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Wednesday, September 5, 2007

जो सोचते हैं, वे वामपंथी होते हैं : अरुंधति राय



भारतीय समाज को आप किस नजरिये से देखती हैं?

किसी भी समाज के बारे में दो वाक्यों में नहीं बताया जा सकता है. एक लेखक समाज के बारे में बताने में पूरी जिंदगी गुजार देता है. लेकिन मुझे लगता है कि दक्षिण अफ्रीका में जिस प्रकार का रंगभेद होता था, ऐसा ही भारत में भी है. वहां आप काले-गोरे के भेद को खुलेआम देख सकते थे, लेकिन यहां पहचान करने में थोड़ी मुश्किल है. यह भी रंगभेद का ही एक प्रकार है.

आप कई बार समाज के सर्वहारा वर्ग के पक्ष में खड़ी नजर आयीं. इसके पीछे क्या कारण रहा?
मेरे ख्याल में दो किस्म के लोग होते हैं. एक, जिनका शक्तिशाली लोगों के साथ नेचुरल एलाइनमेंट रहता है, दूसरे वे लोग हैं जिनके पास कुछ नहीं है. जनता के पास शक्ति तो काफी है, लेकिन देश में जो कुछ हो रहा है, उसे किस प्रकार से ठीक किया जाये, उसका सही तरीका समझ में नहीं आ रहा है. अगर कोई प्रधानमंत्री भी बन जाये, तो वह सबकुछ सुधार नहीं सकता. मुझे नहीं लगता है कि ऊपर से कोई सुधार हो सकता है, सुधार निचले स्तर से ही संभव है.

अभी देश की विकास दर 10 फीसदी के पास है, सरकारी आंकड़ों में 26 फीसदी लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं, हर साल अरबपति लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है, सेंसेक्स डेली रिकॉर्ड ऊंचाई छू रहा है, विदेशी पूंजी का प्रवाह बना हुआ है. इस पूरे ताने-बाने को आप किस रूप में देखती हैं?
ये जो हो रहा है, वह ठीक नहीं है. यह सिर्फ उनको अच्छा लग रहा होगा, जो निजी कंपनियों के सीइओ होंगे, जिनका स्टॉक एक्सचेंज काफी बढ़ रहा है. इसको कैसे रोका जाये इस सवाल का जबाव ढूंढना होगा. मुझे लगता है कि गांधीवादी माहौल का जो रेसिस्टेंस है वो अब नहीं चलता. इसमें पूरी तरह एनजीओ आ गये हैं, लोगों को बांट देते या खरीद लेते हैं. इस माहौल को बदलने का हल क्या है? हल है भी या नहीं, ये भी हमें पता नहीं? मुझे लगता है कि अगर कोई रैडिकल रिवोल्यूशनरी सोल्यूशन नहीं होता है तो फिर कुछ वर्षों में पूरे देश में अपराध बढ़ जायेगा.
सरकार की नीतियां समाधान के बदले किस तरह जनता के हितों के विरुद्ध जा रही है?
आज आप कुछ भी करो सरकार, पुलिस और आर्मी कुचल देती है. पहले तो इसलामिक टेररिज्म का नाम लिया जाता था, लेकिन अब उन्हें लगता है कि इसलामिक टेररिज्म में सब नहीं आते इसमें सिर्फ मुसलमान ही आते हैं, तो बाकियों को कैसे बंद किया जाये. अब जो इस्लामिक टेररिज्म के श्रेणी में नहीं आते हैं उसे माओवादी टेररिस्ट बना दिया गया है. इस तरह राज्य के लिए आतंकवाद का जो पुल है वह बढ़ रहा है. अभी जो कुछ छत्तीसगढ़ में हो रहा है यही चीज कोलंबिया जैसे देश में हुआ था. वहां पर सरकार ने खुद एक पिपुल मिलिशिया खड़ी कर दी और विद्रोहियों के साथ उनका सिविल वार जैसी स्थिति बन गयी, जब सभी लोग छद्म युद्ध देख रहे थे, तो एक बड़ी कंपनी वहां जाकर खनिज की खुदाई की, यही छत्तीसगढ़ में हो रहा है. लोगों को नचाने में ये लोग काफी उस्ताद हैं. इन दिनों एक बात पर काफी चर्चा हो रही है कि सीइओ को 25 करोड़ की सैलरी मिलनी चाहिए या नहीं. इसमें कहा गया कि अगर उनका वेतन कम होगा तो रिफॉर्म की प्रक्रिया बंद हो जायेगी. अब आप बताइये इन दिनों किसी कंपनी के सीइओ के पद पर किस तबके लोग बैठते हैं.

