकारों में एक नया आयाम जोड़ा।
पहले दिन के सत्र का विषय ´नयी सदी का यथार्थ और मेरी प्रिय पुस्तक´ था। चर्चा की शुरुआत आलोचक विजय कुमार के वक्तव्य से हुई जो पोलेण्ड की विश्व विख्यात कवयित्री शिम्बोर्सका पर केिन्द्रत था। विजय कुमार ने कहा कि लेखिका ने वर्तमान के यथार्थ को उभारने का जो प्रयास किया है, वह हमको आज के समाज की यथार्थता के बिम्बों प प्रतीकों के मूल में छिपी नग्नता व छद्म को जानने की दृष्टि देने वाला है। उन्होंने कहा कि शिम्बोर्सका का जीवन यह भी दिखाता है कि एक रचनाकार किस तरह अपने समाज की विद्रुपताओं से जिरह करता हुआ समाज को वैचारिक ताकत देता है। विजय कुमार ने शिम्बोर्सका की कुछ महŸवपूर्ण कविताओं के अंशों को भी उद्धृत किया। चर्चित युवा कथाकार वन्दना राग ने राही मासूम रजा के प्रसिद्ध उपन्यास ´आधा गांव´ के माध्यम से व्यक्ति की सामाजिक मनोदशा को स्वरूप व दिशा देनेवाले कारणों की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि यह उपन्यास इस तथ्य को उद्घाटित करता है कि ´सत्ता´ किस तरह से सच्चाई से ज्यादा अफवाहों का आतंक फैलाकर अपना हित साधती है। बाहरी शक्तियों का असर हमारे अंदरूनी रिश्तों व समरसता की भावना को तोड़ता है। कवि व उपन्यासकार हरिराम मीणा ने ´आदि धर्म´ पुस्तक के माध्यम से आदिवासी जीवन व संस्कृति में पाये जाने वाले सकारात्मक पहलुओं को आत्मासात करते हुए आज के समाज में धर्म, पर्यावरण, वैचारिक संकीर्णता, अलगाव जैसी समस्याओं से निजात पाने की दृष्टि ग्रहण करने पर बल दिया। मीणा ने विकास के नाम पर आदिवासी समाज व जीवन पर आये संकटों की चर्चा करते हुए कहा कि सरकार की जन विरोधी नीतियों के कारण आदिवासी अिस्मता संकट में है। उन्होंने इस संकट से लड़ने में लेखकीय भागीदारी की अपेक्षा बताई। समालोचक एवं गद्यकार दुगाZप्रसाद अग्रवाल ने स्वयं प्रकाश के उपन्यास ´ईंधन´ की चर्चा की। उन्होंने ईंधन को आज के युवा वर्ग के जीवन मूल्यों में आ गये अन्तद्वZन्द्व, सामाजिक मनोवृित्त व व्यक्तिगत आकांक्षाओं के बीच नये अन्तर्विरोधों को समझने में आधारभूत उपन्यास बताया। उन्होंने उपन्यास से उदाहरण देकर स्पष्ट किया कि वैश्वीकरण और बाजारवाद का हमारे जीवन पर कितना गहरा असर पड़ा है। अग्रवाल ने इसे भारतीय परिदृश्य में हो रहे भूमण्डलीकरण पर लिखा गया पहला महŸवपूर्ण उपन्यास माना। इतिहास बोध के संपादक, इतिहासकार लाल बहादुर वर्मा ने अपने उद्बोधन में सबसे पहले गाँधी के व्यक्ति और कृतित्व की चर्चा की उन्होंने गाँधी की सबसे बड़ी ताकत अपने पर गहरा विश्वास और साहस बताते हुये कहा कि आज की नई मानव विरोधी स्थितियोंं से लड़ने में ऐसी ही ताकत की जरूरत है। उन्होंने अपनी प्रिय पुस्तक हार्वर्ड फास्ट की ´सिटीजन टोम्पेन´ के कथानक पर कहा कि सृजन व संघर्ष में एक अन्तद्वZन्द्वात्मक रिश्ता होता है, जिसे समझना बेहद जरूरी है। हर सृजन जीवन के संघर्ष से उत्पन्न होता है तथा जीवन में ही अपनी सार्थकता को स्थापित करता है। उन्होंने यथार्थ के सर्जनात्मक पक्षों को उद्घाटित करने के साहस व उसके साथ चलने को इस सदी की सबसे बड़ी चुनौती बताया। चर्चा में कथाकार लता शर्मा, कैलाश बनवासी, डॉ. सर्वतुिन्नसा खान, अनुपमा सिसोदिया ने भाग लिया। इससे पहले कथाकार महेश कटारे ने संगमन के शुभारंभ की घोषणा की। सुप्रसिद्ध कवि हरीश भादानी के निधन का समाचार सत्र के प्रारंभ होने से पहले मिल गया था अत: सभी ने दो मिनट का मौन रख श्रद्धांजलि दी। संगमन के स्थानीय संयोजक पल्लव ने सभी का स्वागत किया। सत्र का संयोजन कथाकार ओमा शर्मा ने किया।
