Friday, October 24, 2008
Wednesday, October 22, 2008
Thursday, October 2, 2008
चप्पल पर भात
Wednesday, October 1, 2008
फिर परमाणु समझौते पर विवाद क्यों था...

भारत-अमेरिकी परमाणु समझौते पर अमेरिकी संसद में बुधवार रात दस बजे बहस होगी। अमेरिकी संसद बहस और वोटिंग पर इस शर्त के साथ तैयार हुई है कि भारत कोई परमाणु परीक्षण नहीं करगा। इस शर्त को न मानने पर परमाणु समझौता खत्म हो जाएगा। परमाणु समझौता खत्म होने के बाद भी भारत को एक प्रमाण पत्र देना होगा कि उसने परीक्षण में अमेरिकी तकनीक का इस्तेमाल नहीं किया है।
Thursday, September 25, 2008
आपराधिक अर्थशास्त्र की शिनाख्त

मौजूदा आर्थिक संकट को समझने के लिए बस एक ही उदाहरण काफी है वह है हर्षद और केतन पारीख जैसे लोगों की करतूत पर नजर डालना। जिस तरह केतन पारीख और हर्षद मेहता ने बैंकों के पैसे का इस्तेमाल किया उसी तरह बड़े रूप में जो लीमन और बाकी इन्वेस्टमेंट बैंकर्स ने किया। हमारे देश में तो यह व्यक्तिगत और सीमित दायरे वाला प्रयोग था जो काफी हद तक सफल रहा है। बस थोड़ी बहुत अड़चने थी वो रेगुलेटरी यानी नियामकों की ओर से आ रही थीं। जिसे अब नई अर्थनीति के तहत हटा दिया गया है। अब आपके पीएफ वाले पैसे रिलायंस या कोई दूसरी कंपनी मैनेज करेगी। ज्यादा मुनाफा मिलेगा। क्योंकि अब हर्षद का संस्थानीकरण हो चुका है। लेकिन जिस मॉडल को हम अपने कानून के साथ आजमा रहे थे। पूंजी को पूर्णतया कनवर्टेबल बनाने जा रहे थे तभी यह खतरे में कैसे पड़ गया। आका के देश की हालत खराब होने लगी है। सभी डुबती कंपनियों को आका खरीद रहे हैं कहां हम बेचन आयोग बनाकर संभावना तलाश रहे थ। हमारे चापलूस पत्रकार संसद में बहुमत के बाद न जाने कौन-कौन से आर्थिक सुधार की गुंजाइश देख रहे थे। लेकिन अब तो आका ही अपने देशवाशियों से 700 अरब डॉलर की भीख मांग रहे हैं और साथ में चेतावनी भी दे रहे हैं।
हम इस लोभी अर्थव्यवस्था के तमाम पहलुओं तक आपको ले जाएंगे जो इसे संकट तक ले गईं। यह कोई चौंकाने वाली घटना नहीं है बल्कि यह हर सदी में इसे ले जाती है। लेकिन इससे सबक लेना बहुत जरूरी है क्योंकि जब-जब यह संकट में फंसदी है तो उससे उबरने के क्रम में यह भयानक मानवीय अपराध को जन्म देती है। तेल और हथियार हासिल करने की कोशिश तेज होगी। क्रुरता भरे युद्ध के बहुत मानवीय कारण होंगे। लेकिन हम सबसे पहले इस आपराधिक अर्थव्यवस्था के तर्कों को सजगता के साथ समझना होगा।
वित्तीय बाजार में पूंजी संचय या कैपिटल एकुमलेशन की तय परणति ने उन तर्कों को बिखेर कर रख दिया, जिसमें पूंजी को आवारा बनाने में ही भलाई बताई जाती थी। लेकिन हैरत की बात यह है कि इस संकट का दोषारोपण महज कुछ सीईओ और उपरी अधिकारियों की गलती के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन अर्थशास्त्री फ्रिडमैन और अमेरिकी राष्ट्रपति उम्मीदवार मैकनेन अब मानने लगे हैं कि यह लालच और भ्रष्टाचार की परणति हैं। अर्थशास्त्र की संतुलनवादी विचारधारा के समर्थक मुंह छुपाते घुम रहे हैं।