पिछले डेढ़-दो दशक में हमारे देश में उपभोक्तावादी संस्कृति काफी हावी होती जा रही है.आपकी नजर में समाज पर इसका क्या असर हो रहा है?
कुछ दिनों पहले अखबार में एक बड़ा विज्ञापन शॉपिंग रिवोल्यूशन के संबंध में आया था. मुझे लगता है कि भारत में उदारीकरण की जो नीति आयी है इसने मध्य वर्ग को फैलाया है. इससे आज हमारे देश में अमीरी-गरीबी की खाईं बढ़ती जा रही है, अमीर और धनी होते जा रहे हैं, गरीब पिछड़ते जा रहे हैं. उदाहरण के लिए सौ लोगों को रोटी, कपड़ा, पानी और यातायात की सुविधा मिलती है लेकिन अधिकतर लोग इससे वंचित रह जाते हैं. लेकिन यदि आप कोई नयी आर्थिक नीति लाते हैं, जिसके तहत 25 लोगों को बहुत अमीर बनाते हैं और बाकी 75 लोगों से सभी कुछ छीन लेते हैं तो इसका दीर्घकालीन प्रभाव समझा जा सकता है. अभी भारत का बाजार इस प्रकार से बनाया जा रहा है कि ज्यादातर लोगों से काफी कुछ छीन कर कुछ लोगों को दे दिया जाये. अब यह समझना होगा कि ये लोग उपभोक्ता की वस्तु कहां से ला रहे हैं. यदि आप भारत का नक्शा देखें, तो पता चलता है कि जहां पर जंगल है उसके नीचे खनिज- संपदा है. अब आपके पास चुनने का विकल्प है. जंगल को काट कर निकाल दें और इससे बहुत पैसा भी मिलेगा पर इससे 50 वर्षों में सारा देश सूख जायेगा. हमारे देश के प्रधानमंत्री हों या मोंटेक सिंह अहलूवालिया या पी चिंदबरम इनके पास कोई कारगर नीति नहीं है सिर्फ आंकड़े दिखाते हैं. इससे ज्यादा खतरनाक क्या हो सकता है कि बगैर किसी ऐतिहासिक साहित्यिक या सामाजिक नजरिये से देखने के बजाय आप आंकड़ों के आधार पर आगे बढ़ रहे हैं.

एक तरफ अमेरिकी नीति मानवता के इतनी खिलाफ लगती है, लेकिन दूसरी ओर हर कोई अमेरिका जाने का मौका छोड़ना नहीं चाहता है. ऐसा क्यों?
अमेरिका के लिए मुझे कोई चाह नहीं है, मैं सच कहूं तो मुझे घसीट कर भी ले जाओ तो मैं वापस चली आऊंगी. इतना मशीनी बन कर मैं रहने का सोच भी नहीं सकती हूं. लेकिन अगर आप किसी गांव के दलित हों, आप वहां पानी नहीं पी सकते, किसी के सामने नहीं जा सकते और फिर आपको अमेरिका जाने का मौका मिले तो क्यों नहीं जायेंगे? अमेरिका ज्यादातर नेताओं और अधिकारियों के बच्चे ही जाते हैं. लेकिन इतना सत्य है कि यह खतरनाक प्रवृत्ति है.

किस प्रकार से आप खतरनाक मानती हैं?

खतरनाक है, अगर आप 16 या 18 वर्ष के बच्चे को अमेरिका भेज दो तो उसका पूरा दिमाग या उनके सोचने का तरीका बदल जाता है. वो भी किसी जेल में नहीं, बल्कि विश्वविद्यालयों में. वहां उनका पूरा ब्रेन वॉश हो जाता है. यह अमेरिकी नीति है कि नौजवानों को पहले अपने यहां प्रशिक्षण दो और फिर उन्हीं का इस्तेमाल अपने हितों के लिए करो, जैसा कि 1973 में चिली में जो कू हुआ था आइएमए के खिलाफ. इससे पहले अमेरिका ने वहां के नौजवानों को शिकागो स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में भर्ती किया, स्कॉलरशिप देकर इनके दिमाग में न्यू कंजरवेटिव फ्री मार्केट आइडियोलॉजी डाल दी गयी और फिर इन लोगों ने चिली का जिस तरह से दोहन किया वह सभी को पता है. हमारे भारत में भी मुख्यत: इलीट वर्ग के बच्चे अमेरिका जाते हैं, जिनके बाप-दादा यहां मंत्री, ब्यूरोक्रेट या बड़े बिजनेसमैन हैं. इस तरह से यह पूरा चक्र घूमता है.

भारतीय लेखन का मौजूदा दौर आपको कैसा लगता है?
ये भारतीय लेखन क्या है? मैं इसे नहीं मानती हूं. क्या जो अंगरेजी में लिखते हैं वे अलग हैं? हिंदी या भोजपुरी में लिखनेवालों में ऐसा नहीं है. अंगरेज़ी के भारतीय लेखक, कहानी को घुमा-फिरा कर पाठक को संदेह में डाल देते हैं. भारतीय भाषाई लेखन का क्या भविष्य देखती हैं?
भारतीय भाषाई लेखन का भविष्य, क्षेत्र पर निर्भर करता है लेकिन मुझे लगता है कि भाषाई लेखन का माहौल पूरी तरह से अलग हो रहा है. इलीट वर्ग समाज से पूरी तरह अलग हो गया है. निम्न तबका उनके पास पहुंच नहीं पाता, ऐसे में दोनों के बीच संवादहीनता का माहौल पैदा हो गया है. दोनों के पास कोई भाषा ही नहीं बची है और जब आपको लिखना होगा तो दोनों को समझने की आवश्यकता होगी. इस तरह की परिस्थिति में आप कैसे भाषाई लेखन का भविष्य देख सकते हैं.