दूसरे दिन आयोजित कहानी पाठ सत्र में जयपुर के युवा कथाकार राम कुमार सिंह ने अपनी कहानी ´शराबी उर्फ हम तुझे वली समझते´ व मुम्बई से आये वरुण ग्रोवर ने ´डैन्यूब के पत्थर´ का पाठ किया। अलग-अलग शैलियों में लिखी गई इन कहानियों पर विशद् चर्चा में यह बात मुखर हुई कि वरुण की कहानी प्रागैतिहासिक काल की होते हुए भी समकालीन सवालों टकराती है वहीं रामकुमार की कहानी को भाषायी रचनात्मकता व परिवेश को जीवंत बनाने के लिए उल्लेखनीय माना गया। कथाकार योगेन्द्र आहूजा ने वरुण की कहानी के कथ्य को समकालीन मुद्दों से बचाव की युक्ति कहा तो वरिष्ठ लेखक लाल बहादुर वर्मा ने इसे असाधारण को साधारण बनाने का प्रयास बताया। उन्होंने भाषा के वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर वरुण की कहानी को दुस्साहसी बताया। सुभाषचन्द्र कुशवाहा ने कहा कि ये कहानियां मनुष्यता के संकट को हमारे सामने रखती है। युवा फिल्म समीक्षक मिहिर पंड्या ने वरुण की कहानी पर टिप्पणी में कहा कि इसके नायक व खलनायक एक ही पात्र में नजर आने से कहानी की सुन्दरता बढ़ी है। समालोचक प्रो. नवल किशोर, देवेन्द्र, ओमा शर्मा, सीमा शफक, जितेन्द्र भारती व पल्लव ने भी चर्चा में भागीदारी की। गालिब़ की पंक्ति के शीर्षक में प्रयोग पर हुई बहस पर लक्ष्मण व्यास ने कहा कि यह इस्तेमाल दादा-पोते के सम्बन्ध जैसा है जिस पर आपित्त करना उचित नहीं होगा। इस सत्र का प्रभावी संचालन वरिष्ठ कथाकार शिवमूर्ति ने किया।
इस दिन की शाम उदयपुर भ्रमण हेतु रखी गई थी। सभी प्रतिभागी उदयपुर के समीप ऐतिहासिक स्थल सज्जनगढ़, बड़ी तालाब व फतहसागर गये। यहां की प्राकृतिक सुन्दरता ने लेखकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
तीसरे दिन के अन्तिम सत्र में ´प्रतिरोध, जन आन्दोलन और साहित्य´ विषय पर चर्चा का प्रवर्तन योगेन्द्र आहूजा के वक्तव्य से हुआ। कथाकार देवेन्द्र ने कहा कि कोई विचारधारा एक युग में महŸवपूर्ण होती है किन्तु वह अन्य युग में प्रभावहीन भी हो सकती है इसलिए विचारधारा से ज्यादा जरूरी विजन है। कथाकार शिवमूर्ति ने जन आन्दोलनों से लेखकों का जुड़ाव व अपनी रचनाओं में कला के सन्तुलित उपयोग को जरूरी बताया। आलोचक डॉ. माधव हाडा ने कहा कि लेखक को मध्य वर्ग के बदलते सरोकार एवं प्राथमिकताओं की जानकारी होनी चाहिये। शोधार्थी प्रज्ञा जोशी ने लेखकों के जन आन्दोलनों से जुड़ाव न होने से रचनाओं के प्रभाव में आ रही कमी को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि दमन के बढ़ते स्वरूपों को देखकर हमें प्रतिरोध के नये तरीकों को खोजना होगा। वरुण ग्रोवर ने जन आन्दोलनों को वर्तमान पीढ़ी के लिए अमूर्त विचार कहा। उनका कहना था कि क्या सच कहना ही प्रतिरोध नहीं है र्षोर्षो हिमांशु पंड्या ने कहा कि किसी और को जवाब देने से पहले जरूरी है अपने आप को जवाब देना। चर्चा में मधु कांकरिया, सुभाष चन्द्र कुशवाहा, रतन कुमार सांभरिया, मंजू चतुर्वेदी, मनीषा कुलश्रेष्ठ, डॉ. रईस अहमद, जितेन्द्र भारती, हबीब कैफी, विजय कुमार, कैलाश बनवासी और प्रो. नवल किशोर ने भाग लिया। समापन वक्तव्य में वरिष्ठ कथाकार गिरिराज किशोर ने कहा कि कथाकार वह है जो अमूर्त को आकृति दे। किसी रचना के स्वरूप को अस्वीकार किया जा सकता है किन्तु रचनाकार की ईमानदारी पर अंगुली उठाना अनुचित है। उन्होंने कहा कि प्रतिबद्धता विरोध ही है। बाहरी दृष्टि से मूल्यांकन की प्रवृित्त को अनुचित बताते हुए उन्होंने कहा कि रचनाकार उलझनों को सुलझाने का काम करता है। गिरिराज किशोर ने नामवर सिंह के आलोचना कर्म की द्विधा पर प्रहार कर इसे वैचारिक जकड़ बताया। सत्र का संयोजन महेश कटारे व ओमा शर्मा ने किया। हिमांशु पंड्या ने स्थानीय आयोजकों की ओर से आभार माना।
कथाकार प्रियंवद के संयोजन में हुए इस आयोजन के अन्य आकर्षणों में पंकज दीक्षित द्वारा लगाई गई कथा पोस्टर प्रदर्शनी, लघु पत्रिका प्रदर्शनी व पंडित जनार्दन राय नागर के साहित्य की प्रदर्शनी भी थी। राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा आयोजन स्थल पर पुस्तक बिक्री की व्यवस्था थी। तीन दिन तक चले आयोजन में मूलचन्द्र पाठक, हरिनारायण, नवीन कुमार नैथानी, चरणसिंह पथिक, सुशील कुमार, अश्विनी पालीवाल, क़मर मेवाड़ी, ज्योतिपुंज, माधव नागदा, नन्द चतुर्वेदी, अमरीक सिंह दीप, कनक जैन, जितेन्द्रसिंह, डी.एस. पालीवाल, गजेन्द्र मीणा, गणेशलाल मीणा सहित बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमियों ने भागीदारी की।