लेकिन हमें यह सब समझने के लिए इनके रेगुलेटरी यानी नियामकों में सुधारों की प्रक्रिया पर गौर करना जरूरी है। 1970 स्टॉक ट्रेडिंग से ई रुकावटें कानूनी रूप से हटाई गई। जिसमें इन्वेस्टमेंट बैंकर्स और बैंक की भूमिका को अलग रूप में देखता था। 1990 में Glass-Steagall जैसे कानून को भी पिछली सीट पर बिठा दिया दिया। इस रियायत के साथ ही बैंक और इन्वेस्टमेंट बैंकर्स के बीच का फर्क पूरी तरह दूर हो गया। । बैंकर्स और निवेशक एक बन गए। Glass-Steagall के खात्मे के बाद इन्वेस्टमेंट बैंकर्स ने न केवल ट्रेडिंग में हांथ पांव फैलाना शुरू किया बल्कि वे कॉमर्शियल बैंक की उस पूंजी को भी बाजार में ले जाने लगे जो लोगों ने मेहनत से जमा की थी। जाहिर यह काम कॉमर्शियल बैंक की मिलीभगत से होता था और सरकार इसके लिए कानूनी सहुलियते प्रदान कर रही थी। धीरे-धीरे AIG जैसी बीमा कंपनियां भी इस कारोबारी गठजोड़ में शामिल हो गईं। मुनाफा कमाने की होड़ में वे मनी मार्केट तक कसे लिवरेज फंडिंग उगाहने में एक-दूसरे से होड़ लेने लगे। इसी लिवरेज में वे सिक्यूर्टाइजेशन के बिजनेस में बूरी तरह घुस गए। (जारी...)
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Sunday, September 21, 2008
नहीं रहीं प्रभा खेतान

हिन्दी की सुप्रसिद्ध लेखिका प्रभा खेतान का कल देर रात निधन हो गया। दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर डा. खेतान की की रचनाओं में आआ॓ पेपे घर चलें, पीली आंधी, अपरिचित उजाले, छिन्नमस्ता, बाजार बीच बाजार के खिलाफ, उपनिवेश में स्त्री काफी लोकप्रिय हैं। विश्व विख्यात अस्तित्ववादी चिंतक व लेखक ज्यां पाल सार्त्र पर उनकी पुस्तकें भी काफी चर्चित हैं। लेकिन प्रभा खेतान को सबसे ज्यादा ख्याति फ्रांसीसी रचनाकार सिमोन द बोउवा की पुस्तक ‘दि सेकेंड सेक्स’ के अनुवाद ‘स्त्री उपेक्षिता’ से मिली। श्रद्धांजली के बतौर समकालीन जनमत इसी पुस्तक के लिए लिखी गई उनकी भूमिका के अंश दे रहा है। 1949 में लिखी गई ' द सैकेण्ड सेक्स ' के सन्दर्भ में भारतीय स्त्रियों को लेकर 1989 में लिखे गये प्रभा खेतान के विचारआज भी उतने ही प्रसंगिक हैं।
हमें बड़ी उदारता से सामान्य स्त्री और उसके परिवेश के बारे में सोचना होगा। सीमोन ने उन्हीं के लिये इस पुस्तक में लिखा है और उन्हीं से उनका सम्वाद है‚ विशिष्टों या अपवादों से नहीं।
— प्रभा खेतान
स्त्री पैदा नहीं होती उसे बना दिया जाता है — सीमोन द बोउवार
'स्त्री उपेक्षिता' की भूमिका के अंश
प्रभा खेतान