ऐसा देखने में आता है कि इलीट वर्ग के बच्चे समज से पूरी तरह कट से गये हैं. इसके पीछे प्रमुख वजह क्या है?
आपने सही कहा कि आज के धनी वर्ग के बच्चे पूरी तरह से समाज से कटे हुए हैं. कुछ दिनों पहले इसी वर्ग में से आनेवाली एक लड़की ने कहा कि अरुंधति तुम्हारी किताब द अलजेब्रा ऑफ इनफिनिट जस्टिस मैंने अपने भाई को पढ़ने को दिया तो उसने काफी आश्चर्य से आदिवासियों के बारे में बोला भारत में इस प्रकार के प्राणी भी रहते हैं. ऐसा नहीं है कि ये बच्चे खराब हैं या दिल से बुरे हैं. लेकिन समाज से कट से गये हैं. इसके पीछे मुझे कारण लगता है कि इनदिनों इस प्रकार की दुनिया बन रही है जिसमें गाड़ी, अखबार, कॉलेज, अस्पताल, शिक्षा आदि सभी कुछ इस वर्ग के लिए अलग है. जबकि पहले ऐसी बात नहीं थी. आज जो समाज में खाई बनी हुई है, यह किसी भी तरह से लाभकारी नहीं हो सकता. इसी वजह से ये इलीट वर्ग आज सिर्फ छीननेवाले बन गये हैं, इनसे आप किसी भी तरह की उम्मीद नहीं कर सकते हैं.

आप अमेरिका, आस्ट्रेलिया जैसे देशों में जाकर वहां के सरकार की नीतियों के खिलाफ लिखती हैं. इस तरह से लिखने का साहस आप कैसे दिखा पायीं?
जब 11 सितंबरवाली घटना हुई तो मैंने इस घटना के विषय में काफी सोच-विचार किया. इसके बाद मैंने निर्णय लिया कि अगर मैं लेखिका हूं तो इसपर लिखूंगी. अगर नहीं लिख सकती तो जेल में जाकर बैठना मेरे लिया ज्यादा अच्छा होगा. यह निर्णय मैंने तुरंत लिया और लिख डाला. लेकिन भारत में काफी लल्लो-चप्पो करनेवाले लोग हैं, यहां बुश के खिलाफ लिखनेवाले बहुत कम लोग हैं, जबकि आपको अमेरिका में इनके खिलाफ बोलनेवाले काफी ज्यादा मिलेंगे. वियतनाम की लड़ाई के खिलाफ अमेरिका में जितना विरोध हुआ वह मिसाल है. सैनिकों ने अपने मेडल वापस कर दिये. क्या भारत में ऐसा संभव है? कश्मीर के मुद्दे पर सेना ने कभी कुछ नहीं बोला.

न्यायपालिका से आपके विरोध को लेकर काफी चर्चा हुई थी. क्या आपको लगता है कि देश में न्यायिक सक्रियता के दौर के बावजूद न्यायिक ढ़ांचा खासा जर्जर है?
मुझे लगता है कि प्रजातंत्र में सबसे खतरनाक संस्था ज्यूडिसियरी है, क्योंकि यह जिम्मेदारी से अपने को मुक्त किये हुए है. कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट ने सबको डरा दिया है. आप इसके खिलाफ कुछ नहीं कर सकते हैं, प्रेस भी कुछ नहीं कर सकता. अगर आप जजमेंट को देखें तो आपको पता चलेगा कि कोर्ट कितनी गैरजिम्मेदाराना ढंग से निर्णय देती है. प्रजातंत्र में ज्यूडिसियरी का इतना शक्तिशाली होना सही नहीं है.

जल, जंगल और जमीन के मुद्दे पर आप काफी काम करती हैं. जिस तरह से जंगल बहुराष्ट्रीय कंपनियों को दिया जा रहा है और आदिवासियों को उनके अधिकार से वंचित किया जा रहा है. इसका भविष्य आप किस रूप में देखती हैं?
एक किताब है जिसका नाम कोलैप्स है. इसमें एक ईस्टर आइलैंड के बारे में लिखा गया है जो प्रशांत महासागर में है. यहां काफी बड़े-बड़े पेड़ों को वहां रहने वाले लोग अपने रिवाज कि लिए काटा करते थे, जबकि उन्हें मालूम था कि तेज समुद्री हवाओं से ये बड़े पेड़ उन्हें बचाते हैं, लेकिन फिर भी उन्होंने एक-एक करके पेड़ों को काट डाला और अंत में समुद्री तूफान से वह आइलैंड नष्ट हो गया, कमोबेश भारत में भी यही स्थिति बनती जा रही है. सरकार शॉर्ट टर्म फायदा के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों को माइनिंग करने की इजाजत दे रही है और ये कंपनियां अंधाधुंध प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रही हैं, जिसका कुप्रभाव हमें कुछ वर्षों के बाद दिखायी देगा. मानव और जानवर में यही अंतर है कि जानवर भविष्य नहीं देखते हैं और मानव भविष्य के बारे में सोचते हैं. लेकिन यहां समस्या यह है कि सरकार ज्यादा लंबा भविष्य न देखकर कम समय का भविष्य देख रही है. यह सही है कि आज इन्हें बहुराष्ट्रीय कंपनियां माइनिंग के बदले काफी धन दे रही हैं, लेकिन आज से पचास वर्ष बाद क्या स्थिति होगी? एक वेदांत नाम की कंपनी उड़ीसा में बॉक्साइट निकाल रही है जबकि बदले में वह वहां विकास करने की बात करती है. लेकिन जहां बॉक्साइट का भंडार है उससे उड़ीसावासियों को पानी मिलता है. अब आप ही बताइये उसे खत्म करने के बाद पानी की कमी होगी या नहीं. इसलिए सरकार थोड़े समय के लाभ के लिए लंबे समय वाले नुकसानवाली नीति पर चल रही है.