डॉ. सुधा चौधरी
सी-2, दुगाZ नर्सरी रोड, उदयपुर-313001

Thursday, October 15, 2009

समकालीन जनमत अब मासिक पत्रिका के रूप में


‘समकालीन जनमत’ हिन्दी की ऐसी पत्रिका है जो तीन दशक की अपनी यात्रा के दौरान न सिर्फ पटना से लेकर दिल्ली तक का सफर तय किया है बल्कि समय की मांग और जरूरत के अनुसार अपना स्वरूप बदलती रही है। जन आकांक्षा के अनुरूप इसके तेवर और कलेवर में भी बदलाव आता रहा है। कभी यह मासिक हुई तो कभी त्रैमासिक और कभी तो पाक्षिक। इसी तरह इसके आकार और स्वरूप में भी बदलाव आता रहा है। लेकिन जिस साहस, संकल्प और निर्भीकता के साथ अपनी यात्रा शुरू की थी, वह समय के साथ और भी मुखर हुई है। जनविरोधी शक्तियों और विचारों के प्रति आलोचनात्मक रुख तथा जनता के सच, संघर्ष और उसकी आकांक्षा को हर कीमत पर अभिव्यक्त करना, यह इसकी पहचान रही है।
‘जनमत’ 1980 के बिहार के किसान आन्दोलन के गर्भ से पैदा हुई। इसने भोजपुर, आरा, जहानाबाद के किसान आन्दोलन को स्वर देते हुए देश के बौद्धिक व सांस्कृतिक विमर्श में हस्तक्षेप किया। लेखन से लेकर संसाधन तक के लिए जन सहयोग की बुनियाद पर खड़े होकर ‘जनमत’ ने मजबूती से समाज के उन तबकों की आवाज को बुलन्द किया जिनकी आवाज को मुख्यधारा की मीडिया में दरकिनार कर दिया जाता है। इस पत्रिका को जिलाए रखने के लिए किसानों ने धन जुटाया और अनाज तक का सहयोग दिया।