" इस पुस्तक का अनुवाद करने के दौरान कभी – कभी मन में एक बात उठती रही है। क्या इसकी ज़रूरत है? शायद किसी की धरोहर मेरे पास है‚ जो मुझे लौटानी है। यह किताब जहां तक बन पड़ा मैं ने सरल और सुबोध बनाने की कोशिश की। मेरी चाह बस इतनी है कि यह अधिक से अधिक हाथों में पहुंचे। इसकी हर पंक्ति में मुझे अपने आस – पास के न जाने कितने चेहरे झांकते नज़र आए। मूक और आंसू भरे। यदि कोई इससे प्रेरणा पा सके‚ औरत की नियति को हारराई से समझ सके‚ तो मैं अपनी मेहनत बेकार नहीं समझूंगी। हांलाकि जो इसे पढ़ेगा‚ वह अकेले पढ़ेगा‚ लेकिन वह सबकी कहानी होगी। हाँ‚ इसका भावनात्मक प्रभाव अलग – अलग होगा।"
" आज यदि कोई सीमोन को पढ़े‚ तो कोई खास चौंकाने वाली बात नहीं भी लग सकती है। आज स्त्री के विभिन्न पक्षों पर बहुत कुछ लिखा जा रहा है‚ लेकिन मैं यह सोचती हूँ कि यह पुस्तक हमारे देश में आज भी बहस का मुद्दा हो सकती है। हम भारतीय कई तहों में जीते हैं। यदि हम मन की सलवटों को समझते हैं‚ तो ज़रूर यह स्वीकारेंगे कि औरत का मानवीय रूप सहोदरा कही जाने के बावज़ूद स्वीकृत नहीं है। हमारे देश में औरत यदि पढ़ी – लिखी है और काम करती है‚ तो उससे समाज और परिवार की उम्मीदें अधिक होती हैं। लोग चाहते हैं कि वह सारी भूमिकाओं को बिना किसी सिकायत के निभाए। वह कमा कर भी लाए और घर में अकेले खाना भी बनाए‚ बूढ़े सास – ससुर की सेवा भी करे और बच्चों का भरन – पोषण भी। पड़ोसन अगर फूहड़ है तो उससे फूहड़ विषयों पर ही बातें करे‚ वह पति के ड्राईंगरूम की शोभा भी बने और पलंग की मखमली बिछावन भी। चूंकि वह पढ़ी – लिखी है‚ इसलिये तेज – तर्रार समझी जाती है‚ सीधी तो मानी ही नहीं जा सकती। स्पष्टवादिता उसका गुनाह माना जाता है। वह घर निभाने की सोचे‚ घर बिगाड़ने की नहीं। सब कुछ तो उसी पर निर्भर करता है? समाज ने इतनी स्वतन्त्रता दी‚ परिवार ने उसे काम करने की इजाज़त दी है‚ यही क्या कम रहमदिली है! फिर शिकायत क्या?"
" यह पुस्तक न मनु संहिता है और न गीता न रामायण। हिन्दी में इस पुस्तक को प्रस्तुत करने का मेरा उद्देश्य सिर्फ यह है कि विभिन्न भूमिकाओं में जूझती हुई‚ नगरों – महानगरों की स्त्रियां इसे पढ़ें और अपनी प्रतिक्रिया मुझे लिख कर भेजें। यह सच है कि स्त्री के बारे में इतना प्रामाणिक विश्लेषण एक स्त्री ही दे सकती है। बहुधा कोई पाठिका जब अपने बारे में पुरुष के विचार और भावनाएं पढ़ती है‚ तब उसे लेखक की नीयत पर कहीं संदेह नहीं होता। ' अन्ना कैरेनिना पढ़ते हुए या शरत चन्द्र का 'शेष प्रश्न' पढ़ते हुए हम बिलकुल भूल जाते हैं कि इस स्त्री – चरित्र को पुरुष गढ़ रहा है‚ और यदि लेखक याद भी आता है तो श्रद्धा से मस्तक नत हो जाता है। पर यह बात भी मन में आती है कि यदि 'अन्ना' का चरित्र किसी स्त्री ने लिखा होता‚ तो क्या वह 'अन्ना' को रेल के नीचे कटकर मरने देती? यदि देवदास की ' पारो' को स्त्री ने गढ़ा होता‚ तो क्या वह यूं घुट – घुट कर मरती?"