हथियार और बम के बूते दुनिया में दादागिरी दिखाने वाले राष्ट्रों के खिलाफ कोई विश्वजनमत क्यों नहीं तैयार हो पा रहा है?
पूंजीवादी दौर में सभी अपने-अपने फायदे में लगे हुए हैं. किसी के खिलाफ जाने पर फायदा नहीं की सोच पूरे राष्ट्र में व्याप्त् है. लेकिन यह शॉर्ट टर्म विजन है. वास्तव में इसका फायदा कुछ शक्तिशाली राष्ट्र उठा रहे हैं.
हाल में ही अमेरिका और भारत के बीच हुए न्यूक्लियर डील को आप किस रूप में देखती हैं?
भारत और अमेरिका के बीच हुए न्यूक्लियर डील को देखकर मुझे यह लगता है कि हमारे नेताओं ने अदूरदर्शिता दिखायी है. उन्हें यह नहीं मालूम कि जिन्होंने भी अमेरिका के साथ डील किया, उनकी क्या हालत हो गयी. अमेरिका अब एक ऐसी नीति बनायेगी जिससे वह पूरी भारतीय अर्थव्यवस्था को नियंत्रण में ले लेंगे. फिर कहेंगे एनरॉन का कॉट्रेक्ट साइन करो नहीं तो यह नहीं देंगे, वह नहीं देंगे. इस तरीके से अमेरिका भारत के ऊपर हावी हो जायेगा.

आतंकवाद आज पहले से ज्यादा खतरनाक मुद्दा बन गया है, इस चुनौती से निपटने के लिए दुनिया में जो भी पहल हो रही है, उसमें देशों की आपसी गुटबंदी ही ज्यादा दिखायी पड़ती है. आतंकवाद की चुनौती से निपटने का कारगर तरीका क्या हो सकता है?
आप इसे रोकने की जितनी ज्यादा कोशिश करेंगे यह उतना ही ज्यादा बढ़ेगा. इस्लामिक देशों का सारे तेल पर नियंत्रण कर रहे हैं. हर चीजों का निजीकरण किया जा रहा है. अगर आप किसी के संसाधन पर कब्जा करेंगे तो इसके खिलाफ विद्रोह तो फैलेगा ही. इससे निपटने के लिए सरकारों को अपने नीतियों को लेकर आत्मचिंतन करने की आवश्यकता है. भारत की ही स्थिति देखें तो छत्तीसगढ़ में 600 गांवों के लोगों को हटा कर एक पुलिस कैंप में डाल दिया जाता है. हजारों लोगों को घर से बेघर करने का असली मकसद क्या है? असली आतंकवादी वे ही हैं जो नंदीग्राम से लोगों को भगा रहे हैं, कलिंग नगर में गोली चला रहे हैं. जहां तक विश्वस्तर पर आतंकवाद की समस्या से निपटने के प्रयास की बात है, मुझे लगता है कि इसके लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं हो रहा है. सभी अपने-अपने लाभ की प्रकृति को देखते हुए आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई करते हैं.

आपके विचारों में वामपंथ का प्रभाव ज्यादा दिखता है, इसकी वजह क्या है?
मेरा वामपंथ, पार्टीवाला वामपंथ नहीं है. सोचने वाले जो भी लोग होंगे, निश्चित रूप से उनके विचारों में वामपंथ का प्रभाव दिखायी देगा, यह बात कहने में मुझे कोई ऐतराज नहीं है. सरकार की नीतियों के बारे में सोचने पर कभी-कभी तो मुझे लगता है कि मैं पागलखाने चली जाऊंगी.

आप गांधी जी से किस तरह से प्रभावित हैं?

कुछ चीजों में गांधी जी से काफी प्रभावित हूं, लेकिन गांधी जी के जाति के संबंध में जो विचार थे उनसे मैं असहमत हूं. मुझे गांधी के आर्थिक विचार काफी प्रासंगिक लगते हैं लेकिन सरकार ने उनके विचार को खेल बना दिया है. यह गांधी के विचारों का मखौल उड़ाना है. राजनीतिज्ञ इस समय गांधी के नाम का इस्तेमाल अपने राजनीतिक उद्देश्य के लिए करते हैं. जहां फायदा होता है, वहां गांधी के नाम का दुरुपयोग करने से भी परहेज नहीं करते.

ऐसी चर्चा है कि इन दिनों मेधा जी से आपका कुछ वैचारिक मतभेद चल रहा है? इसके पीछे मूल वजह क्या है?
यह सरासर गलत बात है, मेरा मेधा जी से किसी प्रकार का अनबन नहीं है. वे एक कर्मठ सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जबकि मैं अपने आपको सोशल वर्कर नहीं मानती हूं क्योंकि मैं कष्ट उठा कर कोई काम नहीं कर सकती. मैं अपने आपको लेखिका मानती हूं. मैं किसी मुद्दे पर लिख सकती हूं. मुझमें नेतृत्व का गुण नहीं है. मैं नेता कभी नहीं बन सकती हूं.