‘जनमत’ की शुरुआत पटना से हुई थी। अग्निपुष्प, नवेन्दु और श्रीकान्त - जैसे युवा लेखक व पत्रकार इसके शुरुआती संपादक थे। यह क्रान्तिकारी वामपंथी लेखक महेश्वर की प्रतिभा, परिश्रम और साथ था जिससे ‘जनमत’ में न सिर्फ राजनीतिक.वैचारिक गहराई आयी बल्कि इसके पाठकों का दायरा भी बढा। ‘आदमी को निर्णायक होना चाहिए’ इस वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ ताजिन्दगी संघर्ष करने वाले महेश्वर के लिए ‘जनमत’ उनका वैचारिक व सांस्कृतिक मंच था। ‘जनमत’ इसी प्रक्रिया में ‘समकालीन जनमत’ हुई। रामजी राय, बृजबिहारी पाण्डेय, सुधीर सुमन, प्रणय कृष्ण, के के पाण्डेय जैसे लेखक.संस्कृतिकर्मी पत्रिका के संपादन से जुड़े।

पिछले दिनों जब दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावाद के द्वारा साझी संस्कृति और प्रगतिशील मूल्यों को नष्ट कर देने की कोशिश हुई, सांप्रदायिक फासीवाद के द्वारा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का हमला किया गया, इस चुनौती का मुकाबला करने के ‘समकालीन जनमत’ के स्वरूप में बदलाव आया और एक सांस्कृतिक पत्रिका के बतौर इस चुनौती का उसने यथासंभव मुकाबला किया।

आज जिस तेजी से घटनाएं घटित हो रही हैं, लोग सिर्फ खबरे ही नहीं चाहते, उसका विश्लेषण भी चाहते हैं। हालत यह कि चाहे इलेक्ट्रानिक मीडिया हो या प्रिंट मीडिया, इस पूरे मीडिया जगत पर देशी.विदेशी पूँजी और बाजार का भारी दबाव है जिसका नतीजा है कि मीडिया और पाठक/दर्शक के बीच माल और ग्राहक का रिश्ता बनता जा रहा है। सूचना साम्राज्य के इजारेदारों ने आम आदमी और गरीब मेहनतकशों के हितों और उनके पक्षधर विचारों को मीडिया से लगभग बेदखल कर दिया है। ऐसे हलचल भरे दौर में ‘समकालीन जनमत’ ने अपना स्वरूप फिर बदला है और मेहनतकश वर्ग और उनके संघर्ष के पक्ष में खबरें और विचार लेके हर महीने उनके बीच आना तय किया है। अब यह समाचार.विचार.राजनीति की मासिक पत्रिका के रूप में सामने आयी है जिसका नया अंक - अक्तूबर 2009 अंक - इलाहाबाद से प्रकाशित हुआ है। सुनील यादव इसके नए सम्पादक हैं।

‘समकालीन जनमत’ का नया अंक 1940-50 के दौरान बंगाल में चले किसान आन्दोलन के प्रसिद्ध चित्रकार चिŸाप्रसाद के चित्रों से सजा है। आवरण कथा के अन्तर्गत सुधीर सुमन का लेख ‘भगत सिंह का पंजाब आज’ है जो बताता है कि हरित क्रान्ति ने प्रदूषण का जो जहर पैदा किया है उसका दुष्प्रभाव ग्रामीण गरीबों को ही झेलना पड़ता है। अरिन्दम सेन का विशेष लेख है ‘वामपंथ: नई गतिशीलता की तलाश’। ‘पड़ोस’ स्तम्भ के अन्तर्ग पत्रकार और नेपाल मामलों के विशेषज्ञ आनन्द स्वरूप वर्मा बता रहे हैं ‘नेपाल: आसान नहीं है आगे की डगर’। जापान में हुए चुनाव में बदलाव के लिए जनादेश पर जहां सुन्दरम की टिप्पणी है वहीं भाषा सिंह ने बदनाम मोदी सरकार की पुलिस के द्वारा फर्जी मुठभेड़ के नाम पर ठण्डे दिमाग से की गई ‘इशरत जहां’ की हत्या के मुद्दे को उठाया है। ‘समय संवाद’ में अनिल सदगोपाल का लेख है ‘सिब्बल की शिक्षा का सच’।