" फ्रांस की जो स्थिति 1949 में थी‚ पश्चिमी समाज उन दिनों जिस आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन के दौर से गुज़र रहा था‚ वह सायद हमारा आज का भारतीय समाज है‚ उसका मध्यमवर्ग है‚ नगरों और महानगरों में बिखरी हुई स्त्रियां हैं‚ जो संक्रमण के दौर से गुज़र रही हैं।"
" आज 1989 में हो सकता है कि सीमोन के विचारों से हम पूरी तरह सहमत न हों‚ हो सकता है कि हमारे पास अन्य बहुत सी सूचनाएं ऐसी हों‚ जो इन विचारों की कमजोरियों को साबित करें‚ फिर भी बहुत सी स्त्रियां उनके विचारों में अपना चेहरा पा सकती हैं। कुछ आधुनिकाएं यह कह कर मखौल उड़ा सकती हैं कि हम तो लड़के – लड़की के भेद में पले ही नहीं। सीमोन के इन विचारों में मैं देश तथा विदेश में अनेक महिलाओं से बातें करती रही हूँ। हर औरत की अपनी कहानी होती है‚ अपना अनुभव होता है‚ पर अनुभवों का आधार सामाजिक संरचना तथा स्थिति होते हैं। परिस्थितियां व्यक्ति की नियंता होती हैं। अलगाव में जीती हुई स्त्रियों की भी सामूहिक आवाज़ तो होती ही है। आज से बीस साल पहले औसत मध्यवर्गीय घरों में स्वतन्त्रता की बात करना मानो अपने ऊपर कलंक का टीका लगवाना था। मैं यहां पर उन स्त्रियों का ज़िक्र नहीं कर रही‚ जो भाग्य से सुविधासम्पन्न विशिष्ट वर्ग की हैं तथा जिन्हें कॉन्वेन्ट की शिक्षा मिली है। मैं उस औसत स्त्री की बात कर रही हूँ‚ जो गाय की तरह किसी घर के दरवाजे पर रंभाती है और बछड़े के बदले घास का पुतला थनों से सटाए कातर होकर दूध देती है।
हममें से बहुतों ने पश्चिमी शिक्षा पाई है‚ पश्चिमी पुस्तकों का गहरा अध्ययन किया है‚ पर सारी पढ़ाई के बाद मैं ने यही अनुबव किया कि भारतीय औरत की परिस्थिति 1980 के आधुनिक पश्चिमी मूल्यों से नहीं आंकी जा सकती। कभी ठण्डी सांसों के साथ मुंह से यही निकला‚ " काश! हम भी इस घर में बेटा हो कर जन्म लेते! " लेकिन जब पारम्परिक समाज की घुटन में रहते हुए और यह सोचते हुए कि पश्चिम की औरतें कितनी भाग्यशाली हैं‚ कितनी स्वतन्त्र एवं सुविधा सम्पन्न हैं और तब सीमोन का यह आलोचनात्मक साहित्य सामने आया‚ तो मैं चौंक उठी। सारे वायवीय सपने टूट गए। न पारम्परिक समाज में पीछे लौटा जा सकता है और न ही आधुनिक कहलाने वाले पश्चिमी समाज के पीछे झांकता हुआ असली चेहरा स्वीकार करने योग्य था। सीमोन ने उन्हीं आदर्शों को चुनौती दी‚ जिनका प्रतिनिधित्व वे कर रही थीं। औरत होने की जिस नियति को उन्होंने महसूस किया उसे ही लिखा भी। उन्होंने पश्चिम के कृत्रिम मिथकों का पर्दाफाश किया। पश्चिम में भी औरत देवी है‚ शक्तिरूपा है‚ लेकिन व्यवहार में औरत की क्या हस्ती है?"