आप अपने लेखन और रचनात्मक आंदोलन में हिस्सेदारी को लेकर आगामी सालों के लिए क्या प्रतिबद्धता मानती हैं?
मैं किसी को आगे रास्ता दिखाउंगी इसका मैं वचन नहीं दे सकती. मैं नियम बना कर कोई काम नहीं करती. वक्त के अनुसार निर्णय लेती हूं।
(प्रभात खबर से साभार)

Monday, September 3, 2007

हरिप्रसाद चौरसिया का पॉवर एंड ग्रेस-1



गिरिजेश ने इस साप्ताहिक कॉलम में कुछ बदलाव किया गया है। अब एल्बम के संगीत की समीक्षा के साथ रागों के बारे में पॉपुलर तरीके से जानकारी देंगे। हरिप्रसाद चौरसिया का पॉवर एंड ग्रेस पार्ट 1 की समीक्षा कुछ इसी नजरिए से की गई है। जिसमें हम राग दुर्गा के साथ मालकौंस तक से आपको रूबरू कराएंगे । हमारी इस पहल पर अपनी प्रतिक्रिया जरूर दें।

कलाकार - पं हरिप्रसाद चौरसिया
लेबल- टाइम्स म्यूजिक

कीमत- 295 रु


किशोरी अमोनकर का गाया 'गीत गाया पत्थरों ने' याद कीजिए। अब लता-मुकेश का 'चंदा रे मोरी पतिया ले जा ' गुनगुनाकर देखिए। कुछ कॉमन लगता है? आपको महूसस होगा कि दोनों के सुर काफी मिलते-जुलते हैं। दरअसल ये दोनों गाने एक ही राग पर आधारित है। राग है - दुर्गा । भक्ति रस से भरा शाम का खूबसूरत राग है। सोचिए कि जिन सुरों का चंचल सा इस्तेमाल करके इतने मधुर गीत बने हैं वो सुर , वो राग जब अपनी गति में, अपने पूरे विस्तार के साथ सामने आएगा तो कैसा दिखेगा। सीडी की शुरुआत में पं हरिप्रसाद चौरसिया कहते हैं कि वो सुबह की आराधना के तौर पर राग दुर्गा ही बजाते हैं। मैहर घराने के हरिप्रसाद चौरसिया सिद्ध संगीतकार हैं। हाथ भर की बांसुरी की देह में जब उनसी फूंक प्रवेश करती है तो नन्हीं सी , बेजान बांसुरी गाने लगती है। कोई मीठा सा राग, कोई आंचलिक धुन आस-पास भर जाती है। पक्के सुरों और सधे हुए विस्तार से आस- पास की कैफ़ियत बदल जाती है। आंखें मुंद जाती हैं। आप राग-रागिनी के बारे में कुछ भी नहीं जानते तो भी सुनते हुए आपको लगता है - इसमें कुछ है , इसी को संगीत कहते होंगे।

ये सीडी 2001 में अहमदाबाद में हुए सप्तक म्यूजिक फेस्टिवल की रिकॉर्डिंग है। इंट्रोडक्शन के बाद पहला ट्रैक है राग दुर्गा। सबसे पहले शांत, ठहरा सा आलाप शुरू होता है। मंद्र के सुरों से सा पर आना। उसके बाद सा रे , सा ध़ के बीच खेलना। अच्छा संगीतकार आपको ललचाता है। हरि जी, जिस फोर्स से षड़ज से ऋषभ पर पहुंचते हैं उसके बाद आपको लगता है कि अब मध्यम की बारी है। लेकिन वो धीरे से सुरों की सीढ़ियां बनाते लौट आते हैं। फिर से सा , ध़, सा, रे..। उसके बाद रे-रे लगाते हुए मध्यम को छूकर लौट आना। राग में पांच ही सुर हैं - सा रे म प ध सां, अब इन्हीं के साथ खेलना है। इसलिए, धीरे-धीरे..।

अलबम के तकरीबन सत्रहवें सेंकेंड में जोड़ शुरू होता है। ध्रुपद शैली में। और यहां शामिल होते हैं कम दिखनेवाले, अति विलक्षण वाद्य पखावज के साधक पंडित भवानी शंकर। भवानी शंकर ऐसे घराने से आते हैं जो पखावज पर कथक के साथ संगत करने के लिए मशहूर था। बहरहाल , पखावज का पावर और बांसुरी का ग्रेस एक साथ निखरने लगते हैं। सुर के साज़ पर सुर के साथ ताल दिखने लगता है, ताल के साज़ पर ताल के साथ सुर। ताल के इर्द गिर्द बांसुरी और पखावज एक दूसरे से अठखेलियां करते हैं। दो महान संगीतकारों का ये समन्वय सुनने लायक है। तालियों की गड़गड़ाहट के साथ ट्रैक खत्म होता है।

अगला ट्रैक है राग मालकौंस। बहुत पॉपुलर राग है। शांत रस का राग है। गाने -बजाने का समय है आधी रात। आधा है चंद्रमा रात आधी, अंखियन संग अंखियां लागी आज , आए सुर के पंछी आए, मन तड़पत हरि दर्शन को आज - सब इसी राग पर बने हैं। तकरीबन तीन मिनट का आलाप। आलाप में हरि जी के सुर थोड़े उखड़े उखड़े से लग रहे हैं। शायद पिछले राग की द्रुत बजाने की थकान है । बहरहाल .. झपताल यानी 10 बीट्स में रचना शुरू होती है। तबले पर हैं फर्रुखाबाद घराने के बेहतरीन तबला वादक ऑनिंदो चटर्जी। तबले और बांसुरी की ये एक आम जुगलबंदी है। बहुत चमत्कार देखने को नहीं मिलता। बाइसवें मिनट में तबले पर लयकारी दिखती है। दस मात्रा की झपताल की लय बनाए रखते हुए आठ मात्रा और सोलह मात्रा की लयकारी। ये वो वक्त है से जब मुख्य कलाकार संगतकार को इशारा करता है - ले उड़ो। अनिंदो ने यहां अच्छी सी तिहाई ली है। अट्ठइसवें मिनट पर तबले को एक बार फिर मौका मिलता है। बांसुरी लय दे रही है- तबला मुख्य स्थान ले लेता है। तकरीबन एक मिनट तक उंगलियों की सफाई दिखाते हुए ऑनिंदो चटर्जी यहां भी एक सधी हुई तिहाई लेकर सम पर लौटते हैं। इसके बाद आखिरी के दो मिनट ध्यान खींचनेवाले हैं।