नये अंक में आनन्द प्रधान का लेख है ‘दोहा वार्ता: दिल्ली की बेताबी क्यों ?’ वहीं ‘अर्थजगत’ में तापस रंजन साह का विश्लेषणात्मक लेख है ‘बेलगाम क्यों है मँहगाई ?’ सुप्रसिद्ध मानवाधिकारवादी व बालरोग चिकित्सक डॉ विनायक सेन का इंटरव्यू है जिसमें उनका कहना है कि शान्ति और निःसैन्यीकरण के लिए बड़े जन आंदोलन की जरूरत है। उड़ीसा के नियमागिरी पर्वतमाला में ब्रिटेन की कंपनी वेदान्त एल्यूमीनियम को दिये खनन अधिकार ने किस तरह पर्यावरण, वहां के आदिवासियों तथा जीव.जन्तुओं के लिए संकट खड़ा किया है, इसकी पूरी कहानी बता रहे हैं मनोज सिंह। ‘समकालीन जनमत’ के इस अंक में बांग्ला के कवि नवारुण भट्टाचार्य तथा हिन्दी कवि दिनेश कुमार शुक्ल की कविताएँ हैं, वहीं चर्चित कवि वीरेन डंगवाल के नए कविता संग्रह ‘स्याही ताल’ की समीक्षा है। नये रूप में प्रकाशित ‘समकालीन जनमत’ का यह शुरुआती अंक होने के बावजूद प्रभावित करता है, आगे और बेहतर व विविधतापूर्ण पत्रिका की उम्मीद जगाता है।

‘समकालीन जनमत’ के इस नये अंक का लोकार्पण डाॅ भीमराव अम्बेडकर महासभा सभागार, लखनऊ में 8 अक्तूबर को हुआ। कार्यक्रम का आयोजन जन संस्कृति मंच और लेनिन पुस्तक केन्द्र ने संयुक्त रूप से किया जिसकी अध्यक्षता वरिष्ठ कवि व कथाकार भगवान स्वरूप कटियार ने की। कार्यक्रम का संचालन कवि और जसम, लखनऊ के संयोजक कौशल किशोर ने किया। पत्रिका का लोकार्पण करते हुए जाने.माने लेखक और पत्रकार अनिल सिन्हा ने कहा कि हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन से पत्रकारिता के क्षेत्र में जो सामाजिक व राष्ट्रीय चेतना आयी थी उसे पूँजी तथा बाजार के दबाव ने खत्म कर दिया है। आहत व व्यथित कर देने वाली खबरें और घटनाएं भी इस तरह से परोसी जा रही हैं जो हमें संवेदित नहीं करती। इस चिन्ताजनक स्थिति ने ही वैकल्पिक या जनपक्षधर मीडिया की जरूरत को सामने ला दिया है। ‘समकालीन जनमत’ का मासिक के बतौर प्रकाशन इस दिशा में एक कारगर व जरूरी कदम कहा जायेगा।

इस मौके पर बोलते हुए ‘समकालीन जनमत’ के सम्पादक सुनील यादव ने कहा कि जब खूबसूरती से ‘आम आदमी’ के नारे की आड़ लेकर आम आदमी के सवालों को दरकिनार किया जा रहा है, हमारे पत्थर दिल नेता आत्ममुग्धता के शिकार होकर अपनी मूर्तियां गढवाने तथा हरिजन बस्ती में गांधी जयन्ती मनाने का नाटक करने में मशगूल हैं, ऐसे में इन ताकतों का पर्दाफाश करते हुए जनता के सच और संघर्ष को मीडिया के माध्यम से बुलन्द करना ही सच्ची पत्रकारिता है। इसी मकसद से ‘समकालीन जनमत’ को हम अपने पाठकों के हाथ सौंप रहे हैं। समाज की बेहतरी के लिए सक्रिय लोगों का सहयोग ही इसकी ताकत है।

समकालीन जनमत: प्रधान संपादक-रामजी राय, संपादक-सुनील यादव, कीमत-15 रुपये, वार्षिक-150 रुपये, कार्यालय-171, कर्नलगंज (स्वराज भवन के सामने) , इलाहाबाद-211002, मो. नं.-09451845553