" सीमोन को पढ़ते हुए औरत की सही और ईमानदार तस्वीर आंखों में तैरती है। यह समझ में आता है कि हम अकेले औरत होने का दर्द एवं त्रासदी को नहीं झेल रहीं। यह भी लगा कि हमारे देश की ज़मीन अलग है। वह कहीं – कहीं बहुत उपजाऊ है तो कहीं – कहीं बिलकुल बंजर। कहीं जलता हुआ रेगिस्तान है‚ तो कहीं फैली हुई हरियाली‚ जहां औरत के नाम से वंस चलता है। साथ ही यह भी लगा कि सीमोन स्वयं एक उदग्र प्रतिभा थीं और उनकी चेतना को ताकत दी सात्रर् ने‚ जो इस सदी के महानतम दार्शनिकों में से एक हैं। क्या सात्रर् की सहायता के बिना सीमोन इतना सोच पातीं? हमारी संस्कृति का ढांचा अलग है। सीमोन औरत के जिन भ्रमों एवं व्यामोहों का ज़िक्र करती हैं‚ हो सकता हैवे हमारे लिये आज भी ज़रूरी हों।"
" पुस्तक लिखते हुए स्त्री की स्थिति का उन्होंने बिना किसी पूर्वाग्रह के विश्लेषण किया। उन्होंने कहाः " स्त्री कहींं झुण्ड बना कर नहीं रहती। वह पूरी मानवता का हिस्सा होते हुए भी पूरी एक जाति नहीं। गुलाम अपनी गुलामी से परिचित हैं और एक काला आदमी अपने रंग से‚ पर स्त्री घरों‚ अलग – अलग वर्गों एवं भिन्न – भिन्न जातियों में बिखरी हुई है। उसमें क्रान्ति की चेतना नहीं‚ क्योंकि अपनी स्थिति के लिये वह स्वयं ज़िम्मेदार है। वह पुरुष की सहअपराधिनी है। अतः समाजवाद की स्थापना मात्र से स्त्री मुक्त नहीं हो जायेगी। समाजवाद भी पुरुष की सर्वोपरिता की ही विजय बन जाएगा। — सीमोन द बोउवार( द सैकेण्ड सेक्स)"
" नारीत्व का मिथक आखिर है क्या? क्यों स्त्री को धर्म‚ समाज‚ रूढ़ियां और साहित्य – शाश्वत नारीत्व के मिथक के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं। सीमोन विश्व की प्रत्येक संस्कृति में पाती हैं कि या तो स्त्री को देवी के रूप में रखा गया है या गुलाम की स्थिति में। अपनी इन स्थितियों को स्त्री ने सहर्ष स्वीकार किया‚ बल्कि बहुत सी जगहों पर सहअपराधिनी भी रही। आत्महत्या का यह भाव स्त्री में न केवल अपने लिये रहा‚ बल्कि वह अपनी बेटी‚ बहू या अन्य स्त्रियों के प्रति भी आत्मपीड़ाजनित द्वेष रखती आई है। परिणामस्वरूप स्त्री की अधीन्स्थता और बढ़ती गई।"
— प्रभा खेतान ( स्त्री उपेक्षिता की भूमिका के अंश)
Wednesday, September 17, 2008
मुनाफाखोरों का संकट

राजकीय हस्तक्षेप को रोड़ा मानने वाली अर्थव्यवस्था को आज "राज्य" की जरूरत है। दिवालिया हो चुके बैंक सरकारी सहायता के लिए गिड़गिड़ा रहे हैं। जाहिर है सरकार भी अगर उस व्यवस्था को सही मानती है तो वह अपने संपोलों को दूध जरूर पिलाएगी। रही टैक्सपेयर्स की बात तो उनकी परवाह क्यों करें। खजाना भरा है। तुफान की कोई खास चिंता नहीं है। क्योंकि दुनिया के बहुत से हिस्सों में या तो संघर्ष शुरू है या शुरू होने वाला है। हथियार उद्योग के लिए पूरा बाजार पड़ा है। लेकिन आड़े तिरछे तरीकों से संतुलन बनाने की ठगहारी अर्थव्यवस्था के दिन खत्म हो गए हैं। संकट की जो तस्वीर फिलहाल पेश की जा रही है वो केवल वित्तीय बाजार की चिंता मे डुबा हुआ है। वस्तु उत्पादन के संकट पर तो अभी नजर ही नहीं जा रही है। खर्च करने की ताकत कम होने से पड़ने वाले बेहिसाब असर को अभी भी छुपाया जा रहा है। अगर विकसित देशों में यह संकट आगे भी जारी रहा (जैसी उम्मीद है) तो निर्यात पर निर्भर विकासशील देशों की स्थिति बद से बदतर हो जाएगी। (जारी...