कुल मिलाकर, दुर्गा सुनने के लिए आप ये सीडी ले सकते हैं, लेकिन मालकौंस सूनने के लिए पचासों मिलेंगे।

गिरिजेश.

Saturday, September 1, 2007

नवारुण भट्टाचार्य की कविता



यह सिंगुर गांव की तापसी मलिक है। इसने अपनी ज़मीन टाटा को देने से मना कर दिया। इस युवती के साथ एक रात इसकी ज़मीन पर ही सीपीएम के लोगों ने बलात्कार किया और ज़िंदा जला दिया।
जो भाई निरपराध हो रही इन हत्याओं का बदला लेना नहीं चाहता
मैं उससे घृणा करता हुं...
जो पिता आज भी दरवाजे पर निर्लज्ज खड़ा है
मैं उससे घृणा करता हुं...
चेतना पथ से जुड़ी हुई आठ जोड़ा आंखे*
बुलाती हैं हमे गाहे-बगाहे धान की क्यारियों में
यह मौत की घाटी नहीं है मेरा देश
जल्लादों का उल्लास मंच नहीं है मेरा देश
मृत्यु उत्पत्यका नहीं है मेरा देश
मैं देश को वापस अपने सीने में छूपा लूंगा...

यही वह वक्त है जब पुलिस की झुलसाऊ हैड लाइट रौशनी में
स्थिर दृष्टि रखकर पढ़ी जा सकती है कविता
यही वह वक्त है जब अपने शरीर का रक्त-मांस-मज्जा देकर
कोलाज पद्धति में लिखी जा सकती है कविता
कविता के गांव से कविता के शहर को घेर लेने का वक्त यही है
हमारे कवियों को लोर्का की तरह हथियार बांधकर तैयार रहना चाहिए....

-नवारुण भट्टाचार्य

*(सत्तर के दशक में कोलकाता के आठ छात्रों की हत्या कर धान की क्यारियों में फेंक दिया था। उनकी पीठ पर लिखा था देशद्रोही..)

Thursday, August 30, 2007

क्रूरता संस्कृति की तरह आएगी


तब आएगी क्रूरता
पहले ह्रदय में आएगी और चेहरे पर न दिखेगी
फिर घटित होगी धर्मग्रंथो की ब्याख्या में
फिर इतिहास में और
भविष्यवाणियों में
फिर वह जनता का आदर्श हो जाएगी
....वह संस्कृति की तरह आएगी,
उसका कोई विरोधी नहीं होगा
कोशिश सिर्फ यह होगी
किस तरह वह अधिक सभ्य
और अधिक ऐतिहासिक हो
...यही ज्यादा संभव है कि वह आए
और लंबे समय तक हमें पता ही न चले उसका आना
# कुमार अंबुज

Tuesday, August 28, 2007

एल्बम समीक्षा- मिस्टीक साउंडस्केप-फारेस्ट


संगीत शोरगुल या चिल्लाहट है या फिर विवेकपूर्ण तार्किक लय प्रक्रिया। यह अपने प्रकृत में एकाकी है या सामाजिक, इस पर विवाद हो सकता है। लेकिन गिरिजेश की समीक्षा इसे एक व्यवस्थित विधा के रूप में स्थापित करती है। अनुभव, जो कुछ लोगों को व्यक्तिगत हरकत लगता है, इस समीक्षा में सामाजिक परिघटना लगेगी। गिरिजेश न केवल एक बेहतरीन गायक हैं, बल्कि ये संगीत को सामाजिक विकास से जोड़कर देखते हैं। बनावटी संगीत इनकी नजरों को धोखा नहीं देता। इस समझ को हर हफ्ते आपके साथ बांटेंगे संगीत के किसी नए एल्बम या गायक के साथ।

एल्बम-मिस्टीक साउंडस्केप्स- फ़ॉरेस्ट (म्यूजिक टूडे)
सीडी की कीमत-295 रुपए


पहले कहीं सुना होगा तो आप भी जानते और मानते होंगे कि तौफ़ीक़ क़ुरैशी (http://www.taufiqqureshi.com/) अच्छे परकशनिस्ट हैं। उस्ताद अल्लाह रक्खा के बेटे हैं, ज़ाकिर के छोटे भाई हैं और रिदम के धुरंधर हैं। अब तौफ़ीक़ अपने संगीतमय कल्पना के साथ जंगल घूमने का न्यौता दें तो एक बार तजुर्बा ज़रूर करना चाहिए। यही सोचकर ये नया अलबम मिस्टीक साउंडस्केप्स : फॉरेस्ट उठा लाया हूं। संगीत के माध्यम से जंगल और उसके रहस्य की अवतारणा करना मुश्किल काम है। देखते हैं तौफ़ीक़ ने ये काम कैसे किया है।
पहला ट्रैक है
- मॉर्निंग इन फ़ॉरेस्ट। जंगल में एक सुबह। प्ले दबा दिया। सफ़र शुरू होता है। चिड़ियों के चीखते से सुर। डफ़ और ड्रम्स के जरिए घनी , भरी-भरी, कोलाहल सी ध्वनियां। बांसुरी के जंगली से , आवाज़ लगाकर ग़ायब हो जाते से सुर। रह-रह कर एक ऊंचे स्केल पर पुकार लगाती सी इंसानी आवाज़। इस सब के बीच से एक रिदम शुरू होती है। 16 मात्रा का प्रकार। सभी वाद्य, बांसुरी, डफ़, पीछे का बेस और वो इंसानी आवाज़ - एक लय में आ जाते हैं। ऐसा लगता है जैसे जंगल के बीचोबीच किसी कबीले में कोई रहस्यमय अनुष्ठान शुरू हो गया है ..। पीछे का शोर धीरे-धीरे थमता है और फिर एक स्थिरता आती चली जाती है।
दूसरी कंपोज़िशन है
- बर्ड्स आय व्यू। इस संगीत को सुनिए। कल्पनी कीजिए कि आप कहीं ऊंचाई पर हैं। सामने फैला है हरा- भरा, घना जंगल। यहां से वहां तक। और उसके बीच उठती एक रिदम। जिसमें मस्ती है। नाचने-थिरकने का मन करता है। किसी आदिवासी की ऊंची नशीली तान। ताल मूल रूप से दादरा या 6 बीट का प्रकार है। लेकिन इस कंपोजीशन को लीड कर रहा है सैक्सोफोन। जंगल में सैक्सोफोन? ये साज़ किसी क्लब की याद दिलाता है और ये रिदम जंगल की। अजीब सा मेल है। ख़ैर ..ट्रैक सुनने लायक है।
अब आते हैं
- द डीप । ड्यूरेशन के हिसाब से ये सबसे छोटा ट्रैक है। ताल 16 बीट के आस-पास है , लेकिन इसमें मिक्स है तेज़ हवा का इफ़ेक्ट और इंसानी वोकल। इसके समानांतर मेंढक की टर्र-टर्र से मिलता एक साउंड चलता रहता है। इस कंपोजिशन की थीम है- द डीप, ऐसा मानकर सुनिए तो लग सकता है कि किसी रहस्यमय गहराई का चित्रण है। वैसे थीम पर संगीत रचने में यहां संगीतकार कुछ नाकाम सा दिखता है।
अगला ट्रैक, द हंट यानी शिकार। क्रिया भी हो सकता है संज्ञा भी। बहरहाल। एक झन्नाटे के साथ बोल के रूप में ताल शुरू होती है। मध्य लय में एक ताल। यानी 12 बीट्स। धिं धिं धागे तिरकिट तू ना क त्ता धागे तिरकिट धी ना। कुछ दो चार आवर्तनों के बाद लय चौगुन में आ जाती है। बोल का पैटर्न भी बदल जाता है। लेकिन मात्रा बारह ही है। अंत में एक खूबसूरत तिहाई। सुनते हुए आप भूल जाते हैं कि ये किसी थीम पर था। ये ताल का आनंद है।
एनचैंटिंग फ़ॉरेस्ट। यानी आनंद देता जंगल। ट्रैक कुछ नए तरह का है। एक सरसराती सी फीमेल वाएस
..राग तोड़ी पर आधारित आलाप। राग तोड़ी , वही- वतन पे जो फिदा होगा, अमर वो नौजवां होगा। ताल है दस मात्रा। यानी ड्रम्स पर झपताल का पैटर्न। महिला के साथ के एक पुरुष की आवाज़ मिलती है। आलाप जारी रहता है। अंत में मध्य लय में ताल को फ़ॉलो करती थोड़ी सी सरगम। शैली दक्षिण भारतीय गायकी की याद दिलाती है , शायद इसलिए भी कि साथ में वॉयलिन बज रही है। लेकिन कुल मिलाकर ये कंपोज़िशन आंख मूंदकर सुनी जा सकती है। शांति देती है।
द वॉटरहोल।
इसे क्या कहें, पानी का गड्ढा..? शुरू होता है। अरे वाह , ये बढ़िया कंपोज़िशन है। 16 बीट पर ताल के बोलों से शुरूआत होती है। ताल को बोलनेवाला कलाकार सुर भी मेंटेन कर रहा है। इसमें सारंगी जुड़ती है। एक लोकधुन सा आलाप। लगता है जैसे राजस्थान के रेगिस्तान में कोई सारंगीवाला अपनी धुन में बजाता चला जा रहा है। देखें तो यहां भी थीम से पकड़ छूट जाती है - यहां कोई जंगल याद नहीं आता, न ही वॉटरहोल। लेकिन ट्रैक सुनने लायक है। मधुर है।
लाइव स्विंगर्स। मतलब आप ख़ुद लगा लीजिए। यहां तौफ़ीक़ वो सुनाते हैं जिसके उस्ताद वो भी हैं और उनके अग्रज ज़ाकिर हुसैन भी। जी हां,मुंह को गोल करके होठों और गालों पर थपकी देकर ताल निकालना। बैकग्राउंड में किसी पक्षी की चीखती सी आवाज़। महाभारत के क्रौंच पक्षी की याद आती है ...। एक साथ कई लोग मुंह बजा रहे हैं। सोलह मात्रा। तिहाई। उसके बाद तौफीकी आवाज आती है। जमाकर कहरवा के बोल बोलते हुए। इंसानी आवाजों का इंप्रोवाइजेशन है। कहरवा का बेस लेकर उसमें मिक्सिंग। इंस्ट्रुमेंट के नाम पर सम आने पर ड्रम साथ दे रहा है , बाकी सिर्फ़ इंसानी आवाज़े हैं। लेकिन ट्रैक भरा पूरा लगता है। लय तेज़ होती है, ताल का उन्माद बढ़ता है और धीरे -धीरे तिहाई लेते हुए फ़ेड आउट..।
रेवर्ड फ़ॉरेस्ट। मतलब, पूज्य या आदरणीय जंगल? एक श्लोक से ट्रैक शुरू होता है - नवां अरण्यां निर्भन्ति। फिर एक गंवई गवैए की पहाड़ी सी तान। भाषा क्या है, समझ में नहीं आती- शायद मराठी। लेकिन तान कुछ पहाड़ों की याद दिलाती है। श्लोक फिर शुरू होता है- ओम अरण्याय नम: । झाल-करताल जैसी एक रिदम शुरू होती है , कहरवा है शायद। गंवई गवैये की तान, पीछे-पीछे बांसुरी डूबे से सुर। उसके बाद तीन सुरों की हार्मनी बनाते हुए एक आलाप। इनमें ऊपर वाला सुर नुरसत की याद दिलाता है। दो आवर्तन के बाद एक सोलो आवाज़। किसी महिला की आवाज़ है। पकी हुई, रियाज़ी। सुर कभी जयजयवंती की याद दिलाते हैं, कभी तिलक कामोद की। राग पता नहीं क्या है।
आखिरी ट्रैक। कॉल ऑफ द नाइट। रात की पुकार। शुरुआत उन कीटों की आवाज़ से जिन्हें आपने काली अंधेरी,गांव की रातों में सुना होगा। इस कोरस को लीड करती है झींगुर की आवाज़। फिर महिला स्वर में आलाप शुरू होता है। राग यमन के आस -पास। ला-ला-ला के बोलों के साथ लोरी गाती हुई कोई नई नवेली सी मां। एक और फीमेल वाएस में वेस्टर्न म्यूज़िक में आलाप का पैटर्न आता है -चला जाता है। आलाप जारी रहता है। बीच बीच में हार्मनी बनती है। हिंदुस्तानी और वेस्टर्न का सुंदर फ्यूज़न है। ये ट्रैक भी सूदिंग सा है।
और इसी के साथ