Wednesday, September 10, 2008
पार्टिकल भौतिकी का इम्तहान

आज भौतिकी के पांच सिद्धांतों के सही गलत पर फैसला शुरू हो रहा है।। इन सिद्धांतो को विकसित करने के लिए वैज्ञानिकों ने अपना जीवन लगा दिया। हम पाठकों को बताने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर कौन से हैं वे पांच सिद्धांत और किस तरह से एलएचसी प्रयोग उन्हे कटघरे में खड़ा कर सकता है-
1-बिंग बैंग सिद्धांत- लार्ज हड्रॉन कोलाइडर्स में क्वार्क ग्लुआन प्लाज्मा तैयार करेगा। यह ऐसा तत्व है जो बिगबैंग के ‘तत्काल’ (मिली सेकेंड) बाद की अवस्था में मौजूद होता है। उस वक्त क्वार्क ग्लुआन प्लाज्मा अवस्था का तापमान सूरज के तापमान से 100,000 गुना ज्यादा होगा। लेकिन यह तेजी से ठंडा होकर क्वार्क में तब्दील होगा और बाकी कणों में विलीन हो जाएगा। यही वह कण है जिसे वैज्ञानिक देखने की कोशिश करेंगे। अगर वे इसे परख लेते हैं तो यह जानना आसान हो जाएगा कि आखिर न्यूट्रान और प्रोटान 100 गुना भारी क्यों हो जाते हैं।
वैज्ञानिक इस प्रयोग में एक ब्लैक होल पैदा करेंगे। जो इस प्रयोग को आलोचना के घेरे में ले लिया है। कुछ लोगों का मानना है कि अगर सुई की आंख के बराबर भी ब्लैक होल पैदा होगा तो सारी पृथ्वी को लील लेगा। लेकिन प्रयोग करने वाले इसे मजाक मानते हैं उनका कहना है कि वे एक लैंप के बराबर भी इस ब्लैक होल से एनर्जी नहीं निकलने देंगे।
2-सट्रींग सिंद्धांत- स्ट्रींग सिद्धांत मानता है कि कण शून्य आयाम वाला न होकर एक आयामी तार की तरह होता है। लेकिन इस प्रयोग से इस तैरते तार वाले आयाम की समझ तब संकट में पड़ सकती है जब एका नाम का कण का आयाम ऐसा न साबित करे।
कुछ वैज्ञानिक एका स्पार्टिक्लस नाम के कण को 11 वें आयाम से मिला संकेत मानते हैं। इस प्रयोग के बाद यह तय हो जाएगा कि वाकई दुनिया 11 आयाम वाली है। जिसमें से चार आयाम का तो हम अनुभव कर लेते हैं लेकिन बाकी सात आयाम प्रकृति की ताकत को एकीकृत करते हैं।
3-‘हमारा अकेला यूनिवर्स नहीं है’ सिद्धांत
अगर वैज्ञानिक इस प्रयोग के जरिए ग्लुआन के सुपर सिमेट्रिक पार्टनर्स यानी ग्लुयानो को ढूंढ लेते हैं तो यह माना जा सकता है कि हम यूनिवर्स में अकेले नहीं हैं यानी हमारा यूनिवर्स इकलौता नहीं है।
4-यूनिवर्स का डार्क मैटर सिद्धांत –आज वैज्ञानिकों का बड़ा हिस्सा मानता है कि ब्रह्मंड का 96 फीसदी हिस्सा डार्क मैटर और उर्जा से बना है। जिसे न तो हम देख सकते हैं और शायद ही खोज सकते हैं। वैज्ञानिक मानते है कि यूनिवर्स का 26 फीसदी हिस्सा डार्क मैटर से बना है। इसका अहम तत्व है न्यूट्रिलिआनो है। वैज्ञानिक मानते हैं कि अगर यह पता चल जाय कि न्यूट्रिलिआनो ही इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है तो इसका उत्पादन करना आसाना होगा। एलएचसी के प्रयोग के दौरान अगर मलवे में न्यूट्रिलियानों मिलता है तब तो डार्क मैटर सिद्धांत बना रहेगा अन्यथा यह सिद्धांत भी सवालों के घेरे में होगा।
5-पार्टिकल भौतिकी का स्टैंडर्ड मॉडल –अगर हिग्स पार्टिकल या हिग्स की तरह के पार्टिकल्स मिलते हैं तो यह बहुत बड़ी खोज नहीं होगी। लेकिन ऐसा भी संभव है कि यह पार्टिकल भौतिकी में नए मोर्चे खोल दे। कुछ वैज्ञानिक मान रहे हैं कि एलएचसी प्रयोग में जो टक्कर से मलवा पैदा होगा उसमें केवल हिग्स पार्टिकल्स ही मिलें और कुछ नहीं। यानी प्रोजेक्ट की असलफलता।
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