- पटाक्षेप।
कुल नौ ट्रैक्स हैं। ज्यादातर अच्छे हैं। सुनिए- आनंद आएगा।

-गिरिजेश

Monday, August 27, 2007

रघुवीर सहाय की कविता 'अधिनायक'

राष्ट्रगीत में भला कौन वह
भारत-भाग्य-विधाता है
फटा सुथन्ना पहने जिसका
गुन हरचरना गाता है।
मखमल टमटम बल्लम तुरही
पगड़ी छत्र चंवर के साथ
तोप छुड़ाकर ढोल बजाकर
जय-जय कौन कराता है।
पूरब-पश्चिम से आते हैं
नंगे-बूचे नरकंकाल
सिंहासन पर बैठा,उनके
तमगे कौन लगाता है।
कौन-कौन है वह जन-गण-मन
अधिनायक वह महाबली
डरा हुआ मन बेमन जिसका
बाजा रोज बजाता है।
-रघुवीर सहाय

Sunday, August 26, 2007

कार्ल मार्क्स की कविता

इतनी चमक-दमक के बावजूद
तुम्हारे दिन तुम्हारे जीवन
को सजीव बना देने के इतने सवालों
के बावजूद
तुम इतने अकेले क्यों हो मेरे दोस्त ?

जिस नौजवान को कविताएं लिखने और
बहसों में शामिल रहना था
वो आज सड़कों पर लोगों से एक सवाल
पूछता फिर रहा है
महाशय, आपके पास क्या मेरे लिए
कोई काम है ?
वो नवयुवती जिसके हक में
जिंदगी की सारी खुशियां होनी चाहिए थी
इतनी सहमी-सहमी व इतनी नाराज क्यों है ?

शहरों में
संगीतकार ने
क्यों खो दिया है
अपना गान ?

अदम्य रोशनी के बाकी विचार भी
जब अंधेरे बादलों से अच्छादित है
जवाब
मेरे दोस्त ..हवाओं में तैर रहे हैं

जैसे हर किसी को रोज का खाना चाहिए
नारी को चाहिए अपना अधिकार
कलाकार को चाहिए रंग और अपनी तूलिका
उसी तरह
हमारे समय के संकट को चाहिए
एक विचार धारा
और एक अह्वान:-

अंतहीन संघर्षों, अनंत उत्तेजनाओं,
सपनों में बंधे
मत ढलो यथास्थिति के अनुसार
मोड़ो दुनिया को अपनी ओर
समो लो अपने भीतर
समस्त ज्ञान
घुटनों के बल मत रेंगों
उठो-
गीत, कला और सच्चाइयों की
तमाम गहराइयों की थाह लो.